गुरुवार, 25 फ़रवरी 2010

'हमरा ना मालूम गुरु जी कौन हैंÓ

रामधनी परहिया को मालूम नहीं है कि शिबू सोरेन कौन हैं। जब उससे पूछा, आपकाविधायक कौन है? उसने सिर्फ इतना ही बताया, कौनो चंद्रवंशी हैं। उनका पूरा नाम क्या है? नाम नइखी जानत। जब पूछा, गुरुजी को जानते हैं। तो उसने पास में बन रहे निर्माणाधीन एनपीएस के मास्टर को समझ लिया। जब कहा, गुरु जी माने शिबू सोरेन। तो उसने अनभिज्ञता प्रकट की और कहा, हमरा ओतना मालूम ना है। फिर, किसी और नेता के बारे में पूछना वाजिब नहीं समझा।

रामधनी परहिया उग्रवाद प्रभावित पांडू प्रखंड के एक गांव घाटतर का रहने वाला है। यह घासीदाग पंचायत के अंतर्गत पड़ता है। इस गांव तक पहुंंचने के लिए जो सड़क गई है वह दो-तीन किमी पहले ही आपका साथ छोड़ देती है। तब दोपहिया वाहन कुछ मदद कर सकता है, लेकिन बस्ती में जाने के लिए तो आपको सड़क से नहीं, पैदल चलकर जाना पड़ेगा। क्योंकि उनके घर तक सड़क गई ही नहीं है। ऊबड़-खाबड़ खेतों से गुजरते हुए इनके घरों तक पहुंचना होता है। लेकिन बरसात में रास्ता खोजना इनके लिए मुश्किल हो जाता है। यह गांव जंगल और पहाड़ की तलहटी में बसा है, जहां कोई साधन नहीं। आजीविका के लिए पूरी आबादी जंगल की लकडिय़ों पर निर्भर है। देवनारायण परहिया की उम्र 30 के आस-पास है। वह निरक्षर है। वह अपने घर से सटे छोटा सा रकबा वाले खेत में हल जोत रहा था। मंगनी के बैल से। उसके पास इतना रुपया नहीं कि अपना बैल रख सके। खेत भी मामूली। नाममात्र के। सो, वह भी जंगल की लकड़ी बेचकर अपना गुजारा करता है। कहता है, एक ग_ïर लकड़ी चालीस से साठ रुपए में बिकती है। पांच लोगों का परिवार। हारी-बीमारी सो अलग। लेकिन इस ग_ïर के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ती है। फिर, गांव से आठ किमी दूर कजरू बाजार में उसे बेचना पड़ता है, जिसमें पूरा दिन लग जाता है। यह रोज का काम है। रोजगार के नाम पर कुछ नहीं। नरेगा के तहत कोई काम नहीं मिला। गांव के 21 लोगों के पास कार्ड, लेकिन अगस्त के बाद आज तक एक छटांक अनाज नहीं मिला। वही हाल केरोसिन का। घासीदाग का डीलर उन्हें आसानी से बेवकूफ बना देता है। गांव में पोल और तार झूल गए हैं, लेकिन पिछले चार महीनों से बिजली के दर्शन नहीं हुए। शासन-प्रशासन के लोग भूल से भी उधर नहीं गुजरते। सो, इनके सुख-दुख की जानकारी उनके पास नहीं है। पांच साल पहले 11 बिरसा आवास इस बस्ती को मिले, लेकिन छप्पर आज तक नहीं पड़ा। हारी-बीमारी इनके लिए जानलेवा ही साबित होती है। क्योंकि सरकारी अस्पताल पांडू में है, लेकिन वहां कोई रहता नहीं। थक-हारकर इन्हें विश्रामपुर प्रखंड में शरण लेनी पड़ती है। इनके पास कोई साधन भी नहीं। करीब बीस किमी पैदल चलकर ये विश्रामपुर पहुंचते हैं। ऐसे में रोगी और उसके परिजनों के पास भगवान पर भरोसे के सिवाय और कोई विकल्प नहीं बचता है। यही हाल लोटो टोला की है। यह टोला घाटतर से आगे है। और छतरपुर प्रखंड में पड़ता है, लेकिन पांडू से जुड़े हैं। यहां पर बैगा जनजाति के बीस-बाइस घर हैं। इनकी आजीविका भी जंगल पर निर्भर है। ललिता देवी कहती है कि गांव में काम नइखे। शिक्षा, चिकित्सा, रोजगार का कोई साधन नहीं। अलबत्ता, देसी शराब की दुकानें जरूर खुल गई हैं। पर, उनके लिए स्वच्छ पानी की व्यवस्था सरकार नहीं कर पाई है। यह कहानी झाटीनाथ, लालीमाटी आदि आधा दर्जन गांवों की है, जो पहाड़ की तलहटी में बसे हैं जहां 'सरकारÓ अभी नहीं पहुंच पाई है। सो, लाल दस्ते ने अपनी पकड़ मजबूत बना ली है। यहां उसी की सरकार चलती है।