सोमवार, 23 अगस्त 2010

मेरे इलाके की धूप-छांव की कथायात्रा

अरुण कुमार : आदिवासी जीवन और समस्याओं पर लिखे इधर के हिंदी उपन्यासों में सर्वेक्षण की दृष्टि प्रधान रही है। कुछ उपन्यास अपवाद हैं, जिनमें सर्वेक्षण बिल्कुल कच्चे माल के रूप में नहीं आया है। मनमोहन पाठक का उपन्यास 'गगन घटा घहरानी', हरिराम मीणा का 'धूणी तपे तीर', मंगल सिंह मुंडा का उपन्यास 'छैला संदु'। अस्सी के दशक में श्रवणकुमार गोस्वामी के उपन्यास 'जंगल तंत्रम' का विषय जंगल के जीव-जंतुओं का संवाद है, जिसे पंचतंत्र की कथा शैली कह सकते हैं। यह समय कथा साहित्य का नहीं है। फिर भी, कथा साहित्य की दुनिया में जितने प्रयोग हो रहे हैं, उतने शायद पहले नहीं हुए होंगे। जब उपन्यास केंद्रीय विधा थी, तब के दौर में आदिवासी जीवन पर लिखे योगेंद्र सिन्हा के उपन्यास 'वन लक्ष्मी', 'वन के मन में' आदि सर्वेक्षण की नहीं थी। एक पूरा गठा कथानक उनके उपन्यास 'वन के मन में' का है। वरिष्ठ कवि विद्याभूषण (वनस्थली के कथापुरुष) ने लिखा है कि यह उपन्यास 'हो' समाज के अंतरंग से आत्मीय परिचय कराता है। इस उपन्यास में 'हो' समाज के संगठन और उनकी परंपराओं का बिल्कुल आंखों देखा चित्र आया है। ये चित्र इतने गठे और सिलसिलेवार हैं कि एक बार 'हो' के बहाने पूरे आदिवासी समाज से अंतरंग होने की इच्छा महसूस होती है। ऐसा लगता है कि एक अधिकारी किसी इलाके में नियुक्त होने के बाद अपनी लिखी डायरी को उपन्यास नहीं बनाता है। ध्यातव्य है कि योगेंद्रजी 1928 में बिहार उड़ीसा वन सेवा में आए थे और बिहार से वन संरक्षक के पद से सेवानिवृत्त हुए थे। एक अधिकारी होने की नीयत से अपने इलाके का सर्वेक्षण उनके कामकाज का हिस्सा होता था। वही ठसक उपन्यास में आ जाए तो वह इतिहास या किसी साहित्येतर विषय की शक्ल ले लेगा।
आज की पीढ़ी का लेखक आत्म विज्ञापन में जीने को अभ्यस्त और कहीं मजबूर भी है। ऐसे में विरासत में मिली पूंजी भी उसकी दिनचर्या से गायब हो सकती है।
मुझसे एक बार उपन्यासकार हरिराम मीणा बोले कि अमुक पत्रिका के संपादक को मेरी अफसरी का अहसास है, लेखक होने का नहीं। मीणा उन थोड़े कथाकारों में हैं जो राजस्थान की भील जनजाति पर उपन्यास लिखने के क्रम में वहां के प्रसिद्ध इतिहासकार गौरीशंकर हीरानंद ओझा जी को भी नहीं बख्शते हैं। बड़ी साफगोई से राजस्थान की जनजातियों में सामाजिक सुधार आंदोलन करने वाले गोविंद गुरु (धूणी तपे तीर) को एक सुगठित कथानक में ढालते हैं। राजस्थान का इतिहास कर्नल टाड ने भी लिखा है और मीणा भी उपन्यास के बहाने लिख रहे हैं। फर्क देखिए, बारीकी का, कल्पना का। कहावत है, सुनसान रातों में महुआ चुपचाप रोता है। तथ्य है कि गर्मी में भी महुआ के पत्तों से पानी की बूंदें गिरती हैं। और उपन्यासकार की नजर कितनी दूर तक है कि जंगल के सियार भी रो रहे हैं। धूणी तपे तीर के नायक गोविंद गुरु की मानसिक संरचना में त्वरित विद्रोह के लिए कोई स्थान नहीं है। भगवान ने ओले बरसा दिए, फसलें नष्ट हो गई। गोविंद गुरु का किसानों को संदेश है। करम प्रधान जगत रचि राखा। गोविंद गुरु राजपूताने के राजा और ब्रिटिश राज की मैत्री पर हमला करता है। वह आदिवासियों को संगठित करता है। 1898-1900 की अवधि में दक्षिणी राजपूताने (मेवाड़, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़) में भारी अकाल पड़ा और अपराधकर्म में काफी वृद्धि हुई। अंग्रेज सरकार ने अपराधिक जनजाति अधिनियम के तहत आदिवासियों को सूचीबद्ध कर दिया। इस पूरे प्रसंग को मीणा एक कारीगर की तरह बुनते हैं। आदिवासियों को गोविंद गुरु का एक मंत्र है फिरंगियों, महाराजा और ब्राह्मणों की तिकड़ी के खिलाफ एकजुट होना है। गोविंद गुरु का त्वरित क्रांति में विश्वास नहीं है। मानगढ़ पहाड़ की तलहटी में जमा हुए गोविंद गुरु और उनके शिष्यों की टोली से किसी आदिवासी किसान ने कहा, 'ओ गुरु महाराज, यह तो अच्छा सगुन है। मोर ने चार बार बोल दिए हैं। इसका मतलब आषाढ़ से कुआर तक चार महीने अच्छी बारिश होगी।'
धूणी तपे तीर में ऐसे प्रसंग कथानक के प्रवाह के क्रम में इस कुशलता के साथ विन्यस्त हुए हैं कि कोई इसे इतिहास की धरोहर भी न समझे, आंकड़ों का खेल भी न समझे और आदिवासी समाज को गुड्डों-गुडि़यों का खजाना भी नहीं मान लें।
मीणा का यह उपन्यास आदिवासियों के आंदोलन के लिए वैचारिक धरातल बनाता है, जिस ओर झारखंड के किसी उपन्यासकार का ध्यान नहीं गया है। विस्थापन की कथा सभी कहते हैं। परंतु उसकी जड़ तक पहुंचने और संगठन बनाने के विचार में वे पीछे रह जाते हैं। झारखंड के उपन्यासकार मंगल सिंह मुंडा के उपन्यास 'छैला संदु' में लोककथा के बहाने पूरी बस्ती के उजाड़ दिए जाने का विवरण ठोस सूत्रों में है। जैसे, सूबेदार हकीम सिंह के संभावित हादसे से आतंकित बस्ती के मवेशियों का रातोंरात कूच कर जाना इत्यादि। और फिर इसके बाद बस्ती किसानों और मवेशियों की कूच यात्रा का वर्णन और उसके साथ बदल रही प्रकृति इतने सिलसिलेवार तरीके से आई है कि जैसे पुराने समय के बायस्कोप की रील घूम रही हो। इसके बावजूद मुंडा बिरादरी में प्रचलित लोककथा की तासीर को बचाए रखने में अपनी पूरी मेहनत झोंक देते हैं। इसलिए इस उपन्यास में आदिवासियों की सामाजिक और राजनीतिक पृष्ठभूमि उतनी पसार नहीं छेकती है। फिर भी, उपन्यास में मुंडा बिरादरी में प्रचलित लोककथा को तीन खंडों (बाल लीला, प्रेमलीला और मृत्युलीला) में जिस तकनीक से सजाया गया है, उससे मुंडा जाति में शुरुआती दौर के परिवार की दृष्टि मिलती है।
मंगल सिंह मुंडा उस दौर की कथा कहते हैं जब मुंडा क्या किसी भी गांव-कस्बे में बाहर के किसी आदमी के आने को शक की निगाह से देखा जाता था। घटना यह है कि उपन्यास का नायक छैला अपने इलाके के सूबेदार हकीम सिंह की बेटी से प्रेम करता है। छैला पर बुंदी को भगाने का आरोप है। सूबेदार उसकी तलाश में आदिवासियों की बस्ती उजाड़ देता है।
रांची जमशेदपुर मार्ग का तमाड़ इलाका और उसके दक्षिण में कांची नदी पर मनोहर जलप्रपात (दशम) और उस पर टिका है मंगल सिंह मुंडा का उपन्यास छैला संदु। छैला संदु की कथा प्रेमकथा है। मुझे लगता है कि समय गुजरने के साथ इस प्रेमकथा पर अनेक पैबंद लगे होंगे। मंगल उस समय कथा कहते हैं, जब खेती के उत्पाद और साधन बहुत विकसित नहीं थे। छैला संदु में छैला की अनेक प्रेमिकाएं हैं, कहें गोपियां। मुंडारी साहित्य में कृष्ण काव्य की परंपरा समृद्ध रही है। इस लोक कथा पर उसकी छाप है। इसलिए बाल लीला और प्रेम लीला वाले खंड में बाहरी तत्वों (दिकुओं) के उस इलाके में प्रवेश को लेकर भारी रोष फैल जाता है। बाल लीला की जो प्रेमकथा है, उसमें बाहरी तत्वों की चर्चा नहीं है। प्रेम लीला में इस चर्चा के यह संकेत हैं कि छैला की प्रेमकथा में वक्त दर वक्त अनेक पैबंद जुड़े होंगे।
खैर, हाल ही में राकेश कुमार सिंह की एक कहानी आई है, अंधेरे से अंधेरे तक। कहानी पलामू के जनजातीय समाज की पीड़ा बयान करती है। पीड़ा है, प्लास्टिक के आम हो जाने पर तुरी का पारंपरिक रोजगार छिन जाता है। बांस का सामान बनाना मंदा पड़ने लगा। अब प्लास्टिक के टोकरे आ गए। लोहसारी का काम मंदा पड़ा। अब वहां के लोग बंदूक बनाने का काम करते हैं। ये है बाजार की तानाशाही।
लोकतांत्रिक व्यवस्था के आने के बाद प्रत्येक बिरादरी को अपने समाज की रीत-कुरीति की जांच परख करनी चाहिए। कोई जरूरी नहीं कि पिछड़े या प्रगतिशील बिरादरी की हर रीति को आदिवासी समझ गले लगा लेना चाहिए। योगेंद्र सिन्हा के उपन्यास 'वन के मन' में हो समाज में हो रहे आर्थिक और सामाजिक परिवर्तनों के साथ उस समाज के अच्छे बुरे रस्म-रिवाजों का बहुत सुंदर विवरण आया है। इसका आभास हाल के कथा-साहित्य में भी मिलता है। राजनीति की अपेक्षा साहित्यकारों की परिकल्पना में आदिवासी समाज बिखरी सामाजिक आर्थिक इकाई नहीं है। उसे अपने संसाधनों का विकास करना होगा। आदिवासियों के जीवन पर लिखे साहित्य में एक बड़ा भाग इस आशय का जरूर है।
ध्यातव्य है कि आदिवासी समाज में एक तरह का विकास और सामाजिक तंत्र नहीं मिलता है। कहीं खेती बहुत पहले आई (झारखंड) और संपन्न है तो कहीं वह बहुत बाद में आई। इसलिए वहां का सामाजिक तंत्र अपने भीतर सिमटा हुआ है। इस या शायद पिछले वर्ष प्रकाशित प्रकाश मिश्र के उपन्यास 'रूपतिल्ली की कथा' में पूर्वोत्तर प्रांत की पहाड़ी रूपतिल्ली के निकट बसने वाली जनजाति समाज की पीड़ा है। यह उपन्यास मिजोरम की पृष्ठभूमि पर है। इस इलाके के कबीले में हर काम-काज, हर निर्णय सामूहिक तौर पर होते हैं। नेतृत्व भी उनके बीच से ही उभरता है। यहां बहुपति प्रथा भी है। यौन संबंध बनाने की छूट है। इस समाज की पीड़ा है, इसका आत्मस्वावलंबन। अपने में ही यह समाज बिल्कुल सिमटा हुआ है। इसकी जरूरतें अपने ही समाज से पूरी हो जाती हैं। वह दूसरे समाज की ओर क्यों देखे? ऐसे समाज में खेती का पर्याप्त विकास नहीं हुआ है। इसलिए इनके यहां अब भी गाय का बछड़ा, सूअर आदि काटने और उसे सामूहिक रूप से खाने और नृत्य करने का रिवाज है। प्रकाश मिश्र के इस उपन्यास में मिजोरम की खासी जनजाति में संपन्न कृषि के अभाव का ब्यौरा आया है। मजा ये इनके द्वारा भूमि पर मालिकाना हक हर साल बदलता है। हर साल उस कबीले के राजा और पुजारी की सलाह से उस जमीन का आवंटन होता है। इस आलोक में देखें तो आदिवासी समाज के विकास के लिए एक स्वतंत्र नीति बनाने की आवश्यकता है। परंतु नई धारा के साथ उसका जुड़ाव भी उतना ही आवश्यक है।
लेखक हिंदी के जाने-माने समीक्षक हैं। वसुधा के 1857 अंक का संपादन। सिनेमा पर भी लगातार लेखन।

दर्द, दमन, दहशत के बीच सोसाकुटी

संजय कृष्ण :उ (नक्सली) दिने पिटेला इ (नक्सली) राइते पिटेला। यह दर्द अकेले लुडू देवी का नहीं है। उन जैसी सैकड़ों औरतें इसी दर्द, दमन और दहशत के बीच दिन और रात गुजारने को विवश हैं। लुडू देवी रांची जिले के इटकी प्रखंड के सोसाकुटी गांव की रहने वाली है। इस गांव का कसूर यह है कि इसी गांव का गुरुवा लोहार नक्सली है। अब पुलिस पूरे गांव के साथ नक्सलियों के साथ जैसा व्यवहार करती है। किसी का किवाड़ तोड़ देना, अनाज छींट देना, पके भात को चूल्हे में ही पलट देना..आदि-आदि। और, गांव में किसी लड़की ने सूट-सलवार पहन रखा हो तो, पुलिस की नजर में उसका नक्सली होना काफी है। ललिता कुमारी की उम्र 12-13 साल है। मां बचपन में ही गुजर गई। पिता हैं। सो, पढ़ाई बीच में ही छूट गई। पिछले आठ जुलाई, गुरुवार को जब सौ से ऊपर की संख्या में पुलिस बल पहुंचा तो गांव वालों के साथ उसने यही सलूक किया। ललिता ने स्कर्ट पहन रखा था। पुलिस ने सवाल दागा.क्या गुरुवा ने दिया तेरे को। जिस उम्र की दहलीज पर ललिता है, उसे क्या पता यह गुरुवा कौन है? गांव में दहशत का आलम यह है कि कोई गाड़ी यदि बिना हार्न बजाए घुस रही हो तो गांव के लोग भागकर छिपने लगते हैं। फ्रेंडली पुलिस का यह दहशत है। गांव की ही ऐतवारी, शशिकला की कहानी भी यही है। लुडू को बेटा विपुल लोहरा, जो नवयुवक छऊ नृत्य पार्टी में काम करता है, 19 जून को छऊ मुहानी से उठा ले गई। पिता सुखराम लोहरा कहते हैं कि मामला जब अखबार में आया तब जाकर उसे जेल भेजा गया। सोसाकुटी गांव का टोला है सोसोहातु। सड़क से सिंदरी गांव और उसके पीछे सोसोहातु। गांव तक जाने के लिए कोई सड़क नहीं। न बिजली न सिंचाई का कोई साधन। पूरी तरह बारिश पर निर्भर। इस गांव में उस बासंती से उसका दर्द पूछिए, जिसे पुलिस शादी की रात ही उसके पति सत्यनारायण मुंडा को उठा ले गई। शादी करने अपनी ब्याहता को ले आया था। घर का एकलौता चिराग। सो, पिता ने जश्न में कोई कोताही नहीं बरती। देर रात तक चला पार्टी..। क्या पता था कि कुछ घंटों में पार्टी का रंग फीका हो जाएगा..। पुलिस पहले भी उसे गिरफ्तार कर जेल भेज चुकी थी। आरोप यही था कि वह दस्ते को लेवी की रकम वसूल कर और अन्य सामान पहुंचाता है। इधर, वह हालांकि वह खेती-बारी कर रहा था। लेकिन पुलिस..। उसके पिता धान सिंह मुंडा कहते हैं कि हम लोगों की स्थिति इधर कुआं, उधर खाई जैसी हो गई है। क्या करें, कहां जाए?

सोमवार, 9 अगस्त 2010

प्रतिरोध की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति हैं आदिवासी भाषाएं

अश'्रिवनी कुमार पंकज :
'देश में अगर किन्हीं लोगों के साथ सबसे अधिक बुरा व्यवहार हुआ है तो वे मेरे लोग हैं। पिछले 6000 वषरें के दौरान उनके साथ असम्मानजनक व्यवहार हुआ है और उनकी उपेक्षा हुई है।''
- जयपाल सिंह मुण्डा (19 दिसम्बर 1946 को संविधान सभा में)
स्वतंत्रता, न्याय, समानता और भागीदारी, लोकतंत्र के इन चारों आयामों के संदर्भ में भारत के आदिवासी जनों का अनुभव नीम से भी ज्यादा कड़वा है। लगभग जहर जैसा। वे न सिर्फ औपनिवेशिक काल में छले, लूटे व मारे गये, बल्कि स्वतंत्र भारत में भी आंतरिक उपनिवेश बने हुए हैं। वे अपने तमाम संसाधनों से बेदखल किये गए, भाषा-संस्कृति से विस्थापित हुए और बड़े पैमाने पर धार्मिक रूपांतरण का शिकार बने। आधुनिकीकरण और विकास के पहले चरण में जहां उन्हें अदृश्य युद्धों (विस्थापन) में सब कुछ खो देना होता है, वहीं संस्कृतिकरण से पीढ़ी दर पीढ़ी धीमे-धीमे मरते रहना पड़ता है। पिछले 350 वषरें से इस आदिवासी दोहन, लूट, नरसंहार और संस्कृतिकरण की प्रक्त्रिया में कोई शिथिलता नहीं आई है। यदि कुछ शिथिल हुआ भी है, तो वह है संविधान और लोकतंत्र।
भारत ही नहीं, पूरी दुनिया में आदिवासी समुदायों के साथ शासक वगरें का यही विश्वासघाती रवैया रहा है। आधुनिक नगरीय जीवन की चमक-दमक और विकास का मायाजाल (शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार) लेकर वे आदिवासी दुनिया में प्रवेश करते हैं और उनसे उनका सबकुछ (स्वतंत्रता, आत्मनिर्णय का अधिकार, सांस्कृतिक अस्मिता) छीनकर उन्हें अपना शासित बना लेते हैं। इसके बाद उनके ऊपर एक ऐसी सांस्कृतिक व्यवस्था आरोपित कर दी जाती है, जिससे उनकी इतिहास चेतना हमेशा-हमेशा के लिए कुंद हो जाए और वे कभी भी प्रतिरोध की हिम्मत नहीं जुटा पाएं। न्यूगी वा थ्योंगो कहते हैं, 'औपनिवेशिक ताकतें अपने आर्थिक और राजनीतिक नियंत्रण को ज्यादा से ज्यादा मुकम्मल रूप देने के लिए सांस्कृतिक परिवेश पर अपना नियंत्रण बनाने की कोशिश करती हैं। शिक्षा, धर्म, भाषा, साहित्य, गीत, नृत्य के विविध रूप, अभिव्यक्ति के प्रत्येक रूप आदि पर नियंत्रण करके वे जनता के समग्र मूल्यों पर नियंत्रण हासिल कर लेती हैं और अंतत: जनता के विश्वदृष्टिकोण पर भी उनका नियंत्रण हो जाता है और इसी के अधीन लोग खुद को परिभाषित करने लगते हैं।' (न्गुगी वा थ्योंगो: भाषा, संस्कृति और राष्ट्रीय अस्मिता, पृष्ठ 54)
भाषा-संस्कृति का सवाल सीधे-सीधे सांस्कृतिक अस्मिता और आर्थिक-राजनीतिकी स्वायत्तता से जुड़ा है। अगर आज समूची दुनिया के प्रथम नागरिकों का अस्तित्व खतरे में है, तो इसके कारण उस 'ऐतिहासिक अन्याय' में निहित हैं, जिसके लिए विकसित देशों (आस्ट्रेलिया आदि) को आज अपने मूल निवासियों एवं आदिवासियों से माफी मांगनी पड़ रही है। इस ऐतिहासिक अन्याय के कारण ही भारत के 699 आदिवासी समुदायों में से 52 का पूरी तरह से खात्मा हो चुका है। यही नहीं वे आज भी भारतीय राजसत्ता और कॉरपोरेट घरानों के हिटलिस्ट में सबसे पहले नंबर पर हैं। वे आधुनिक दुनिया की शुरुआत के समय से ही 'विकास' का सबसे पसंदीदा शिकार रहे हैं। उन्होंने राष्ट्र निर्माण की प्रक्त्रिया में सबसे ज्यादा कीमत चुकायी है और देश के किसी भी नागरिक समुदाय की तुलना में सबसे कम पाया है। जहां तक भारत के आम गरीब-वंचित जनता की बात है तो तथ्य यह भी है कि 'सत्ता हस्तांतरण' के 62 सालों बाद भी जनता का 80 प्रतिशत हिस्सा 20 रुपये प्रतिदिन या उससे कम पर गुजर बसर कर रहा है। वहीं सबसे धनी 100 परिवारों की कुल आय देश के जीडीपी का 25 प्रतिशत है। ये तथ्य हमें भारतीय शासकवर्ग की जनता के जीवन और स्वतंत्रता के प्रति प्रतिबद्धता के बारे में संदेह करने के लिए बाध्य करते हैं।
आदिवासियों के इस संदेह को स्वाधीनता प्राप्ति (सत्ता हस्तांतरण) के समय ही जयपाल सिंह मुण्डा ने तीखी अभिव्यक्ति प्रदान की थी। जब उन्होंने 19 दिसम्बर 1946 को संविधान सभा में ऑब्जेक्टिव्स रिजॉल्युशन पर बोलते हुए यह कहा था, 'मैं भी सिंधु घाटी की सभ्यता की ही एक संतान हूं और उसका इतिहास बताता है कि आप में से अधिकांश बाहर से आए हुए घुसपैठिए हैं। जहां तक हमारी बात है, बाहर से आए हुए लोगों ने हमारे लोगों को सिंधु घाटी से जंगल की ओर खदेड़ा। हम लोगों का समूचा इतिहास बाहर से यहां आए लोगों के हाथों निरंतर शोषण और बेदखल किए जाने का इतिहास है। .. इसके बावजूद मैं पंडित जवाहर लाल नेहरू की बात पर यकीन करता हूं, मैं आप सबकी इस बात पर यकीन करता हूं कि हम एक नए अध्याय की शुरुआत करने जा रहे हैं। स्वतंत्र भारत का एक नया इतिहास जहां अवसरों की समानता होगी, जहां किसी की उपेक्षा नहीं की जाएगी।' पर हम देखते हैं कि स्वाधीन भारत में आदिवासियों की इस उम्मीद और विश्वास को कोई तरजीह नहीं दी गई। सिर्फ भाषा का उदाहरण ही लें तो 1961 की जनगणना के अनुसार भारत में 1652 भाषाएं थीं। 2001 में यह संख्या घटकर मात्रा 234 रह गई। अर्थात् पिछले चार दशक में भारत 1418 भाषाएं खो चुका है। हो सकता है कि यह आंकड़ा कुछ कम हो, क्योंकि इसमें उन भाषाओं की गिनती से बाहर रखा गया है, जिन्हें बोलनेवालों की संख्या दस हजार से कम है। फिर भी यह आंकड़ा तेजी से सिकुड़ रहे भाषाई गणतंत्र और विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र 'भारत' की अत्यंत भयावह तस्वीर पेश करता है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि पिछले 40 वषरें में विलोपित हुए भाषाई समुदायों को सामाजिक, राजनीति, आर्थिक, सांस्कृतिक सहित जीवन के सभी स्तरों पर जबरदस्त आघातों से गुजरना पड़ा है, जिनकी सुरक्षा-संरक्षण का उल्लेख भारतीय संविधान में किया गया है। साथ ही जब हम यूनेस्को द्वारा फरवरी 2008 में जारी 'खतरे में पड़ी भाषाओं का विश्व-मानचित्र' देखते हैं, जिसके अनुसार भारत की 196 भाषाओं का अस्तित्व खतरे में है तो पाते हैं कि भाषाई, जातीय व सांस्कृतिक घृणा, उपेक्षा और भेदभाव की यह प्रक्त्रिया निर्बाध रूप से जारी है। यूनेस्को की एक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में सबसे तेज़ी से भाषाओं के ग़ायब होने की दर भारत में ही है। इसके बाद नंबर आता है अमेरिका का, जहां 192 ऐसी भाषाएं हैं और फिर तीसरे नंबर पर है इंडोनेशिया, जहां 147 भाषाएं दम तोड़ रही हैं। यूनेस्को के अध्ययन के मुताबिक हिमालयी राज्यों जैसे हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड में करीब 44 भाषाएं-बोलियां ऐसी हैं, जो जन-जीवन से गायब हो रही हैं, जबकि उड़ीसा, झारखंड, बिहार और पश्चिम बंगाल में ऐसी करीब 42 भाषाएं विलुप्त हो रही हैं। भाषाओं का इस भयानक तेजी के साथ अदृश्य होते जाना सामाजिक विविधता के लिए भी चिंता की बात है। विशेषकर, ग्लोबलाइजेशन के बाद समाज के सभी आयामों में उन समुदायों के प्रति हिंसा-दमन का दौर पहले से और बर्बर, और अधिक तीव्र हुआ है, जो मुख्यधारा से बाहर की भाषाएं बोलते हैं। ये वे लोग हैं, जो भारत की कुल जनसंख्या के मात्र 8.4 प्रतिशत हैं (लगभग साढ़े आठ करोड़), लेकिन संसाधनों की दृष्टि से देश के सबसे समृद्ध समुदाय हैं।
इन समृद्धशाली समुदायों के साथ भेदभाव का इतिहास बहुत पुराना है। वैदिक काल से लेकर अब तक के लिखित साहित्य में उनके अमानवीय शोषण, दोहन, और दमन की अंतहीन कहानियां बिखरी पड़ी हैं। 'माओवाद से देश की आंतरिक सुरक्षा को खतरा' के नाम पर पिछले वर्ष से आदिवासी इलाकों में शुरू हुआ 'ऑपरेशन ग्रीन हंट' रक्तरंजित इतिहास और सत्ता के दमनकारी कारवाइयों की सबसे ताजा बर्बर कड़ी है। गौर करने लायक बात यह है कि माओवाद (नक्सलवाद) उन इलाकों में संगठित है, जो इलाके देश में सबसे ज्यादा खनिज सम्पदा से भरे पूरे हैं, लेकिन साथ ही साथ वहां रहने वाले आदिवासी समुदायों की गरीबी और बेरोजगारी चरम पर है। ये वे इलाके हैं, जिनका निजी और सरकारी कंपनियों ने पूरा दोहन किया है, परंतु छोड़ा सिर्फ विस्थापन, भुखमरी, गरीबी व संस्कृतिकरण है। ऑपरेशन ग्रीन हंट इसलिए चलाया जा रहा है, क्योंकि इन क्षेत्रों में खनिज और खनिज आधारित उद्योगों के लिए किये गये सैकड़ों करारों (एमओयू) के क्त्रियान्वयन में आदिवासी एवं अन्य स्थानीय समुदाय जबरदस्त प्रतिरोध पैदा कर रहे हैं। इस प्रतिरोध को कमजोर किये बिना भारत सरकार की खनिज और साथ ही उसकी एफडीआई नीति कार्यान्वित नहीं हो सकती है। छत्तीसगढ़, झारखंड, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल की सरकारों ने कॉरपोरेट घरानों के साथ कई खरब डॉलर के सैंकड़ों समझौतों पर दस्तखत किये हैं। स्टील प्लांट, स्पंज आयरन फैक्टरी, पावर प्लांट, एल्युमिनियम रिफाइनरी, बांधों और खदानों के लिए किये गये ये सारे समझौते गोपनीय हैं। लिहाजा यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि कांग्रेस, बीजेपी, और सीपीएम में 'निवेश और त्वरित आर्थिक विकास के लिए' अनुकूल वातावरण बनाने के प्रश्न पर आम सहमति है। स्पष्ट है कि ऑपरेशन ग्रीन हंट भारत के उन प्रथम नागरिकों के अस्तित्व को बर्बरतापूर्वक कुचल देने की कार्रवाई है, जो अन्यायपूर्ण विकास का विरोध करते हैं, राज्य प्रायोजित हिंसा के खिलाफ खड़े हैं तथा अपने पूर्वजों की धरोहर को बचाकर रखना चाहते हैं।

ेदेश के पहले आदिवासी उपन्यासकार थे मेनस ओड़ेया


संजय कृष्ण : देश के पहले आदिवासी उपन्यासकार थे मेनस ओड़ेया (1884-1968)और पहला उपन्यास है 'मतुराअ: कहनि'। उपन्यास प्राचीन मुंडारी में 1920 के आस-पास लिखा गया। हालांकि यह बीसवीं शताब्दी के पिछले दशक में यानी 1984 में प्रकाशित हुआ, लेकिन लिखा गया बीसवीं शताब्दी के आरंभिक दशकों में। एक लंबा अंतराल लिखने और छपने के बीच। कारण, 1700 पृष्ठों का होना और भाषा मुंडारी। कोई प्रकाशक तैयार नहीं। कैसे छपे उपन्यास। कौन थे मेनस और कहां से मिली उपन्यास लिखने की प्रेरणा? कहानी बड़ी दिलचस्प है।
मेनस ओड़ेया 'इनसाइक्लोपीडिया आफ मुंडारिका' के संकलनकर्ता फादर हाफमैन के स्टेनो थे। करीब पांच हजार पेजों की सामग्री उन्होंने टंकित की थी। टंकण के समय ही यह विचार आया, क्यों न इन सामग्रियों से एक उपन्यास की रचना कर दूं, उनकी भाषा में उनके लिए। इसी बीच विश्वयुद्ध छिड़ गया। फादर जर्मन थे। सो, अंग्रेजों ने उन्हें अपने वतन लौटने का हुक्म सुना दिया। फादर जर्मनी अपने गांव लौट गए और वहीं से सामग्री रांची भेजते फिर पटना जाता छपने के लिए। कहते हैं, फादर अंतिम दिनों में गठिया से ग्रसित हो गए थे और उन्हें टाइप करने में काफी दिक्कत होती थी। एक छोटी सी हथौड़ी के सहारे वे टाइप करते। एक अक्षर टाइप करने में कई मिनट लग जाता। फिर भी, उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। यह संयोग देखिए कि इनसाइक्लोपीडिया का अंतिम भाग डिस्पैच जिस दिन भेजा, उसके दूसरे दिन उनकी मृत्यु हो गई। उन्होंने अंतिम डिस्पैच करते समय लिखा, 'ईश्वर को धन्यवाद कि अब मुझको टाइप नहीं करना पड़ेगा।' रांची छोड़ने से पहले फादर सर्वदा मिशन खूंटी में रहते थे और यहीं पर मेनस भी उनके साथ रहते थे। एक बार भगवान बिरसा ने इस मिशन पर हमला कर दिया था। सौभाग्य से दोनों बच गए। उस समय भगवान बिरसा का आंदोलन चरम पर था। मेनास ने भगवान के आंदोलन को भी नजदीक से देखा था। वे खुद भी मुंडा थे। सो, अपने समाज के बारे में जानते थे। रही-सही कसर फादर के शोध अध्ययन से पूरा कर लिया। यहीं से उपन्यास का बीज पड़ा- 'मतुराअ: कहनि'। इस उपन्यास के केंद्र में नायक मतुरा है। मतुरा खूंटी के पास एक नई बस्ती बसाता है। उस बस्ती में एक ही गोत्र के लोग रहते हैं। धीरे-धीरे दूसरे गोत्र के लोग भी पहुंचते हैं और बस्ती बड़ी होने लगती है। अब नई बस्ती की जरूरत पड़ती है। पाहन पहाड़ों से पत्थरों को लुढ़काता है। गांव का सीमांकन किया जाता है। मुंडा गांवों को ससनदिरि (श्मशान का पत्थर) ही विभाजित करता है। यहीं से कहानी शुरू होती है। हिंदी-मुंडारी भाषा के विद्वान और इस उपन्यास को प्रकाशित कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले प्रो दिनेश्वर प्रसाद ने इस कृति के बारे में लिखा है, 'मथुरा की कहानी मुंडा जीवन का महाभारत है। महाभारत के विषय में कहा जाता है, यन्न भारते तन्न भारते। यानी जो महाभारत में नहीं, वह भारत में भी नहीं। यह उपन्यास भी कुछ ऐसा ही महत्व रखता है। यह उपन्यास की शक्ल में मुंडा जीवन का विश्वकोश है। इसमें मुंडा समाज, संस्कृति एवं इतिहास की प्रत्येक जानकारी उपलब्ध है।' मेनस का अंतिम दिन कष्ट में बीता। वे लोगों के स्नायु और हड्डी जोड़ आदि बीमारियों का इलाज कर अपना जीवन यापन करते थे। लंबा कद और गठा शरीर था। खैर, उनके जीते जी पुस्तक प्रकाशित नहीं हो सकी। 1934 में फादर पोनेट रांची आए। इन्होंने भी मुंडारी भाषा पर काफी काम किया। बहुत प्रयास किया इसके प्रकाशन के लिए, पर वे अपने जीवन के अंतिम काल में ही इसे प्रकाशित करवा सके कैथोलिक प्रेस से। फिलहाल, इसके हिंदी अनुवाद को लेकर प्रो दिनेश्वर प्रसाद और अश्विनी कुमार पंकज सक्रिय हैं।