रविवार, 26 सितंबर 2010

...ताकि जंगल खाली हो जाए

केंद्र सरकार की नजर में माओवादी आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौती के रूप में उभरे हैं। लेकिन सरकार के इस चुनौती का खामियाजा आदिवासियों को उठाना पड़ा रहा है। क्योंकि ये आदिवासी एक ओर माओवादियों से त्रस्त हैं तो दूसरी ओर आपरेशन ग्रीन हंट के जवानों से। वे दो पाटों के बीच ऐसे पीस रहे हैं कि उनकी आजीविका, जल, जंगल, जमीन सब कुछ हाथ से निकलता जा रहा है। और, शायद सरकार की यही मंशा है, ताकि जंगल-जमीन खाली हो जाएं और उन्हें कारपोरेट कंपनियों को सौंपा जा सके। कुछ इसी तरह की बातें शनिवार को एसडीसी सभागार में उभरकर आईं। झारखंड अल्टरनेटिव डवलपमेंट फोरम की ओर से आयोजित दो दिवसीय संगोष्ठी एवं जन सुनवाई के पहले दिन वक्ताओं और पीडि़तों की आपबीती से यही लगा। कार्यक्रम में दिल्ली से आए सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता प्रशांत भूषण, मशहूर लेखिका व एक्टिविस्ट अरुधंती रॉय, पूर्व डीजीपी एसके सुब्रमण्यम, पूर्व न्यायाधीश विक्रमादित्य प्रसाद आदि ने धैर्य से लोगों की बातें सुनीं। संगोष्ठी का विषय था इंडिपेंडेंट पीपुल्स ट्राइब्यूनल ऑन आपरेशन ग्रीन हंंट।
नक्सलवाद लॉ एंड आर्डर की समस्या नहीं है : रामदयाल
विषय की शुरुआत करते हुए राज्यसभा सांसद डा. रामदयाल मुंडा माओवाद को सतह की बजाय नजदीक से देखने की अपील करते हुए कहा कि यह महज लॉ एंड आर्डर की समस्या नहीं है। समस्या के पीछे लंबी उपेक्षा और प्रताडऩा है। ग्रीन हंट के नाम पर भी यही हो रहा है। सरकार विकास को लेकर प्रतिबद्ध नहीं है। आदिवासी क्यों माओवादियों के साथ हैं, यह सोचने की जरूरत है। आदिवासियों की अस्मिता, पहचान, जल, जंगल, जमीन सब कुछ दांव पर लगा है। पर, सरकार को बदल देने का एजेंडा आदिवासियों का नहीं है, इसे भी समझना चाहिए। मुंडा ने आज के विकास मॉडल पर प्रश्न उठाते हुए कहा कि इससे किसका विकास हो रहा है? आदिवासियों का या अधिकारियों का? विकास पर राशि खर्च हो रही है, क्या उससे विकास हो रहा है? हमें लाइन के इस पार और उस पार दोनों ओर देखना है। मुंडा ने राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की बैठक का हवाला देते हुए कहा कि प्रधानमंत्री से कहा कि इससे समस्या का समाधान नहीं होगा। इसे खतरा और बढ़ेगा ही। हमें लोगों को विश्वास में लेकर ही कोई काम करना होगा।
सवाल पहचान और स्वायत्तता का है : संजय बुस मलिक
जंगल बचाओ आंदोलन के अगुवा संजय बसु मलिक ने माओवाद को संदर्भित करते हुए सवाल उठाया कि आदिवासियों का एजेंडा क्या है? जबाव भी दिया, स्वायत्तता। अपना शासन, अपना कानून। उन्होंने कौटिल्य का उल्लेख करते हुए कहा कि अर्थशास्त्र में कौटिल्य में आदिवासियों पर बहुत लिखा है। जिसमें यह भी है कि राष्ट्र तभी पनप सकता है जब आदिवासियों को जीत लें। केंद्र की सरकार यही काम कर रही है। उनके जल, जंगल, जमीन पर वह आपरेशन के जरिए कब्जा करना चाहती है। मलिक ने तेलंगना, तेभागा और नक्सलवाड़ी का भी जिक्र करते हुए आदिवासियों की समस्याएं उठाई। आदिवासी क्यों माओवादियों के साथ हैं। इस पर कहा कि नक्सलवाड़ी आंदोलन में भी जंगल संताल साथ थे जो आदिवासी थे। कभी आदिवासी माओवादियों के साथ हो लेते हैं, कभी माओवादी आदिवासियों के साथ। ऐसी स्थिति के लिए केंद्र की सरकारें ही जिम्मेदार हैं।
...वे कत्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होती : बीपी केशरी झारखंड आंदोलन के बौद्धिक अगुवा डा. बीपी केशरी ने अपनी बात की शुरुआत उक्त शेर से की। कहा, एक देश में कई देश हैं। गरीब-शोषितों, पीडि़तों की सुनने वाला कोई नहीं। न सरकार न पुलिस। राज्य में औपनिवेशिक विकास हो रहा है। यहां के लोग पलायन कर रहे हैं। बाहरी आकर बस रहे हैं। यह विकास का मॉडल नहीं, विनाश का है। जो इसके खिलाफ आवाज उठाता है, वह माओवादी करार दिया जाता है। आपरेशन ग्रीन हंट आदिवासियों के लिए चलाया जा रहा है, न कि माओवादियों के लिए। सरकार ने सैकड़ों एमओयू किया है। धरातल पर एक भी नहीं उतरा। इसे उतारने के लिए जरूरी है कि प्रतिरोध की शक्ति को खत्म कर दिया जाए। उन्होंने जोर देकर कहा, विकास का रंगरूप बदलना चाहिए और यह दिल्ली में नहीं गांव में बनेगा।
विकास को लेकर प्रतिबद्ध क्यों नहीं है सरकार : एलेक्स एक्का 
एक्सआईएसएस के निदेशक एलेक्स एक्का ने बड़ा मौजू सवाल उठाया। कहा, केंद्र की सरकार जितनी प्रतिबद्ध आपरेशन ग्रीन हंट को लेकर है, उतनी प्रतिबद्धता विकास को लेकर दिखाई होती तो यह स्थिति पैदा नहीं होती। उन्होंने कहा, दुर्भाग्य यह है कि जिस देश में ब्लाक स्तर पर अधिकारी हों, उसका विकास नहीं हो पाता। इसकी जिम्मेदारी किसकी है? मोटी-मोटी तनख्वाह क्यों इन्हें दी जाती है? ब्लाक में न डाक्टर न शिक्षक। यह किसकी जवाबदेही है? क्या सरकार ने ऐसे लोगों पर कभी कार्रवाई की है? विकास का कहां चला जा रहा है, इसकी छानबीन कभी की है? अच्छा शासन आप दे नहीं सकते। लेकिन आपरेशन चलाकर आदिवासियों का खात्मा जरूर करेंगे।
15 लाख हो गए विस्थापित : स्टेन स्वामी 
स्टेट स्वामी ने कहा आजादी के बाद सूबे से 15 लाख लोगों का विस्थापन हुआ। ये कहां गए, पता नहीं। अनौपचारिक रूप से तीन लोग और विस्थापित हुए। 15 लाख एकड़ जमीन गई, विकास के नाम पर। पर किसका विकास हुआ? आदिवासियों की जमीन की रक्षा के लिए कानून बने हैं। 5वीं अनुसूची है, लेकिन उनकी जमीन की रक्षा नहीं हो पा रही है। कानून उन्हें मुंह चिढ़ा रहा है। सरकार यूएपीए के तहत लोगों को जेल में ठूस रही है। कई को फर्जी मुठभेड़ में मारकर वाह-वाही लूटी जा रही है। इससे क्या शांति स्थापित हो सकती है? क्या हम झारखंड को अशांत नहीं बना रहे हैं? इस मौके पर आरती कुजूर ने कई घटनाओं का उल्लेख किया। संंचालन पीपी वर्मा ने किया।
पीडि़तों ने सुनाई पीड़ा
दूसरे सत्र में पुलिस ज्यादतियों के शिकार लोगों ने अपनी पीड़ा सुनाई। जीतन मरांडी की पत्नी अर्पण मरांडी ने पति की गिरफ्तारी की कहानी सुनाई। तमाड़ के जगमोहन सिंह मुंडा ने क्रास फायरिंग में अपनी बेटी के मारे जाने की मर्मांतक पीड़ा का बयान किया। खूंटी के पौलूस बागे ने भी सीआरपीएफ की ज्यादतियों के बारे में बताया। पलामू छतरपुर से आए दशरथ यादव ने पुलिस कस्टडी में अपने बेटे के मारे जाने की पीड़ा बयान की। इसके अलावा भी कई लोगों ने अपनी पीड़ा सुनाई। इस दूसरे सत्र का संचालन ग्लैडसन डुंगडुंग ने किया। 

समाज से जुड़े हैं नक्सली : अरुंधती राय

जानी-मानी लेखिका अरुंधती रॉय ने माओवाद और भारत सरकार की शल्य चिकित्सा करते हुए कहा कि समाज से तो नक्सली जुड़े हुए हैं, लेकिन सरकार आजादी के बाद से आज तक नहीं जुड़ सकी। जुड़ी होती तो माओवाद पैदा ही नहीं होता।
अरुधंती रविवार को एसडीसी सभागार में 'इंडिपेंडेंट पीपुल्स ट्राइब्यूनल ऑन आपरेशन ग्रीन हंटÓ विषय पर जनसुनवाई के बाद अपनी बात रख रही थीं। कार्यक्रम का आयोजन झारखंड वैकल्पिक विकास मंच ने किया था।
विकास और नरसंहार का क्या कोई रिश्ता है? अरुधंती ने कहा औपनिवेशिक युग में विकास के लिए नरसंहार होते रहे हैं। यह रिश्ता बहुत पुराना है। जो भी आज विकसित देश बने हैं, वे अपने पीछे नरसंहार छोड़ आए हैं। लैटिन अमेरिका, दक्षिण अफ्रिका आदि देशों में विकास के लिए बड़े पैमाने पर नरसंहार किए गए। अपने देश में भी सरकार विकास के लिए आदिवासियों का नरसंहार कर रही है। आपरेशन ग्रीन हंट इसीलिए चलाया जा रहा है। इसके जरिए सरकार आदिवासियों की जमीन अधिग्रहण कर कारपोरेट कंपनियों को देना चाहती है। वे धरती के गर्भ में छिपे बाक्साइट को कंपनियों के हवाले करना चाहते हैं। इससे किसका विकास होगा? देश का? नहीं। इससे कंपनियां मालामाल हो जाएंगी, हो रही हैं। सरकार के हाथों कुछ नहीं आएगा। रॉय ने कहा, देश में नई स्थिति है। अब अपने देश में ही आदिवासी क्षेत्रों में नई कालोनियां बनाई जा रही हैं। यह आंतरिक उपनिवेशवाद है।
अरुंधती ने कांग्रेस और भाजपा के समान चरित्र का उद्घाटन करते हुए कहा कि दोनों में एक ही तरह का जेनोसाइड है। यानी भाजपा के लिए हिंदुत्व पहले है और आर्थिक फासीवाद दूसरे नंबर पर है जबकि कांग्रेस के लिए पहले नंबर पर आर्थिक फासीवाद और दूसरे नंबर पर है हिंदुत्व। दोनों के लिए इंडिया चमक रहा है। यही वजह है कि देश के सौ करोड़पतियों के पास देश की संपत्ति का 25 प्रतिशत है।
रॉय ने 1986 के बाद का जिक्र करते हुए कहा कि देश और देश के बाहर कई घटनाएं घटीं। अफगानिस्तान पर अमेरिका ने अपना प्रभाव जमा लिया। उस समय पूरी दुनिया बदल गई। और, इसी समय दो घटनाएं हुई। बाबरी मस्जिद का ताला खुलना और देश में बाजार का प्रवेश। देश कहा खड़ा है, यह दिखाई दे रहा है। उदारीकरण का जिक्र करते हुए रॉय ने कहा कि नरसिंहा राव सरकार ने इंटरनेशल मानेटरी से लोन लिया। उसने दो शर्तों पर लोन दिया। 1. दुनिया के लिए बाजार खोलना व निजीकरण करना और 2. हमारे आदमी को वित्तमंत्री बनाना। उस समय रॉव ने मनमोहन सिंह को वित्तमंत्री बनाया, जिन्हें देश में उदारीकरण का जनक माना जाता है। देश कहां जा रहा, यह सबको पता है। इन बीस सालों में बीस रुपए रोज पर गुजारा करती है अस्सी करोड़ आबादी। इसी को हम विकास कह रहे हैं। यही कारण है कि न्यायालय, संसद, प्रेस सब कुछ खोखला हो गया है। लेकिन इन सबके बीच आशा की किरण भी हैं। रॉय ने झारखंड को संदर्भित करते हुए कहा कि यहां बड़े-बड़े कारपोरेट कंपनियों को छोटे-छोटे किसानों ने रोक रखा है। सौ एमओयू हुए हैं, लेकिन धरातल पर कोई नहीं उतरा। यहां के लोगों को मैं सलाम करती हूं। रॉय ने कहा, विकास होना चाहिए लेकिन दिल्ली में बैठकर योजना बनाने वालों की तर्ज पर नहीं। विकास के लिए आदिवासियों के पास जाना चाहिए। उनके मॉडल का विकास होना चाहिए। एक प्रश्न के जवाब में अरुंधती रॉय ने कहा कि हम माओवादियों के हर कदम का समर्थन नहीं करते हैं। इंदुवार फ्रांसिस व लुकस टेटे की हत्या की घोर निंदा करते हैं। यह यह क्रांतिकारिता नहीं है। कस्टडी में किसी की भी मौत हो, उसकी निंदा करती हूं।
इसके पहले शनिवार को बातचीत करते हुए राय ने कहा कि सरकार जंग चाहती है। ऐसा नहीं होता तो आजाद की हत्या नहीं होती। एक ओर बातचीत की तैयारी दूसरी ओर हत्या। यह दोनों बातें एक साथ नहीं हो सकती। उन्होंने छत्तीसगढ़ का उल्लेख करते हुए कहा कि सरकार चाहती है कि सलवा जुडूम के जरिए गांव के गांव खाली हो जाएं, ताकि जमीन को कारपोरेट कंपनियों के हवाले कर दिया जाए। एक सवाल के जवाब में कहा कि गरीबों का निवाला छिना जा रहा है। उनकी जमीन, जल, जंगल सबकुछ छीनी जा रही है। इसके लिए सरकार ने दो लाख जवानों को लगा रखा है। क्या लड़ाई गांधीवादी तरीके से नहीं लड़ी जा सकती। रॉय ने कहा, अब समय बदल गया है। वह दौर खत्म हो चुका है कि भूख हड़ताल से समस्या का समाधान होगा। जो खुद भूखे हैं, वह कैसे भूख हड़ताल करेंगे। अब तो लड़ाई दो तरफा है। कौन किस तरफ है या होगा, यह महत्वपूर्ण है। उन्होंने सरकार को कठघरे में खड़ा करते हुए कहा कि सरकार असंवैधानिक तरीके से काम कर रही है। वह कानून का उल्लंघन कर आदिवासियों की जमीन छिन रही है, जबकि माओवादी संविधान की रक्षा कर रहे हैं। वे आदिवासियों के हक में लड़ रहे हैं। जल, जंगल, जमीन की रक्षा कर रहे हैं। कश्मीर के सवाल पर उन्होंने कहा कि कश्मीर समस्या बहुत पेचीदा हो गया है। समाधान के लिए हमें कश्मीरियों की आवाज सुननी होगी। समस्या का समाधान तभी होगा।

शनिवार, 18 सितंबर 2010

नागार्जुन कवि थे, कैडर नहीं

 नागार्जुन को क्या किसी बद्ध आंखों से देखा जा सकता है, क्या उन्हें विचारधारा के कठघरे मे खड़ा कर उनकी कोई मुकम्मल तस्वीर बनाई जा सकती है। क्या कविकर्म और दुनियादारी में कोई फर्क है। जब हम नागार्जुन के रचना संसार पर दृष्टि डालते हैं,तो ऐसे असहज सवालों का सामना करना पड़ता है। हिंदी के प्रख्यात आलोचक व वागर्थ के संपादक विजय बहादुर सिंह ने इन्हीं सवालों के जवाब ढूंढऩे की कोशिश शुक्रवार को सीसीएल के विचार कक्ष में की। दूरदर्शन, रांची द्वारा आयोजित नागार्जुन पर दो दिवसीय विचार गोष्ठी का समापन करते हुए डा. सिंह ने कहा कि नागार्जुन को देखना हो तो निगाहें खोलकर देखिए। अक्सर होता यह है कि हम अपने-अपने चश्मे से देखने लगते हैं। ऐसे में उन सात अंधों की तरह हम हाथी की तरह अपने-अपने ढंग से व्याख्या करने लगते हैं। नागार्जुन विचारधारा के कायल कभी नहीं रहे। कवि और कैडर में अंतर होता है। कवि अपने दिल की आवाज सुनता है और कैडर की। नागार्जुन कवि थे, कैडर नहीं। उनके लिए विचारधारा से पहले राष्ट्र था। यही, वजह है कि चीन आक्रमण पर उन्होंने उसके खिलाफ कविताएं लिखी।
विषय प्रवेश कराते हुए डा. खगेंद्र ठाकुर ने नागार्जुन के जीवन की कई घटनाएं सामने रखीं। डा. ठाकुर ने बताया कि साहित्य का कथ्य समाज में पैदा होता है और फिर साहित्य में स्थान पाता है। बलचनमा प्रेमचंद के गोदान से आगे की कथा है, जहां नायक खेत मजदूर है। नागार्जुन  लिखते ही नहीं, लड़ाई में शरीक भी होते हैं। अमवारी में किसान आंदोलन की अगुवाई हो या फिर जेपी आंदोलन...। उन्होंने कहा कि नागार्जुन का साहित्य चिंतन को प्रेरित करता है। और उनके पात्र अंधेरे में रोशनी पैदा करने वाले हैं। इस मौके पर रांची के सिद्दीक मुजीबी, अशोक प्रियदर्शी, अलीगढ़ से आए डा. वेद प्रकाश, दिल्ली से विष्णु नागर, पटना से आए अलोचना के संपादक अरुण कमल ने भी अपने विचार रखे। अरुण कमल ने कहा कि नागार्जुन की रचनाओं को ध्यान में रखते हुए उनकी जीवनी लिखी जानी चाहिए।

नक्सलवाद में सरोकार थे, माओवाद में फिसलन

'पुरस्कार अच्छा लगता है।Ó यह प्रतिक्रिया है सुपरिचित कथाकार जयनंदन की। वे मंगलवार को रांची आए थे राजभाषा पुरस्कार लेने। पर, मलाल यह था कि वरिष्ठ लेखक नहीं आए पुरस्कार लेने। आते तो अच्छा लगता। 26 फरवरी, 1956 को नवादा (बिहार) में जन्मे जयनंदन की अब तक तेरह पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। 'श्रम एव जयतेÓ, 'ऐसी नगरिया में केहि विधि रहनाÓ, 'सल्तनत की सुनो गांव वालोÓ। ये सभी उपन्यास है। आठ कहानी संग्रह भी प्रकाशित हो चुके हैं और दो नाटक। 1983 में पहली कहानी 'नागरिक मताधिकारÓ छपी सारिका में। तब से छपने का सिलसिला रुका नहीं। कहानी लिखना चुनौतीपूर्ण है अपेक्षाकृत उपन्यास के। ऐसा जयनंदन मानते हैं। कहते हैं, कहानी में सब कुछ समेटना होता है। थोड़े में बहुत कुछ कहना। उपन्यास में विस्तार की गुंजाइश होती है। शाखाएं, उपशाखाएं, प्रतिशाखाएं...निकलती रहती हैं। कहानी में यह अवकाश नहीं है। फिलहाल, जयनंदन टाटानगर पर उपन्यास लिख रहे हैं। युवा कथाकारों की आई नई पौध को लेकर संतुष्ट हैं। वे कहते हैं, उनकी प्रतिभा, लेखन शैली और विषय की विविधता ध्यान आकर्षित करती है। नक्सलवाद व माओवाद को लेकर कहते हैं, नक्सलवाद में वैचारिक प्रतिबद्धता थी, सामाजिक सरोकार थे। माओवाद में विकृति है। सैद्धांतिक फिसलन है। हिंसा का अतिरेक है। जयनंदन कहते हैं, इनसे सत्ता ही टकरा सकती है, लेकिन सत्ता का जो चरित्र है, वह संदेह पैदा करता है। कई नेता उन्हीं की बदौलत विधायक-सांसद बनते हैं। फिर, वे कैसे कार्रवाई करेंगे? दूसरी ओर, साहित्य केवल दिशा दे सकता है। सीधे टकरा नहीं सकता। वह वायुसेना की तरह हवाई हमला ही कर सकता है। वायुसेना थल सेना की मदद करती है। वैसे ही लेखक मदद कर सकता है। आपरेशन ग्रीन हंट से माओवाद का खात्मा हो सकता है? कहते हैं, इससे कुछ नहीं होगा। सिस्टम बदले। भ्रष्टाचार रुके। बेरोजगारी दूर हो। तभी इस नासूर बन चुकी समस्या का स्थाई समाधान हो सकेगा। अन्यथा बालू में लकीर खींचते रहेंगे। जयनंदन सधे कथाकार हैं। टाटा स्टील की गृह पत्रिका का संपादन करते हैं। राधाकृष्ण पुरस्कार, विजय वर्मा कथा सम्मान, बिहार सरकार राजभाषा सम्मान और भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा युवा लेखक प्रकाशन सम्मान पा चुके हैं। कहानियों का कई भाषाओं में अनुवाद और नाटकों का आकाशवाणी और विभिन्न संस्थाओं द्वारा प्रसारण व मंचन हो चुका है। असहमति लिखने को प्रेरित करती है। ऐसा जयनंदन मानते हैं।
                                                                                                                                           संजय कृष्ण

संघर्ष की भूमि पर खड़ा है बाबा का साहित्य

बाबा नागार्जुन की जन्मशती पर रांची दूरदर्शन द्वारा आयोजित दो दिवसीय संगोष्ठी 'नागार्जुन का रचना संसारÓ के पहले दिन गुरुवार को सीसीएल के विचार कक्ष में रचना और कविताओं को लेकर लंबी चर्चा चली। वरीय पत्रकार हरिवंश से लेकर शीन अख्तर, अरुण कमल, विश्वनाथ त्रिपाठी, विजय बहादुर सिंह, मदन कश्यप, रामदयाल मुंडा, वीपी केशरी, रविभूषण, विष्णु नागर सहित दर्जनभर से ऊपर कवि-समालोचकों ने नागार्जुन के रचना संसार पर हर ओर-छोर से दृष्टि डाली। शीन अख्तर ने शुरुआत की और बहस की जमीन हरिवंश ने तैयार की। कहा, साहित्य-संस्कृति के बिना कारपोरेट कंपनियां भी नहीं चल सकतीं। इसके बाद दिल्ली से आए वरिष्ठ आलोचक डा. विश्वनाथ त्रिपाठी ने कई कोणों से नागार्जुन को देखने की कोशिश की। बताया कि वे जनकवि थे। उनकी प्रतिबद्धता आम जनता के प्रति थी। अध्यक्षता करते हुए 'आलोचनाÓ के संपादक व कवि अरुण कमल उनकी कविता, यात्रावृत्तांत, उपन्यास आदि पर चर्चा करते हुए यह स्थापित करने का प्रयास किया कि बाबा का संपूर्ण साहित्य संघर्ष की भूमि पर खड़ा है।
 बताया, सरहपा से होते हुए कबीर, नजीर अकबराबादी, मुकुटधर पांडेय, निराला के नए पत्ते की पूरी परंपरा नागार्जुन में मौजूद है। कमल ने बहुत विस्तार से अपने विचार रखते हुए उनकी संस्कृत, बांग्ला, मैथिली कविताओं की प्रासंगिकता उद्धरण के साथ रेखांकित की। उन्होंने इस ओर भी ध्यान दिलाया कि वे हिंदी के ऐसे जादूगर हैं, जहां भाषा के कई रूप मौजूद हैं। तुम खिलो रात की रानी और मंत्र कविता से लेकर बाकी बच गया अंडा तक...।
निष्कर्ष यह कि वे निरंतर प्रतिपक्ष के कवि थे। कमल ने उनके उपन्यास बलचनमा के बारे में बताया कि इसमें गोदान से आगे की कथा है, जहां भूमिहीन खेतिहर मजदूर हैं। बाबा बटेसर नाथ, जमनिया क बाबा की भी चर्चा की। पहले सत्र का संचालन नाटककार विनोद कुमार ने किया।
दूसरा सत्र नागार्जुन की कविताओं को समर्पित था। रविभूषण ने विषय प्रवर्तन किया। अपने 40 मिनट के व्याख्यान में नागार्जुन के अड़सठ सालों की रचनायात्रा की चर्चा करते हुए कहा कि नागार्जुन की कविताओं के कई पाठ हो सकते हैं। दलित, स्त्री, आदिवासी, उत्तर आधुनिक आदि-आदि। किसी ने प्रश्न उठाया था कि झारखंड में नागार्जुन क्यों? रविभूषण ने बड़ा सटीक जवाब दिया। कहा, नागार्जुन ने मुंडा, उरांव को तब याद किया जब उनकी चर्चा कहीं नहीं थी। पद्मश्री डा. रामदयाल मुंडा ने राहुल के बाद नागार्जुन को सबसे बड़ा यायावर बताया। मौके पर एक मुंडारी गीत भी सुनाया, जिसका आशय था सब एक हैं। सबको समन्वित करो। भोपाल से आए ओम भारती ने परंपरा और आधुनिकता के बरक्स उनकी कविताओं को देखा-परखा। वहीं, कवि व द पब्लिक एजेंडा के साहित्य संपादक मदन कश्यप ने व्यापक जन सरोकारों का उल्लेख किया। मुुंबई से आए आलोचक विजय कुमार ने नागार्जुन को फकीर और साधु कहा। कई तरह के अंत की घोषणा के बरक्स विजय ने नागार्जुन की कविताओं को समझने की कोशिश की। बीपी केशरी ने हिंदी कवियों और आलोचकों का ध्यान इस ओर आकर्षित किया कि आप गरीबों पर भी नजर डालिए। नागार्जुन की परंपरा को आगे बढ़ाइए। 'वागर्थÓ के संपादक व विशिष्ट अतिथि विजय बहादुर सिंह, जो बाबा के बहुत निकट रहे हैं, बहुत स्पष्ट कहा कि बाबा को कवि-लेखक के दायरे से बाहर निकल कर देखने की जरूरत है। किताबी तौर पर बाबा को नहीं देखा जा सकता। इससे हम खंडित नागार्जुन को देख पाएंगे। समग्र रूप से देखने के लिए उनकी हर कविता को पढ़ा जाना चाहिए। अध्यक्षीय उद्बोधन विष्णु नागर ने दिया। इस सत्र का संचालन माया प्रसाद ने किया। इसके पूर्व सभी अतिथियों को पुष्पगुच्छ व शॉल ओढ़ाकर सम्मानित किया गया।