रविवार, 26 सितंबर 2010

...ताकि जंगल खाली हो जाए

केंद्र सरकार की नजर में माओवादी आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौती के रूप में उभरे हैं। लेकिन सरकार के इस चुनौती का खामियाजा आदिवासियों को उठाना पड़ा रहा है। क्योंकि ये आदिवासी एक ओर माओवादियों से त्रस्त हैं तो दूसरी ओर आपरेशन ग्रीन हंट के जवानों से। वे दो पाटों के बीच ऐसे पीस रहे हैं कि उनकी आजीविका, जल, जंगल, जमीन सब कुछ हाथ से निकलता जा रहा है। और, शायद सरकार की यही मंशा है, ताकि जंगल-जमीन खाली हो जाएं और उन्हें कारपोरेट कंपनियों को सौंपा जा सके। कुछ इसी तरह की बातें शनिवार को एसडीसी सभागार में उभरकर आईं। झारखंड अल्टरनेटिव डवलपमेंट फोरम की ओर से आयोजित दो दिवसीय संगोष्ठी एवं जन सुनवाई के पहले दिन वक्ताओं और पीडि़तों की आपबीती से यही लगा। कार्यक्रम में दिल्ली से आए सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता प्रशांत भूषण, मशहूर लेखिका व एक्टिविस्ट अरुधंती रॉय, पूर्व डीजीपी एसके सुब्रमण्यम, पूर्व न्यायाधीश विक्रमादित्य प्रसाद आदि ने धैर्य से लोगों की बातें सुनीं। संगोष्ठी का विषय था इंडिपेंडेंट पीपुल्स ट्राइब्यूनल ऑन आपरेशन ग्रीन हंंट।
नक्सलवाद लॉ एंड आर्डर की समस्या नहीं है : रामदयाल
विषय की शुरुआत करते हुए राज्यसभा सांसद डा. रामदयाल मुंडा माओवाद को सतह की बजाय नजदीक से देखने की अपील करते हुए कहा कि यह महज लॉ एंड आर्डर की समस्या नहीं है। समस्या के पीछे लंबी उपेक्षा और प्रताडऩा है। ग्रीन हंट के नाम पर भी यही हो रहा है। सरकार विकास को लेकर प्रतिबद्ध नहीं है। आदिवासी क्यों माओवादियों के साथ हैं, यह सोचने की जरूरत है। आदिवासियों की अस्मिता, पहचान, जल, जंगल, जमीन सब कुछ दांव पर लगा है। पर, सरकार को बदल देने का एजेंडा आदिवासियों का नहीं है, इसे भी समझना चाहिए। मुंडा ने आज के विकास मॉडल पर प्रश्न उठाते हुए कहा कि इससे किसका विकास हो रहा है? आदिवासियों का या अधिकारियों का? विकास पर राशि खर्च हो रही है, क्या उससे विकास हो रहा है? हमें लाइन के इस पार और उस पार दोनों ओर देखना है। मुंडा ने राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की बैठक का हवाला देते हुए कहा कि प्रधानमंत्री से कहा कि इससे समस्या का समाधान नहीं होगा। इसे खतरा और बढ़ेगा ही। हमें लोगों को विश्वास में लेकर ही कोई काम करना होगा।
सवाल पहचान और स्वायत्तता का है : संजय बुस मलिक
जंगल बचाओ आंदोलन के अगुवा संजय बसु मलिक ने माओवाद को संदर्भित करते हुए सवाल उठाया कि आदिवासियों का एजेंडा क्या है? जबाव भी दिया, स्वायत्तता। अपना शासन, अपना कानून। उन्होंने कौटिल्य का उल्लेख करते हुए कहा कि अर्थशास्त्र में कौटिल्य में आदिवासियों पर बहुत लिखा है। जिसमें यह भी है कि राष्ट्र तभी पनप सकता है जब आदिवासियों को जीत लें। केंद्र की सरकार यही काम कर रही है। उनके जल, जंगल, जमीन पर वह आपरेशन के जरिए कब्जा करना चाहती है। मलिक ने तेलंगना, तेभागा और नक्सलवाड़ी का भी जिक्र करते हुए आदिवासियों की समस्याएं उठाई। आदिवासी क्यों माओवादियों के साथ हैं। इस पर कहा कि नक्सलवाड़ी आंदोलन में भी जंगल संताल साथ थे जो आदिवासी थे। कभी आदिवासी माओवादियों के साथ हो लेते हैं, कभी माओवादी आदिवासियों के साथ। ऐसी स्थिति के लिए केंद्र की सरकारें ही जिम्मेदार हैं।
...वे कत्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होती : बीपी केशरी झारखंड आंदोलन के बौद्धिक अगुवा डा. बीपी केशरी ने अपनी बात की शुरुआत उक्त शेर से की। कहा, एक देश में कई देश हैं। गरीब-शोषितों, पीडि़तों की सुनने वाला कोई नहीं। न सरकार न पुलिस। राज्य में औपनिवेशिक विकास हो रहा है। यहां के लोग पलायन कर रहे हैं। बाहरी आकर बस रहे हैं। यह विकास का मॉडल नहीं, विनाश का है। जो इसके खिलाफ आवाज उठाता है, वह माओवादी करार दिया जाता है। आपरेशन ग्रीन हंट आदिवासियों के लिए चलाया जा रहा है, न कि माओवादियों के लिए। सरकार ने सैकड़ों एमओयू किया है। धरातल पर एक भी नहीं उतरा। इसे उतारने के लिए जरूरी है कि प्रतिरोध की शक्ति को खत्म कर दिया जाए। उन्होंने जोर देकर कहा, विकास का रंगरूप बदलना चाहिए और यह दिल्ली में नहीं गांव में बनेगा।
विकास को लेकर प्रतिबद्ध क्यों नहीं है सरकार : एलेक्स एक्का 
एक्सआईएसएस के निदेशक एलेक्स एक्का ने बड़ा मौजू सवाल उठाया। कहा, केंद्र की सरकार जितनी प्रतिबद्ध आपरेशन ग्रीन हंट को लेकर है, उतनी प्रतिबद्धता विकास को लेकर दिखाई होती तो यह स्थिति पैदा नहीं होती। उन्होंने कहा, दुर्भाग्य यह है कि जिस देश में ब्लाक स्तर पर अधिकारी हों, उसका विकास नहीं हो पाता। इसकी जिम्मेदारी किसकी है? मोटी-मोटी तनख्वाह क्यों इन्हें दी जाती है? ब्लाक में न डाक्टर न शिक्षक। यह किसकी जवाबदेही है? क्या सरकार ने ऐसे लोगों पर कभी कार्रवाई की है? विकास का कहां चला जा रहा है, इसकी छानबीन कभी की है? अच्छा शासन आप दे नहीं सकते। लेकिन आपरेशन चलाकर आदिवासियों का खात्मा जरूर करेंगे।
15 लाख हो गए विस्थापित : स्टेन स्वामी 
स्टेट स्वामी ने कहा आजादी के बाद सूबे से 15 लाख लोगों का विस्थापन हुआ। ये कहां गए, पता नहीं। अनौपचारिक रूप से तीन लोग और विस्थापित हुए। 15 लाख एकड़ जमीन गई, विकास के नाम पर। पर किसका विकास हुआ? आदिवासियों की जमीन की रक्षा के लिए कानून बने हैं। 5वीं अनुसूची है, लेकिन उनकी जमीन की रक्षा नहीं हो पा रही है। कानून उन्हें मुंह चिढ़ा रहा है। सरकार यूएपीए के तहत लोगों को जेल में ठूस रही है। कई को फर्जी मुठभेड़ में मारकर वाह-वाही लूटी जा रही है। इससे क्या शांति स्थापित हो सकती है? क्या हम झारखंड को अशांत नहीं बना रहे हैं? इस मौके पर आरती कुजूर ने कई घटनाओं का उल्लेख किया। संंचालन पीपी वर्मा ने किया।
पीडि़तों ने सुनाई पीड़ा
दूसरे सत्र में पुलिस ज्यादतियों के शिकार लोगों ने अपनी पीड़ा सुनाई। जीतन मरांडी की पत्नी अर्पण मरांडी ने पति की गिरफ्तारी की कहानी सुनाई। तमाड़ के जगमोहन सिंह मुंडा ने क्रास फायरिंग में अपनी बेटी के मारे जाने की मर्मांतक पीड़ा का बयान किया। खूंटी के पौलूस बागे ने भी सीआरपीएफ की ज्यादतियों के बारे में बताया। पलामू छतरपुर से आए दशरथ यादव ने पुलिस कस्टडी में अपने बेटे के मारे जाने की पीड़ा बयान की। इसके अलावा भी कई लोगों ने अपनी पीड़ा सुनाई। इस दूसरे सत्र का संचालन ग्लैडसन डुंगडुंग ने किया।