शनिवार, 18 सितंबर 2010

नागार्जुन कवि थे, कैडर नहीं

 नागार्जुन को क्या किसी बद्ध आंखों से देखा जा सकता है, क्या उन्हें विचारधारा के कठघरे मे खड़ा कर उनकी कोई मुकम्मल तस्वीर बनाई जा सकती है। क्या कविकर्म और दुनियादारी में कोई फर्क है। जब हम नागार्जुन के रचना संसार पर दृष्टि डालते हैं,तो ऐसे असहज सवालों का सामना करना पड़ता है। हिंदी के प्रख्यात आलोचक व वागर्थ के संपादक विजय बहादुर सिंह ने इन्हीं सवालों के जवाब ढूंढऩे की कोशिश शुक्रवार को सीसीएल के विचार कक्ष में की। दूरदर्शन, रांची द्वारा आयोजित नागार्जुन पर दो दिवसीय विचार गोष्ठी का समापन करते हुए डा. सिंह ने कहा कि नागार्जुन को देखना हो तो निगाहें खोलकर देखिए। अक्सर होता यह है कि हम अपने-अपने चश्मे से देखने लगते हैं। ऐसे में उन सात अंधों की तरह हम हाथी की तरह अपने-अपने ढंग से व्याख्या करने लगते हैं। नागार्जुन विचारधारा के कायल कभी नहीं रहे। कवि और कैडर में अंतर होता है। कवि अपने दिल की आवाज सुनता है और कैडर की। नागार्जुन कवि थे, कैडर नहीं। उनके लिए विचारधारा से पहले राष्ट्र था। यही, वजह है कि चीन आक्रमण पर उन्होंने उसके खिलाफ कविताएं लिखी।
विषय प्रवेश कराते हुए डा. खगेंद्र ठाकुर ने नागार्जुन के जीवन की कई घटनाएं सामने रखीं। डा. ठाकुर ने बताया कि साहित्य का कथ्य समाज में पैदा होता है और फिर साहित्य में स्थान पाता है। बलचनमा प्रेमचंद के गोदान से आगे की कथा है, जहां नायक खेत मजदूर है। नागार्जुन  लिखते ही नहीं, लड़ाई में शरीक भी होते हैं। अमवारी में किसान आंदोलन की अगुवाई हो या फिर जेपी आंदोलन...। उन्होंने कहा कि नागार्जुन का साहित्य चिंतन को प्रेरित करता है। और उनके पात्र अंधेरे में रोशनी पैदा करने वाले हैं। इस मौके पर रांची के सिद्दीक मुजीबी, अशोक प्रियदर्शी, अलीगढ़ से आए डा. वेद प्रकाश, दिल्ली से विष्णु नागर, पटना से आए अलोचना के संपादक अरुण कमल ने भी अपने विचार रखे। अरुण कमल ने कहा कि नागार्जुन की रचनाओं को ध्यान में रखते हुए उनकी जीवनी लिखी जानी चाहिए।