गुरुवार, 30 दिसंबर 2010

वरिष्ठ कथाकार युवाओं को नहीं पढ़ते हैं : अनुज


संजय कृष्ण :  रांची की दीपिका कुमारी ने तीरंदाजी से देश का मान ही नहीं बढ़ाया है, उसने अपने संघर्ष से कथाकारों की नई पीढ़ी को भी प्रभावित किया है। अनुज नई पीढ़ी के कथाकार हैं। परिकथा के नए अंक में उनकी कहानी 'टार्गेटÓ आई है। कहानी दीपिका पर लिखी गई है, लेकिन क्रिकेट की चकाचौंध से इतर हाशिए पर जाते खेलों की चिंता भी कहानी में दर्ज है। अनुज रांची में हैं। बुधवार की शाम फिरायालाल की गहमगहमी के बीच दो पल बात करने का मौका मिला। उनके साथ थे युवा कथाकार पंकज मित्र, परिकथा के संपादक शंकर व अनुज के बहनोई डा. डीके सहाय। पूछता हूं, दिल्ली में रहते हुए रांची की दीपिका का ख्याल कैसे आया? बड़ी शाइस्तगी से कहते हैं, पहली बात तो यह खेल केंद्र में नहीं है। हाशिए पर चल रहा है। अखबारों के जरिए पता चला कि दीपिका के पिता रांची में आटो चलाते हैं। सो, इससे बेहतर कोई विषय नहीं हो सकता कहानी के लिए। और, इस तरह टार्गेट पाठकों के बीच आई। कहानी के केंद्र में दीपिका तो है ही लेकिन यहां उस ओर ध्यान दिलाया गया कि कैसे किसी की उपलब्धि को हमारे नेता 'इनकैशÓ करते हैं। मीडिया में भी नेताओं की बातें ज्यादा आईं। उसकी प्रतिभा, उसका संघर्ष नजरअंदाज कर दिया गया। मीडिया हाशिए के लोगों की नोटिस नहीं ले रहा है। जबकि उसे सपोर्ट करना चाहिए। अनुज कहते हैं, मीडिया का काम विचार बनाना है। उसे दिशा देना है।
कहानी के वर्तमान दौर पर चर्चा होती है। काशीनाथ सिंह चर्चा में हैं। सवाल वहीं से उठाता हूं। वरिष्ठ कथाकार काशीनाथ सिंह कहते हैं, युवा कथाकारों के पास जमीन नहीं है। वह कहां से लिख रहे हैं, कहां के रहने वाले हैं, कहानी में पता नहीं चलता। इस बात से कितना इत्तेफाक रखते हैं।
अनुज थोड़े गंभीर होते हैं। लंबी सांस छोड़ते हैं। फिर जवाब देते हैं। कहते हैं, उनकी (काशीनाथ सिंह) मजबूरी यह है कि वह किन कारणों से, शायद उम्र का तकाजा हो, वे पढ़ते नहीं हैं। दावे के साथ कह सकता हूं कि चाहे काशीनाथ सिंह हों, या उनकी पीढ़ी के दूसरे कथाकार, जो बड़े लोग हैं, उनमें बहुत कम लोग ऐसे हैं, जिन्होंने युवा कहानी या कहानीकारों पर टिप्पणी करते हुए, या करने से पहले युवाओं को पढ़ा है। दूसरी बात, पुरानी पीढ़ी में असुरक्षा की भावना है। उन्हें लगता है कि उनकी सत्ता अब खत्म हो रही है, उन्होंने जो कुछ लिखा है, वह सब युवाओं के आने के बाद खत्म हो रहा है, हालांकि ऐसा है नहीं। काशीनाथ सिंह युवा कथाकारों को मानवविरोधी कहते हैं, जो कहीं से भी स्वीकार्य नहीं है। अनुज कहते हैं, काशीनाथ सिंह से सवाल पूछा जाना चाहिए कि अगर नए लोगों ने कुछ नया नहीं लिखा है तो किए नए की अपेक्षा करते हैं। अनुज पूछते हैं, जो पुरानी पीढ़ी के लोग हैं, उनमें इतनी बेचैनी क्यों है कि युवा कहानीकार कुछ नहीं कर रहे हैं?
अनुज मौजूं सवाल उठाते हैं कि अभी तक पुरानी पीढ़ी का ही मूल्यांकन ठीक से नहीं हुआ है तो, अभी से कैसे तय हो गया कि युवा कुछ नहीं लिख रहे हैं। पहले पूरा मूल्यांकन तो होने दीजिए। कौन कहां रहेगा, यह तो समय बताएगा। कथा की दुनिया में आए हुए अनुज को अभी पांच साल ही हुए हैं। पहली कहानी वागर्थ में 2005 में आई थी। उनकी निगाहें प्रेमचंद से होती हुई रेणु, जैनेंद्र, अज्ञेय पर आकर ठहरती हैं। इसके बाद उदय प्रकाश पर आकर टिकती हैं। नई कहानी के दौर को भी अनुज नहीं भूलते, जिसमें से कमलेश्वर, मोहन राकेश और राजेंद्र यादव की तिकड़ी आई थी। खैर, चलते-चलते अनुज बताते हैं कि एक उपन्यास पर काम कर रहे हैं, जिसमें देश की राजनीति है मगर फंतासी के साथ। खैर, उनका साथ छोड़ आफिस की ओर चल पड़ता हूं। 

शनिवार, 25 दिसंबर 2010

बारूद की जमीन पर फूलों की गंध

संजय कृष्ण : जैसे कांची नदी की किस्मत, वैसी कांची गांव की। दामोदर पुंडीदीरी नदियों की कहानी भी जुदा नहीं। झारखंड की अधिकतर नदियों का दर्द ऐसा ही है। पानी-पानी को प्यासी...। पंचायत चुनाव का अंतिम चरण। 24 दिसंबर। शुक्रवार का दिन। बुंडू, तमाड़, राहे और सोनाहातू...। हम कांची नदी के समानांतर गांव तक जाती सड़क के किनारे-किनारे होते हुए कांची गांव पहुंचते हैं। नदी प्रखंडों का बंटवारा करती है। इस तरफ बुंडू, नदी के पार तमाड़। कांची बुंडू का अंतिम गांव। मिट्टी और पक्के मकान। गांव के बीच में राजकीय मध्य विद्यालय पर जवान मुस्तैद हैं। मतदाता अपनी-अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं। यहां तीन बूथ हैं। तीनों पर कुल नौ सौ वोटर। मुंडा बहुल गांव में साहू, मछुआ, प्रमाणिक भी हैं। गांव के लिए बहुत संकीर्ण रास्ता है। गांव के बाहर खेत। इस साल पानी के अभाव में धान की बोआई नहीं हो पाई है। 65 वर्षीय गोपाल मुंडा कहते हैं, तैमारा घाटी से एक कांची पाइन यानी छोटी नहर आई है। पर, बरसात नहीं होने से खुद ही प्यासी है। नहर कच्ची है। सो, पानी बहुत दिन तक टिक नहीं पाता। इसकी प्यास बुझे तो खेत अवश्य लहललाने लगेंगे। इस नहर से कांची, हेट कांची और भोजडीह गांवों के खेतों को पानी मिल सकता है। पर, कोई सुनता नहीं। गांव के अरुण कुमार गुप्ता कहते हैं, पंचायत चुनाव के बाद नहर के पक्कीकरण पर जोर दिया जाएगा। वैसे, इस गांव की कई समस्याएं हैं। राजधानी रांची से महज साठ-सत्तर किमी दूर। जमशेदपुर तक जाती हाइवे की चमचमाती सड़क से एक डेढ़ किमी दूर गांव बसा है। हाइवे की सड़क गांव की सड़क को मुंह चिढ़ाती है। इसके बाद तमाड़ की ओर रुख करते हैं। रायडीह मोड़ से बुरूडीह पहुंचते हैं। बेहद खराब सड़क। राजकीय मध्य विद्यालय पर तीन बूथ हैं। तीनों पर लाइनें लगी हुई हैं। अमलेशा की महालेन भेंगरा अपना वोट डाल चुकी हैं। बस उनकी थोड़ी सी चाहत है। गांव में बिजली पहुंच जाए और खेत को पानी। बुरूडीह की शकुंतला देवी चाहती हैं कि बरसात में कादो-कीचड़ में पैर न सने। राजा पीटर का इलाका है। अब वे राज्य सरकार में मंत्री भी हो गए। पिछले चुनाव में झामुमो प्रमुख शिबू सोरेन को हराया था। तब शिबू राज्य के सीएम थे। उनके चुनाव हारते ही सरकार भी गिर गई थी। दुबारा चुनाव हुआ। जीते। पर, चुनाव के बाद उनका दर्शन नहीं हुआ। अब पंचायत से आस है। आजादी के 63 साल बाद भी इन गांवों में छोटी-छोटी खुशियां नहीं पहुंच पाई हैं। ये गांव मुख्य सड़क से बहुत दूर नहीं हैं। रायडीह से पुन: हम सारजोमडीह होते हुए बघाई तक पहुंचते हैं। सारजोमडीह से घना जंगल और भय हमारा साथ पकड़ लेते हैं। पुंडीदीरी नदी के पास पहुंचते ही पैर कांपने लगते हैं। नदी से गांव सटा हुआ है। चारों तरफ जंगल। सड़क बन रही है। याद होगा, डीएसपी प्रमोद कुमार को यहीं पर उड़ा दिया गया था। पर, तमाड़ का थाना प्रभारी 'चमत्कारिकÓ ढंग से बच गया था। हम आगे बढ़ते हैं। पेड़, पौधे, पहाड़ जैसे हमें ही घूर रहे हों...। एक अजीब दहशत। आस-पास खेतों में फैले सरसों के पीले-पीले फूल भी मानो हमें चेतावनी दे रहे हों, आगे मत बढऩा...। पूरी जमीन बारूदी। पर, कहीं-कहीं गेंदे के पीले फूलों की गंध हमारा ध्यान बारूदी जमीन से हटा देती है। हार्न बजाते हुए गाड़ी आगे बढ़ती है। सड़क में गड्ढे देख शरीर कांप जाता है। कहीं माइंस तो नहीं बिछा है। हम पातसायडीह होते हुए बघाई पहुंचते हैं। रायडीह मोड़ से 17 किमी दूरी तय कर घने जंगल में प्रवेश करते हैं। बघाई में खुले में मतदान हो रहा है। एक स्कूल है, जिस पर सीआरपीएफ के जवानों ने कब्जा कर रखा है। यानी स्कूल पुलिस कैंप में तब्दील। कैंप के सामने पहाड़ की तलहटी में खंखर पूस-पुआल की झोपड़ी। बांस के सहारे खड़ी। न कोई दीवाल न बेंच। पिछले चार साल से बच्चे इसी खुली झोपड़ी में पढ़ रहे हैं। चुनाव के आस-पास चार-पांच बच्चे दिखाई देते हैं। पूछता हूं, झोपड़ी में पढ़ाई कैसे होती है, कहते हैं, किसी तरह हो जाती हैं। कहीं दूसरा रास्ता भी नहीं। स्कूल में चार-पांच किमी की दूरी के बच्चे यहां पढऩे आते हैं। अब वे क्या करें। शिक्षा का कैसा मजाक झारखंड सरकार में चल रहा है...स्कूल की दशा देखकर समझ में आता है। इस रास्ते से सकुशल वापसी के बाद हम बुंडू से चुरगी का रास्ता पकड़ लेते हैं। लोआहतू, बारूहातू होते हुए। पहाड़ की तलहटी में बसा है बारूहातू गांव। चारों तरफ जंगल। सड़क की एक तरफ गांव और दूसरी तरफ पुलिस कैंप। पर, 18 नवंबर की रात माओवादी गांव में घुस गए और चार लोगों की हत्या कर दी। इनमें एक बच्ची भी शामिल थी। तीनों पूर्व माओवादी थे और अब एसपीओज थे। अब वे पुलिस के लिए काम रहे थे। रात्रि आठ बजे माओवादियों ने इनके घर पर धावा बोल दिया। गोलियां तड़तड़ाई और जंगल में समा गए। सौ गज की दूरी पर कैंप की पुलिस ताकती रही। गांव वाले पूछते हैं, जब कैंप की पुलिस हमारी रक्षा नहीं कर सकती, तो स्कूलों पर कब्जा क्यों? बच्चों की जिंदगी से खिलवाड़ क्यों? इसका जवाब तो राज्य सरकार की दे सकती है। खैर, पुलिस अब दूसरे ढंग से लड़ाई लड़ रही है। हम आगे बढ़ते हैं। चुरगी पहुंचते हैं। चुरगी के समानांतर कांची बहती है। यहां कांची दो जिलों का बंटवारा करती है। इस तरफ रांची और उस तरफ खूंटी। यहीं पर पांच करोड़ लूट की गाड़ी जलाई गई थी। नदी के उस पार अड़की प्रखंड, जो खूंटी जिले का हिस्सा बन गया है। माओवादी कुंदन पाहन का पैतृक घर। तीन बज रहे थे। मतदान संपन्न हो चुका था। सूरज पश्चिम की ओर ढरक रहा था। हम वापसी के लिए चल पड़ते हैं।

बहती नदी, प्यासे खेत और उदास आंखें

संजय कृष्ण:  सर्द हवाओं के थपेड़े से जंगल भी सहमे थे। सूरज की किरणों में गर्मी तो थी, लेकिन सर्द हवाओं के आगे वह भी बेबस...। यह हाल नामकुम के जंगली इलाकों से लेकर अनगड़ा, सिल्ली, मुरी तक था। 20 दिसंबर, सोमवार को पंचायत चुनाव का चौथा चरण था। रांची-मुरी मार्ग पर इक्का-दुक्का वाहन खामोशी से गुजर रहे थे। यह चुनाव का असर था कि लोग पैदल भी जाते दिखे। सुबह की बेला। खिलती धूप। अनगड़ा ब्लाक के साल्हन गांव पहुंचते हैं। मतदान केंद्र पर भीड़ है। भीड़ के पास कई तरह की समस्याएं हैं। विकास की बातें हैं। सुदेश महतो का इलाका। विकास के नाम प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना के बोर्ड ज्यादा दिखाई पड़ते हैं बनिस्पत सड़कों के। रासबिहारी साहु मैट्रिक पास हैं। ठेकेदारी करते हैं। उम्मीद जताते हैं कि पंचायत चुनाव से कुछ काम होगा। ब्लाक पर बार-बार दौड़ लगाने से छुटकारा मिलेगा। गांव से थोड़ी दूर पर स्वर्णरेखा बहती है। यहां से ही नदी की धारा दिखाई पड़ती है, पर गांव और खेत दोनों प्यासे हंै। आंखें उदास हैं। यहां से वापस लौटते हैं और कोचो पंचायत के लगाम पर पहुंचते हैं। घड़ी की सुइयां 11 बजा रही थीं। प्राथमिक विद्यालय लगाम दक्षिणी पर तीन मतदान केंद्र बने हैं। बूथ संख्या 164 पर 365 मतों से 164 वोट पड़ चुके हैं। दूसरे 165 पर 342 में से 116 और तीसरे बूथ पर 166 पर 327 में से 185। सिल्ली से मुरी का रास्ता पकड़ते हैं। सिल्ली-रामगढ़ के रास्ते पर आगे बढ़ते हुए हाकेदाग का रास्ता। हाकेदाग के गाझा गांव में अंतूराम माझी अवकाश प्राप्त शिक्षक हैं। वोट डाल चुके हैं। उम्मीद जताते हैं कि गांव में सिंचाई की व्यवस्था होगी। गांव में 65 घर हैं, जिनमें बेदिया, करमाली, मुंडा और 20-25 घर मुसलमान। यहां भी बुनियादी समस्याएं मुंह बाए खड़ी हैं। हालमाद गांव में कुछ दुकानें चट्टी का आभास पैदा करती हैं। हाकेदाग हालमाद से टाटी सिंगरी होते हुए डुमरा गांव। बीच में घने जंगल। तीखे मोड़। सर्पीली सड़कें और सीढ़ीदार खेत। बीच-बीच में कहीं प्यासे खेत तो कहीं सरसों के फूलों की चादर। जंगल इतना गझिन कि आगे का रास्ता भी दिखाई न दे। घाटियों से गुजरते हुए बार-बार जीवन की दुहाई। जंगल की खूबसूरती आनंदित भी कर रही थी और भयभीत भी। इस मार्ग से जाते हुए कुछ बच्चियां माथे पर सूखी लकडिय़ों का ग_र लिए चल रही हैं। उम्र यही कोई छह सात से लेकर बारह-तेरह वर्ष। कपड़े के नाम पर कुछ स्कूली डे्रस। नाम पूछने पर नहीं बताती। आज छुट्टी का दिन है उनके लिए। जोन्हा जल प्रपात पर भी दो बच्चियां अमरूद और बेर बेच रही थीं। एक शोभा कुमारी और दूसरी जसवंती कुमारी। दोनों कक्षा तीन की छात्रा। जोन्हा से चलते हुए गौतमधारा प्राथमिक स्कूल पर पहुंचते हैं। तीन बज रहे हैं। चुनाव खत्म। पीठासीन अधिकारी बक्से को सील कर रहे हैं। झारखंड जगुआर के जवान मुस्तैद। चेहरे पर इत्मीनान के भाव। स्कूल से बाहर सड़क पर युवाओं की भीड़। कुछ अधेड़ भी हैं। वे हमें घेर लेते हैं और अपनी समस्याएं गिनाने लगते हैं। पानी नहीं, बिजली नहीं। सड़क नहीं। यह जो सड़क है, वह जोन्हा तक चमचमाती जाती है, क्योंकि इस पर पर्यटक जाते हैं, पर हमारे गांव में पगडंडी भी नहीं...। हम वापसी की ओर रुख करते हैं। गांव के बाहर यानी प्रवेश द्वार पर एक पांच फीट का पत्थल गड़ा है। उस पर लिखा है, 'गुड़ीडीह सबसे अच्छा ग्रामसभाÓ। हम उम्मीद करते हैं, चुनाव के बाद पत्थलगड़ी की बात सच निकले।

सोमवार, 13 दिसंबर 2010

वंदनवार वृक्ष, प्यासी धरती और वोटों की बारिश

संजय कृष्ण : रांची जिले के मांडर, बुड़मू, खलारी और चान्हो...चारों प्रखंडों में कहीं एमसीसी, कहीं पीएलएफआई तो कहीं टीपीसी जैसे उग्रवादी संगठन। इनके इशारे पर ही यहां की हवाएं अपना रुख तय करती हैं। आदमी की बिसात ही क्या? सोमवार का दिन। पंचायत चुनाव का तीसरा चरण। हम मांडर के अन्ना हाई स्कूल पर पहुंचते हैं। बंधु तिर्की का इलाका। वे यहां के विधायक हैं। ठंड की अलसाई सुबह के बावजूद मतदान केंद्र पर भीड़ जमी है। कहीं कोई बाधा नहीं। शांतिपूर्वक मतदान चल रहा है। वोट देकर आते रणसी खलखो से पूछता हूं पंचायत चुनाव से क्या कुछ बदलाव आएगा? कहते हैं, इसीलिए तो आधा कोस से चलकर आया हूं। माथे पर उभर आई रेखाएं उनकी उम्र का पता देती हैं। आपके प्रतिनिधि बंधु तिर्की हैं, फिर भी पीने के लिए पानी की किल्लत...। कहते हैं, कई बार उनसे कहा गया, लेकिन कुछ नहीं हुआ। सो, अब हिम्मत जवाब दे गई। रणसी करकच्चों गांव के हैं। गांव की आबादी वे तीन हजार बताते हैं। कहते हैं, पीने का पानी भी ठीक से मयस्सर नहीं। कुआं सूख चुका है। चापानल एक चल रह है, बाकी सब खराब। उनकी बातों की ताइद मांडर के प्यासे खेत भी करते हैं। मांडर से जब पतली सड़क पकड़ तिगोई अंबा टोली की ओर बढ़ते हैं तो सड़क के दोनों किनारे दूर-दूर तक फैले खेत अपनी पीड़ा खुद बयां करते हैं। सूखे खेतों में घास का तिनका तक नहीं। गाय-बैल-बकरी के लिए चारा जुटाना भी मुश्किल। मतदान केंद्र के बाहर खड़े अंबा टोली के पारा टीचर इम्तियाज अंसारी कहते हैं कि यहां सिंचाई को कोई साधन नहीं है। सिंचाई की व्यवस्था हो तो खेत सोना उगले। दो साल से बारिश भी ठीक से नहीं हो रही है, सो खेती प्रभावित है। इस बार धान की खेती भी नहीं हुई। इसी गांव के तिगई के सिब्बा उरांव वोट डाल चुके थे। इत्मीनान से धूप सेवन कर रहे थे। उनकी भी शिकायत वही थी। कहने लगे, चेकडैम गांव से एक किमी दूर बना है, लेकिन बारिश में बह गया। अब न पानी उसमें रुकता है न खेती हो पाती है। जनप्रतिनिधि चुनाव के दौरान आते हैं फिर वे कहां चले जाते हैं, खोजना मुश्किल। कहते हैं, पंचायत चुनाव से एक आस है। खेत प्यासे हैं, पेट भूखा है। पेट की आग तो मजदूरी से बुझा लेते हैं, लेकिन खेत...। इसी प्रखंड का हात्मा, छोटा हात्मा सब जगह एक ही नजारा था। वोट डालने के लिए लाइनें लगी थीं। मांडर की प्यासी धरती को छोड़ बुढ़मू की ओर बढ़ चलते हैं। पतली-सर्पीली राह से गुजरते हुए सड़क के दोनों ओर झाड़-झंखाड़। सिदरौल राजी टोला का वोट पंचायत भवन पर पड़ रहा है। पास में कुआं सूख चुका है। मतदान देने आए जगदीश साहु अपनी शिकायत की पोटली खोल देते हैं। न बीपीएल सूची में नाम दर्ज हुआ न इंदिरा आवास मिला। रांची में तीन हजार महीने में गार्ड की नौकरी और पांच जने का पेट। अधिकारी सुनते ही नहीं...। उमेडंडा के लैम्पस भवन पर वोटरों की भारी भीड़। अव्यवस्था का आलम। उमेश कुमार कहते हैं, छह बजे आए और 11 बजे वोट दिए। अधिकारी एकदम सुस्त हैं। यही शिकायत कई और वोटर करते हैं। एक कहता है कि यहां दो सौ वोटरों का नाम ही काट दिया गया। यहां से अब जंगल की ओर रुख करते हैं। सरले होते हुए राय बाजार, डकरा और खलारी। सरले से खलारी तक पांच किमी की दूरी और सड़क के दोनों ओर जंगल और पहाड़। सड़क के दोनों ओर सखुआ के विशाल वृक्ष वंदनवार खड़े। सूनसान सड़क। बीच-बीच में कोई आदिवासी दिख जाता है। जंगल से लकड़ी ले आता। छोटी-छोटी पहाडिय़ों पर छोटे-छोटे खपरैल के घर दूर से दिखाई पड़ते हैं। सीढ़ीदार पहाड़ और उसपर बसे मकान। जैसे दार्जिलिंग के किसी पहाड़ पर चल रहे हों...। खलारी अंतिम पड़ाव। कोयले की कालिख से पूरा शहर काला। दुकानें, मकान और लोग भी...। यहां एसीसी की खलारी सिमेंट फैक्ट्री भी है और यहीं पर सीसीएल का खदान भी है। शहर से बेहतर कस्बा इसे कह सकते हैं। यहां अस्सी प्रतिशत बिहारी हैं। खलारी से होते हुए चान्हो के चामा पहुंचते हैं। घड़ी की सुइयां तीन बजा रही हैं। मतदान केंद्र के बाहर सड़क पर काफी चहल-पहल। यहां दो बूथ हैं और दोनों पर लाइनें लगी हैं। ये अतिसंवेदनशील हैं। चुनाव अधिकारी बताते हैं कि आधे घंटे और चलेगा। वे मतदाताओं को पर्ची बांट रहे हैं। सुरक्षा में लगे जवान काफी मुस्तैद दिखे। धीरे-धीरे हम आगे बढ़ते हैं। बीजूपाड़ा, मांडर होते हुए पुन: वापस। प्यासी धरती पर वोटों की बारिश आश्वस्त कर रही थी कि अब वे ज्यादा दिन तक नहीं टिकने वाली। उम्मीद की लौ हम भी जला लेते हैं...

सरसों के फूल, हडिय़ा की गंध और पठार पर कोहरा

संजय कृष्ण : रांची से नगड़ी, इटकी, बेड़ो और उससे होते हुए लापुंग। घुमावदार राहों से गुजरते हुए कभी कच्ची सड़क मिलती, तो कभी पक्की। कहीं-कहीं बेहद पतली-दुबली। सड़क के दोनों किनारों पर खिलते सरसों के पीले-पीले मुस्कुराते फूल...तो पठार और जंगलों का संग-साथ। बूंदा-बांदी के साथ नथुनों में समाती वन तुलसी की गंध। कहीं पंचायत चुनाव से बेखबर किसान धान ओसाते, तो कहीं मतदान केंद्रों पर मतदाताओं की उमड़ती भीड़। लोकतंत्र की छोटी इकाई में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करने को लोग बेताब। इस तरह, खूबसूरत प्रकृति की मनोहारी छटा को निहारते जब हम लापुंग प्रखंड पहुंचते हैं, तो दो बड़े होर्डिंग हमारा स्वागत करते हैं। एक होर्डिंग पर सूबे के मुखिया का हंसता चेहरा और खेलते बच्चे हैं। होर्डिंग पर बड़े-बड़े हरफों में एक स्लोगन है, पंचायत की पहली सीढ़ी, देख रही है अगली पीढ़ी। अगली होर्डिंग 32 साल बाद हो रहे चुनाव के बारे में जागरूक करता है। पर, अगली पीढ़ी...लतरातू का एक युवक करमवीर तिर्की शिकायती लहजे में कहता है, गांव में आज तक बिजली नहीं। सड़क नहीं। कच्ची सड़क से आना-जाना होता है। सिबन उरांव की उम्र साठ के आस-पास। बूढ़ी आंखें। माथे पर झुर्रियां। पूछता हूं, उम्र कितनी है। कहती हैं- का जानबे बाबू। अपनी उम्र नहीं बता पाती है। रंथी उरांव चुनाव में मशगूल है। वोटरों को उनके नाम की पर्ची खोज-खोज दे रहा है। ककरिया का फागू बैठा 50 वसंत देख चुका है। वह चुनाव से आश्वस्त है। कहता है, कुछ तो बदलाव आएगा ही....। जहां कुछ नहीं था, वहां कुछ तो होगा ही। बदना मुंडा भी पचास के पार है। वोट डालने के लिए इंतजार कर रहा है। कहता है, बहुत भीड़ है। थोड़ा निकस जाए तो जाएं। ककरिया चट्टी है। दो-चार दुकानें उग आई हैं। जरूरत की चीजें सब कुछ मिलती हैं। पाजी लोहरा अपनी पर्ची लेकर घूम रहा है। सुबह से हडिय़ा से आचमन कर चुका है। किसी दूसरे को खोज रहा है...शायद एकाध शीशी की व्यवस्था हो जाए...। पक्की सड़क छोड़कर हम कच्चे रास्ते से रामाटोली में पहुंचते हैं। चुनाव की गहमा-गहमी। चेहरे से साठ के पार लगती सुकरा मुंडाइन से पूछता हूं, वोट डाल देली। वह अपना अंगूठा दिखाती है। उसे लगता है कि हम कोई प्रत्याशी हैं, इसलिए पूछ रहे हैं। तुरंत कहती है, एक पौआ के देब...। जब तक मैं उसकी बात समझ पाता, एक युवक उसे पकड़ दूसरी ओर खींच ले जाता है...चल-चल हम देबी। यहां से दूसरे गांव की ओर रुख करता हूं। आकाश में सूरज का सुबह से ही अता-पता नहीं है। बादलों ने घेरा डाल रखा है। कभी-कभी बूंदा-बांदी। लगता है- जैसे पठार पर बैठा है खामोश कोहरा।