सोमवार, 13 दिसंबर 2010

सरसों के फूल, हडिय़ा की गंध और पठार पर कोहरा

संजय कृष्ण : रांची से नगड़ी, इटकी, बेड़ो और उससे होते हुए लापुंग। घुमावदार राहों से गुजरते हुए कभी कच्ची सड़क मिलती, तो कभी पक्की। कहीं-कहीं बेहद पतली-दुबली। सड़क के दोनों किनारों पर खिलते सरसों के पीले-पीले मुस्कुराते फूल...तो पठार और जंगलों का संग-साथ। बूंदा-बांदी के साथ नथुनों में समाती वन तुलसी की गंध। कहीं पंचायत चुनाव से बेखबर किसान धान ओसाते, तो कहीं मतदान केंद्रों पर मतदाताओं की उमड़ती भीड़। लोकतंत्र की छोटी इकाई में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करने को लोग बेताब। इस तरह, खूबसूरत प्रकृति की मनोहारी छटा को निहारते जब हम लापुंग प्रखंड पहुंचते हैं, तो दो बड़े होर्डिंग हमारा स्वागत करते हैं। एक होर्डिंग पर सूबे के मुखिया का हंसता चेहरा और खेलते बच्चे हैं। होर्डिंग पर बड़े-बड़े हरफों में एक स्लोगन है, पंचायत की पहली सीढ़ी, देख रही है अगली पीढ़ी। अगली होर्डिंग 32 साल बाद हो रहे चुनाव के बारे में जागरूक करता है। पर, अगली पीढ़ी...लतरातू का एक युवक करमवीर तिर्की शिकायती लहजे में कहता है, गांव में आज तक बिजली नहीं। सड़क नहीं। कच्ची सड़क से आना-जाना होता है। सिबन उरांव की उम्र साठ के आस-पास। बूढ़ी आंखें। माथे पर झुर्रियां। पूछता हूं, उम्र कितनी है। कहती हैं- का जानबे बाबू। अपनी उम्र नहीं बता पाती है। रंथी उरांव चुनाव में मशगूल है। वोटरों को उनके नाम की पर्ची खोज-खोज दे रहा है। ककरिया का फागू बैठा 50 वसंत देख चुका है। वह चुनाव से आश्वस्त है। कहता है, कुछ तो बदलाव आएगा ही....। जहां कुछ नहीं था, वहां कुछ तो होगा ही। बदना मुंडा भी पचास के पार है। वोट डालने के लिए इंतजार कर रहा है। कहता है, बहुत भीड़ है। थोड़ा निकस जाए तो जाएं। ककरिया चट्टी है। दो-चार दुकानें उग आई हैं। जरूरत की चीजें सब कुछ मिलती हैं। पाजी लोहरा अपनी पर्ची लेकर घूम रहा है। सुबह से हडिय़ा से आचमन कर चुका है। किसी दूसरे को खोज रहा है...शायद एकाध शीशी की व्यवस्था हो जाए...। पक्की सड़क छोड़कर हम कच्चे रास्ते से रामाटोली में पहुंचते हैं। चुनाव की गहमा-गहमी। चेहरे से साठ के पार लगती सुकरा मुंडाइन से पूछता हूं, वोट डाल देली। वह अपना अंगूठा दिखाती है। उसे लगता है कि हम कोई प्रत्याशी हैं, इसलिए पूछ रहे हैं। तुरंत कहती है, एक पौआ के देब...। जब तक मैं उसकी बात समझ पाता, एक युवक उसे पकड़ दूसरी ओर खींच ले जाता है...चल-चल हम देबी। यहां से दूसरे गांव की ओर रुख करता हूं। आकाश में सूरज का सुबह से ही अता-पता नहीं है। बादलों ने घेरा डाल रखा है। कभी-कभी बूंदा-बांदी। लगता है- जैसे पठार पर बैठा है खामोश कोहरा।