शनिवार, 25 दिसंबर 2010

बहती नदी, प्यासे खेत और उदास आंखें

संजय कृष्ण:  सर्द हवाओं के थपेड़े से जंगल भी सहमे थे। सूरज की किरणों में गर्मी तो थी, लेकिन सर्द हवाओं के आगे वह भी बेबस...। यह हाल नामकुम के जंगली इलाकों से लेकर अनगड़ा, सिल्ली, मुरी तक था। 20 दिसंबर, सोमवार को पंचायत चुनाव का चौथा चरण था। रांची-मुरी मार्ग पर इक्का-दुक्का वाहन खामोशी से गुजर रहे थे। यह चुनाव का असर था कि लोग पैदल भी जाते दिखे। सुबह की बेला। खिलती धूप। अनगड़ा ब्लाक के साल्हन गांव पहुंचते हैं। मतदान केंद्र पर भीड़ है। भीड़ के पास कई तरह की समस्याएं हैं। विकास की बातें हैं। सुदेश महतो का इलाका। विकास के नाम प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना के बोर्ड ज्यादा दिखाई पड़ते हैं बनिस्पत सड़कों के। रासबिहारी साहु मैट्रिक पास हैं। ठेकेदारी करते हैं। उम्मीद जताते हैं कि पंचायत चुनाव से कुछ काम होगा। ब्लाक पर बार-बार दौड़ लगाने से छुटकारा मिलेगा। गांव से थोड़ी दूर पर स्वर्णरेखा बहती है। यहां से ही नदी की धारा दिखाई पड़ती है, पर गांव और खेत दोनों प्यासे हंै। आंखें उदास हैं। यहां से वापस लौटते हैं और कोचो पंचायत के लगाम पर पहुंचते हैं। घड़ी की सुइयां 11 बजा रही थीं। प्राथमिक विद्यालय लगाम दक्षिणी पर तीन मतदान केंद्र बने हैं। बूथ संख्या 164 पर 365 मतों से 164 वोट पड़ चुके हैं। दूसरे 165 पर 342 में से 116 और तीसरे बूथ पर 166 पर 327 में से 185। सिल्ली से मुरी का रास्ता पकड़ते हैं। सिल्ली-रामगढ़ के रास्ते पर आगे बढ़ते हुए हाकेदाग का रास्ता। हाकेदाग के गाझा गांव में अंतूराम माझी अवकाश प्राप्त शिक्षक हैं। वोट डाल चुके हैं। उम्मीद जताते हैं कि गांव में सिंचाई की व्यवस्था होगी। गांव में 65 घर हैं, जिनमें बेदिया, करमाली, मुंडा और 20-25 घर मुसलमान। यहां भी बुनियादी समस्याएं मुंह बाए खड़ी हैं। हालमाद गांव में कुछ दुकानें चट्टी का आभास पैदा करती हैं। हाकेदाग हालमाद से टाटी सिंगरी होते हुए डुमरा गांव। बीच में घने जंगल। तीखे मोड़। सर्पीली सड़कें और सीढ़ीदार खेत। बीच-बीच में कहीं प्यासे खेत तो कहीं सरसों के फूलों की चादर। जंगल इतना गझिन कि आगे का रास्ता भी दिखाई न दे। घाटियों से गुजरते हुए बार-बार जीवन की दुहाई। जंगल की खूबसूरती आनंदित भी कर रही थी और भयभीत भी। इस मार्ग से जाते हुए कुछ बच्चियां माथे पर सूखी लकडिय़ों का ग_र लिए चल रही हैं। उम्र यही कोई छह सात से लेकर बारह-तेरह वर्ष। कपड़े के नाम पर कुछ स्कूली डे्रस। नाम पूछने पर नहीं बताती। आज छुट्टी का दिन है उनके लिए। जोन्हा जल प्रपात पर भी दो बच्चियां अमरूद और बेर बेच रही थीं। एक शोभा कुमारी और दूसरी जसवंती कुमारी। दोनों कक्षा तीन की छात्रा। जोन्हा से चलते हुए गौतमधारा प्राथमिक स्कूल पर पहुंचते हैं। तीन बज रहे हैं। चुनाव खत्म। पीठासीन अधिकारी बक्से को सील कर रहे हैं। झारखंड जगुआर के जवान मुस्तैद। चेहरे पर इत्मीनान के भाव। स्कूल से बाहर सड़क पर युवाओं की भीड़। कुछ अधेड़ भी हैं। वे हमें घेर लेते हैं और अपनी समस्याएं गिनाने लगते हैं। पानी नहीं, बिजली नहीं। सड़क नहीं। यह जो सड़क है, वह जोन्हा तक चमचमाती जाती है, क्योंकि इस पर पर्यटक जाते हैं, पर हमारे गांव में पगडंडी भी नहीं...। हम वापसी की ओर रुख करते हैं। गांव के बाहर यानी प्रवेश द्वार पर एक पांच फीट का पत्थल गड़ा है। उस पर लिखा है, 'गुड़ीडीह सबसे अच्छा ग्रामसभाÓ। हम उम्मीद करते हैं, चुनाव के बाद पत्थलगड़ी की बात सच निकले।