मंगलवार, 20 जुलाई 2010

रेड अलर्ट : रियल कम, अनरियल ज्यादा

नक्सल आंदोलन पर बनी अनंत महादेवन निर्देशित फिल्म 'रेड अलर्ट: द वार विद इनÓ जिस नाटकीयता के साथ शुरू होती है, उसी नाटकीयता और आश्चर्य के साथ समाप्त हो जाती है। चालीस साल से चल रहा आंदोलन बिना किसी निष्कर्ष के समाप्त हो जाता है। पुलिस कहती है कि हम उनसे लडऩे में सक्षम नहीं हैं, वही पुलिस नक्सलियों का खात्मा कर देती है। निर्देशक का यह दावा कि यह रियल स्टोरी पर आधारित है, पर कहीं-कहीं यह वास्तविकता से दूर भागने लगती है।
फिल्म में नक्सली स्कूल पर दिन में धावा बोलते हैं। वहां पुलिस ने कैंप किया है और बच्चे पढ़ रहे होते हैं। पुलिस-नक्सली की क्रास फायरिंग में एक स्कूली बच्चा मारा जाता है। आगे चलकर इसका प्रभाव नरसिम्हा (सुनील शेट्टी) पर पड़ता है, जिसे दस्ते में जबरदस्ती शामिल कर लिया गया था। नरसिम्हा गांव का एक सीधा-सादा युवक है, जो किसी के कहने पर जंगल में नक्सलियों को खाना पहुंचाने जाता है। उसके वहां पहुंचते ही पुलिस भी पहुंच जाती है और क्रास फायरिंग शुरू हो जाती है। इसमें तीन लोग मारे जाते हैं। नरसिम्हा किसी तरह बच जाता है। पर, दलम के लीडर वेलू अन्ना (आशीष विद्यार्थी) उसे जाने नहीं देते और खाना बनाने के साथ-साथ बंदूक चलाने की ट्रेनिंग शुरू कर देते हैं। नरसिम्हा गिड़गिड़ता है, अपनी पत्नी (भाग्यश्री) और दो बच्चों का हवाला देता है। पर, लीडर नहीं पिघलता। फिल्म के अंत तक नरसिम्हा नहीं बदलता। बार-बार इस तरह की 'अनावश्यकÓ हिंसा उसे विचलित करती है। पूछता है, दोनों ओर तो अपने लोगां हैं। जब नरसिम्हा अपने लीडर की हत्या कर भागता है तो उसे पत्रकार की याद आती है।
खैर, एक पत्रकार (मकरंद देशपांडे) के सवाल पर अन्ना कहता है हम सिस्टम के खिलाफ हैं और आतंकवादी देश के। फिल्म में चेग्वारा की शक्ल का एक बौद्धिक पात्र भी है। नरसिम्हा से एक बार कहता है, हथियारों से ज्यादा ताकत होती है शब्दों में। फिल्म में तेंदु पत्ता तोडऩे की मजदूरी के सवाल भी हैं। भ्रष्टाचार, शोषण, गरीबी की समस्या को उठाया गया है। सेज की समस्या को भी सतही ढंग से दिखाया गया है। नसीरुद्दीन शाह की इंट्री भी नाटकीय ढंग से होती है। फिल्म में दो-चार मिनट की भूमिका है, लेकिन प्रभावशाली। लक्ष्मी (समीरा रेड्डी )की इंट्री भी कुछ इसी अंदाज में होती है। थाने में जब नक्सली धावा बोलते हैं, एक कमरे में सिसकती हुई मिलती है। नक्सली उसे अपने साथ उठा ले जाते हैं। वह भी दलम में शामिल हो जाती है। लेकिन मुठभेड़ में मारे जाने के बाद कुछ नक्सली बच निकलते हैं, जिनमें लक्ष्मी भी है, जो थाने में ही आत्महत्या कर लेती है। उसकी भूमिका ग्लैमरस नहीं है, लेकिन वह अपना प्रभाव छोडऩे में कामयाब होती है। विनोद खन्ना, सीमा विश्वास, आयशा धारकर ने भी अपने-अपने हिस्से की भूमिका धारदार ढंग से निभाई है। सुनील शेट्टी और समीरा की भूमिका बेहद कमजोर है, लेकिन अपने अभिनय से दोनों दर्शकों को बांधे रहते हैं। स्क्रिप्ट मजबूत है, संवाद की डिलीवरी भी कमजोर नहीं है। लोकेशन फिल्म को वास्तविकता प्रदान करता है। कसी हुई फिल्म के बावजूद उसका अंत अत्यंत सतही ढंग से होता है। अंत में आतंकवादी ओसामा बिन लादेन के पुत्र के एक कोटेशन, फाइंउ एनॉदर वे के साथ फिल्म समाप्त हो जाती है। बेशक, महादेवन ने मेहनत की है, लेकिन नक्सल आंदोलन पर और गहराई से सोचने और शोध की जरूरत थी। नक्सलवाद और आतंकवाद का घालमेल विचार विभ्रम की स्थिति पैदा करता है। जंगलों में माओवादियों के रहन-सहन, खान-पान, देह की भूख आदि चीजों को भी समेटा गया है। ऐसी फिल्मों में गीत की गुजांइश नहीं होती है। है भी नहीं। गीत का एक मुखड़ा जरूर पाश्र्व संगीत के साथ सुनाई देता है। 1980 के दशक में स्मिता पाटिल की 'द नक्सलाइट्सÓ फिल्म 2002 में आई 'लाल सलामÓ की ही कतार में यह खड़ा होती है।
प्रस्तुति: संजय कृष्ण