प्रतिरोध की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति हैं आदिवासी भाषाएं

अश'्रिवनी कुमार पंकज :
'देश में अगर किन्हीं लोगों के साथ सबसे अधिक बुरा व्यवहार हुआ है तो वे मेरे लोग हैं। पिछले 6000 वषरें के दौरान उनके साथ असम्मानजनक व्यवहार हुआ है और उनकी उपेक्षा हुई है।''
- जयपाल सिंह मुण्डा (19 दिसम्बर 1946 को संविधान सभा में)
स्वतंत्रता, न्याय, समानता और भागीदारी, लोकतंत्र के इन चारों आयामों के संदर्भ में भारत के आदिवासी जनों का अनुभव नीम से भी ज्यादा कड़वा है। लगभग जहर जैसा। वे न सिर्फ औपनिवेशिक काल में छले, लूटे व मारे गये, बल्कि स्वतंत्र भारत में भी आंतरिक उपनिवेश बने हुए हैं। वे अपने तमाम संसाधनों से बेदखल किये गए, भाषा-संस्कृति से विस्थापित हुए और बड़े पैमाने पर धार्मिक रूपांतरण का शिकार बने। आधुनिकीकरण और विकास के पहले चरण में जहां उन्हें अदृश्य युद्धों (विस्थापन) में सब कुछ खो देना होता है, वहीं संस्कृतिकरण से पीढ़ी दर पीढ़ी धीमे-धीमे मरते रहना पड़ता है। पिछले 350 वषरें से इस आदिवासी दोहन, लूट, नरसंहार और संस्कृतिकरण की प्रक्त्रिया में कोई शिथिलता नहीं आई है। यदि कुछ शिथिल हुआ भी है, तो वह है संविधान और लोकतंत्र।
भारत ही नहीं, पूरी दुनिया में आदिवासी समुदायों के साथ शासक वगरें का यही विश्वासघाती रवैया रहा है। आधुनिक नगरीय जीवन की चमक-दमक और विकास का मायाजाल (शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार) लेकर वे आदिवासी दुनिया में प्रवेश करते हैं और उनसे उनका सबकुछ (स्वतंत्रता, आत्मनिर्णय का अधिकार, सांस्कृतिक अस्मिता) छीनकर उन्हें अपना शासित बना लेते हैं। इसके बाद उनके ऊपर एक ऐसी सांस्कृतिक व्यवस्था आरोपित कर दी जाती है, जिससे उनकी इतिहास चेतना हमेशा-हमेशा के लिए कुंद हो जाए और वे कभी भी प्रतिरोध की हिम्मत नहीं जुटा पाएं। न्यूगी वा थ्योंगो कहते हैं, 'औपनिवेशिक ताकतें अपने आर्थिक और राजनीतिक नियंत्रण को ज्यादा से ज्यादा मुकम्मल रूप देने के लिए सांस्कृतिक परिवेश पर अपना नियंत्रण बनाने की कोशिश करती हैं। शिक्षा, धर्म, भाषा, साहित्य, गीत, नृत्य के विविध रूप, अभिव्यक्ति के प्रत्येक रूप आदि पर नियंत्रण करके वे जनता के समग्र मूल्यों पर नियंत्रण हासिल कर लेती हैं और अंतत: जनता के विश्वदृष्टिकोण पर भी उनका नियंत्रण हो जाता है और इसी के अधीन लोग खुद को परिभाषित करने लगते हैं।' (न्गुगी वा थ्योंगो: भाषा, संस्कृति और राष्ट्रीय अस्मिता, पृष्ठ 54)
भाषा-संस्कृति का सवाल सीधे-सीधे सांस्कृतिक अस्मिता और आर्थिक-राजनीतिकी स्वायत्तता से जुड़ा है। अगर आज समूची दुनिया के प्रथम नागरिकों का अस्तित्व खतरे में है, तो इसके कारण उस 'ऐतिहासिक अन्याय' में निहित हैं, जिसके लिए विकसित देशों (आस्ट्रेलिया आदि) को आज अपने मूल निवासियों एवं आदिवासियों से माफी मांगनी पड़ रही है। इस ऐतिहासिक अन्याय के कारण ही भारत के 699 आदिवासी समुदायों में से 52 का पूरी तरह से खात्मा हो चुका है। यही नहीं वे आज भी भारतीय राजसत्ता और कॉरपोरेट घरानों के हिटलिस्ट में सबसे पहले नंबर पर हैं। वे आधुनिक दुनिया की शुरुआत के समय से ही 'विकास' का सबसे पसंदीदा शिकार रहे हैं। उन्होंने राष्ट्र निर्माण की प्रक्त्रिया में सबसे ज्यादा कीमत चुकायी है और देश के किसी भी नागरिक समुदाय की तुलना में सबसे कम पाया है। जहां तक भारत के आम गरीब-वंचित जनता की बात है तो तथ्य यह भी है कि 'सत्ता हस्तांतरण' के 62 सालों बाद भी जनता का 80 प्रतिशत हिस्सा 20 रुपये प्रतिदिन या उससे कम पर गुजर बसर कर रहा है। वहीं सबसे धनी 100 परिवारों की कुल आय देश के जीडीपी का 25 प्रतिशत है। ये तथ्य हमें भारतीय शासकवर्ग की जनता के जीवन और स्वतंत्रता के प्रति प्रतिबद्धता के बारे में संदेह करने के लिए बाध्य करते हैं।
आदिवासियों के इस संदेह को स्वाधीनता प्राप्ति (सत्ता हस्तांतरण) के समय ही जयपाल सिंह मुण्डा ने तीखी अभिव्यक्ति प्रदान की थी। जब उन्होंने 19 दिसम्बर 1946 को संविधान सभा में ऑब्जेक्टिव्स रिजॉल्युशन पर बोलते हुए यह कहा था, 'मैं भी सिंधु घाटी की सभ्यता की ही एक संतान हूं और उसका इतिहास बताता है कि आप में से अधिकांश बाहर से आए हुए घुसपैठिए हैं। जहां तक हमारी बात है, बाहर से आए हुए लोगों ने हमारे लोगों को सिंधु घाटी से जंगल की ओर खदेड़ा। हम लोगों का समूचा इतिहास बाहर से यहां आए लोगों के हाथों निरंतर शोषण और बेदखल किए जाने का इतिहास है। .. इसके बावजूद मैं पंडित जवाहर लाल नेहरू की बात पर यकीन करता हूं, मैं आप सबकी इस बात पर यकीन करता हूं कि हम एक नए अध्याय की शुरुआत करने जा रहे हैं। स्वतंत्र भारत का एक नया इतिहास जहां अवसरों की समानता होगी, जहां किसी की उपेक्षा नहीं की जाएगी।' पर हम देखते हैं कि स्वाधीन भारत में आदिवासियों की इस उम्मीद और विश्वास को कोई तरजीह नहीं दी गई। सिर्फ भाषा का उदाहरण ही लें तो 1961 की जनगणना के अनुसार भारत में 1652 भाषाएं थीं। 2001 में यह संख्या घटकर मात्रा 234 रह गई। अर्थात् पिछले चार दशक में भारत 1418 भाषाएं खो चुका है। हो सकता है कि यह आंकड़ा कुछ कम हो, क्योंकि इसमें उन भाषाओं की गिनती से बाहर रखा गया है, जिन्हें बोलनेवालों की संख्या दस हजार से कम है। फिर भी यह आंकड़ा तेजी से सिकुड़ रहे भाषाई गणतंत्र और विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र 'भारत' की अत्यंत भयावह तस्वीर पेश करता है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि पिछले 40 वषरें में विलोपित हुए भाषाई समुदायों को सामाजिक, राजनीति, आर्थिक, सांस्कृतिक सहित जीवन के सभी स्तरों पर जबरदस्त आघातों से गुजरना पड़ा है, जिनकी सुरक्षा-संरक्षण का उल्लेख भारतीय संविधान में किया गया है। साथ ही जब हम यूनेस्को द्वारा फरवरी 2008 में जारी 'खतरे में पड़ी भाषाओं का विश्व-मानचित्र' देखते हैं, जिसके अनुसार भारत की 196 भाषाओं का अस्तित्व खतरे में है तो पाते हैं कि भाषाई, जातीय व सांस्कृतिक घृणा, उपेक्षा और भेदभाव की यह प्रक्त्रिया निर्बाध रूप से जारी है। यूनेस्को की एक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में सबसे तेज़ी से भाषाओं के ग़ायब होने की दर भारत में ही है। इसके बाद नंबर आता है अमेरिका का, जहां 192 ऐसी भाषाएं हैं और फिर तीसरे नंबर पर है इंडोनेशिया, जहां 147 भाषाएं दम तोड़ रही हैं। यूनेस्को के अध्ययन के मुताबिक हिमालयी राज्यों जैसे हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड में करीब 44 भाषाएं-बोलियां ऐसी हैं, जो जन-जीवन से गायब हो रही हैं, जबकि उड़ीसा, झारखंड, बिहार और पश्चिम बंगाल में ऐसी करीब 42 भाषाएं विलुप्त हो रही हैं। भाषाओं का इस भयानक तेजी के साथ अदृश्य होते जाना सामाजिक विविधता के लिए भी चिंता की बात है। विशेषकर, ग्लोबलाइजेशन के बाद समाज के सभी आयामों में उन समुदायों के प्रति हिंसा-दमन का दौर पहले से और बर्बर, और अधिक तीव्र हुआ है, जो मुख्यधारा से बाहर की भाषाएं बोलते हैं। ये वे लोग हैं, जो भारत की कुल जनसंख्या के मात्र 8.4 प्रतिशत हैं (लगभग साढ़े आठ करोड़), लेकिन संसाधनों की दृष्टि से देश के सबसे समृद्ध समुदाय हैं।
इन समृद्धशाली समुदायों के साथ भेदभाव का इतिहास बहुत पुराना है। वैदिक काल से लेकर अब तक के लिखित साहित्य में उनके अमानवीय शोषण, दोहन, और दमन की अंतहीन कहानियां बिखरी पड़ी हैं। 'माओवाद से देश की आंतरिक सुरक्षा को खतरा' के नाम पर पिछले वर्ष से आदिवासी इलाकों में शुरू हुआ 'ऑपरेशन ग्रीन हंट' रक्तरंजित इतिहास और सत्ता के दमनकारी कारवाइयों की सबसे ताजा बर्बर कड़ी है। गौर करने लायक बात यह है कि माओवाद (नक्सलवाद) उन इलाकों में संगठित है, जो इलाके देश में सबसे ज्यादा खनिज सम्पदा से भरे पूरे हैं, लेकिन साथ ही साथ वहां रहने वाले आदिवासी समुदायों की गरीबी और बेरोजगारी चरम पर है। ये वे इलाके हैं, जिनका निजी और सरकारी कंपनियों ने पूरा दोहन किया है, परंतु छोड़ा सिर्फ विस्थापन, भुखमरी, गरीबी व संस्कृतिकरण है। ऑपरेशन ग्रीन हंट इसलिए चलाया जा रहा है, क्योंकि इन क्षेत्रों में खनिज और खनिज आधारित उद्योगों के लिए किये गये सैकड़ों करारों (एमओयू) के क्त्रियान्वयन में आदिवासी एवं अन्य स्थानीय समुदाय जबरदस्त प्रतिरोध पैदा कर रहे हैं। इस प्रतिरोध को कमजोर किये बिना भारत सरकार की खनिज और साथ ही उसकी एफडीआई नीति कार्यान्वित नहीं हो सकती है। छत्तीसगढ़, झारखंड, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल की सरकारों ने कॉरपोरेट घरानों के साथ कई खरब डॉलर के सैंकड़ों समझौतों पर दस्तखत किये हैं। स्टील प्लांट, स्पंज आयरन फैक्टरी, पावर प्लांट, एल्युमिनियम रिफाइनरी, बांधों और खदानों के लिए किये गये ये सारे समझौते गोपनीय हैं। लिहाजा यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि कांग्रेस, बीजेपी, और सीपीएम में 'निवेश और त्वरित आर्थिक विकास के लिए' अनुकूल वातावरण बनाने के प्रश्न पर आम सहमति है। स्पष्ट है कि ऑपरेशन ग्रीन हंट भारत के उन प्रथम नागरिकों के अस्तित्व को बर्बरतापूर्वक कुचल देने की कार्रवाई है, जो अन्यायपूर्ण विकास का विरोध करते हैं, राज्य प्रायोजित हिंसा के खिलाफ खड़े हैं तथा अपने पूर्वजों की धरोहर को बचाकर रखना चाहते हैं।

ेदेश के पहले आदिवासी उपन्यासकार थे मेनस ओड़ेया


संजय कृष्ण : देश के पहले आदिवासी उपन्यासकार थे मेनस ओड़ेया (1884-1968)और पहला उपन्यास है 'मतुराअ: कहनि'। उपन्यास प्राचीन मुंडारी में 1920 के आस-पास लिखा गया। हालांकि यह बीसवीं शताब्दी के पिछले दशक में यानी 1984 में प्रकाशित हुआ, लेकिन लिखा गया बीसवीं शताब्दी के आरंभिक दशकों में। एक लंबा अंतराल लिखने और छपने के बीच। कारण, 1700 पृष्ठों का होना और भाषा मुंडारी। कोई प्रकाशक तैयार नहीं। कैसे छपे उपन्यास। कौन थे मेनस और कहां से मिली उपन्यास लिखने की प्रेरणा? कहानी बड़ी दिलचस्प है।
मेनस ओड़ेया 'इनसाइक्लोपीडिया आफ मुंडारिका' के संकलनकर्ता फादर हाफमैन के स्टेनो थे। करीब पांच हजार पेजों की सामग्री उन्होंने टंकित की थी। टंकण के समय ही यह विचार आया, क्यों न इन सामग्रियों से एक उपन्यास की रचना कर दूं, उनकी भाषा में उनके लिए। इसी बीच विश्वयुद्ध छिड़ गया। फादर जर्मन थे। सो, अंग्रेजों ने उन्हें अपने वतन लौटने का हुक्म सुना दिया। फादर जर्मनी अपने गांव लौट गए और वहीं से सामग्री रांची भेजते फिर पटना जाता छपने के लिए। कहते हैं, फादर अंतिम दिनों में गठिया से ग्रसित हो गए थे और उन्हें टाइप करने में काफी दिक्कत होती थी। एक छोटी सी हथौड़ी के सहारे वे टाइप करते। एक अक्षर टाइप करने में कई मिनट लग जाता। फिर भी, उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। यह संयोग देखिए कि इनसाइक्लोपीडिया का अंतिम भाग डिस्पैच जिस दिन भेजा, उसके दूसरे दिन उनकी मृत्यु हो गई। उन्होंने अंतिम डिस्पैच करते समय लिखा, 'ईश्वर को धन्यवाद कि अब मुझको टाइप नहीं करना पड़ेगा।' रांची छोड़ने से पहले फादर सर्वदा मिशन खूंटी में रहते थे और यहीं पर मेनस भी उनके साथ रहते थे। एक बार भगवान बिरसा ने इस मिशन पर हमला कर दिया था। सौभाग्य से दोनों बच गए। उस समय भगवान बिरसा का आंदोलन चरम पर था। मेनास ने भगवान के आंदोलन को भी नजदीक से देखा था। वे खुद भी मुंडा थे। सो, अपने समाज के बारे में जानते थे। रही-सही कसर फादर के शोध अध्ययन से पूरा कर लिया। यहीं से उपन्यास का बीज पड़ा- 'मतुराअ: कहनि'। इस उपन्यास के केंद्र में नायक मतुरा है। मतुरा खूंटी के पास एक नई बस्ती बसाता है। उस बस्ती में एक ही गोत्र के लोग रहते हैं। धीरे-धीरे दूसरे गोत्र के लोग भी पहुंचते हैं और बस्ती बड़ी होने लगती है। अब नई बस्ती की जरूरत पड़ती है। पाहन पहाड़ों से पत्थरों को लुढ़काता है। गांव का सीमांकन किया जाता है। मुंडा गांवों को ससनदिरि (श्मशान का पत्थर) ही विभाजित करता है। यहीं से कहानी शुरू होती है। हिंदी-मुंडारी भाषा के विद्वान और इस उपन्यास को प्रकाशित कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले प्रो दिनेश्वर प्रसाद ने इस कृति के बारे में लिखा है, 'मथुरा की कहानी मुंडा जीवन का महाभारत है। महाभारत के विषय में कहा जाता है, यन्न भारते तन्न भारते। यानी जो महाभारत में नहीं, वह भारत में भी नहीं। यह उपन्यास भी कुछ ऐसा ही महत्व रखता है। यह उपन्यास की शक्ल में मुंडा जीवन का विश्वकोश है। इसमें मुंडा समाज, संस्कृति एवं इतिहास की प्रत्येक जानकारी उपलब्ध है।' मेनस का अंतिम दिन कष्ट में बीता। वे लोगों के स्नायु और हड्डी जोड़ आदि बीमारियों का इलाज कर अपना जीवन यापन करते थे। लंबा कद और गठा शरीर था। खैर, उनके जीते जी पुस्तक प्रकाशित नहीं हो सकी। 1934 में फादर पोनेट रांची आए। इन्होंने भी मुंडारी भाषा पर काफी काम किया। बहुत प्रयास किया इसके प्रकाशन के लिए, पर वे अपने जीवन के अंतिम काल में ही इसे प्रकाशित करवा सके कैथोलिक प्रेस से। फिलहाल, इसके हिंदी अनुवाद को लेकर प्रो दिनेश्वर प्रसाद और अश्विनी कुमार पंकज सक्रिय हैं।