मंगलवार, 19 अक्तूबर 2010

बीस रुपये में गुजारा करती लुप्त होती जनजाति

 

संजय कृष्ण : केंद्र और राज्य सरकार की कल्याणकारी योजनाएं भी आदिवासियों के जीवन स्तर में सुधार नहीं ला पा रही हैं। सो, यहां की अधिकांश आबादी आज भी आदिम युग में जीने को अभिशप्त हैं। उनकी रोजाना आय बीस रुपए से भी कम है। आंकड़े बताते हैं कि पांच सौ रुपए आय वर्ग में कुल आबादी का 70.28 प्रतिशत है। छह सौ रुपए कमाने वालों की संख्या 10.88 है। सात सौ कमाने वालों की संख्या 8.49 है। आठ सौ कमाने वाले 6.24, एक हजार कमाने वाले 2.72 और एक हजार से ऊपर कमाने वाले 1.09 प्रतिशत हैं। यह अलग बने झारखंड की कहानी है। राज्य की कुल आबादी 2,69,09,428 है। इनमें लुप्तप्राय जनजातियों की संख्या 1,92,425 है। यानी 0.72 प्रतिशत। इनमें बिरहोर (6579), परहिया (13848), माल पहाडि़या (60783), सावर (9949), सौरिया पहाडि़या (61121), हिल खडि़या (1625), कोरवा (24027), असुर (9100), बिरजिया (5393)हैं। आदिम जनजातियों की सर्वाधिक संख्या साहेबगंज में 35,129 है और सबसे कम धनबाद में महज 137। इनकी आजीविका जंगल पर निर्भर है। जंगल में वन विभाग और माओवादियों की चलती है। 2006 में वन अधिकार कानून लागू हुआ लेकिन सरकारी महकमा इसे लागू करने के प्रति उदासीन है। जिसके कारण आदिवासियों को इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है। खेती से इनकी जीविका में सुधार हो सकता है, लेकिन सिंचाई के अभाव में इनकी अधिकांश भूमि असिंचित ही रह जाती है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि लुप्तप्राय जनजातियों के पास कृषि योग्य भूमि 23,876 एकड़ है। इनमें सिंचित भूमि 6594 एकड़ हैं और 17282 एकड़ भूमि पर सिंचाई नहीं हो पाती है। ये आंकड़े सरकार को ही मुंह चिढ़ाते हैं। उनकी योजनाओं के हश्र की कहानी बयां करते हैं। पिछले दिनों अर्जुन सेन गुप्ता ने भी अपने रिपोर्ट में लिखा था कि देश की आबादी का 80 प्रतिशत 20 रुपए रोज पर गुजारा करती है।

कम्बख्तो, मैं तुम लोगों की तरह पागल नहीं हूं...

राधाकृष्ण :  यों तो वह बिना किसी कारण के मुस्कराता रहता था।
ऐसे आदमी पागल होते हैं। अगर कोई अपने मतलब से अपने स्वार्थ से मुस्कराता है, तो वह ठीक है। कम से कम वह पागल तो नहीं है। लेकिन अगर कोई बिना वजह के मुस्कराता है तो वह मुस्कान का अपव्यय करता है। इस व्यापारिक युग में अपव्यय बड़ी खराब चीज है। इससे दिवाला निकल जाता है। सो, मुस्कान का भी अपव्यय नहीं होना चाहिए। जो फिजूल बिना कारण के मुस्कराता रहता है, वह पागल नहीं तो और क्या है?
खाने-पीने का भी उसका ठीक नहीं। जो मिला सो खा लिया। नहीं मिला, नहीं खाया। अपनी मौज में मुस्कराते रहे। जरूर ही वह पागल है, वरना खाना तो आदमी को दोनों वक्त मिलना ही चाहिए। इसी दोनों वक्त के भोजन के लिए आदमी चोरी, डकैती, घूसखोरी, जालसाजी और बेईमानी करता है। इसी भोजन के लिए राज्यक्रांतियां होती हैं, षड्यंत्र होते हैं, हत्याएं होती हैं, तख्त उलटते और पलटते हैं। भोजन ही तो सारवस्तु है। उस भोजन की ओर से लापरवाह? उस भोजन के बिना भी अलमस्त? वह जरूर पागल है। यदि वह पागल नहीं होता, तो अपने भोजन के लिए अवश्य ही जाल-फरेब करता, चोरी-डकैती करता अथवा किसी से भीख मांगता। मगर वह तो, यह सबकुछ भी नहीं करता। जरूर वह पागल है।
रहने का भी ठौर ठिकाना नहीं। जहां जमे वहीं अपना घर है। सड़क पर है, तो वहीं आराम है। जरूर वह पागल है, अन्यथा उसका कोई अपना घर जरूर होता। अगर अपना घर नहीं होता, तो कोई किराये का घर तो जरूर होता। अगर वह भी नहीं होता, तब भी किसी मकान या जमीन के लिए किसी अदालत में उसका कोई दीवानी मुकदमा जरूर चलता होगा। नहीं-नहीं वह पागल है। उसे अपने कपड़े-लत्ते का ख्याल नहीं। वह अपने भोजन की भी परवाह नहीं करता। उसके रहने का भी ठीक नहीं। ऊपर से वह बिना किसी कारण के मुस्कराता रहता है। उसके पास भीख मांगने की झोली तक नहीं और वह अलमस्त बना रहता है। जरूर वह पागल है। 
ऐसे पागल से कौन बोले? मैं भी नहीं बोलता। उसके पास तो अपनी कोई कामना नहीं। फिर वह दूसरों के काम में दिलचस्पी क्यों लेगा? जिसके पास अपना स्वार्थ नहीं, उससे दूसरे किसी का स्वार्थ कुछ भी नहीं सधेगा। वह फिजूल है। समाज और सामाजिक चेतना के लिए वह पागल है। पागल से नहीं बोलना चाहिए। मैं शाम-सवेरे, दिन-दोपहर, आते-जाते उसे बराबर देखता हूं। वह बराबर मुस्कराता रहता है, बराबर हंसता रहता है। मैं उससे बोलता ही नहीं।
वह पागल बराबर मेरे मुहल्ले में चक्कर काटता था, मेरे ही मुहल्ले में रहता था। घर तो उसका था ही नहीं। अपना पड़ोसी भी उसे कैसे कहूं? मगर वह मेरे ही मुहल्ले में रहता था।
सन 1946 की बात है। संप्रदाय और मजहब आपस में टकराने लगे। मुझे मालूम नहीं कि भगवान और अल्लाहताला कभी लड़ते होंगे, खुदाबंदा करीम और श्री रामचंद्र आपस में छूरेबाजी करते होंगे? लेकिन हिंदू और मुसलमान तो जरूर लडऩे लगे। सारा देश इस वातावरण में लीन हो गया।
फिर हमारा ही नगर क्यों चुप रहे? क्या गया के हिंदुओं ने मां का दूध नहीं पिया है? क्या मुसलमानों के पास इस्लाम की आन नहीं? अल्लाओ-अकबर! बजरंग बली की जय!!...लो, दोनों ओर ठन गई। खचाखच छुरियां चलने लगीं, बीच-बीच में बंदूकों से फायर होने लगे। फटाफट तमाम घरों के सभी दरवाजे बंद हो गए। सारे शहर में सन्नाटा छा गया। बस, कभी दूर से हर-हर महादेव की आवाज आती या फिर आत्र्तनाद का स्वर सुनाई देता। सड़कों पर लहू के धब्बे थे और निरीह की लोथ थी। ओह, कैसा बुरा वक्त था।
मगर वह पागल तब भी घूम रहा था, तब भी हंस रहा था। मैंने अपने मकान की खिड़की को खोलकर देखा। वह भागते हुए लोगों को देखकर हंस रहा था, मुर्दा पड़ी हुई लाशों को देखकर हंस रहा था।
आज पहली बार मुझे उस पागल पर ममता आई। डर लगा कि कहीं कोई उसे मार न डाले। मैंने खिड़की बंद की। जल्दी-जल्दी नीचे उतरा। पास जाकर बोला, तुम कहीं छिप क्यों नहीं जाते?
वह मुस्कराता रहा, मेरी ओर देखता रहा।
मैंने कहा-देखते नहीं, चारो ओर मार-काट मची हुई है?
उसने मुस्कराकर कहा-हां, मार-काट मची हुई है। सब पागल हो गए हैं।
वह ऐसा वक्त था कि आदमी या तो हिंदू था या मुसलमान था। इसके सिवा वह कुछ भी नहीं था। इसके सिवा वह कुछ हो भी नहीं सकता था। मेरे मन में एक संदेह ने सिर उठाया। मैंने उससे पूछा-तुम हिंदुओं की ओर हो या मुसलमानों की तरफ?
उसने हंसते हुए कहा-क्या तुम मुझे भी पागल समझ लिया है? मैं किसी की तरफ क्यों रहूं? मैं पागल नहीं हूं।
और, वह मुझे लक्ष्य करके हंसा, फिर गली की ओर चलकर मुड़ गया। जाते-जाते वह बड़बड़ा रहा था कि लोग पागल हो गए हैं कि मुझे पागल समझ रहे हैं। कम्बख्तो, मैं तुम लोगों की तरह पागल नहीं हूं।...
राधाकृष्ण की यह कहानी उनके पुत्र सुधीर लाल ने उपलब्ध कराई है। राधाकृष्ण के बारे में यही कहना है प्रेमचंद ने एक बार कहा था कि यदि पांच कहानीकारों की सूची बनाई जाए तो उनमें एक नाम राधाकृष्ण का भी होगा। प्रेमचंद के निधन के बाद राधाकृष्ण ने हंस का भी कुछ दिनों के लिए संपादन किया। सैकड़ों कहानियां लिखीं, दर्जनों उपन्यास लिखे। रांची से आदिवासी नामक पत्रिका का भी संपादन किया। पर, आज हिंदी के ख्यात आलोचकों का ध्यान राधाकृष्ण पर नहीं है। जबकि यह उनका जन्मशताब्दी वर्ष है। पर, हम इन्हें भूल गए। हिंदी का लेखक इतना कृतघ्न क्यों है...।
 यह कहानी क्यों, यह कहानी इसलिए कि हर ओर अयोध्या कांड को ले अरण्यरोदन जारी है। यह कहानी हमारी संवेदना को झिंझोड़ती है। 
                                                                                                                          

                                                                                                                                             -संजय कृष्ण

अब याद नहीं आते भोजपुरी के तुलसीदस कहे जाने वाले कवि बावला

-एम. अफसर खां सागर हम फकीरों से जो चाहे दुआ ले जाए, फिर खुदा जाने किधर हमको हवा ले जाए, हम सरे राह लिये बैठे हैं चिंगारी, जो भी चाहे चरागो...