सोमवार, 13 दिसंबर 2010

वंदनवार वृक्ष, प्यासी धरती और वोटों की बारिश

संजय कृष्ण : रांची जिले के मांडर, बुड़मू, खलारी और चान्हो...चारों प्रखंडों में कहीं एमसीसी, कहीं पीएलएफआई तो कहीं टीपीसी जैसे उग्रवादी संगठन। इनके इशारे पर ही यहां की हवाएं अपना रुख तय करती हैं। आदमी की बिसात ही क्या? सोमवार का दिन। पंचायत चुनाव का तीसरा चरण। हम मांडर के अन्ना हाई स्कूल पर पहुंचते हैं। बंधु तिर्की का इलाका। वे यहां के विधायक हैं। ठंड की अलसाई सुबह के बावजूद मतदान केंद्र पर भीड़ जमी है। कहीं कोई बाधा नहीं। शांतिपूर्वक मतदान चल रहा है। वोट देकर आते रणसी खलखो से पूछता हूं पंचायत चुनाव से क्या कुछ बदलाव आएगा? कहते हैं, इसीलिए तो आधा कोस से चलकर आया हूं। माथे पर उभर आई रेखाएं उनकी उम्र का पता देती हैं। आपके प्रतिनिधि बंधु तिर्की हैं, फिर भी पीने के लिए पानी की किल्लत...। कहते हैं, कई बार उनसे कहा गया, लेकिन कुछ नहीं हुआ। सो, अब हिम्मत जवाब दे गई। रणसी करकच्चों गांव के हैं। गांव की आबादी वे तीन हजार बताते हैं। कहते हैं, पीने का पानी भी ठीक से मयस्सर नहीं। कुआं सूख चुका है। चापानल एक चल रह है, बाकी सब खराब। उनकी बातों की ताइद मांडर के प्यासे खेत भी करते हैं। मांडर से जब पतली सड़क पकड़ तिगोई अंबा टोली की ओर बढ़ते हैं तो सड़क के दोनों किनारे दूर-दूर तक फैले खेत अपनी पीड़ा खुद बयां करते हैं। सूखे खेतों में घास का तिनका तक नहीं। गाय-बैल-बकरी के लिए चारा जुटाना भी मुश्किल। मतदान केंद्र के बाहर खड़े अंबा टोली के पारा टीचर इम्तियाज अंसारी कहते हैं कि यहां सिंचाई को कोई साधन नहीं है। सिंचाई की व्यवस्था हो तो खेत सोना उगले। दो साल से बारिश भी ठीक से नहीं हो रही है, सो खेती प्रभावित है। इस बार धान की खेती भी नहीं हुई। इसी गांव के तिगई के सिब्बा उरांव वोट डाल चुके थे। इत्मीनान से धूप सेवन कर रहे थे। उनकी भी शिकायत वही थी। कहने लगे, चेकडैम गांव से एक किमी दूर बना है, लेकिन बारिश में बह गया। अब न पानी उसमें रुकता है न खेती हो पाती है। जनप्रतिनिधि चुनाव के दौरान आते हैं फिर वे कहां चले जाते हैं, खोजना मुश्किल। कहते हैं, पंचायत चुनाव से एक आस है। खेत प्यासे हैं, पेट भूखा है। पेट की आग तो मजदूरी से बुझा लेते हैं, लेकिन खेत...। इसी प्रखंड का हात्मा, छोटा हात्मा सब जगह एक ही नजारा था। वोट डालने के लिए लाइनें लगी थीं। मांडर की प्यासी धरती को छोड़ बुढ़मू की ओर बढ़ चलते हैं। पतली-सर्पीली राह से गुजरते हुए सड़क के दोनों ओर झाड़-झंखाड़। सिदरौल राजी टोला का वोट पंचायत भवन पर पड़ रहा है। पास में कुआं सूख चुका है। मतदान देने आए जगदीश साहु अपनी शिकायत की पोटली खोल देते हैं। न बीपीएल सूची में नाम दर्ज हुआ न इंदिरा आवास मिला। रांची में तीन हजार महीने में गार्ड की नौकरी और पांच जने का पेट। अधिकारी सुनते ही नहीं...। उमेडंडा के लैम्पस भवन पर वोटरों की भारी भीड़। अव्यवस्था का आलम। उमेश कुमार कहते हैं, छह बजे आए और 11 बजे वोट दिए। अधिकारी एकदम सुस्त हैं। यही शिकायत कई और वोटर करते हैं। एक कहता है कि यहां दो सौ वोटरों का नाम ही काट दिया गया। यहां से अब जंगल की ओर रुख करते हैं। सरले होते हुए राय बाजार, डकरा और खलारी। सरले से खलारी तक पांच किमी की दूरी और सड़क के दोनों ओर जंगल और पहाड़। सड़क के दोनों ओर सखुआ के विशाल वृक्ष वंदनवार खड़े। सूनसान सड़क। बीच-बीच में कोई आदिवासी दिख जाता है। जंगल से लकड़ी ले आता। छोटी-छोटी पहाडिय़ों पर छोटे-छोटे खपरैल के घर दूर से दिखाई पड़ते हैं। सीढ़ीदार पहाड़ और उसपर बसे मकान। जैसे दार्जिलिंग के किसी पहाड़ पर चल रहे हों...। खलारी अंतिम पड़ाव। कोयले की कालिख से पूरा शहर काला। दुकानें, मकान और लोग भी...। यहां एसीसी की खलारी सिमेंट फैक्ट्री भी है और यहीं पर सीसीएल का खदान भी है। शहर से बेहतर कस्बा इसे कह सकते हैं। यहां अस्सी प्रतिशत बिहारी हैं। खलारी से होते हुए चान्हो के चामा पहुंचते हैं। घड़ी की सुइयां तीन बजा रही हैं। मतदान केंद्र के बाहर सड़क पर काफी चहल-पहल। यहां दो बूथ हैं और दोनों पर लाइनें लगी हैं। ये अतिसंवेदनशील हैं। चुनाव अधिकारी बताते हैं कि आधे घंटे और चलेगा। वे मतदाताओं को पर्ची बांट रहे हैं। सुरक्षा में लगे जवान काफी मुस्तैद दिखे। धीरे-धीरे हम आगे बढ़ते हैं। बीजूपाड़ा, मांडर होते हुए पुन: वापस। प्यासी धरती पर वोटों की बारिश आश्वस्त कर रही थी कि अब वे ज्यादा दिन तक नहीं टिकने वाली। उम्मीद की लौ हम भी जला लेते हैं...

सरसों के फूल, हडिय़ा की गंध और पठार पर कोहरा

संजय कृष्ण : रांची से नगड़ी, इटकी, बेड़ो और उससे होते हुए लापुंग। घुमावदार राहों से गुजरते हुए कभी कच्ची सड़क मिलती, तो कभी पक्की। कहीं-कहीं बेहद पतली-दुबली। सड़क के दोनों किनारों पर खिलते सरसों के पीले-पीले मुस्कुराते फूल...तो पठार और जंगलों का संग-साथ। बूंदा-बांदी के साथ नथुनों में समाती वन तुलसी की गंध। कहीं पंचायत चुनाव से बेखबर किसान धान ओसाते, तो कहीं मतदान केंद्रों पर मतदाताओं की उमड़ती भीड़। लोकतंत्र की छोटी इकाई में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करने को लोग बेताब। इस तरह, खूबसूरत प्रकृति की मनोहारी छटा को निहारते जब हम लापुंग प्रखंड पहुंचते हैं, तो दो बड़े होर्डिंग हमारा स्वागत करते हैं। एक होर्डिंग पर सूबे के मुखिया का हंसता चेहरा और खेलते बच्चे हैं। होर्डिंग पर बड़े-बड़े हरफों में एक स्लोगन है, पंचायत की पहली सीढ़ी, देख रही है अगली पीढ़ी। अगली होर्डिंग 32 साल बाद हो रहे चुनाव के बारे में जागरूक करता है। पर, अगली पीढ़ी...लतरातू का एक युवक करमवीर तिर्की शिकायती लहजे में कहता है, गांव में आज तक बिजली नहीं। सड़क नहीं। कच्ची सड़क से आना-जाना होता है। सिबन उरांव की उम्र साठ के आस-पास। बूढ़ी आंखें। माथे पर झुर्रियां। पूछता हूं, उम्र कितनी है। कहती हैं- का जानबे बाबू। अपनी उम्र नहीं बता पाती है। रंथी उरांव चुनाव में मशगूल है। वोटरों को उनके नाम की पर्ची खोज-खोज दे रहा है। ककरिया का फागू बैठा 50 वसंत देख चुका है। वह चुनाव से आश्वस्त है। कहता है, कुछ तो बदलाव आएगा ही....। जहां कुछ नहीं था, वहां कुछ तो होगा ही। बदना मुंडा भी पचास के पार है। वोट डालने के लिए इंतजार कर रहा है। कहता है, बहुत भीड़ है। थोड़ा निकस जाए तो जाएं। ककरिया चट्टी है। दो-चार दुकानें उग आई हैं। जरूरत की चीजें सब कुछ मिलती हैं। पाजी लोहरा अपनी पर्ची लेकर घूम रहा है। सुबह से हडिय़ा से आचमन कर चुका है। किसी दूसरे को खोज रहा है...शायद एकाध शीशी की व्यवस्था हो जाए...। पक्की सड़क छोड़कर हम कच्चे रास्ते से रामाटोली में पहुंचते हैं। चुनाव की गहमा-गहमी। चेहरे से साठ के पार लगती सुकरा मुंडाइन से पूछता हूं, वोट डाल देली। वह अपना अंगूठा दिखाती है। उसे लगता है कि हम कोई प्रत्याशी हैं, इसलिए पूछ रहे हैं। तुरंत कहती है, एक पौआ के देब...। जब तक मैं उसकी बात समझ पाता, एक युवक उसे पकड़ दूसरी ओर खींच ले जाता है...चल-चल हम देबी। यहां से दूसरे गांव की ओर रुख करता हूं। आकाश में सूरज का सुबह से ही अता-पता नहीं है। बादलों ने घेरा डाल रखा है। कभी-कभी बूंदा-बांदी। लगता है- जैसे पठार पर बैठा है खामोश कोहरा।