गुरुवार, 27 जनवरी 2011

सिर्फ इक बार मुलाकात का मौका दे दे

संजय कृष्ण :   ...तो गजल के बेताज बादशाह गुलाम अली की सुरमई शाम थी। सरहद पार से आती सुर की आवाज रांची को भिंगो गई। बुधवार की शाम कुछ ऐसी थी, जो सालोंसाल याद रहेगी। वाकई, थी खबर गर्म उनके आने की। जैसे ही वह रांची के जिमखाना क्लब के मंच पर नमूदार हुए, तालियों से जोरदार इस्तकबाल हुआ। अब तो बहार आने की बारी थी। वे गजलों का ऐसा गुलदस्ता लेकर आए थे, जिसमें हर रंग के फूल खिले थे। कुंजे-लब से जब लहरों की तरह कशिश भरी आवाज बाहर आ रही थी तो वह मिस्ले-अश्क (आंसू की तरह) की तरह भी बन जाती।
आगाज इन दुआओं के साथ कि...मैं आपका दुआ करने वाला हूं, खुश रहें, सुर में रहें, तभी हम भी सुर में रह सकते हैं। ...अब मैं समझा तेरे रुखसार पे तिल का मतलब, दौलते हुस्न पे दरवान बिठा रखा है से अपनी गजलों का आगाज किया। अनवर की इस गजल के बाद अपनी मशहूर गजल सुनाई। इस गजल से उन्हें पहचान भी मिली और प्रसिद्धि भी। यह गजल थी हसरत मोहानी की। तीस पंक्तियों की इस गजल के कुछ शेर ही सुनाए। कंपकपाते ओठ से जब पहला शब्द चुपके निकला तो तालियां से पूरी बज्म गूंज उठी। करीब पांच मिनट तक इस शब्द पर ही अटके रहे। श्रोता लहालोट होते रहे। सात सुरों में पिरोया था इस शब्द को। ..चुपके चुपके रात दिन आंसू बहाना याद है...हमको अब तक आशिकी का वह जमाना याद है। यह काफी राग में थी। इसे ठाट का राग कहते हैं। इस गजल को गुलाम अली ने खुद कंपोज किया था। एक-एक शब्द पर ठहरते फिर आगे बढ़ते। अगली बारी नासिर काजमी के गजल की थी...रागिनी पहाड़ी में। पहले शेर पढ़ी। दिल गया था तो ये आंखें भी कोई ले जाता...मैं फकत एक ही तस्वीर कहां तक देखूं। अब गजल की बारी थी, दिल में एक लहर-सी उठी है अभी, कोई ताजा हवा चली है अभी। लहरों में जैसे अलोडऩ पैदा होती है, ओठों से भी गुलाम साहब कुछ ऐसा ही एहसास पैदा कर रहे थे। शांत लहर, तेज लहर, मद्धिम लहर...। न जाने कितनी लहरें लबों से उठ रही थीं। अब चौथी गजल की बारी थी। गजल से पहले यह शेर भी सुनाया- कैसी चली है अब के हवा तेरे शहर में, बंदे भी हो गए हैं खुदा तेरे शहर में..। इसके बाद गजल पेश की- हम तेरे शहर में आए हैं मुसाफिर की तरह, सिर्फ इक बार मुलाकात का मौका दे दे..। मेरी मंजिल है कहां, मेरा ठिकाना है कहां सुबह तक तुझसे बिछड़कर मुझे जाना है कहां..। आज इजहारे खयालात का मौका दे दे..।
हालांकि मना करने के बावजूद कुछ लोग मोबाइल व इलेक्ट्रानिक कैमरे में इस शाम को कैद रहे थे। बार-बार वह कैमरा बंद करने की गुजारिश कर रहे थे। कहा, मैं गजलें आपको सुनाने आया हूं, कैमरों को नहीं। 
व्यवधान के बाद अगली गजल पेश की...तुम्हारे खत में वो इक सवाल किसका था, वफा रकीब तो आखिर वो नाम किसका था...। महफिल जवां होकर धीरे-धीरे अंजाम की ओर बढ़ रही थी। थोड़ा मूड बदला। गजल से ठुमरी पर आए। बरसन लागे सावन....तोरे बिना लागे न जिया मोरा। ठुमरी सुन सबके हाथ खुल गए। एक बार फिर तालियां की गडग़ड़ाट से अपने इस कलाकार का इस्तकबाल किया। अब तो बारी हंगामा बरपाने की थी। 'हंगामा है क्यों बरपाÓ कार्यक्रम के जरिए गजल सम्राट गुलाम अली ने क्लब परिसर में सुरमई जाजम बिछा दी। सुरों में झलकती बुजुर्गियत के बावजूद उन्होंने श्रोताओं को गजल अदायगी से बांधे रखा। स्वर पर ऐसी पकड़ की कि संगतसाज जुगलबंदी करने में अपने को असहज पा रहे थे। सुर व स्वर पर ऐसा नियंत्रण कि तबले की थाप भी असहज हो जाती। ऐसी थी 70 साल के इस युवा गायक की दिलकश आवाज।