रविवार, 15 मई 2011

उसकी कहानी

राधाकृष्ण

एक ठूंठ खड़ा था और उसके खोड़हर में घोंसला बना कर एक चिडिय़ा रहती थी।

वह भी कोई दिन था, जब इस ठूंठ ने पृथ्वी के ऊपर खड़े होकर अपने लाल-लाल पत्तों के इशारे से वसंत को बुलाया था और उसके स्वागत में अपनी सुगन्ध-भरी मदमाती मंजरियां भेंट की थीं।

लेकिन अब वे दिन अतीत में अस्त हो गए थे। समय श्वेत और श्यामल चरण-चिह्न छोड़ता हुआ बहुत दूर तक चला गया था। यदि वह ठूंठ याद कर सकता, तो अनेकों वसन्त, अनेकों बरसात और शरद की असंख्य चांदनी रातों को याद कर सकता।

अब भी वसन्त आता था, अब भी भौंरे गुन-गुन गाते थे, अब भी विगह-कूजन से निस्तब्ध सन्ध्या चंचल हो उठती थी; किंतु वहां अब इसका कुछ प्रभाव नहीं पड़ता था; क्योंकि वह एक ठूंठ था। इने-गिने पत्र-पुञ्ज ही उसकी सजीवता की साक्षी देते थे।

समीप ही एक झरना झर रहा था। वह एक स्वर और एक रागिनी में न जाने क्या गा रहा था। यह वही जाने। वहां फेनिल लहरें उछल-उछल कर, नाच-नाच कर क्रीड़ा किया करती थीं। आसपास हरे-भरे झुरमुट थे, पृथ्वी पर तृणों की शैया थी, बहुतेरे फूल हंस-हंस कर खेल रहे थे; किंतु वह ठूंठ जैसे सबसे पृथक, अकेला और असुन्दर होकर खड़ा था।

रात हो आई थी। तृतीया का बंक शशि रूप की नौका के समान तैरता हुआ आकाश के नील महासागर को पार कर रहा था। बिखरे हुए तारे ऐसे जान पड़ते थे, जैसे किसी महाकाव्य में पड़ी हुई उपमाएं। शीतल पवन मन की भांति इधर-उधर दौड़ता हुआ अठखेलियां कर रहा था।

ठूंठ खड़ा था औ अपने घोंसले से सिर निकाल कर चिडिय़ां झांक रही थीं।

सहसा पूरब की ओर से कुछ मेघ दौड़ पड़े। हवा की चंचलता क्षुब्धता में बदल गई। आकाश में छितराये हुए प्रकाश के मोती अलोप हो गये। चांद बादलों के बीच उलझ गया। चारों ओर एक स्याही सी फिर गई। एक भीषण गरज से पृथ्वी कांप उठी। ...फिर बिजलियों की तड़पन, मेघों की गरज, वृष्टि की बौछार और हवा का हाहाकार!...आखिर थोड़ी देर के बाद सब थम गया। बादल दौड़ते हुए आए थे, दौड़ते हुए चले गये। चांद खिलखिलाता हुआ निकल आया। तारे हंसने लगे।

सब हुआ; लेकिन वह ठूंठ गिर पड़ा। उसकी डालें टूट गई थीं और उसमें रहने वाली चिडिय़ां चें-चें करके उस अंधकार में उड़कर न जाने कहां चली गई थीं। ठूंठ निस्सहाय, निरावलंब पृथ्वी पर पड़ा हुआ था।

अब भी झरना वही अपना मुक्त, प्रवाहमय और अविराम गीत गाने में व्यस्त था, फेनिल लहरें क्रीड़ा कर रही थीं, वृक्षों की द्रुमावलियां डोल रही थीं, फूल हंस-हंसकर लोट रहे थे, पर वह ठूंठ नहीं था और उसमें बसने वाली चिडिय़ां भी नहीं थीं।

सब कुछ वही था, केवल रह-रह कर हवा ठंडी सांसे ले लिया करती थी।

हंस के फरवरी, 1935 अंक में प्रकाशित।