गुरुवार, 9 जून 2011

बदहाल धरती आबा की धरती

खूंटी जिले के उलिहातू गांव में बिरसा मुंडा के पोते सुकरा मुंडा का मकान
संजय कृष्ण : तमाड़-खूंटी मार्ग से होते हुए उलिहातू पहुंचे तो दस से पार हो चुका था। सूरज तप रहा था। सपीर्ली सड़कों से होते हुए गांव पहुंचे। सड़क के दोनों ओर बसे जंगल निस्तब्ध थे। सड़कें भी शांत थीं। उसके किनारे पथरीले ईंटों से बने इक्का-दुक्का घर भी चुपचाप थे। रास्ते में एकाध मुंडारी महिलाएं लाल पाड़ की सफेद साड़ी में सड़क पर ही धान कूट रही थी। रास्ते पार करती बकरी और भेंडें भी दिख जातीं। प्रकृति के अपूर्व सौंदर्य को निहारते, गांवों की बेबस जिंदगी को देखते हुए हम अपने मुकाम पर पहुंचे। पुरुष समय पास करने के लिए गपबाजी कर रहे थे। वे मुंडारी में बातचीत कर रहे थे, जो अपने पल्ले नहीं पड़ रही थी। महिलाएं अलबत्ता महुआ की डोरी निकाल रही थीं, जिसे सुखाकर तेल निकाला जाता है। धरती आबा बिरसा मुंडा के पोते सुकरा मुंडा की पत्नी लखीमनी भी एक पेड़ की छाया तले यही काम कर रही थी। बिरसा के जन्म स्थल के पीछे उसका मकान है। ऊपर खपरैल। बांस के फट्टे का दरवाजा। क्या आप उम्मीद कर सकते हैं कि राज्य के सबसे बड़े नायक बिरसा मुंडा के वंशज सुकरा के पास एक ढंक का मकान भी नहीं होगा। मकान के आगे लगा चापाकल भी सालभर से बेकार है। वैसे गांव के अधिकांश चापाकल बेकार हैं। बिजली की तो पूछिए मत। दो साल से ट्रांसफार्मर जला है। डीसी से लेकर एसडीओ से भी शिकायत की गई, लेकिन बेकार। मैट्रिक पास सामयल पूर्ति दुभाषिए का काम करता है। गांव के लोग मुंडारी बोलते हैं। हिंदी बहुत मुश्किल से कोई-कोई बोलता है। कहता है, गांव में कोई सुविधा नहीं। नौ जून और 15 नवंबर को अधिकारी दिखाई देते हैं। समस्याएं सुनते हैं, आश्वासन देते हैं। खूंटी जाते ही समस्याओं को 'खूंटीÓ पर टांग देते हैं। नेता इन दो अवसरों के अलावा चुनाव के समय आते हैं, फिर इधर का रास्ता भूल जाते हैं। बरनावास पूर्ति 70 को छू रहे हैं। बुनियादी अस्पातल दिखाते हुए कहते हैं, तीन कमरों वाला यह अस्पातल सालों से बंद है। न कोई डाक्टर, न कोई नर्स। यहां से सबसे नजदीक अस्पताल अड़की दस किमी दूर है और खूंटी 25 किमी दूर। कोई साधन नहीं। एक कमांडर ही चलता है। सुबह-शाम। जरूरत पड़ी तो पैदल ही एकमात्र उपाय। विकास के नाम पर एक सड़क ही दिखाई पड़ती है। 812 लोगों की आबादी वाले इस गांव में महिला-पुरुष संख्या में कोई ज्यादा अंतर नहीं। पुरुष 408 और महिलाएं 404। गांव से सटे बना आवासीय विद्यालय और अस्पताल भी खस्ता हो रहे हैं। अस्पताल में बुध के बुध डाक्टर आते हैं। आवासीय विद्यालय में कक्षा आठ तक 280 बच्चे हैं और शिक्षक महज चार। गर्मी की छुट्टी होने के कारण आवासीय विद्यालय में ताला लटका था। पास बने बिरसा कांप्लेक्स में लगे शिलापट्ट टूट चुके हैं। कांप्लेक्स देखकर रोना आता है। बिरसा अपने की गांव में उपेक्षित हैं। उनके जन्म स्थल को भी मामूली छप्पर से से बनाया गया है। नेताओं के शिलापट्ट जरूर मजबूती से खड़े हैं।