गुरुवार, 11 अगस्त 2011

छत्तीसगढ़ की राह पर झारखंड

संजय कृष्ण : झारखंड भी अब छत्तीसगढ़ की राह चल पड़ा है। यहां भी एसपीओ भर्ती अभियान तेज हो गया है। इसका दूसरा पहलू यह है कि पुलिस-माओवादियों के बीच अब एसपीओ (स्पेशल पुलिस आफिसर) भी पिसने लगे हैं। पुलिस इन्हें भर्ती करती है। मारे जाने पर इनसे अपना पल्ला झाड़ लेती है। माओवादीे इन्हें अपने निशाने पर ले रहे हैं क्योंकि ये उनकी गतिविधियों की जानकारी पुलिस तक पहुंचाते हैं।
गत 25 जुलाई को खूंटी-चाइबासा मुख्य पथ पर 40 वर्षीय विक्रांत लोहरा की गोली मारकर हत्या कर दी गई। पुलिस अब इस बात से पल्ला झाड़ रही है कि वह एसपीओ था। उसकी पत्नी सुमी देवी कहती है कि 2006 से वह एसपीओ था। इसके अलावा वह ठेकेदारी भी करता था। उसके छह बच्चे अब अनाथ हो गए। कुछ लोग कहते हैं कि वह पहले माओवादी था। पुलिस एसपीओ में या तो पूर्व माओवादियों को शामिल कर रही है या फिर आदिवासी युवकों को। यह पहली घटना नहीं है। पिछले साल 18 नवंबर को बुंडू प्रखंड के बारूहातू गांव में प्रदीप मुंडा सहित तीन लोग मारे गए। दो उसके मित्र थे और एक बच्ची भी माओवादियों की फायरिंग में मारी गई। माओवादियों ने उसपर पुलिस मुखबिरी का आरोप लगाया था। प्रदीप भी एसपीओ था। प्रदीप और उसके दो बड़े भाई कुलजीवन सिंह मुंडा (40)कुलदीप सिंह मुंडा (35) कभी माओवादी दस्ते में सक्रिय थे। वे विचारधारा से प्रभावित होकर नहीं, आर्थिक मजबूरियों के कारण दस्ते की ओर आकर्षित हुए थे। बाद में मोहभंग हो गया और एसपीओ में शामिल हो गए। प्रदीप के मारे जाने के बाद पुलिस ने हाथ खड़े कर दिए। कहा, वह एसपीओ नहीं था। प्रदीप की पत्नी लखीमनी ने बताया कि वह (प्रदीप)पुलिस कैंप में सोने जाता था। कभी-कभी घर पर डबल बायरल बंदूक भी लेकर आता था। वह स्पष्ट कहती है कि पुलिस के साथ काम करने से पहले वह पार्टी के लिए काम करता था। प्रदीप के बड़े भाई कुलजीवन सिंह मुंडा भी बताते हैं कि वह पहले माओवादी थे। पिछले छह महीने से पुलिस के लिए काम कर रहे हैं। इन्हें तीन हजार महीने की भुगतान पर रखा गया, लेकिन आज तक इन्हें एक रुपया भी नहीं मिला। इस बाबत जब तत्कालीन एसएसपी प्रवीण कुमार से पूछा गया तो उनका जवाब था, झारखंड में एसपीओ नहीं हैं। एसपी अपने स्तर से माओवादियों की गतिविधियों व अन्य सूचना प्राप्त करने के लिए कुछ लोगों को रखता है। उन्हें इसके लिए पेमेंट भी किया जाता है। पुलिस को स्वीकार करने में आठ महीने लग गए। आठ जून को आईजी सह पुलिस प्रवक्ता एसएन प्रधान ने कहा कि तीन हजार एसपीओ पहले से काम कर रहे हैं। 34 सौ और भर्ती करना है। एसपीओ के लिए अस्सी प्रतिशत राशि केंद्र सरकार देती है और 20 प्रतिशत राज्य सरकार। अभी इसी महीने की पांच जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने एसपीओ की भर्ती को असंवैधानिक करार दिया है। केंद्र सरकार को भी आड़े हाथों लेते हुए कहा कि 'केंद्र सरकार सुनिश्चित करे कि कोई भी धन एसपीओ भर्ती के लिए न जाए।Ó मानवाधिकार कार्यकर्ता व एसेसमेंट एंड मानिटरिंग आथारिटी (योजना आयोग) के सदस्य ग्लैडसन डुंगडुंग कहते हैं कि 'पुलिस अब माओवादियों से सीधे लड़ाई न लड़कर अप्रत्यक्ष लड़ाई लडऩा चाहती है। एसपीओ की भर्ती व उन्हें हथियार देना संविधान का उल्लंघन है। पुलिस की इस स्ट्रेटजी से गांव-गांव में विभाजन होने लगा है। यदि पुलिस को एसपीओ भर्ती करना ही है तो नियमबद्ध करे। क्योंकि इनके मारे जाने के बाद वह इनसे पल्ला झाड़ लेती है। स्टेट के लिए लडऩे के बावजूद उन्हें शहीद का दर्जा भी नसीब नहीं होता।Ó प्रदेश के डीजीपी गौरी शंकर रथ कहते हैं कि प्रदेश में तीन हजार एसपीओ हैं। तीन हजार और बहाली करनी थी। सुप्रीम कोर्ट के निर्णय से तत्काल इस पर ब्रेक लग गया है। हालांकि नौ स्टेट के 81 जिलों में एसपीओ हैं। इनकी संख्या 13566 है जबकि 12000 और भर्ती करना है। इनमें छत्तीसगढ़ और झारखंड पर विशेष जोर है।