बुधवार, 15 जून 2011

कला में अश्लीलता और हुसेन

संजय कृष्ण :  मकबूल फिदा हुसेन ने लंदन में अपनी अंतिम सांसें लीं। वे कई सालों से अपने वतन से दूर रह रहे थे। कारण था, दक्षिणपंथियों की धमकी। उनके निधन से भारतीय कला जगत का एक महासूर्य अस्त हो गया। भारतीय कला को बेशक, एक अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई। अपनी खुद की एक ऐसी शैली विकसित की, जिसे देखकर सहसा उनका नाम कौंध जाता है। यह बिरल कलाकार  कुछ दक्षिणपंथी कट्टरपंथियों के डर से अपने देश से दूर चला गया। इन कट्टरपंथियों का सामना करने की हिम्मत उनमें नहीं थी। सरकारें भी उनकी सुरक्षा को लेकर उन्हें कोई आश्वासन नहीं दे सकीं। हमारी सरकारें, केंद्र की हों या राज्य की, कुछ कट्टरपंथियों के आगे झुक जाया करती हैं। हुसेन मामले में भी यही हुआ। अपनी जान की परवाह करते हुए हुसेन ने देश छोड़ दिया। उनके देश छोडऩे पर कागजी लेखकों, कला समीक्षकों ने खूब कागज काले किए। उनके निधन पर यह सिलसिला फिर शुरू हो गया है। कोई इसे राष्ट्रीय शर्म बता रहा है तो कोई इस शर्म से इतना दुखी है कि उसके दिल में कोई दूसरा भाव टिक नहीं पा रहा है। जब वे देश बदर थे तो किसी ने केंद्र सरकार पर दबाव नहीं बनाया। उनके निधन पर भी उनके शव को भारत में लाने की कोशिश नहीं की गई। उन्हें वहीं दफना दिया गया। एयर कंडीशन में बैठ कर शियापा करने वाले लेखक अब जार-जार रो रहे हैं। अजीब स्थिति है।
एक सवाल तो यह उठता है कि हुसेन गए ही क्यों? उन्हें यहां की अदालत का सामना करना चाहिए था। यह सब जानते थे कि जो भी मुकदमें थे, वे ज्यादा दिनों तक टिकते नहीं। फिर भी वे चले गए और कतर की नागरिकता ले ली। लोग कह रहे हैं कि उन्हें देश से बहुत प्रेम था। अंतिम समय में भी वे अपने वतन को नहीं भूले। पर, देश भी उन्हें कहां भूला?
कहते हैं, कला को उन्होंने ऊंचाई दी। भारतीय कला को पहचान दी। विवाद और लोकप्रियता साथ-साथ चली। जिन कारणों से उन्हें अपने देश से दूर जाना पड़ा, कट्टरपंथियों का कोपभाजन बनना पड़ा, उनमें उनके कुछ विवादित चित्र थे, जो हिंदू आस्तिकता पर आघात करते हैं। उनके विवादित चित्रों को लेकर के. बिक्रम सिंह ने लिखा है, 'यह सोचने वाली बात है कि जिन चित्रांकनों के कारण हुसेन विवादों में घिरे, वे भारतीय कला के लिए नए नहीं थे। हिंदू मंदिरों से लेकर बौद्ध स्तूपों तक में देवी के चित्र पाए गए हैं। जहां तक नग्न और कामोद्दीपक चित्रण की बात है, भारतीय परंपरा के लिए यह नई बात नहीं थी, अजंता, गुप्तकाल और चोलकाल की कला से लेकर खजुहारों में भी इस कला को विभिन्न रूपों और शिल्पों में चित्रित किया गया है। रीतिकाल में भी इसकी चिन्हारियां दिख जाती हैं।Ó  के बिक्रम ने यह नहीं बताया कि इन मंदिरों में क्या देवी दुर्गा, पार्वती, सरस्वती, भारत माता के नग्न चित्र बनाए गए हैं? चलिए मान लें, कला में अश्लीलता नाम की कोई चीज नहीं होती। पर, मदर टेरेसा, अपनी मां की तस्वीर, एक मुसलमान को क्यों कपड़ों में रखा? जबकि एक तस्वीर में एक ब्राह्मण को नंगा दिखाया है।    
 कहने वाले कह रहे हैं, ...'असल में बहुधार्मिक, बहुसांस्कृतिक भारतीय समाज के सदस्य होने के नाते हिंदू, मुसलिम, ईसाई उनके लिए साझा विरासत के अंग थे। इसीलिए उनकी कला में सभी विश्वासों और परंपरा ने जगह पाई। इतना ही नहीं, दुनिया के दस प्रचलित धर्मों को भी उन्होंने अपने रचना कर्म में जगह दी थी।Ó पर यहीं आकर उनकी सोच दगा दे जाती है। हिंदू प्रतीकों के साथ जो वे बर्ताव करते हैं, वह अपने ही धर्म के साथ कतई नहीं करते। मैं नहीं कहता है कि वे इन चित्रों को बनाते समय किसी प्रकार के पूर्वग्रही थे। लोहिया के आग्रह पर उन्होंने रामायण पर पेंटिंगें बनाई। हिंदू धर्म का उन्हें गहरा ज्ञान था। पर, देवियों को नंगा चित्रित करने के पीछे कभी अपनी मंशा को जाहिर नहीं किया। उनके चाहने वालों ने भी यह सवाल उनसे नहीं पूछा? मध्यकाल में कबीर ने दोनों धर्मों की खूब लानत-मलानत की। वे 125 बरस जीए। बनारस में रहे और कट्टरपंथियों से लड़ते रहे। अंत समय काशी छोड़ मगहर गए तो कट्टरपंथियों के डर से नहीं...उन्हें ललकारते हुए गए। उनकी कथित आस्था व विश्वास को चुनौती देते हुए गए। यह समय तो मध्यकाल जितना बुरा नहीं है। पर हुसेन साहब  कतर की नागरिकता ले ली। वे कबीर की भूमिका में होते तो यह सवाल नहीं उठता...। वे एक महान कलाकार थे... भारत के पिकासो थे, इसमें किसी को शक नहीं। वे बेहद उदार थे... उनका साधु स्वभाव था, इसे मानने में भला किसे गुरेज हो सकता है? पर...।