शनिवार, 13 अगस्त 2011

नागार्जुन की पाषाणी

संजय कृष्ण : आजादी के दो महीने पहले जून, 1947 में नागार्जुन की लंबी मिथकीय रचना पाषाणी छपी थी। यह कविता युगधारा, रत्नगर्भ, भूमिजा में इसे संकलित किया गया था। हालांकि पहली बार यह रचना इलाहाबाद से निकलने वाली त्रैमासिक पत्रिका प्रतीक में 1947 में प्रकाशित हुई थी। यह लंबी कविता नागार्जुन ने बरवै छंद में रची। यह छंद, बकौल नागार्जुन कवि गुरुओं का मनचीता (प्यारा) है। इस छंद को रहीम ने भी पसंद किया है और बाबा तुलसी ने भी। तुलसीदास ने तो इस छंद में बरवै रामायण की रचना ही की है। कहते हैं, प्रतीक में जब यह रचना प्रकाशित हुई थी तो इसे काफी लोगों ने पसंद किया था। इसी छंद में आगे चलकर नागार्जुन ने भस्माकुंर खंड काव्य की रचना की। पाषाणी, अहिल्या पर केंद्रित लंबी कविता है। करीब 220 पंक्तियां। रचना पुरुष सत्ता के क्रूर, क्षणमति, दुर्विग्ध संशय को रेखांकित करती है। विष्णुचंद्र शर्मा नागार्जुन की पक्षधरता को देख वे महाकवि से विभूषित करते हैं। उनके शब्द हैं, ...भिक्षुणी, चंदना, पाषाणी, जया जैसी कविताओं में नागार्जुन, किसान और नारी को मुक्ति की प्रगतिशील भूमिका पर जोर देने वाले आज हिंदी जगत के महाकवि हैं। नागार्जुन ने अपनी बात कहने के लिए, आरंभिक समय में मिथकों का सहारा लिया था। जब हिंदी साहित्य में स्त्री विमर्श उपस्थित नहीं हुआ था, नागार्जुन स्त्री पक्षधरता पर कविता लिख रहे थे। उनके लिए अहिल्या से बड़ा चरित्र कोई दूसरा नहीं दिखाई दिया। अहिल्या छल की मारी थी। पति ऋषि गौतम ने शाप दे दिया। वह पाषाणी हो गई। अहिल्या नाम भी शायद इसलिए पड़ा कि वह हिल-डुल नहीं सकती। अहिल्या का एक अर्थ नागार्जुन ने  उद्बोधन नामक कविता में भी खोला है। पाषाणी के साथ उद्बोधन को भी पढ़ा जाना चाहिए।
नागार्जुन जब अपनी कविता की शुरुआत करते हैं, इन आरंभिक पंक्तियों में पूरा वातावरण उपस्थित हो जाता है। वह बताता कि बिना स्त्री के घर, परिवार ही नहीं, आश्रम भी संस्कारविहीन हो जाते हैं। यह नारी की प्रतिष्ठा है। राम जब आश्रम में पहुंचते हैं, उन्हें आश्रम शून्यप्राय दिखाई देता है। यत्र-तत्र तृण उग आए हैं। सारा प्रांगण था संस्कारविहीन दिखाई पड़ता है।
राम देखते हैं
आंगन से हटकर कुछ थोड़ी दूर
एक झोंपड़ी थी उत्तर की ओर
वहां पहुंचकर देखा अद्भुत दृश्य:
भू-लुंठित थी नारी-प्रतिमा, ओह!
ग्लानि-क्षोभ का वैसा करुण प्रतीक
देख सामने राम रह गए दंग
वहीं धम्म से बैठ गए तत्काल...
लक्ष्मण पूछते हैं
साधारण-सी इस प्रतिमा में, आर्य!
क्या है जिससे हुआ आपको खेद?
राम लक्ष्मण से चुपचाप बैठने को कहते हैं और पाषाणी के मुखमंडल को निर्निमेष निहारते हैं। थोड़ी देर बार पाषाणी के पास आते हैं, मूर्ति को स्पर्श करते हैं। शिर से लेकर तलवे तक अंग-प्रत्यंग। पूरे मनोयोग से राम हाथ फेरते हैं। हाड़ों का वह शिलाभूत संसार हिलता है डोलता है तो दाशरथी रोमांच से भर जाते हैं। वे लक्ष्मण की ओर देखते हैं और लक्ष्मण नि:शब्द उत्तर देते हैं। और, इस तरह राम पाषाणी में प्राण संचार करते हैं।
नागार्जुन पाषाणी के मुंह से कहलवाते हैं-
'कौन देव, तुम मेरे हृदयाधार ?
असुर क्रूर, तो सुर होते हैं धूत्र्त;
क्षणमति होते किन्नर औÓ गंधर्व,
दुर्विग्ध संशयी, हृदय से हीन
होता मानव, तुम हो उससे भिन्न!
धन्वंतरि का कर-पल्लव-संस्पर्श
सुनती हूं, करता अमरत्व प्रदान
धनश्याम, बतालाओ, तुम हो कौन?
पाषाणी में डाल दिए हैं प्राण।Ó
राम ने विनीत होकर अपना परिचय दिया। राम ने पाषाणी से परिचय
अहोभाग्य ! मैं किंतु, पूछ लूं नाम,
गोत्र और कुल...कैसा यह अभिशाप?
'गौतमदार अहिल्या मेरा नाम
यहीं कहीं होंगे मुनि भी हे राम!
दिया उन्होंने मुझको यह अभिशाप: पर नर दूषित, पुंश्चलि, तेरी देह, हो जाए निस्पंद कुलिश-पाषाण।Ó
अहिल्या अपनी पूरी कथा बताती है। कि उसने अपने पति को छोड़ किसी का ध्यान नहीं धरा। वह पूछती है, यदि कोई पति का रूप धरकर आ जाए तो उसका क्या दोष?
पति के इस अन्याय से ही पाषाण हो गई। अहिल्य अपनी व्यथा सुनाते-सुनाते उसकी आंखों से अश्रु की धारा बहने लगी। राम उसके उत्तरीय से आंसू पोछते हैं। राम आश्वासन देते हैं, रोवे मत, देवि!
अब न होगा आपको कोई कष्ट!
गदगद होकर मुनिपत्नी ने कहा धन्य!
पाकर तेरे करकमलों का स्पर्श
प्राणवंत हो उठा आज का पाषाण
अहिल्या राम से कहती है, क्या भूल तो नहीं जाओगे। राम कहते हैं, क्या तुम रघुकुल की रीति नहीं जानती। राम अहिल्या के दोनों पैर छूकर प्रतिज्ञाबद्ध होते हैं कि जीवन भर वह तुम्हे रखेगा दया, नारी के प्रति कभी न होगा क्रूर, नही करेगा वह दूसरा विवाह। अहिल्या आशीष देती है-'पाया जिसने तुम सा राजकुमार
युग-युग जियो दयालु, दीन जन बंधु, होगी तुमसे प्रजा यथार्थ सनाथ...Ó आशीर्वाद ले दोनों भाई जनकपुर की ओर प्रस्थान कर जाते हैं। और, कविता समाप्त हो जाती है।
यही कविता का विषय है। अहिल्या के उद्धार की। इस उद्धार में नारी की पीड़ा है। पुरुष सत्ता समाज में नारी कुचली जाती रही है। इस आधुनिक युग में भी स्त्री उपेक्षिता ही है। कविता जब रची गई थी, विमर्श के केंद्र में स्त्री नहीं थी। आजादी का आंदोलन चरम पर था। इस आंदोलन में स्त्रियां किसी से पीछे नहीं थी। नागार्जुन याद कर रहे थे। आजादी के बाद स्त्रियां अहिल्या की तरह शापित न हो। इसलिए इस प्रतीक का इस्तेमाल किया अपनी कविता में। इस कविता पर आलोचकों का ध्यान कम गया। शायद, इस मिथक से उन्हें परेशानी होती हो...। राम की प्रतिष्ठा इस कविता में की गई है। और, आलोचकों को राम का कंकड़ की तरह चुभ रहा है। हमने अपने प्रतीकों, मिथकों को संघ के हवाले कर दिया है। इन बात नहीं की जा सकती। बात करना पुराणपंथी करार दिया जा सकता है। पर, नागार्जुन हैं कि मानते ही नहीं। बार-बार पुरौणिक जंगलों में घूमने लगते हैं। क्या यह संस्कृत का प्रभाव था, पाली को या...।
नागार्जुन की इस कविता के साथ एक और कविता पढ़ा जाना चाहिए उद्बोधन।
जाने किस गौतम का पाकर शाप
सारी धरती बनी अहल्या हाय
यहां कवि ने इसका अर्थ दिया है,  हल से कृषि करने के अयोग्य धरती। वह आह्वान करते हैं कि
भील, गोंड, हो, मुंडा, औÓ संथाल
अब भी तो विकसित हों तेरे बाल
देखो तुमसे मांग रहे द्युति दान
निर्विकल्प निश्चल सौ-सौ दिनमान
उठो, उठो, उठ जाओ विंध्य महान! यह रचना सितंबर, 1947 में रची गई थी। यह भी युगधारा में संकलित है। नागार्जुन इस कविता में अगस्तय की धूर्तता का वर्णन करते हैं कि जिसमें उन्होंने विंध्य की पहाड़ी को अपने दक्षिण प्रवास से लौटने तक विनयावनत रहने की आज्ञा दे जाते हैं। नागार्जुन अगस्त्य की धुतर्ता को लक्ष्य करते हुए विंध्य को उद्बोधन देते हैं, उठो, उठो।
झारखंड सतपुड़ा सदृश तव स्कंध !
रत्नाकर हो अगर तुम्हारा नाम
सागर को क्या कुछ होगी आपत्ति?
अबरख और कोयला और पेट्रोल
...
अंदर दबी पड़ी हैं सौ-सौ खान
उठो, उठो, उठ जाओ विंन्ध्य महान! मांग रहा युग तुमसे जीवन दान।
क्या इन कविताओं का पुनर्पाठ नहीं होना चाहिए।