बुधवार, 5 सितंबर 2012

किसी आईने की तलाश में रांची
संजय कृष्ण
मुंशी प्रेमचंद के सहयोगी रहे व्यंग्य कथा सम्राट राधाकृष्ण के शहर रांची में साहित्यिक तापमान- सूचक कांटा बेशक ऊपर-नीचे होता रहता है किन्तु यह कभी शून्य तक नहीं गिरता। ताजा सरगर्म कथा के अनुसार इंदु जी की दुकान से ही यह खबर फूटी कि रणेंद्र ने महुआ माजी के प्रतीक्षित नवीनतम उपन्यास मरंग गोडा नीलकंठ हुआ की निर्मम शल्य क्रिया कर दी है। समीक्षा छपने से पहले ही कलमघिस्सुओं ने चटखारे ले-लेकर उपन्यास का पोस्टमार्टम शुरू कर दिया। मई में ही चर्चा आम हो गयी थी कि समीक्षा नया ज्ञानोदय में आ रही है। समीक्षा पढने के लिए लोग आकुल- व्याकुल होने लगे। जैसे ही जून चढा, हर रोज लोग इंदु जी दुकान पर हाजिरी लगाते, पत्रिका आई क्या? इंदुजी भी रोज सुबह रेलवे स्टेशन जाते, पता करते और फिर उदास हो चले आते। पाठक- साहित्यकार दोनों बेसब्र हो रहे थे। खैर, आधा महीना गुजर जाने के बाद आखिरकार जून का अंक आया। रणेंद्र की समीक्षा सबने देखी-सबने पढी। वरिष्ठ लोगों की प्रतिक्रिया होती, बतिया त ठीके लिखे हैं। और आहत महुआ ने ज्ञानोदय को लंबी प्रतिक्रिया भेज दी। उदारता दिखाते हुए रवींद्र कालिया ने जुलाई के अंक में महुआ माजी की प्रतिक्रिया छाप दी। हिसाब- किताब बराबर..। लंबे समय से रांची में पसरा साहित्यिक सन्नाटा किसी बहाने टूटा था। खैर, माहौल में अभी भी नमी है। ताप है। रांची की पहाडी तप रही है।
अल्बर्ट एक्का चौक इस बात से बेखर नहीं। न इंदु जी की दुकान। आजकल गप्पबाजी का अड्डा यही है। यदि आप यहां नियमित आते हों तो रविभूषण, विद्याभूषण, वासुदेव, पंकज मित्र, महुआ माजी, रणेंद्र, श्रवणकुमार गोस्वामी, अरुण कुमार आदि से मुलाकात संभव है। झारखंड के दूसरे जिले से आने वाले साहित्यकार, कवि, लेखक, भी यहां टकरा ही जाते हैं। हां, एक्टिविस्टनुमा पत्रकार और पत्रकारनुमा एक्टिविस्ट नामक प्राणी भी यहां आसानी से पाए जाते हैं। यहां ज्ञान की विभिन्न सरणियों से गुजरते हुए आप धर्म की गंगा में भी डुबकी लगा सकते हैं। यह बात अलग है कि इस ज्ञानचर्चा में इंदुजी कभी समाधिस्थ नहीं हुए। समाधि जैसे ही लगती, तंद्रा में जाने लगते कि बगल में मामा चाय वाले को तीन में पांच करने का आर्डर दे देते जोकि तरल ऊर्जा का निकटस्थ स्नोत है। सुबह से शाम तक गुलजार रहने वाला अल्बर्ट एक्का चौक को लोग रांची का दिल कहते हैं। हमें न मानने का भी कोई कारण नहीं। इसी के पास है इंदुनाथ चौधरी की मार्डन बुक नामक किताब की दुकान, जिसे लोग उनके शार्ट नेम इंदुजी पुकारते हैं। यही रांची का साहित्यिक मर्मस्थल है। अब रांची तो कोई बनारस है नहीं कि यहां पप्पू चाय की दुकान मिलेगी, न पटना का काफी हाउस न इलाहाबाद...। रांची तो अपन रांची ठहरी। पीठ पर छौव्वा, माथ पर खांची.. यही है रांची की पहचान..। पर वैश्वीकरण ने इस पहचान को भी धूमिल कर दिया है।
जब रांची में बैठकी और गप्पबाजी के अड्डे की तलाश में भटकते हैं तो अपर बाजार के अपने पुराने मकान में व्यंग्य कथा सम्राट राधाकृष्ण के पुत्र सुधीर लाल मिल जाते हैं। कहते हैं कि 1890 में वनिता हितैषी का प्रकाशन बालकृष्ण सहाय के अमला टोली स्थित प्रेस से हुआ। अब इसे श्रद्धानंद रोड कहते हैं। प्रेस में ही साहित्यिक गोष्ठी और बैठकी होती थी। बालकृष्ण सहाय, ठाकुर गदाधर सिंह, बलदेव सहाय, त्रिवेणी प्रसाद.. आदि की महफिल जमती थी। तब रांची आज जैसी नहीं फैली थी। न कंक्रीट के जंगल ही उग पाए थे। वह एक कस्बाई नगरी थी। बित्ते भर की। दूसरी बैठकी यूनियन क्लब में होती थी। यहां बंग समुदाय के लोग ही शरीक होते थे। आठ साल बाद 1898 में सहाय ने आर्यावर्त साप्ताहिक का प्रकाशन शुरू किया। बित्ते भर शहर की पहचान बडी पुख्ता थी। 1924 में छोटानागपुर पत्रिका का प्रकाशन यहां के मारवाडी टोला से प्रारंभ हुआ तो ठाकुरबाडी (गांधीचौक के निकट) मामराज शर्मा के यहां बैठकी शुरू हो गई। मामराज इस पत्रिका के संपादक थे। पत्रिका के कार्यालय में हर रोज बैठक होती थी। मामराज, चिरंजीलाल शर्मा, अयोध्या प्रसाद, जगदीश प्रसाद, देवकीनंदन.. तबके लेखक थे। जगदीश प्रसाद छोटानागपुर पत्रिका के नियमित लेखक थे। गोष्ठी में जगदीश प्रसाद राधाकृष्ण को भी ले जाया करते थे। उनकी आंखें कमजोर थीं। इसलिए जगदीश प्रसाद राधाकृष्ण से बोलकर लिखाते थे। उनके भीतर साहित्य का बीजारोपण यहीं पडा जो बाद में एक सफल कहानीकार और व्यंग्यकार बने। 1926 में अपर बाजार में संतुलाल पुस्तकालय खुला तो अड्डेबाजी यहां जमने लगी। तब युवा लेखक के रूप में अपनी पहचान बना चुके राधाकृष्ण, सुबोध मिश्र, जगदीश नारायण आदि शामिल होते। 1929 में इन युवाओं ने वाटिका नामक हस्तलिखित पत्रिका निकाली।
अपर बाजार में जब सुबोध ग्रंथ माला खुली तो यहीं बैठकी होने लगी। इसके मालिक श्याम सुंदर शर्मा साहित्यिक मिजाज के थे। 1932 में विधा नामक पत्रिका शुरू की। उनके निधन के बाद उनके पुत्र प्रेम नारायण शर्मा भी साहित्यानुरागी थे। बैठकों का दौर जारी रहा। लेकिन सबसे ज्यादा पहचान मेन रोड स्थित फ्रेंड्स केबिन को मिली। यहां की चुस्की के साथ हिन्दी, उर्दू, बांग्ला के साहित्यकार बैठकी करते। राधाकृष्ण, रामकृष्ण उन्मन, मधुकर, प्रफुल्लचंद्र पटनायक, जयनारायण मंडल, रामखेलावन पांडेय, जुगनू शारदेय से लेकर कई राजनीतिज्ञ और पत्रकार भी यहां आया-जाया करते। सत्तर के दशक में राधाकृष्ण के निधन के बाद बैठकी बंद हो गयी। फ्रेण्ड्स केबिन आज भी हैं, लेकिन अब यहां दक्षिण भारतीय व्यंजन परोसे जाते हैं। रातू रोड में भी एक चाय की दुकान थी। मुकुंदी बाबू की। यहां पर भी राधाकृष्ण के अलावा शिवचंद्र शर्मा, भवभूति मिश्र, आदित्य मित्र संताली, नारायण जहानाबादी, डॉ. दिनेश्वर प्रसाद के अलावा रेडियो स्टेशन के कलाकार भी जुटते थे। कचहरी रोड स्थित अभिज्ञान प्रकाशन, स्वीट पैलेस भी अड्डा हुआ करता था।
राधाकृष्ण चाय, बीडी, पान के शौकीन थे। चाय के साथ तो वे घंटों गप्प करते रहते थे। प्रेमचंद के निधन के बाद कुछ महीनों तक बनारस जाकर हंस भी संभाला। रांची आए तो आदिवासी पत्रिका के संपादक हुए। अमृत राय रांची आते तो उन्हीं के यहां महीनों ठहरते। इनके अलावा विष्णु प्रभाकर, कमलेश्वर जैसे रचनाकार भी उनसे मिलने रांची आते रहते। सुधीर एक बात का जिक्र करते हैं। सत्तर के पहले का। रांची में बांग्ला के मशहूर लेखक ताराशंकर बंद्योपाध्याय साल में एक बार राधाकृष्ण से मिलने जरूर आते। लेकिन यह मुलाकात गोपनीय ही रहती। वरिष्ठ साहित्यकार विद्याभूषण कहते हैं कि रांची में वह कल्चर कभी विकसित नहीं हुआ, जो दिल्ली, बनारस, इलाहाबाद और पटना में रहा। लेकिन होटलों और लोगों के आवासों, क्लबों में बैठकें, गोष्ठियां होती रहती थीं। 1960 और 2010 के बीच करीब 31 से ऊपर ऐसी संस्थायें थीं, जहां रचनाशीलता पर बहस होती रही। इनमें प्रतिमान, अभिज्ञान, केंद्र, सुरभि, अभिव्यक्ति, प्रज्ञा, लेखन मंच, तीसरा रविवार, देशकाल, साहित्य लोक प्रमुख हैं। तीसरा रविवार 1986 से 88 तक चला। परिवर्तन बिहार क्लब के बगल में ही सजता था, जिसमें आजके महत्वपूर्ण कथाकार प्रियदर्शन और अश्विनी कुमार पंकज नियमित भाग लेते थे। लेखन मंच से वीरभारत तलवार भी जुडे हुए थे।
चर्चित लेखिका महुआ माजी कहती हैं कि रांची में ऐसी कोई जगह नहीं रही जहां बैठकी होती हो। इसके पीछे गुटबाजी को भी वे कारण बताती हैं जो अपने से ऊपर लोगों को देखना नहीं चाहते। परन्तु वे 1996 में बिहार क्लब में कादंबिनी क्लब का जिक्र करती हैं, जहां माहवार बैठकी होती थी, जिसमें माया प्रसाद, मुक्ति शाहदेव, रेहाना मोहम्मद, अशोक अंचल, आदित्य, प्रभाशंकर विद्यार्थी, बालेंदुशेखर तिवारी शामिल होते थे। हालांकि उषा सक्सेना और ऋता शुक्ला के घर पर भी कुछ लोग जुटते थे। अश्विनी यह सवाल भी उठाते हैं कि पिछले सौ सालों में और इधर झारखंड बनने के बाद भी शहर में कोई सार्वजनिक जगह नहीं है, जहां चाय की दो घूंट के साथ अड्डेबाजी की जा सके। यही मलाल आलोचक रविभूषण को भी है। कहानीकार पंकज मित्र कहते हैं कि बढती माल संस्कृति और बडी-बडी अत्रलिकाओं ने शहर को एक नया चेहरा तो दिया है,लेकिन इस अचानक आई समृद्धि के बीच संस्कृति का दम घुट रहा है। भारत- पाक की साहित्यिक विरासत को संजाने वाले हुसैन कच्छी को भी इस बात का दु:ख है कि शहर का कोई चेहरा नहीं है। मॉल और बडी-बडी बिल्डिगों से शहर नहीं पहचाना जाता, उसकी पहचान उसकी संस्कृति से होती है।

गुरुवार, 30 अगस्त 2012

वर्कशॉप से विकसित होती है सिनेमा देखने की समझ : अतुल

अतुल तिवारी किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। तहजीब के शहर लखनऊ से जुड़े अतुल तिवारी एनएसडी से पासआउट हैं। दिल्ली से मुंबई का सफर तय किया और अपना एक मुकाम बनाया। कई सुपरहिट फिल्में लिखीं। कलम चालू है। शनिवार को सिनेमा की समझ को लेकर दैनिक जागरण के वरीय संवाददाता संजय कृष्ण से उनकी बातचीत के संक्षिप्त अंश:-
फिल्म फेस्टिवल और वर्कशॉप से दर्शकों को कितना फायदा होगा? सिनेमा के प्रति हमारी समझ को कितना बेहतर बना सकता है?
फिल्म एप्रेसिएशन का सिलसिला चलना चाहिए। यह महत्वपूर्ण है। फिल्म देखना आसान है, लेकिन समझना कठिन। आज डीवीडी का जमाना है। घर बैठे अब आप दुनिया की फिल्में देख सकते हैं। पहले यह बात नहीं थी। लेकिन क्या फिल्मों को लेकर हमारी समझ भी उतनी ही अग्रगामी हुई है? क्या हमारी समझ पहले की अपेक्षा प्रखर हुई है? यह बड़ा सवाल है। इस तरह के वर्कशॉप से ही यह समझ विकसित होती है। जैसे टी एप्रेसिएशन। मैंने इसका भी कोर्स किया है कि चाय कैसे पी जाए, कौन सी चाय किस प्रकार के आनंद निर्मित करती है? दार्जिलिंग चाय क्या है, ग्रीन टी किसे कहते हैं? यदि आप इनके बारे में समझ रखते हैं तो चाय का आनंद दुगुना उठा सकते हैं। यही बात फिल्म पर भी लागू होती है। यदि आपकी समझ बेहतर है, तो फिल्म को आप बेहतर ढंग से ग्राह्य कर सकते हैं।
क्या सीखने के लिए भी कोई तैयारी करनी चाहिए?
सीखने की तैयारी तो होनी ही चाहिए। प्रश्नाकुलता नहीं रहेगी तो वह कुछ नहीं कर सकता। जिज्ञासा बड़ी चीज है। यही आपको आगे बढ़ती है। आपके अंदर क्यूरोसिटी होनी चाहिए। क्योंकि फिल्म या कला बहुत कंपलेक्स चीज है। महान फिल्मकार सत्यजीत रे ने चालीस-पचास साल पहले कोलकाता में कला की बारीकियों को सीखने की एक विधिवत शुरुआत की थी। इसी तरह का काम पुणे के पीके नायर एवं उत्तरप्रदेश के सतीश बहादुर ने काम किया था। दोनों ने पुणे में फिल्म एप्रोसिएशन का काम किया था। उन्होंने फिल्म अर्काइव का काम भी किया। कोर्स भी चलाए। दोनों ने तो कर्नाटक के सुदूर गांव हेगुडू में इस काम को अंजाम दिया। मेरी शीचर ने भी जो विदेशी थीं, सत्यजीत रे पर किताब लिखी। तो, इस तरह के प्रयास से एक मानस विकसित होता है।
देश का दर्शक सिनेमा देखता है। सिनेमा का आधा पैसा सरकार टैक्स के रूप में वसूल लेती है? क्या इस टैक्स के पैसे का इस्तेमाल लोगों की समझ विकसित करने के लिए नहीं करना चाहिए और इसमें एफटीआईआई (फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीच्यूट आफ इंडिया) और नेशनल स्कूल आफ ड्रामा जैसे सरकारी संस्थानों की क्या भूमिका हो सकती है?
जिससे टैक्स लिया जा रहा हो, जरूरी नहीं वह पैसा उसी के लिए इस्तेमाल हो। यह ठीक भी नहीं है। फाइव स्टार होटल से सरकार अधिक टैक्स लेती है तो इसका मतलब यह नहीं कि वह इन्हीं के विकास के लिए खर्च करे? कार से टैक्स ले तो यह ठीक नहीं कार की इंजीनियरिंग के लिए उसका इस्तेमाल हो? टैक्स लेती है सरकार भले ही वह मिनिस्टर के घर जाए? खैर, एनएसडी यह काम बखूबी कर रही है। आउट रिच प्रोग्राम के तहत वह देश ही नहीं, पूर्वोत्तर में भी वह बेहतर ढंग से काम कर रही है। जहां तक संस्थाओं का सवाल है तो यह पेचीदा प्रश्न है। एनएसडी के छात्रों को सरकारी छात्रवृत्ति मिलती है। लेकिन वह फिर मुंबई का रुख कर लेते हैंं। सरकार यदि ऐसी कोई व्यवस्था करती है कि जिन्हें छात्रवृत्ति दी जाती है, वह तीन साल तक सरकार के लिए काम करेंगे तो यह सबके लिए होना चाहिए। आईआईटी, मेडिकल सबके लिए। मेरा निजी तौर पर मानना है कि मैं तीन साल एनएसडी में पढ़ा। सरकार चाहे तो तीन साल आज भी मेरा उपयोग कर सकती है बशर्ते मेरे काम के अनुरूप हो।
प्रश्न : सिनेमा में जाने वालों के सामने क्या चुनौतियां हैं?
दो बड़ी चुनौतियां हैं। यदि आप इस फिल्म लाइन में आना चाहते हो तो आपके पास कहने की एक अलग और अलहदा शैली होनी चाहिए। कहानी कहने की अलग शैली नहीं होगी तो आप टिक नहीं सकते। दूसरी बात, आप यदि तकनीकी क्षेत्र में जाना चाहते हैं तो वहां भी आपकी दक्षता की बार-बार परीक्षा ली जाएगी। तभी आप वहां सफल हो सकते हैं। वर्कशॉप इस तरह के काम को सरल बनाते है।
पत्र-पत्रिकाओं में भी सिनेमा काफी जगह घेरता है। इसके बाद भी देश में आम लोगों के बीच सिनेमा की समझ विकसित नहीं हो सकी है?
अतुल : ठीक कह रहे हैं। देश का जूता बाजार 26 हजार करोड़ का है और फिल्म उद्योग महज पांच हजार करोड़ का। लेकिन अखबारों में सबसे अधिक कॉलम सिनेमा घेरता है। फिल्मों पर काफी पत्रिकाएं भी निकल रही हैं, लेकिन समझ विकसित नहीं हो पा रहा है। इसके पीछे सबसे बड़ी बात यह है कि इनमें फिल्मों की विधा, उसके व्याकरण, व्यवस्था पर बात नहीं होती। वहां केवल गॉशिप या सूचनाएं होती हैं।

सोमवार, 2 अप्रैल 2012

ओ दामोदर, तुम बहती हो क्यों

संजय कृष्ण : झारखंड का एक जिला है चतरा। घोर उग्रवाद प्रभावित। सांझ ढलते ही जिले में सन्नाटा पसर जाता है। गांव-गिराव की बात छोड़ दें। इस जिले का एक प्रखंड है टंडवा। इस पंचायत में 16 गांव हैं। कुछ गांव, उनके खेत, जंगल विकास की भेंट चढ़ रहे हैं। ये गांव हैं बसरिया, कुसुमटोला, पुरनाडीह, झूलनडीह। पूछिए क्यों? तो जवाब है सीसीएल। सीसीएल यानी सेंट्रल कोल फिल्ड््स लिमिटेड। सीसीएल ने यहां अपना प्रोजेक्ट लगाया है। नाम है पुरनाडीह प्रोजेक्ट। पुरनाडीह ओपन कास्ट माइनिंग पिछले तीन सालों से चल रही है। तीन साल के दौरान कोलरा जंगल में खनन समाप्त हो चुका है। अभी टागर जंगल और बगलाता जंगल में खनन कार्य चल रहा है। कास्ट माइनिंग के चलते जल, जंगल और जमीन तीनों प्रभावित हो रहे हैं। सैकड़ों एकड़ में फैले जंगलों की हरियाली को माइनिंग की धूल ने निगल लिया है। जंगल मे पाए जाने वाले टेना, मेठी आदि कंद मूल समाप्त हो गए हैं। इन जंगलों से प्राप्त होने वाली जड़ी-बूटी, लकड़ी और पत्ते भी अब समाप्त हो गए हैं, निकट के जंगल भी समाप्त हो रहे हैं। इससे उनकी आजीविका पर ही संकट के बादल नहीं छाए हैं, ग्रामीणों को अपने पशुओं के आहार आदि के लिए दूर के जंगलों में जाना पड़ता है।

माइनिंग से पशुओं को घास एवं पत्ते भी नहीं मिल नहीं मिल रहे हैं। कृषि उजड़ रहा है। किसान धीरे-धीरे मजदूर में तब्दील हो रहे हैं। इस खनन से लगभग ढाई हजार लोगों और छह गांवों पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है। वहां के ग्रामीण भूमि रक्षा के लिए आंदोलन लगातार चला रहे हैं, पर उनकी समस्याओं पर सरकार ध्यान नहीं दे रही है।

ओपन कास्ट माइनिंग से यहां के जंगल और यहां की पहाडिय़ों में बहने वाले दो झरने 'मादी चुआंÓ और 'छापर झरनाÓ अब सूख गए हैं। दामोदर नदी दम तोड़ रही है। यह नदी टंडवा प्रखंड से गुजरती है। पूर्व में यह नदी वहां की आबादी के लिए जीवन रेखा के समान थी दैनिक जीवन में इसका पानी पीने और सिंचाई में इस्तेमाल करते थे। नदी में मछलियां पकड़ते थे। लेकिन सीसीएल के कोयला खनन के कारण इस नदी में पानी अब सालों भर नहीं बहता। साल के 3-4 महीने इसका पानी सूख जाता है। चिंता इस बात की है कि यहां कोई उसे बचाने वाला नहीं। गंगा को बचाने के लिए तो गंगा एक्शन प्लान बना है। यहां भी दामोदर बचाओ आंदोलन चल रहा है। लेकिन गंगा के लिए अनशन करने वाले स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद हैं। लेकिन दामोदर के लिए...? भूपेन हजारिका की तरह कहने को मन होता है, ओ दामोदर, बहती हो क्यों? यहां ब्लास्टिंग से बच्चे काफी भयभीत रहते हैं। स्कूलों और घरों में दरारें पड़ चुकी हैं। माइनिंग के लिए धरती की ऊपरी परत को हटाकर कड़े चट्टान को धंसाने के लिए गहन ब्लास्टिंग की जाती है। ग्रामीण असरफी उरांव कहते हैं कि ब्लास्टिंग के कारण घर की दीवारों पर बड़ी-बड़ी दरारें आ गई हैं। छत भी टूट गया है। इस मकान को बनाने में 87 हजार रुपये लगे थे और 57 हजार की लागत से एक आटा चक्की लगाई थी, लेकिन सब बेकार हो गया। पर, सीसीएल के तकनीकी निदेशक टीके नाग कहते हैं कि 'ब्लास्टिंग का कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा है। डायरेक्टर जनरल एंड माइंस सेफ्टी की टीम की स्वीकृति के बाद भी प्रोजेक्ट से उत्पादन शुरू हुआ है। प्रोजेक्ट से आठ सौ मीटर की दूरी पर गांव बसे हैं।Ó इसका सबसे पहले खुलासा यूएन का विश्वव्यापी संगठन 'फूड फस्र्ट इनफारमेशन एंड एक्शनÓ ने किया था। उसने पूरनाडीह प्रोजेक्ट को दौरा किया था। जो स्थिति देखी, उसे लेकर उसने प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति एवं झारखंड के राज्यपाल को जुलाई, 2009 को पत्र लिखा। प्रधानमंत्री कार्यालय ने झारखंड के गृह विभाग के उपसचिव विपिन बिहारी चौधरी, को 21 जुलाई, 2011 को पत्र लिखा। चौधरी ने चतरा के एसडीओ को पत्र भेजा। एसडीओ ने कार्यपालक अभियंता, पूरनाडीह के परियोजना अधिकारी अनूप श्रीवास्तव को लेकर स्थल निरीक्षण किया। पाया कि पत्र में वर्णित आरोप हद तक सही हैं। कुसुम टोला के ग्रामीण पुरनाडीह कोलियरी द्वारा किए जा रहे विस्फोट से प्रभावित हैं। विस्फोट से स्कूल भवन क्षतिग्रस्त हो रहे हैं, भूमिगत जलस्तर नीचे जा रहा है, जनजीवन एवं कृषि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। बस्ती के समीप उत्खनित कोयला का स्वत: आक्सीकरण हो जाने के कारण कोयला भंडार निरंतर धुआं देकर जल रहा है और पर्यावरण को लगातार प्रदूषित कर रहा है। जिसके कारण टोला के ग्रामीणों को सांस की समस्या व जानमाल की सुरक्षा संदिग्ध बन गई है। 10 अक्टूबर, 2010 को एसडीओ ने ओदश दिया कि विस्फोट तत्काल प्रभाव से अगले आदेश तक रोक दें। यदि उन्हें कोई आपत्ति है तो 15 अक्टूबर, 2010 को अधोहस्ताक्षरी कार्यालय/न्यायालय कक्ष में प्रात: साढ़े दस बजे उपस्थित होकर अपना रक्ष रखें। सीसीएल अपना पक्ष 18 पेजों एवं 108 पेजों की संदर्भित सामग्री भी लगा दी। बताया कि, उनके मकान पुराने हैं, इसलिए क्षतिग्रस्त हों रहे हैं। विस्फोट से नहीं। पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं हो रहा, क्योंकि मानक के अनुसार काम हो रहा है। जवाब से एसडीओ संतुष्ट नहीं दिखे और 16 नवंबर, 2011 को उनकी दलीलों को अस्वीकार कर दिया और अपने आदेश को आत्यंतिक घोषित किया। कहा, आदेश की अवहेलना पर दंप्रसं की धारा 143 के अंतर्गत सीसीएल के विरुद्ध पुन: कार्रवाई करने की अधोहस्ताक्षरी की विवशता होगी। जो आदेश दिया वह यह कि-किसी भी सूरत में गहन एवं साधारण ब्लास्टिंग बस्ती के नजदीक कदापि न की जाए। उन्होंने एक और तथ्य का उल्लेख किया कि 19 सालों में जिनकी जमीन ली गई है, उन्हें न मुआवजा दिया गया न नौकरी, जिसके कारण उनकी आर्थिक स्थिति बदतर होती जा रही है। 2500 की आबादी उत्खनन से घिर गई है। पारंपरिक कृषि कार्य ध्वस्त हो गया है। जमैक की एक फैक्ट फाइडिंग टीम 29 फरवरी को वहां गई तो, परियोजना पर एसडीओ के आदेश का कोई असर नहीं था। झारखंड का यह विकास कहां ले जाएगा?

बुधवार, 29 फ़रवरी 2012

बाजारवाद का मिला है लाभ


संजय कृष्ण : प्रो श्यौराज सिंह बेचैन दलित चिंतन का एक महत्वपूर्ण नाम है। दिल्ली विवि में प्रोफेसर हैं। 'मेरा बचपन मेरे कंधों परÓ आत्मकथा से चर्चित बेचैन रांची में दलित सम्मेलन में भाग लेने आए हुए थे। जागरण संवाददाता से कई मुद्दों पर उनसे बातचीत की। प्रमुख अंश।
-हिंदी में दलित साहित्य किस मुकाम तक पहुंचा है?
दलित साहित्य ने अपनी पहचान बना ली है। भूमंडलीकरण और बाजारवाद का लाभ भी दलित साहित्य और चेतना को मिला। पूरी दुनिया में दलित लेखन की परंपरा विकसित हुई है। रिसर्च सेंटर बने हैं। अनुवादों का दायरा बढ़ा है। अंग्रेजी, मराठी, मलयालम, उर्दू आदि में दलित साहित्य के अनुवाद हो रहे हैं।
-दलित आत्मकथाएं काफी आ रही हैं। इनका स्वागत भी हो रहा है? इसे किस रूप में देखते हैं।
कहानी-उपन्यास आदि में दलित समाज उपस्थित रहा है। चरित्र भी रहे हैं। लेकिन उसमें कल्पना की छौंक होती है। पठनीयता के लिहाज से यह जरूरी भी है। पर आत्मकथा में कल्पना की गुजांइश नहीं होती। जो सच है, जो भोगा है, उसे ही अभिव्यक्त करना है। सो, वहां यथार्थ है। दूसरे, दलित लेखकों को जन्म से लेकर बचपन और युवा होने तक तिरस्कार, अपमान और घृणा के साथ जीना पड़ता है। किस परिवेश में कैसे वह बड़ा होता है, यह वही जान सकता है, जो दलित है। इसलिए दलित आत्मकथाएं बड़े चाव से पढ़ी जा रही हैं।
-दलित चिंतक प्रेमचंद को भी कठघरे में खड़ा करते हैं। उसके पीछे क्या उद्देश्य है?
प्रेमचंद की कहानियां या उपन्यास में घिसू, माधव या बुधिया जैसे पात्र दयनीय स्थिति में दिखाए गए हैं। वे याचक की भूमिका में हैं। बेशक, उनकी सहानुभूति थी लेकिन सवाल है कि जब प्रेमचंद लिख रहे थे, उसी समय स्वामी अछूतानंद भी लिख रहे थे, पत्रिका निकाल रहे थे, लेकिन उनकी उनसे कोई बातचीत नहीं। जब दलितों के प्रति उनकी सहानुभूति थी, वे अछूतानंद से कैसे दूर रहे?
-डा. धर्मवीर अंबेडकर की चिंतन को खारिज करते हैं, जबकि दलित साहित्य और चेतना के वे स्तंभ हैं?
धर्मवीर अंबेडकर को पूना पैक्ट तक मानते हैं। उसके बाद उनसे दूर हो जाते हैं। वस्तुत : धर्म के बिंदु पर उनसे अलगाव है। बुद्ध, मक्खली गोशाल और महावीर तीनों मित्र थे। गोशाल कुम्हार थे, लेकिन गोशाल बाद में हाशिए पर चले गए और इनका धर्म मार्ग चल निकला। बुद्ध राज परिवार से थे, सो लोगों ने उन्हें हाथों हाथ लिया। जबकि सारे मौलिक विचार गोशाल के थे। पहली बार मानवता की बात गोशाल करते हैं। दूसरे, अंबेडकर पुनर्जन्म को मानते हैं, जबकि बुद्ध भी नहीं इसे मानते थे। अंबेडकर में बुद्ध गहरे जड़ जमाए हैं। बुद्ध भी बराबरी की बात करते हैं, लेकिन संघ में। और संघ में भी नाई गया तो वहीं काम कर रहा है, धोबी गया तो वही काम कर रहा है। फिर समानता कहां है? बराबरी कहां थीं।
-दलित चेतना के विकास में अखबारों की भूमिका को किस नजर से देखते हैं?
दलित चेतना के विकास में अखबारों ने महती भूमिका निभाई है। शिक्षा, राजनीतिक चेतना के विकास में इनका योगदान महत्वपूर्ण है?
-हिंदी पत्रिकाओं का योगदान कहां तक मानते हैं?
हिंदी में तीन सौ लघु पत्रिकाएं निकलती हैं। कानपुर से भीम, सारिका ने भी दलित अंक निकाले, हंस का भी दलित पर विशेषांक आया, जिसका संपादन खुद मैंने किया था। विमलकीर्ति का अंगुत्तर, जबलपुर का तीसरा पक्षधर आदि पत्रिकाओं ने योगदान दिया। अब कई पत्रिकाएं दलित पर विशेषांक निकाल रही हैं। यह शुभ संकेत है।

अंबेडकर ने हाशिए की वैचारिकी निर्मित की

संजय कृष्ण : काशी हिंदू विश्वविद्यालय, हिंदी विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. चौथीराम यादव ने मंगलवार को जागरण से विशेष बातचीत में कहा कि दलित साहित्य में भी अंतर्विरोध उभर रहे हैं। यह ठीक भी है। जैसे डा. धर्मवीर खुद को अंबेडकर से आगे बताते हैं। वे अंबेडकर को खारिज करते हैं। उन्हें अंबेडकर का बौद्ध होना अखरता है। वे दलित के लिए आजीवक धर्म की वकालत करते हैं। लेकिन दलित बुद्ध-अंबेडकर के प्रति वही भाव रखते हैं। धर्मवीर के लिए बौद्ध धर्म क्षत्रिय धर्म लगता है। बुद्धिज्म में वह स्पेस है, जहां दलितों के लिए एक जगह है। बुद्धिज्म के तीन सूत्र हैं। समता, स्वतंत्रता, बंधुत्व। यही तीन सूत्र फ्रेंच रेवोल्यूशन के भी हैं। जनता के हित में जो भी बात होगी, सामाजिक क्रांति की भी जब बात होगी तो यही तीन सूत्र होंगे। ये तीनों सूत्र परंपरा और इतिहास से अंबेडकर ने लिए।
बुद्ध को पहला गुरु माना अंबेडकर ने
अंबेडकर ने जो देखा-भोगा था, उसे दूर करने के लिए बुद्ध के पास गए। बुद्ध को पहला गुरु माना, क्योंकि बुद्ध तार्किक बात करते हैं। बौद्ध चिंतक अश्वघोष, नागार्जुन, दिग्नाग..जातिवाद पर तार्किक प्रहार करते हैं। ये तीनों ब्राह्मण थे, पर अपने समय के बेहद प्रगतिशील। इसके बाद दूसरे गुरु हुए कबीर। कबीर का समय बुद्ध से भी जटिल था, क्योंकि इस समय हिंदू कट्टरपंथी एवं मुस्लिम कट्टरपंथी दोनों समाज पर हावी थे। कबीर दोनों को बता रहे थे, अरे इन दोऊ राह न पाई...। कबीर ने भी जातिवाद पर प्रहार किया। तीसरे गुरु थे, ज्योतिबा फुले। आधुनिक काल में वही काम किया जो भक्ति काल में कबीर ने। ज्योतिबा ने एक काम और किया, वह है शिक्षा। दलितों को शिक्षा से जोड़ा। इसी काम को अंबेडकर ने आगे बढ़ाया।
माक्र्स से भी प्रभावित थे
अंबेडकर माक्र्स से भी प्रभावित थे। उन्होंने डांगे के साथ काम किया था। दोनों में इस बात को लेकर मतभेद था कि अंबेडकर मानते थे कि पूंजीवाद के जाति और वर्ग दोनों शत्रु हैं। डांगे मानते थे कि वर्ग खत्म हो जाएगा तो जाति स्वयं खत्म हो जाएगी। पर, अंबेडकर की सोच यह थी कि अमीर-गरीब यदि दो वर्ग हो जाएं तो अमीर दलित को अपमान सहना ही पड़ेगा, जबकि गरीब ब्राह्मण भी सम्मान पाएगा। सामाजिक लड़ाई के बिना वर्ग की लड़ाई का कोई माने नहीं है। अंबेडकर को बाइपास करके माक्र्सवादी अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकते।