बुधवार, 29 फ़रवरी 2012

बाजारवाद का मिला है लाभ


संजय कृष्ण : प्रो श्यौराज सिंह बेचैन दलित चिंतन का एक महत्वपूर्ण नाम है। दिल्ली विवि में प्रोफेसर हैं। 'मेरा बचपन मेरे कंधों परÓ आत्मकथा से चर्चित बेचैन रांची में दलित सम्मेलन में भाग लेने आए हुए थे। जागरण संवाददाता से कई मुद्दों पर उनसे बातचीत की। प्रमुख अंश।
-हिंदी में दलित साहित्य किस मुकाम तक पहुंचा है?
दलित साहित्य ने अपनी पहचान बना ली है। भूमंडलीकरण और बाजारवाद का लाभ भी दलित साहित्य और चेतना को मिला। पूरी दुनिया में दलित लेखन की परंपरा विकसित हुई है। रिसर्च सेंटर बने हैं। अनुवादों का दायरा बढ़ा है। अंग्रेजी, मराठी, मलयालम, उर्दू आदि में दलित साहित्य के अनुवाद हो रहे हैं।
-दलित आत्मकथाएं काफी आ रही हैं। इनका स्वागत भी हो रहा है? इसे किस रूप में देखते हैं।
कहानी-उपन्यास आदि में दलित समाज उपस्थित रहा है। चरित्र भी रहे हैं। लेकिन उसमें कल्पना की छौंक होती है। पठनीयता के लिहाज से यह जरूरी भी है। पर आत्मकथा में कल्पना की गुजांइश नहीं होती। जो सच है, जो भोगा है, उसे ही अभिव्यक्त करना है। सो, वहां यथार्थ है। दूसरे, दलित लेखकों को जन्म से लेकर बचपन और युवा होने तक तिरस्कार, अपमान और घृणा के साथ जीना पड़ता है। किस परिवेश में कैसे वह बड़ा होता है, यह वही जान सकता है, जो दलित है। इसलिए दलित आत्मकथाएं बड़े चाव से पढ़ी जा रही हैं।
-दलित चिंतक प्रेमचंद को भी कठघरे में खड़ा करते हैं। उसके पीछे क्या उद्देश्य है?
प्रेमचंद की कहानियां या उपन्यास में घिसू, माधव या बुधिया जैसे पात्र दयनीय स्थिति में दिखाए गए हैं। वे याचक की भूमिका में हैं। बेशक, उनकी सहानुभूति थी लेकिन सवाल है कि जब प्रेमचंद लिख रहे थे, उसी समय स्वामी अछूतानंद भी लिख रहे थे, पत्रिका निकाल रहे थे, लेकिन उनकी उनसे कोई बातचीत नहीं। जब दलितों के प्रति उनकी सहानुभूति थी, वे अछूतानंद से कैसे दूर रहे?
-डा. धर्मवीर अंबेडकर की चिंतन को खारिज करते हैं, जबकि दलित साहित्य और चेतना के वे स्तंभ हैं?
धर्मवीर अंबेडकर को पूना पैक्ट तक मानते हैं। उसके बाद उनसे दूर हो जाते हैं। वस्तुत : धर्म के बिंदु पर उनसे अलगाव है। बुद्ध, मक्खली गोशाल और महावीर तीनों मित्र थे। गोशाल कुम्हार थे, लेकिन गोशाल बाद में हाशिए पर चले गए और इनका धर्म मार्ग चल निकला। बुद्ध राज परिवार से थे, सो लोगों ने उन्हें हाथों हाथ लिया। जबकि सारे मौलिक विचार गोशाल के थे। पहली बार मानवता की बात गोशाल करते हैं। दूसरे, अंबेडकर पुनर्जन्म को मानते हैं, जबकि बुद्ध भी नहीं इसे मानते थे। अंबेडकर में बुद्ध गहरे जड़ जमाए हैं। बुद्ध भी बराबरी की बात करते हैं, लेकिन संघ में। और संघ में भी नाई गया तो वहीं काम कर रहा है, धोबी गया तो वही काम कर रहा है। फिर समानता कहां है? बराबरी कहां थीं।
-दलित चेतना के विकास में अखबारों की भूमिका को किस नजर से देखते हैं?
दलित चेतना के विकास में अखबारों ने महती भूमिका निभाई है। शिक्षा, राजनीतिक चेतना के विकास में इनका योगदान महत्वपूर्ण है?
-हिंदी पत्रिकाओं का योगदान कहां तक मानते हैं?
हिंदी में तीन सौ लघु पत्रिकाएं निकलती हैं। कानपुर से भीम, सारिका ने भी दलित अंक निकाले, हंस का भी दलित पर विशेषांक आया, जिसका संपादन खुद मैंने किया था। विमलकीर्ति का अंगुत्तर, जबलपुर का तीसरा पक्षधर आदि पत्रिकाओं ने योगदान दिया। अब कई पत्रिकाएं दलित पर विशेषांक निकाल रही हैं। यह शुभ संकेत है।

अंबेडकर ने हाशिए की वैचारिकी निर्मित की

संजय कृष्ण : काशी हिंदू विश्वविद्यालय, हिंदी विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. चौथीराम यादव ने मंगलवार को जागरण से विशेष बातचीत में कहा कि दलित साहित्य में भी अंतर्विरोध उभर रहे हैं। यह ठीक भी है। जैसे डा. धर्मवीर खुद को अंबेडकर से आगे बताते हैं। वे अंबेडकर को खारिज करते हैं। उन्हें अंबेडकर का बौद्ध होना अखरता है। वे दलित के लिए आजीवक धर्म की वकालत करते हैं। लेकिन दलित बुद्ध-अंबेडकर के प्रति वही भाव रखते हैं। धर्मवीर के लिए बौद्ध धर्म क्षत्रिय धर्म लगता है। बुद्धिज्म में वह स्पेस है, जहां दलितों के लिए एक जगह है। बुद्धिज्म के तीन सूत्र हैं। समता, स्वतंत्रता, बंधुत्व। यही तीन सूत्र फ्रेंच रेवोल्यूशन के भी हैं। जनता के हित में जो भी बात होगी, सामाजिक क्रांति की भी जब बात होगी तो यही तीन सूत्र होंगे। ये तीनों सूत्र परंपरा और इतिहास से अंबेडकर ने लिए।
बुद्ध को पहला गुरु माना अंबेडकर ने
अंबेडकर ने जो देखा-भोगा था, उसे दूर करने के लिए बुद्ध के पास गए। बुद्ध को पहला गुरु माना, क्योंकि बुद्ध तार्किक बात करते हैं। बौद्ध चिंतक अश्वघोष, नागार्जुन, दिग्नाग..जातिवाद पर तार्किक प्रहार करते हैं। ये तीनों ब्राह्मण थे, पर अपने समय के बेहद प्रगतिशील। इसके बाद दूसरे गुरु हुए कबीर। कबीर का समय बुद्ध से भी जटिल था, क्योंकि इस समय हिंदू कट्टरपंथी एवं मुस्लिम कट्टरपंथी दोनों समाज पर हावी थे। कबीर दोनों को बता रहे थे, अरे इन दोऊ राह न पाई...। कबीर ने भी जातिवाद पर प्रहार किया। तीसरे गुरु थे, ज्योतिबा फुले। आधुनिक काल में वही काम किया जो भक्ति काल में कबीर ने। ज्योतिबा ने एक काम और किया, वह है शिक्षा। दलितों को शिक्षा से जोड़ा। इसी काम को अंबेडकर ने आगे बढ़ाया।
माक्र्स से भी प्रभावित थे
अंबेडकर माक्र्स से भी प्रभावित थे। उन्होंने डांगे के साथ काम किया था। दोनों में इस बात को लेकर मतभेद था कि अंबेडकर मानते थे कि पूंजीवाद के जाति और वर्ग दोनों शत्रु हैं। डांगे मानते थे कि वर्ग खत्म हो जाएगा तो जाति स्वयं खत्म हो जाएगी। पर, अंबेडकर की सोच यह थी कि अमीर-गरीब यदि दो वर्ग हो जाएं तो अमीर दलित को अपमान सहना ही पड़ेगा, जबकि गरीब ब्राह्मण भी सम्मान पाएगा। सामाजिक लड़ाई के बिना वर्ग की लड़ाई का कोई माने नहीं है। अंबेडकर को बाइपास करके माक्र्सवादी अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकते।