गुरुवार, 30 अगस्त 2012

वर्कशॉप से विकसित होती है सिनेमा देखने की समझ : अतुल

अतुल तिवारी किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। तहजीब के शहर लखनऊ से जुड़े अतुल तिवारी एनएसडी से पासआउट हैं। दिल्ली से मुंबई का सफर तय किया और अपना एक मुकाम बनाया। कई सुपरहिट फिल्में लिखीं। कलम चालू है। शनिवार को सिनेमा की समझ को लेकर दैनिक जागरण के वरीय संवाददाता संजय कृष्ण से उनकी बातचीत के संक्षिप्त अंश:-
फिल्म फेस्टिवल और वर्कशॉप से दर्शकों को कितना फायदा होगा? सिनेमा के प्रति हमारी समझ को कितना बेहतर बना सकता है?
फिल्म एप्रेसिएशन का सिलसिला चलना चाहिए। यह महत्वपूर्ण है। फिल्म देखना आसान है, लेकिन समझना कठिन। आज डीवीडी का जमाना है। घर बैठे अब आप दुनिया की फिल्में देख सकते हैं। पहले यह बात नहीं थी। लेकिन क्या फिल्मों को लेकर हमारी समझ भी उतनी ही अग्रगामी हुई है? क्या हमारी समझ पहले की अपेक्षा प्रखर हुई है? यह बड़ा सवाल है। इस तरह के वर्कशॉप से ही यह समझ विकसित होती है। जैसे टी एप्रेसिएशन। मैंने इसका भी कोर्स किया है कि चाय कैसे पी जाए, कौन सी चाय किस प्रकार के आनंद निर्मित करती है? दार्जिलिंग चाय क्या है, ग्रीन टी किसे कहते हैं? यदि आप इनके बारे में समझ रखते हैं तो चाय का आनंद दुगुना उठा सकते हैं। यही बात फिल्म पर भी लागू होती है। यदि आपकी समझ बेहतर है, तो फिल्म को आप बेहतर ढंग से ग्राह्य कर सकते हैं।
क्या सीखने के लिए भी कोई तैयारी करनी चाहिए?
सीखने की तैयारी तो होनी ही चाहिए। प्रश्नाकुलता नहीं रहेगी तो वह कुछ नहीं कर सकता। जिज्ञासा बड़ी चीज है। यही आपको आगे बढ़ती है। आपके अंदर क्यूरोसिटी होनी चाहिए। क्योंकि फिल्म या कला बहुत कंपलेक्स चीज है। महान फिल्मकार सत्यजीत रे ने चालीस-पचास साल पहले कोलकाता में कला की बारीकियों को सीखने की एक विधिवत शुरुआत की थी। इसी तरह का काम पुणे के पीके नायर एवं उत्तरप्रदेश के सतीश बहादुर ने काम किया था। दोनों ने पुणे में फिल्म एप्रोसिएशन का काम किया था। उन्होंने फिल्म अर्काइव का काम भी किया। कोर्स भी चलाए। दोनों ने तो कर्नाटक के सुदूर गांव हेगुडू में इस काम को अंजाम दिया। मेरी शीचर ने भी जो विदेशी थीं, सत्यजीत रे पर किताब लिखी। तो, इस तरह के प्रयास से एक मानस विकसित होता है।
देश का दर्शक सिनेमा देखता है। सिनेमा का आधा पैसा सरकार टैक्स के रूप में वसूल लेती है? क्या इस टैक्स के पैसे का इस्तेमाल लोगों की समझ विकसित करने के लिए नहीं करना चाहिए और इसमें एफटीआईआई (फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीच्यूट आफ इंडिया) और नेशनल स्कूल आफ ड्रामा जैसे सरकारी संस्थानों की क्या भूमिका हो सकती है?
जिससे टैक्स लिया जा रहा हो, जरूरी नहीं वह पैसा उसी के लिए इस्तेमाल हो। यह ठीक भी नहीं है। फाइव स्टार होटल से सरकार अधिक टैक्स लेती है तो इसका मतलब यह नहीं कि वह इन्हीं के विकास के लिए खर्च करे? कार से टैक्स ले तो यह ठीक नहीं कार की इंजीनियरिंग के लिए उसका इस्तेमाल हो? टैक्स लेती है सरकार भले ही वह मिनिस्टर के घर जाए? खैर, एनएसडी यह काम बखूबी कर रही है। आउट रिच प्रोग्राम के तहत वह देश ही नहीं, पूर्वोत्तर में भी वह बेहतर ढंग से काम कर रही है। जहां तक संस्थाओं का सवाल है तो यह पेचीदा प्रश्न है। एनएसडी के छात्रों को सरकारी छात्रवृत्ति मिलती है। लेकिन वह फिर मुंबई का रुख कर लेते हैंं। सरकार यदि ऐसी कोई व्यवस्था करती है कि जिन्हें छात्रवृत्ति दी जाती है, वह तीन साल तक सरकार के लिए काम करेंगे तो यह सबके लिए होना चाहिए। आईआईटी, मेडिकल सबके लिए। मेरा निजी तौर पर मानना है कि मैं तीन साल एनएसडी में पढ़ा। सरकार चाहे तो तीन साल आज भी मेरा उपयोग कर सकती है बशर्ते मेरे काम के अनुरूप हो।
प्रश्न : सिनेमा में जाने वालों के सामने क्या चुनौतियां हैं?
दो बड़ी चुनौतियां हैं। यदि आप इस फिल्म लाइन में आना चाहते हो तो आपके पास कहने की एक अलग और अलहदा शैली होनी चाहिए। कहानी कहने की अलग शैली नहीं होगी तो आप टिक नहीं सकते। दूसरी बात, आप यदि तकनीकी क्षेत्र में जाना चाहते हैं तो वहां भी आपकी दक्षता की बार-बार परीक्षा ली जाएगी। तभी आप वहां सफल हो सकते हैं। वर्कशॉप इस तरह के काम को सरल बनाते है।
पत्र-पत्रिकाओं में भी सिनेमा काफी जगह घेरता है। इसके बाद भी देश में आम लोगों के बीच सिनेमा की समझ विकसित नहीं हो सकी है?
अतुल : ठीक कह रहे हैं। देश का जूता बाजार 26 हजार करोड़ का है और फिल्म उद्योग महज पांच हजार करोड़ का। लेकिन अखबारों में सबसे अधिक कॉलम सिनेमा घेरता है। फिल्मों पर काफी पत्रिकाएं भी निकल रही हैं, लेकिन समझ विकसित नहीं हो पा रहा है। इसके पीछे सबसे बड़ी बात यह है कि इनमें फिल्मों की विधा, उसके व्याकरण, व्यवस्था पर बात नहीं होती। वहां केवल गॉशिप या सूचनाएं होती हैं।