शुक्रवार, 1 मार्च 2013

भारद्वाज मुनि बसहिं प्रयागा

संजय कृष्ण : जानते हो परमार्थ का मतलब क्या होता है? तीर्थराज प्रयाग की इस नगरी में सत्तर साल के गाजीपुर से आए संत प्रवर अनंतश्री स्वामी महिधर प्रपन्नाचार्य सबसे पहला सवाल मेरी ओर यही दागा। दिनरात धर्म की बह रही गंगा के बीच ऐसे सहज सवाल से पहली बार साबका पड़ा था। मैंने जब अनभिज्ञता जाहिर की तो कहने लगे, परमार्थ के तीन चरण होते हैं। रोटी देकर, दवा देकर और कथा सुनाकर। इसे थोड़ा विस्तार देते हुए कहते हैं, यदि कोई भूखा है तो उसे रोटी की जरूरत होगी। बीमार है तो दवा की। तब उसे कथा सुनाओगे तो सुनेगा। जिसके यहां यह तीनों है, वही स'चा परमार्थी है...भारद्वाज मुनि बसहिं प्रयागा, परमारथ पथ परम सुजाना। महिधर प्रपन्नाचार्य कथा के बाबत कहते हैं कि संगीमय भागवत कथा नहीं होती। किसी ऋषि ने संगीतमय कथा कही है क्या? शायद उनका इशारा कुकुरमूत्ते की तरह उग आए कथावाचकों की ओर हो?
खैर, परमार्थ के इस विकट रहस्य को जान आगे बढ़ लेते हैं। बरसात के बाद खिली धूप ने रास्तों को सुकून बख्शा है। चहल-पहल बढ़ गई है। एक विशाल शिविर के आगे बोर्ड पढ़ता हंू तो साढ़े सात सौ साल पुराने हथियाराम मठ का बोर्ड लगा हुआ दिखा। अंदर घुसते ही चंदौली के हलधर सिंह मिल जाते हैं। बताते हैं कि यहां से लोग 16 मार्च को गाजीपुर जाएंगे। थोड़ी देर बाद उनके महंत भवानी नंदन यति से मुलाकात होती है। संस्कृत विश्वविद्यालय, बनारस से पी एचडी हैं। उनका यह तीसरा कुंभ है। युवा हैं। तार्किक भी। चेहरे पर ओज भी है। जिज्ञासावश एक सवाल पूछता हूं...अब 12 स्थानों पर कुंभ की तैयारी हो रही है, आप क्या सोचते हैं? सहजढंग से कहते हैं, परंपराओं को जिंदा रखना आसान नहीं। प्रयाग में पूरे देश से लोग आते हैं। चार स्थानों पर कुंभ हो रहे हैं। प्रयाग में कैसे होता है, यह आप देख रहे हैं। संकल्प करना ब'चों का खेल नहीं। संकल्प वहीं लेना चाहिए, जिसे हम निभा सकें। संकल्प का कोई विकल्प नहीं होता। इसका भी ध्यान रखना चाहिए।
सेक्स स्कैंडल में फंसे स्वामी नित्यानंद के महामंडलेश्वर बनाए जाने को लेकर हो रहे विरोध पर कहते हैं, विरोध तो स्वाभाविक है। वैसे, इस युवा संन्यासी में मुझे जो एक बात आकर्षित की, वह थी ईमानदारी। उन्होंने बहुत स्पष्ट ढंग से कहा कि मैं कोई बड़ा संत नहीं हूं। मैं तो साधना पथ का एक अदना से आदमी हूं। प्रारब्ध ने साथ दिया तो मंजिल एक दिन मिल ही जाएगी। यहां से फिर आगे बढ़ लेता हूं ...। एक शिविर के पास अचानक कदम ठिठक जाते हैं। शिविर के सामने अनंतश्री स्वामी अखंडानंद सरस्वती महाराज के चित्र लगे थे। महाराज के बारे बहुत सुनता रहा हूं। हिंदी के महत्वपूर्ण ललित निबंधकार विद्यानिवास मिश्र के साथ इनकी तस्वीरें देखी थीं बनारस में। सो, खुद को रोक नहीं पाया। सोचा, उनके किसी शिष्य से मुलाकात होगी, पर यहां तो आधुनिक मीरा से मुलाकात हो गई। श्रीमां पूर्णप्रज्ञा। उनके चेहरे पर गजब की कांति थी। अत्यंत मधुर आवाज। सोचा, धर्म-अध्यात्म की बातें तो कई जगह हो गईं थोड़ा उनके भीतर मन को टटोला जाए। आखिर, वे संन्यास का मार्ग क्यों चुनीं। मीरा की तरह श्री मां भी सतना जिले में पडऩे वाला नागौद रियासत से ताल्लुक रखती हैं। 19 की उम्र में ग्वालियर से बी एससी किया। इसके बाद गुजरात के लाठी रियासत में शादी हो गई। पर, छोटी से उम्र में आर्ष ग्रंथों की ओर जो झुकाव बढ़ा, वह शादी के बाद और भी प्रगाढ़ होता गया। शादी हुई तो भी जो समय मिलता जप और ध्यान में जाता।
श्रीमां बताती हैं कि एक बार वे घर में पत्र छोड़ हिमालय चली गईं। ग्रंथों में पढ़ा था कि संतों को हिमालय जरूर जाना चाहिए। सो, चल दी। ससुर ने पुलिस में कंपलेन लिखवा दिया। इसके बाद मेरी खोजबीन शुरू हुई। आखिरकार पुलिस ने मेरे ठिकाने का पता लगा लिया। ससुर भी पुलिस अधिकारी थे। पुलिस ने मेरे से पूछताछ की...क्या किसी ने बहकाया....श्रीमां कहने लगीं, हां। कौन? नाम बताने लगीं....विवेकानंद, दयानंद, शंकराचार्य, चिन्मयानंद....इस तरह नाम बताती गईं। एक पुलिस वाला बड़ी तेजी से इन नामों को लिख रहा था कि अचानक उसकी कलम रुक गई...कहने लगा, इनमें तो कई जीवित नहीं है। इसके बाद ससुरजी से भी पूछताछ किया। इसके बाद छोड़ दिया। इसके बाद पति को समझाया। वे मेरी भावनाओं को समझ ही नहीं पा रहे थे। उन्हें पार्टी और घुड़सवारी का शौक था। इनमें मेरी कोई रुचि नहीं थी। उनके साथ पार्टी में जाती जरूर लेकिन एक किनारे बैठ माला जपा करती। इस बीच मेरे तीन बेटे हो गए। अंतिम बार जब घर छोड़ा, मेरा सबसे छोटा बेटा पांच साल का था। वही मेरे संपर्क में रहता है। श्रीमां वेदांत से लेकर उपनिषद तक को खंगाला और वे उसी पर बोलती भी हैं। मां कहती हैं, चिंतन ही जीवन है और चित्त ही संसार...। ब्रह्म वह है, जिसमें शब्द की गति नहीं। मां से हम विदा लेते हैं, लेकिन वे प्रसाद लेने का आग्रह करती हैं...वहां से चलते हैं तो सांझ अपना पैर पसारने लगी थी....धीरे-धीरे पूरा कुंभ परिसर ही पीली रोशनी से जगमगा उठता है।