रविवार, 18 अगस्त 2013

वैद्यनाथ की यात्रा

 यह यात्रा विवरण हरिश्चंद्र चन्द्रिका और मोहन चन्द्रिका खं 7, संख्या 4, आषाढ़ शुक्ल एक सम्वत 1937 यानी सन् 1880 में प्रकाशित था। मंदिर के बारे में संस्‍क़त के श्‍लोकों को यहां नहीं दिया गया है। सावन के महीने में इसका महत्‍व कुछ बढ गया है। भारतेंदु ने यह यात्रा काशी नरेश के साथ की थी। उनकी मजेदार भाषा का यहां दर्शन तो होता ही है, मौका मिलने पर अंगरेजी राज को भी कोसना नहीं भूलते। रेल की यह यात्रा काफी रोमांचक भी है।

                                         भारतेंदु हरिश्‍चंद्र                       
श्री मन्महाराज काशीनरेश के साथ वैद्यनाथ की यात्रा को चले। दो बजे दिन के पैसेंजर ट्रेन में सवार  हुए। चारांे ओर हरी हरी घास का फर्श, ऊपर रंग रंग के बादल, गड़हों में पानी भरा हुआ, सक कुछ  सुंदर। मार्ग में श्री महाराज के मुख से अनेक प्रकार के अमृतमय उपदेश सुनते हुए चले जाते थे। सांझ को बक्सर के आगे बड़ा भारी मैदान, पर सब्ज काशानी मखमल से मढ़ा हुआ। सांझ होने से बादल  छोटे छोटे पीले नीले बड़े ही सुहाने मालमू पड़ते थे। बनारस कालिज की रंगीन शीशे की खिड़कियों का सा सामान था। क्रम से अंधकार होने लगा, ठंढी ठंढी हवा से निद्रा देवी अलग नेत्रों से लिपटी जाती थी। मैं महाराज के पास से उठकर सोने के वास्ते दूसरी गाड़ी में चला गया। झपकी का आना था कि     बौछारों ने छेड़छाड़ करनी शुरू कक, पटने पहुंचते-पहुंचते तो घेर घार कर चारों ओर से पानी बरसने ही लगा। बस पृथ्वी आकाश सब नीरब्रह्ममय हो गया। इस धूमधाम में भी रेल, कृष्णाभिसारिका सी   अपनी धुन में चली ही जाती थी। सच है सावन की नदी और दृढ़प्रतिज्ञ उद्योगी और जिनके मन पीतम के पास हैं वे कहीं रुकते हैं? राह में बाज पेड़ों में इतने जुगनू लिपटे हुए थे कि पेड़ सचमुच ‘सर्वे  चिरागां’ बन रहे थे। जहां रेल ठहरती थी, स्टेशन मास्टर और सिपाही बिचारे टुटरू टूं छाता, लालटेन  लिए रोजी जगाते भीगते हुए इधर उधर फिरते दिखाई पड़ते थे। गार्ड अलग ‘मैकिंटाश कवच पहिने’ अप्रतिहत गति से घूमते थे। आगे चलकर एक बड़ा भारी विघ्न हुआ, खास जिस गाड़ी पर श्री महाराज सवार थे, उसके धुरे घिसने से गर्म होकर शिथिल हो गए। वह गाड़ी छोड़ देनी पड़ी। जैसे धूमधाम से अंधेरी, वैसी ही जोर शोर का पानी। इधर तो यह आफत, उधर फरऊन क्या फरऊन के भी बाबाजान  रेलवालों को जल्दी, गाड़ी कभी आगे हटै, कभी पीछे। खैर, किसी तरह सब ठीक हुआ। इस पर भी बहुतसा असबाब और कुछ लोग पीछे छूट गए। अब आगे आगे बढ़ते तो सबेरा ही होने लगा। निद्रा वधू का संयोग भाग्य में न लिखा था, न हुआ। एक तो सेकंेड क्लास की एक ही गाड़ी, उसमें भी लेडीज कंपार्टमेंट निकल गया, बाकी जो कुछ बचा उसमें बारह आदमी। गाड़ी भी ऐसी टूटी फूटी, जैसी हिदंुओं की किस्मत और हिम्मत। इस कम्बख्त गाड़ी से और तीसरे दर्जे की गाड़ी से कोई फर्क नहीं, सिर्फ एक ही धोके की टट्टी का शीशा खिड़कियों में लगा था। न चैड़े बेंच न गद्दा न बाथरूम। जो लोग मामूली से तिगुना रुपया देें उनको ऐसी मनहूस गाड़ी पर बिठलाना, जिसमें कोई बात भी आराम की न हो, रेलवे कंपनी की सिर्फ बेइंसाफी ही नहीं, वरन धोखा देना है। क्यों नहीं ऐसी गाडि़यों को आग लगाकर जला देती। कलकत्ते में नीलाम कर देती। अगर मारे मोह के न छोड़ी जाए तो उसमें तीसरे दर्जे का काम ले। नाहक अपने गाहकों को बेवकूफ बनाने से क्या हासिल। लेडीज कंपार्टमेंट खाली था, मैंने गार्ड से कितना कहा कि इसमें सोने दो, न माना। और दानापुर से दोचार नीम अंगरेज (लेडी नहीं सि। लैड) मिले। उनको बेतकल्लुफ उसमें बैठा दिया। फस्र्ट क्लास की सिर्फ दो गाड़ी-एक में महाराज, दूसरी में आधी लेडीज, आधी में अंगरेज। अब कहां सोवैं कि नींद आवै। सचमुच अब तो तपस्या करके गोरी गोरी कोख से जन्म लें तब संसार में सुख मिलै। मैं तो ज्यों ही फस्र्ट क्लास में अंगरेज कम हुए कि सोने की लालच से उसमें घुसा। हाथ फैलाना था कि गाड़ी टूटने वाला विघ्न हुआ। महाराज के इस गाड़ी में आने से फिर मैं वहीं का वहीं। खैर इसी सात पांच में रात कट गई। बादल के परदों को फाड़ फाड़कर ऊषा देवी ने ताकझांक आरंभ कर दी। परलोकगत सज्जनों की कीर्ति की भांति सूय नारायण काप्रकाश पिशुन मेघों के वागाडंबर से घिरा हुआ दिखलाई पड़ने लगा। प्रकृति का नाम काली से सरस्वती हुआ, ठंढी ठंढी हवा मन की कली खिलाती हुई बहने लगी। दूर से धनी और काही रंग के पर्वतों पर सुनहरापन आ चला। कहीं आधे पर्वत बादलों से घिरे हुए, कहीं एक साथ वाष्प निकलने से चोटियां छिपी हुईं और कहीं चारों ओर से उनपर जलधारा पात से बुक्के की होली खेलते हुए बड़े ही सुहाने मालूम पड़ते थे। पास से देखने से भी पहाड़ बहुत ही भले दिखलाई पड़ते थे। काले पत्थरों पर हरी हरी घास और जहां तहां छोटे बड़े पेड़, बीच बीच में मोटे पतले झरने, नदियों की लकीरें, कहीं चारों ओर सघन हरियाली, कहीं चट्टानांे पर ऊंचे नीचे अनगढ़ ढोंके और कहीं जलपूर्ण हरित तराई विचित्रा शोभा देती थी। अच्छी तरह प्रकाश होते होते तो वैद्यनाथ के स्टेशन पर पहंुच गए। स्टेशन से वैद्यनाथ जी कोई तीन कोस हैं।  बीच में एक नदी उतरनी पड़ती है जो आजकल बरसात में कभी घटती और कभी बढ़ती है। रास्ता पहाड़ के ऊपर ही ऊपर बरसात से बहुत सुहावना हो रहा है। पालकी पर हिलते हिलते चले। श्रीमहाराज के सोचने के अनुसार कहारों की गतिध्वनि में भी परदेश की ही चर्चा है। पहले ‘कोह कोह’ की ध्वनि सुनाई पड़ती है फिर ‘सोह सोह’ की एकाकार पुकार मार्ग में भी उसमें तन्मय किए देती थी। मुसाफिरों को अनुभव होगा कि रेल पर सोने से नाक थर्राती है और वही दशा कभी कभी सवारियों पर होती है। इससे मुझे पालकी पर भी नींद नहीं आई और जैसे तैसे बैजनाथ जी पहुंच ही गए।
       बैजनाथ जी एक गांव है, जो अच्छी तरह आबाद है। मजिस्ट्रेट, मुनसिफ वगैरह हाकिम और जरूरी सब आफिस हैं। नीचा और तर होने से देश बातुल गंदा और ‘गंधद्वारा’ है। लोग काले काले और हतोत्साह मूर्ख और गरीब हैं। यहां सौंथाल एक जंगली जाति होती है। ये लोग अब तक निरे वहशी हैं। खाने पीने की जरूरी चीजें यहां मिल जाती हैं। सर्प विशेष हैं। राम जी की घोड़ी जिनको कुछ लोग ग्वालिन कहते भी कहते हैं एक बालिश्त लंबी और दो दो उंगल मोटी देखने में आईं।
      मंदिर वैद्यनाथ जी का टोप की तरह बहुंत ऊंचा शिखरदार है। चारांे ओर देवताओं के मंदिर और बीच में फर्श है। मंदिर भीतर से अंधेरा है क्योंकि सिर्फ एक दरवाजा है। बैजनाथ जी की पिंडी जलधरी से तीन चार अंगल ऊंची बीच में से चिपटी है। कहते हैं कि रावण ने मूका मारा है इससे यह गड़हा पड़ गया है। वैद्यनाथ बैजनाथ और रावणेश्वर यह तीन नाम महादेवजी के हैं। यह सिद्धपीठ और ज्योतिर्लिंग स्थान है। हरिद्रापीठ इसका नाम है और सती का हृदयदेश यहां गिरा है। जो पार्वती अरोगा और दुर्गा नाम की सामने एक देवी हैं वही यहां की मुख्य शक्ति हैं। इनके मंदिर एवं महादेव जी के मंदिर से गांठ जोड़ी रहती है रात को महादेव जी के ऊपर बेलपत्रा का बहुत लंबा चैड़ा एक ढेर करके ऊपर से कम खाब या ताश का खोल चढ़ाकर शृंगार करते हैं या बेलपत्रा के ऊपर से बहुत सी माला पहना देते हैं सिर के गड़हे में भी रात को चंदन भर देते हैं।
   वैद्यनाथ की कथा यह है कि एक बेर पार्वतीजी ने मान किया था और रावण के शोर करने से वह मान छूट गया। इस महादेव जी ने प्रसन्न होकर वर दिया कि हम लंका चलंेगे और लिंग रूप से उसके साथ चले। राहमें जब बैजनाथ जी पहुंचे तब ब्राह्मण रूपी विष्णु के हाथ में वह लिंग देकर पेशाब करने लगा। कई घड़ी तक माया मोहित होकर वह मूतता ही रह गया और घबड़ाकर विष्णु ने उस लिंग को वहीं रख दिया। रावण का महादेव जी से यह करार था कि जहां रख दोगे वहां से आगे न चलेंगे। इससे महादेव जी वहां रह गए वरंच इसी पर खफा होकर रावणने उनको मूका भी मार दिया।
   वैद्यनाथ जी मंदिर राजा पूरणमल्ल का बनाया हुआ है। लोग कहते हैं कि रघुनाथ ओझा नामक एक तपस्वी इसी वन में रहते थे। उनको स्वप्न हुआ कि हमारी एक छोटी सी मढ़ी झाडि़यों में छिपी है तुम उसका एक बड़ा मंदिर बनाओ। उसी स्वप्न के अनुसार किसी वृक्ष के नीचे उनको तीन लाख रुपया मिला। उन्हांेने राजा पूरणमल को वह रुपया दिया कि वे अपने प्रबंध में मंदिर बनवा दें। वे बादशाह के काम से कहीं चले गए और कई बरस तक न लौटें, तब रघुनाथ ओझा ने दुखित होकर अपने व्यय से मंदिर बनवाया। जब पूरणमल लौटकर आए और मंदिर बना देखा तो सभा मंडप बनवाकर मंदिर के द्वार पर अपनी प्रशस्ति लिखकर चले गए। यह देखकर रघुनाथ ओझा ने दुखित होकर कि रुपया भी गया कीर्ति भी गई, एक नई प्रशस्ति बनाई और बाहर के दरवाजे खुदवाकर लगा दी। वैद्यनाथ महात्म्य से मालूम होता है कि इन्हीं महात्मा का बनाया हुआ है क्योंकि उसमें छिपाकर रघुनाथ ओझा को श्रीरामचंद्र जी का अवतार लिखा है। प्रशस्ति का काव्य भी उत्तम नहीं है जिससे बोध होता है कि ओझा जी श्रद्धालु थे किंतु उद्वत पंडित नहीं थे। गिद्धौर के महाराज सर जयमंगलसिं के सीएसआइ कहते हैं कि पूरणमल उनके पुरखा थे। एक विचित्रा बात यहां और भी लिखने योग है। गोवर्धन पर श्रीनाथ जी का मंदिर सं 1556 में एक राजा पूरणमल्ल ने बनाया और यहां संवत् 1652 सन् 1595 ई मेंएक पूरणमल्ल ने वैद्यनाथ जी का मंदिर बनाया। क्या यह मंदिरों का काम पूरणमल्ल ही हो परमेश्वर को सौंपा है?
               निज मंदिर का लेख
अचल शशिशायके लसित भूमि शकाब्दके।
         वलति रघुनाथके वहल पूजक श्रद्धया।।
विमल गुण चेतसा नृपति पूणेनाचितं।
          त्रिपुरहरमंदिरं व्यरचि सर्वकामप्रदम्।।
                     नृपतिकृत पद्यमिदम्।।

    मंदिर के चारों ओर देवताओं के मंदिर हैं। कहीं प्राचीन जैन मूर्तियां हिंदू मूर्ति बनकर पूजती हैं एक पद्मावती देवी की मूर्ति बड़ी सुंदर है जो सूर्य नारायण के नाम से पुजती है। यह मूर्ति पद्म पर बैठी है और वे बड़ी सुंदर कमल की लता दोनों ओर बनी है। इस पर अत्यंत प्राचीन पाली अक्षर में कुछ लिखा है जो मैंने श्री बाबू राजेंद्रलाल के पास पढ़ने को भेजा है। दो भैरव की मूर्ति, जिससे एक तो किसी जैन सिद्ध की और एक जैन क्षेत्रापाल की है, बड़ी ही सुंदर है लोग कहते हैं कि भागलपुर जिले में किसी तालाब में से निकली थी।
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शुक्रवार, 16 अगस्त 2013

नजरबंदी में भी रांची में जोश भरा था मौलाना ने

संजय कृष्ण, रांची
आजादी के एक प्रमुख सिपाही हिंदू-मुसलिम एकता के संबल मौलाना अबुल कलाम आजाद (11 नवंबर, 1888-22 फरवरी 1958) जब रांची से प्रकाशित साप्ताहिक पत्रिका 'आदिवासीÓ (वर्ष 18, अंक 28, 15 अगस्त, 1964) के एक अंक में समरुल हक ने 'आवाज गूंजती हैÓ नामक लेख में लिखा है कि 'रांची के बुजुर्ग जब मौलाना को देखते थे तो उन्हें विश्वास ही नहीं होता था कि इतनी कम उम्र का नौजवान इतना बड़ा साहित्यकार, ओजस्वी वक्ता और ब्रिटिश सरकार के लिए इतना भयानक हो सकता है। रांची में नजरबंद रहते हुए भी मौलाना आजाद की राजनीतिक और सामाजिक सरगर्मियां ठंडी नहीं पड़ी थी।Óमौलाना केवल तकरीर ही नहीं करते थे। लोगों में आजादी का जोश ही नहीं भरते थे। शिक्षा को लेकर अपनी चिंता को भी यहां परवाना चढ़ाया और कई संस्थाओं की नींव डाली। अगस्त, 1917 में उन्होंने अंजुमन इस्लामिया, रांची तथा मदरसा इस्लामिया की नींव डाली। ये दोनों आज भी हैं और उनकी स्मृतियों की गवाही देती हैं।
समरुल हक ने लिखा है कि जुमे की नमाज के बाद मसजिद में हिंदू भी मौलाना का भाषण सुनने के लिए आते थे। रांची के कुछ मुसलमानों ने विरोध प्रकट किया कि ये लोग मस्जिद में क्यों आ जाते हैं? उन लोगों की आपत्ति सुनकर मौलाना ने 'जामिल सवाहिदÓ नाम की किताब लिखी। यह हिंदू मुस्लिम एकता की बेजोड़ पुस्तक मानी जाती है।
रांची के गजनफर मिर्जा, मोहम्मद अली, डा. पूर्णचंद्र मित्र, देवकीनंदन प्रसाद, गुलाब नारायण तिवारी, नागरमल मोदी, रंगलाल जालान, रामचंद्र सहाय आदि उनसे अक्सर मिलते-जुलते रहते थे और आजादी पर चर्चा करते थे।
कहा जाता है कि 1919 में रांची के गौरक्षणी में हिंदू मुसलमानों की इतनी बेजोड़ सभा हुई कि इतनी भीड़ रांची  ने इसके पहले नहीं देखी थी। उस समय खिलाफत और असहयोग आंदोलन के बारे में ओज और तेज से भरी वक्तृताएं हुईं। मौलाना उस समय नजरबंद थे और सभा में जा नहीं सकते थे, फिर भी सारी प्रेरणा उनकी ही थी। सन 1919 में मौलाना की नजरबंदी से मुक्त हुए। उसके बाद वे रांची में गोशाला के गोपाष्टमी मेला के दिन अपना अंतिम भाषण देकर रांची से चले गए। उस दिन रांची गोशाला में हिंदू-मुसलमानों की इतनी सम्मिलित भीड़ थी, जैसा रांची के इतिहास में पहले कभी भीड़ नहीं जुटी थी। उनके जाने के बाद 1920 में यहां कांग्रेस का गठन हुआ। इसी साल गांधी भी रांची आए और लोगों से आंदोलन में भाग लेने की अपील की। इसके बाद तो कई बार गांधी आए और फिर रांची भी आजादी के दीवानों का एक प्रमुख केंद्र बन गया। 
रांची में नजरबंद थे तब भी आजादी का तकरीर करने से नहीं चूकते थे। कम से कम जुमे की नमाज के बाद तो उनकी तकरीर होती ही थी। वे आजादी का जोश भरते। उनकी तकरीर सुनने के लिए हिंदू भी मस्जिदों जाते थे। वे रांची में अप्रैल 1916 से 27 दिसंबर, 1919 तक रहे और आजादी के आंदोलन को परिपक्वता प्रदान की।

आजादी की मुनादी और वो रात

संजय कृष्ण, रांची
अगस्त का महीना था। 1947 का साल। राजनीतिक वातावरण काफी विषाक्त हो गया था। तरह-तरह की अफवाहें हवा में तैर रही थीं। मेरी उम्र उस समय 18 साल थी। एक रात घर में हम लोग आराम से सोए थे कि पटाखे छूटने लगे। गलियों-सड़कों से होती हुई खबर घर में भी दाखिल हुई, 'पाकिस्तान बन गया।Ó
मुल्तान के पास बहावलपुर स्टेट था। उस स्टेट में एक गांव था कायमपुर। उस गांव के हम वाशिंदे थे। गांव में 85 प्रतिशत आबादी मुसलमानों की थी और 15 प्रतिशत हम लोगों की।
रातू रोड, कृष्णापुरी गुरुद्वारे में प्लास्टिक की कुर्सी पर अपनी छड़ी के साथ बैठे आपबीती सुनाते ऋषिकेश गिरधर की आंखें रह-रहकर सजल हो उठती हैं। कहते हैं, पाकिस्तान बनने की खबर जैसे ही आई, दंगे शुरू हो गए। इन दंगों में अफवाहों ने बड़ी भूमिका निभाई। 14 अगस्त की रात तो इतनी स्याह थी कि कभी वैसी रात देखी ही नहीं। दंगों की खबरें आती तो पूरा शरीर कांप जाता। लगता, मौत अब सामने खड़ी है। 
किसी तरह गांव के सभी लोग गुरुद्वारे में जमा हो गए। बच्चे, बूढ़े, महिलाएं सभी। गुरुद्वारे की खिड़कियां और दरवाजों को मजबूती से बंद कर दिया गया। मेरे बहनोई बालकृष्ण दो बजे रात को लालटेन लेकर ऊपर चढ़े देखने के लिए। तभी एक गोली की आवाज सुनाई दी। दंगाइयों ने उन्हें गोली मार दी। वे छत पर ही ढेर हो गए। हम लोग कुल पंद्रह सौ के करीब थे। घरों को लूटने की खबर आई। खेतों को आग के हवाले कर दिया गया। अब सवाल बहू-बेटियों का था। बुजुर्गों ने बड़ा कठोर फैसला लिया...गुरुद्वारे में ही उन्हें आग के हवाले कर दिया जाए ताकि अपने सामने इन्हें बेआबरू होते न देख सकें। इस प्रस्ताव की खबर गुरुद्वारे से बाहर जा पहुंची। भीड़ में मुसलमानों के एक पीर थे अब्दुल्ला शाह। उन्हें इसका पता चला तो खबर भिजवाई, ऐसा मत करिए।
गिरधर की आंखों में आंसू आ गए। आंसू पोछने के बाद फिर बताते हैं, पीर ने खबर भिजवाई अपने डेरे चलने के लिए। अब माहौल ऐसा था कि उनकी बात पर विश्वास किया जाए या नहीं? खैर, अंतत: चांस लिया गया। जितने लोग थे, अपने गहने मुसलमानों को हवाले करते जाते और फिर उनके साथ चल दिए। दस दिन उनके डेरे पर रहा गया। फिर एक दिन पांच सौ के करीब मुसलमान गांवों से पहुंच गए और कहने लगे कि ये मुसलमान बन जाएंगे तो इन्हें छोड़ देंगे। कुछ तैयार भी हो गए, पर ऐसी नौबत ही नहीं आई। वाहे गुरु ने सुन ली। उसी रास्ते से एक अंग्रेज आफिसर जा रहे थे फोर्स के साथ। आगे एक गांव में भारी तबाही मची थी। जब हम लोगों को पता चला तो रास्ते में हम लोगों ने उन्हें रोक लिया। कहानी सुन उनका दिल पसीजा। उन्होंने ऊपर के अधिकारियों से बात की। हमारी गिनती हुई और हमें मिलिट्री वालों को सुपुर्द कर दिया गया। इसके बाद दोनों देश के बीच बातचीत हुई। तय हुआ कि एक ट्रेन पाकिस्तान से जाएगी और एक हिंदुस्तान से। इस तरह 26 सितंबर को वहां से हम लोग ट्रेन से चले और 28 को राजस्थान के बार्डर पर जो अंतिम स्टेशन था, हिंदू मलकोट वहां उतरे। हिंदू मलकोट से पांच मील पहले ही एक दरिया के पुल पर हमें फिर दंगाइयों ने घेर लिया। पर, मिलिट्री के कारण हम सुरक्षित भारत की सीमा में दाखिल हो गए। स्टेशन पर रांची से आए फिरायालाल, जीव लाल, गोपालदास मुंजाल, शिवदयाल छाबड़ा आदि स्वागत के लिए खड़े थे। ये लोग भी हमारे गांव के ही थे, पर व्यापार के सिलसिले में सत्तर-अस्सी साल पहले इनका परिवार यहीं का हो गया था। हिंदू मलकोट से लोग बिखर गए। सौ-डेढ़ सौ लोग रांची आए। मैं, माता-पिता और भाई सभी यहीं आए। चार लोग आए थे और आज चौवन लोग हैं। केंद्र और बिहार की सरकार ने इनलोगों की खूब मदद की। गिरधर बताते हैं कि पीर का पत्र आते रहा कि आप अपना सामान ले जाइए। उनके पास आते समय काफी सोना रख आए थे। पर, फिर वहां जा नहीं सके। कहते हैं, आजादी की वह काली रात आज भी सिहरन पैदा कर जाती है।       

आजादी की लड़ाई में गंवा दी अपनी जमीन

मोहनदास करमचंद गांधी पहले नेता थे, जिन्होंने आजादी के आंदोलन की शुरुआत करने से पहले पूरा देश का भ्रमण किया। इसके बाद उन्होंने अपनी रणनीति बनाई। मैदानी इलाकों से एकदम अलग-थलग रहने वाले रांची की पठार पर भी उनके कदम पड़े। यह वाकया 1920 का है। असहयोग आंदोलन शुरू हो गया था। वे देश का दौरा कर रहे थे। इसी क्रम में वे रांची भी आए। गांधीजी जब रांची आए तो यहां उनकी मुलाकात टाना भगतों से हुई। इसका श्रेय डा. राजेंद्र प्रसाद को जाता है। टाना भगत भी छह साल पहले ही अस्तित्व में आए थे। वे गांधी के व्यक्तित्व से इस कदर प्रभावित हुए कि फिर गांधी के ही होकर ही रह गए।
श्री नारायणजी ने 'आदिवासीÓ के  गांधी अंक, 2 अक्टूबर, 1969 में लिखा है, 'टाना भगत महात्मा गांधी के अनन्य भक्त बन गए। आजादी की लड़ाई में टाना भगतों ने अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। कितने जेल गए, हजारों की जमीन नीलाम हुई, कितने जेल में खेत आए। स्वराज्य का संवाद सुनने के लिए कांग्रेस अधिवेशन में सम्मिलित होने के लिए सैकड़ों पांव पैदल गया, कानपुर, बेलगांव और कोकोनाडा गए।
1922 के गया कांग्रेस में करीब तीन सौ टाना भगतों ने भाग लिया। ये रांची से पैदल चलकर गया पहुंचे थे। 1940 में रामगढ़ कांग्रेस में इनकी संख्या तो पूछनी ही नहीं थी।
  पांच अक्टूबर, 1926 को रांची में राजेंद्र बाबू के नेतृत्व में आर्य समाज मंदिर में खादी की प्रदर्शनी लगी थी तो टाना भगतों ने इसमें भी भाग लिया। 1934 में महात्मा गांधी हरिजन-उत्थान-आंदोलन के सिलसिले में चार दिनों तक रांची में थे। इस समय भी टाना भगत उनके पास रहते थे। साइमन कमीशन के बॉयकाट में टाना भगत भी शामिल थे। टाना भगतों की जमीन तो अंगरेजी सरकार ने पहले ही नीलाम कर दी थी, फिर भी वे आजादी के आंदोलन से पीछे नहीं हटे, मार खाई, सड़कों पर घसीटे गए, जेल की यातनाएं सही, फिर भी गांधीजी की जय बोलते रहे, अंतिम दम तक। देश जब आजाद हुआ तो टाना भगतों ने अपनी तुलसी चैरा के पास तिरंगा लहराया, खुशियां मनाईं, भजन गाए। आज भी टाना भगतों के लिए 26 जनवरी, 15 अगस्त व दो अक्टूबर पर्व के समान है। हरवंश भगत ने 'पंद्रह अगस्त और टाना भगतÓ लेख में बताया है कि '15 अगस्त को टाना भगत पवित्र त्यौहार के रूप में मनाते हैं। इस दिन टाना भगत किसी प्रकार खेतीबाड़ी आदि का काम नहीं करते। प्रात: उठकर ग्राम की साफ-सफाई करते हैं। महिलाएं घर-आंगन की पूरी सफाई करती हैं। स्नानादि के बाद समूह रूप में वे राष्ट्रीय गीत गाकर राष्ट्र-ध्वज फहराते हैं। अभिवादन करते हैं। स्वतंत्र भारत की जय, महात्मा गांधी की जय, राजेंद्र बाबू की जय, जवाहर लाल नेहरू की जय तथा सभी टाना भगतों की जय का नारा लगाते हैं। गांव में जुलूस निकालते हैं। प्रसाद वितरण भी करते हैं। अपराह्न आम सभा होती है। सूत काता जाता है और आपस में प्रेम और संगठन को दृढ़ करने की चर्चा होती है।Ó पर, आजादी के ये अहिंसक सिपाही आज भी अपनी जमीन वापसी के लिए संघर्ष कर रहे हैं।