रविवार, 24 नवंबर 2013

14 साल में लिखा छउ नृत्य पर ग्रंथ


संजय कृष्ण :  बदरी प्रसाद हिंदी के प्राध्यापक रहे। रांची विवि से 2004 में अवकाश लिया, लेकिन काम 1991 से ही शुरू कर दिया था। छउ के प्रति रुचि के सवाल पर बदरी प्रसाद कहते हैं कि रांची विवि ने परीक्षा के दौरान 1990 में सुपरिटेंडेंट बनाकर सरायकेला भेज दिया था। परीक्षा वगैरह खत्म हो गई लोगों ने इस नृत्य के बारे में बताया। पहले तो कहा, क्या ये सब होता है? फिर चपरासी से पूछा तो उसने बताया और नृत्य गुरु केदारनाथ साहु से मिलवा भी दिया। कागज-कलम लेकर उनके पास गए। एक शरतचंद्र रथ थे, जो कोर्ट में डीड लिखने का काम करते थे। उनके साथ गया और कुछ जानकारी मिली। इसके बाद रांची आ गया। फिर 1991 में जाने का मौका मिला। इसके बाद तो आना-जाना लगा रहा और नृत्य के प्रति रुचि बढ़ती ही गई। रुचि ने भूख को बढ़ा दिया। अब तो उसके बारे में मन बना लिया जानने का। छउ नृत्य के कलाकार वैसे तो किसान या अन्य काम करते थे। कभी कटनी तो कभी गाय-भैंस चराते। बताने वाला परेशान हो जाता। एक बार एक कलाकार से मिला तो कहा, अभी तो गाय चराने जा रहा हूं। आने पर बात करेंगे? हमने कहा, हम भी चलते हैं। इस तरह ऐसे जमीनी कलाकारों के साथ जाता, नृत्य की बारीकियों को समझता। इसके बाद फिर तीन-चार लोगों से क्रास करता। पूरी तरह संतुष्ट हो जाने के बाद फिर शास्त्रों को खंगालता। फुटनोट से जानकारी लेता। भरत नाट्यम, ओडिसी आदि नृत्य को भी समझता और तुलनात्मक अध्ययन करता। भरत का नाट्य शास्त्र, नंदीकेश्वर का नृत्य देखा। भरत ने अपने ग्रंथ में 104 नृत्य कर्म की चर्चा की है। 
छउ मूक नृत्य है। इसमें कोई संवाद नहीं। पर भावनाएं झलकती हैं। प्रेम, विरह, करुणा सब कुछ। हर छोटी-बड़ी जानकारी गांव-गांव जाकर लिया। रात-रातभर जागकर नृत्य देखा। पद संचालन से लेकर हस्ताभिनय आदि को देखा-परखा-समझा। छउ की तीन शैलियां है। पुरुलिया, पं बंगाल, मयूरभंज ओडि़सा और सरायकेला झारखंड। सरायकेला ही इसका जन्म स्थान है। यहीं से यह फैला। पुरुलिया ने अपने प्रयोग किए। इसलिए तीनों अलग-अलग नाम से जाने गए। तीनों प्रदेशों की खाक छानी। पुरुलिया में चड़ीदा जगह है, वहां ही इसका केंद्र है। यहां 84 घर उन लोगों के हैं, जो नृत्य में उपयोग होने वाले मुखौटे बनाते हैं। इनकी पूरी आजीविका इसी से चलती है। इसी तरह सरायकेला में भी।
छउ आज भी लोकनृत्य ही है। इसे गांधी ने देखा। टैगोर ने देखा। इन सबकी दुर्लभ तस्वीर ग्रंथ में है। वे कहते हैं, लोक महासागर है, जो चीजें यहां हैं, जो रत्न यहां हैं, अन्यत्र नहीं मिलेंगे। वे इस बात को लेकर आश्वस्त हैं कि उनका परिश्रम सफल रहा। पर, इस बात से थोड़ा परेशान भी दिखे कि पुस्तक की पांडुलिपि 20 फरवरी, 2003 को ही अकादमी को भेज दिया था लेकिन छपत-छपते दस साल लग गए। कुछ महीने पहले यह छपकर आई है। इस बात का जरूर कोफ्त है कि डा. सिद्धनाथ कुमार जी व डा. दिनेश्वर प्रसाद जी इस कृति को नहीं देख सके। बहरहाल, वे इसका अंग्रेजी में भी खुद ही अनुवाद कर चुके हैं। पांडुलिपि तैयार हो गई है। उसे भी संगीत नाटक अकादमी को भेजने की तैयारी कर चुके हैं। वैसे, नागपुरी व छत्तीसगढ़ी भाषा के तुलनात्मक अध्ययन की पांडुलिपि भी तैयार है। 

चौदह साल के अथक परिश्रम, अनवरत शोध और सैकड़ों लोगों से बातचीत के बाद बदरी प्रसाद की दो खंडों में 'भारतीय छउ नृत्य : इतिहास, संस्कृति और कलाÓ का प्रकाशन संगीत नाटक अकादमी ने किया है। अब तक किसी लोक नृत्य पर यह अद्भुत काम है। लोक ही नहीं, संभवत: शास्त्रीय नृत्य पर ऐसा काम किसी का नहीं देखने को मिला है। सैकड़ों दुर्लभ चित्रों से सजी यह पुस्तक उनके जुनून और कुछ बेहतर करने का प्रतिफल है। खुद इसके लेखन में वे एक लाख रुपये अपना खर्च कर चुके हैं।