गुरुवार, 14 मार्च 2013

पातालपुरी में आदिम रात्रि की महक


संजय कृष्ण, कुंानगर से : 
बांध से बड़े हनुमान मंदिर तक ठेलमठेल है। जिधर नजर जाती है, उधर जनप्रवाह ही दिखाई देता। भीड़ में चलना मुश्किल हो रहा था। कांची काम कोटि शंकराचार्य पीठम मंदिर के सामने खड़ा हो जाता हूं। उत्तर में दक्षिण शैली के मंदिर की ओर निहारने लगता हूं। कुछ उडिय़ावासी दर्शन कर निकल रह थे। गंजाम, उड़ीसा से आए थे। कुल छह लोग। आर आर पंडा आर्मी से रिटायर्ड। लंबा सफर तय कर यहां पहुंचे हैं। महाकुंा की जानकारी के बाबत कहने लगे, 'पंजिका के माध्यम से इसकी जानकारी मिली।  पंजिका यानी पतरा। पतरा ने उन्हें कुंभ का पता बताया और चले आए इस पुण्यनगरी में। माघी पूर्णिमा का स्नान कर यहां से रवाना होंगे। पहली बार मेले में इस छोटी सी अनुशासित भीड़ को देखकर स्तब्ध हैं। कहते हैं, इसके बारे केवल सुना था। देखा तो जीवन धन्य-धन्य हो गया।Ó बातचीत कर किले की ओर रुख कर लेता हूं। बीच में रामजानकी मंदिर में दर्शनार्थियों का तांता लगा हुआ था। मंदिर का पट बंद होने की घोषणा हो रही थी। मन को समझाया, बाद में दर्शन कर लेंगे। अभी तो आदिम रात्रि की उस महक को महसूस करना है, जहां राम ने तीन रात्रि बिताई थी। अक्षय वट के दर्शन को लंबी कतारें लगी थीं। हम भी कतार में खड़े हो जाते हैं और धीरे-धीरे कदम दर कदम बढऩे लगता है। तन-मन रोमांचित है। कतार में खड़े श्रद्धालु जय-जय गंगे, हर-हर गंगे का उद्घोष कर रहे हैं। किले के उस मुहाने पर पहुंच जाता हूं। वहां से पंडित दान की महिमा बता रहे थे और भंडारे के लिए दान की अपील कर रहे थे। भक्त दान करते और पातालपुरी की ओर बढ़ चलते। पाताल में मंदिरों का समुच्चय। एक जगह वट का जड़ दिखा। लोग श्रद्धा से शीश झुकाते और फिर दूसरे रास्ते से ऊपर आ जाते। इसके बाद बाहर। अक्षय वट की महिमा तो सबने बखानी है। लेकिन मेरे ज्ञान में एक ठेले वाला वृद्धि करता है। मुख्य द्वार के दूसरी छोर पर वह चने भूंज रहा था। चने का स्वाद लेते हुए मैंने इस वट के बारे में उससे पूछने लगा। कहने लगा, 'इ ओरीजिनल बट थोड़े है। उ तो दूसरी ओर है। उसे नहीं दिखाते। उ बट को तो अंगरेज जाते-जाते उसकी जड़ में आग डालकर गए, लेकिन उसका कुछ नहीं बिगड़ा। उसकी रक्षा तो राम-लक्ष्मण सीता करते हैं।Ó
 खैर, दर्शन करने के बाद संगम की ओर बढ़ लेता हूं। स्नान की लंबी कतारें। पंडे संकल्प करा रहे हैं...हरिओ-हरिओम...अपने गोत्र का नाम लीजिए, अपना नाम....इसके बाद कुछ सुनाई नहीं देता। आधा मिनट में कर्मकांड पूरा। दान-दक्षिणा ले उन्हें तृप्ति का अहसास होता है और भक्त को पुण्य का। दान-पुण्य की इस नगरी में कोई आंध्रप्रदेश से आया तो कोई गुजरात से। पूरा देश ही संगम तट पर सिमट गया है। चाहे वह गरीब हो या अमीर। हर आदमी एक डुबकी लगाता। वापसी पर गुजरात के संत से भेंट हो जाती है। वे लंदन से संत गुणवंती देवी को लेकर यहां स्नान कराने आए थे। वे बीमार थी। पुलिस से गुजारिश की, वीआइपी गेट के पास स्नान करा दीजिए, पर पुलिस असहाय थी। वे चार पहिए से तीन दिनों में यहां पहुंचे थे। चौथे दिन वे संगम पहुंचे थे। काफी परेशान थे। लेकिन कोई चारा भी नहीं दिख रहा था। पुलिस उन्हें सरस्वती घाट का रास्ता बता देती है...। भीड़ को चीरते हुए वे आगे बढ़ लेते हैं और मैं भी अपना रास्ता पकड़ लेता हूं।