मंगलवार, 25 मार्च 2014

टैगोर हिल सुनाती है ज्योतिरींद्र की गाथा

संजय कृष्ण, रांची
टैगोर हिल के शिखर पर ब्रह्म मंदिर के खुले स्थान पर जैसे आज भी कोई ध्यान मुद्रा में बैठा है। सैकड़ों सीढिय़ां चढऩे के बाद इस एहसास से आप अलग नहीं हो सकते। सीढिय़ों के दाए-बाएं शिलाखंड, पेड़, पौधे, पत्तियां जैसे आज भी अपनी कहानी सुनाने को बेताब हों कि वह व्यक्ति कहां-कहां टहलता रहा। पेड़-पौधों और शिलाओं से कैसे बातचीत करता रहा? वह कुसुम का विशाल वृक्ष भी, जिसकी सौ साल से ऊपर उम्र हो गई है, उसकी चरणों में बैठक ज्योतिरींद्रनाथ टैगोर ध्यान लगाया करते थे। यहां आने पर कुछ भी अबूझ, अज्ञात और अव्यक्त नहीं है। कोई मौन नहीं, सब मुखर हैं।
 
वह आवास जहां ज्‍योतिरींद्र रहते थे
कण-कण बोलते हैं। हृदय को स्पंदित करते हैं। कभी-कभी यादों के झरोखें से झांकने पर बेचैन भी। कुसुम वृक्ष न जाने कितनी घटनाओं का साक्षी है। यहीं पर बैठकर ज्योति दा बाल गंगाधर तिलक की गीता रहस्य का अनुवाद करते थे। यहीं पर बैठकर नई-नई धुनें बनाते थे। यह धुन आज भी सुनाई देता है। रात के सन्नाटे में जब आप यहां से गुजरें तो लगेगा कि ज्योति दा की धुनों के साथ पेड़-पौधे, शिलाएं कोरस गा रही हैं।
सूरज की पहली किरण और फिर आखिरी किरण पड़ते ही इस पहाड़ी में चैतन्यता आ जाती है। सूरज का स्वागत भी करती है और संध्या विदा भी। अब आप सोच रहे हैं, क्यों निर्जीव की कथा सुना रहे हैं और यह ज्योतिरींद्रनाथ हैं कौन?  
ज्योतिरींद्रनाथ महर्षि देवेंद्रनाथ के पांचवें पुत्र थे और गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर से 12 साल बड़े थे। संगीतज्ञ, गायक, पेंटर, अनुवादक, नाटककार, कवि...कला के जितने रूप हो सकते हैं, उनमें वे सिद्धहस्त थे। रवींद्रनाथ पर इनका गजब का प्रभाव था। 1868 में कादंबरी देवी से इनका विवाह हुआ। पर, कादंबरी देवी ने 19 अप्रैल, 1884 को आत्महत्या कर ली। इससे ये बड़े दुखी हुए। इसके बाद इनका मन उचटने लगा। वे ठाकुरबाड़ी छोड़कर कुछ दिनों तक अपने अग्रज भारत के पहले आईएएस सत्येंद्रनाथ टैगोर के साथ रहने लगे।
 1905 में अपने पिता महर्षि देवेंद्र नाथ के निधन के बाद उन्होंने कुछ दिनों तक विरागी होकर विभिन्न स्थानों का भ्रमण किया। बड़े भाई सत्येंद्रनाथ टैगोर के साथ पहली बार वे 1905 में रांची आए। यहां की आबोहवा उनके मन के अनुकूल लगी। कुछ दिन रहने के बाद वे चले गए। फिर तीन साल बाद एक अक्टूबर, 1908 को रांची रहने के लिए ही आ गए। यहां पर मोरहाबादी स्थित पहाड़ी इन्हें पसंद आ गई। तब तक यह वीरान था। यहां पर 1842 से 48 तक कैप्टन एआर ओस्ली रहे। उन्होंने ही यहां पर एक रेस्ट हाउस बनवाया था। ओस्ली यहां 1839 में रांची आए। वे प्रतिदिन प्रात:काल काले घोड़े पर सवार होकर मोरहाबादी मैदान टहलने जाते थे। फिर रेस्ट हाउस में आकर विश्राम करते थे। उनके भाई ने किसी अज्ञात कारण से इस रेस्ट हाउस में आत्महत्या कर ली। इसके बाद ओस्ली का मन यहां से उचट गया और इसके बाद फिर वे कभी नहीं आए। इसके बाद यह वीरान हो गया।
प्रवेश द्वार
ज्योतिंद्रनाथ आए तो उन्होंने यहां के जमींदार हरिहरनाथ सिंह से मुलाकात की और 23 अक्टूबर 1908 को पंद्रह एकड़ अस्सी डिसमिल जमीन पहाड़ी के साथ बंदोबस्त कराई। यह जमीन उन्होंने अपने भाई सत्येंद्रनाथ ठाकुर के पुत्र सुरेंद्रनाथ ठाकुर यानी भतीजे के नाम से लिखा-पढ़ी कराई। इसका सालाना लगान 295 रुपये वार्षिक था। लेने के बाद टूटे-फूटे रेस्ट हाउस को दुरुस्त करवाया। पहाड़ पर चढऩे के लिए काफी धन खर्च कर सीढिय़ां बनवाई। मकान के प्रवेश द्वार पर एक तोरण द्वार बनवाया। द्वार के निकट विभिन्न प्रजातियों की चिडिय़ां, कुछ हिरण, कुछ मोर रखकर एक आश्रम का रूप दिया गया। वे ब्रह्म समाजी थे। इसलिए बुर्ज पर एक खुला मंडप बनवाया ध्यान-साधना के लिए। नाम रखा शांतालय। पहाड़ के नीचे सत्येंद्रनाथ एक मकान बनवाए थे, जिसका नाम रखा था 'सत्यधामÓ। कहा जाता है कि रांची में हाथ रिक्शा का प्रचलन इन्हीं के कारण हुआ। हाथ रिक्शे से ही वे रांची घूमते थे। कभी-कभी वे अपनी पॉकिट घड़ी का समय मिलाने के लिए रांची डाकघर तक आते थे, जो उन दिनों सदर अस्पताल के पास था। आर. अली साहब की दुकान से केक, बिस्कुट आदि खरीदते थे। हजारीबाग रोड के किनारे कुमुद बंधु चक्रवर्ती के अन्नपूर्णा भंडार से अपनी जरूरत की चीजें लेते थे। कुमुद बाबू उनके बायोकेमिक चिकित्सक थे। और, विष्णुपुर घराने के सुविख्यात सितार वादक नगेंद्रनाथ बोस से वे सितारवादन सीखते थे। जब अवनींद्रनाथ ठाकुर सपरिवार रांची आते थे तब उनकेच्बच्चों के लिए ढेर सारी चीजें खरीदकर खिलाया करते थे। ऐसे अवसरों पर उनके आवास में हंसी-खुशी का माहौल छा जाता।
कुसुम ताल
ज्योतिरींद्र नाथ की डायरी से पता चलता है कि उन दिनों रांची के गणमान्य लोग उनके भवन में प्राय: आते थे तथा साहित्य, संगीत, उपासना आदि कार्यक्रमों में शामिल होते थे। और, वे खुद भी दूसरों के यहां जाया करते थे। थड़पकना हाउस के उद्धव रॉय, नवकृष्ण राय, भूपालचंद्र बसु, त्रिपुराचरण राय उनमें प्रमुख हैं।
मंजरी चक्रवर्ती ने लिखा है कि 'स्वतंत्रता संग्राम के अन्यतम योग्य नेता विपिनचंद्र पाल के मध्यम पुत्र मेरे पिता ज्ञानांजन पाल, मेरी छोटी फूफी वीणा चौधुरी, जब पुरुलिया के देशबंधु सी आर दास के घर आए थे, तब वे ज्योतिरींद्रनाथ से मिलने रांची भी आए। तब पहाड़ों पर घूमते समय ज्योति दा ने मेरी फूफी और सास के चित्र भी बनाए थे।Ó
एक बात यहां उल्लेखनीय है कि रवींद्रनाथ टैगोर यहां भले न आए लेकिन उनके परिवार का नाता इस धरती से बहुत पुराना है। रवींद्रनाथ टैगोर के दादा द्वारिका नाथ टैगोर ने पलामू के राजहरा में एक अंग्रेज व्यापारी से मिलकर कोलियरी चलाई थी। फर्म का नाम था मेसर्स कार्र-टैगोर एंड कंपनी। 1834 में इस फर्म के जरिए कोयले का व्यापार शुरू किया गया। विलियम कार्र एवं विलियम प्रिंसेप का इंग्लैंड के साथ सिल्क व नील का व्यापार था। इन्होंने ही कोयले का व्यापार भी शुरू किया। 1936 में रानीगंज कोलियरी खरीदा गया। इसे मूलत: विलियम जान्स ने खोला था। इस कोलियरी को खरीदने के बाद कार्र-टैगोर फर्म ने अपनी कंपनी का विस्तार किया। इसके साथ डीन कैंपवेल एवं डा. मैकफर्सन इसके अतिरिक्त पार्टनर बन गए। कलकत्ता (अब कोलकाता) कार्यालय का काम डोनाल्ड मैकलियोड गार्डन देखते थे और कोलियरी का काम सीबी टेलर। खैर, आगे चलकर द्वारिका नाथ इस व्यवसाय से अलग हो गए। धु्रब मित्र बताते हैं कि 1920 के आस-पास गुरुदेव के भाई अवनींद्रनाथ ठाकुर कोकर में दो बेहद खूबसूरत मकान बनवाए थे, जिसका नाम रखा था सन्नी नूक। भवन विभिन्न प्रकार के फूलों, वृक्षों, पौधों से पटा था। इसी भवन पर बाद में रामलखन सिंह कालेज बना। दूसरा भवन भी सड़क के ठीक विपरीत में था, जिसे कुछ लोगों ने प्लाटिंग करके बेच दिया। इनके साथ ही सत्येंद्रनाथ की सुपुत्री इंदिरा देवी एवं उनके पति प्रख्यात साहित्यकार प्रमथ चौधुरी ने भी एक मकान रांची में खरीदा था और वे लोग अक्सर यहां रहा करते थे। आज जहां रामकृष्ण मिशन का पुस्तकालय है, वहीं पर उनका मकान हुआ करता था। यही नहीं, गुरुदेव की एक भतीजी सुप्रभा एवं उनके पति सुकुमार हालदार सामलौंग, रांची में ही रहते थे। ये सभी गुरुदेव को रांची आने को कहते। ज्योति दा की डायरी से पता चलता है कि उनका कार्यक्रम भी बना, लेकिन वे यहां नहीं आ सके। हालांकि गुरुदेव ने एक पारिवारिक तनाव से दूर रहने को लेकर पत्र में लिखा था कि कलकत्ता की अपेक्षा रांची में रहना बेहतर होगा। खैर, गुरुदेव नहीं आ सके। ज्योति दा ने यहीं पर अपनी अंतिम सांसें ली। चार मार्च 1925 को सदा-सदा के लिए चले गए। उनकी यादों को सहेजने का प्रयास किया जा रहा है।