शुक्रवार, 4 जुलाई 2014

कायस्थों ने उठाई थी बिहार की मांग

बिहार ने पिछले साल अपने गठन का शतवार्षिकी मनाया, लेकिन हम उन सपूतों को याद करने से भी परहेज कर रहे हैं, जिन्होंने बिहार को अलग करने की मांग पहले पहल उठाई थी। बंगभंग आंदोलन की इसमें बड़ी भूमिका है। 1905 के बाद ही अलग बिहार की मांग जोर पकडऩे लगी थी। इसे जानने के लिए थोड़ा अतीत में जाना हैं। बंगभंग विरोधी आंदोलन से बिहार तथा बंगाल में क्रांतिकारी आंदोलन प्रारम्भ हो गया। बिहार के डा. ज्ञानेन्द्र नाथ, केदारनाथ बनर्जी एवं बाबा ठाकुर दास प्रमुख थे। बाबा ठाकुर दास ने 1906-07 . में पटना में रामकृष्ण मिशन सोसायटी की स्थापना की और समाचार-पत्र द्वारा दी मदरलैंड का संपादन एवं प्रकाशन शुरू किया ।
बिहार प्रादेशिक सम्मेलन की स्थापना 12-13 अप्रैल, 1906 में पटना में हुई जिसकी अध्यक्षता अली इमाम ने की थी, इसमें बिहार को अलग प्रांत की मांग के प्रस्ताव को पारित किया गया। अली इमाम का संबंध रांची है। रांची में हजारीबाग मार्ग पर जिमखाना क्लब के सामने उनकी मजार है। मजार से सटी उनकी कोठी थी, जिसे इमाम कोठी कहा जाता था। सरकार ने इस कोठी को संरक्षित करने का प्रयास नहीं किया। सो, उनके वंशजों ने इसे बेच दिया। हालांकि मजार के साथ आज भी काफी जमीन है, जिसे कला संग्रहालय बनाने की मांग उठती रही है। खैर, इसकी चर्चा फिर कभी। इतिहास के पन्नों को पलटते हैं तो पाते हैं कि 1908 . में ही नवाब सरफराज हुसैन खां की अध्यक्षता में बिहार कांग्रेस कमेटी का गठन हुआ। इसमें स'िचदानन्द सिंह, मजरूलहक हसन, इमाम, दीपनारायण सिंह आदि शामिल थे। कांग्रेस कमेटी के गठन के बाद इसका अध्यक्ष इमाम हुसैन को बनाया गया ।
1909 . में बिहार कांग्रेस सम्मेलन का दूसरा अधिवेशन भागलपुर में हुआ। इसमें भी बिहार को अलग राज्य की मांग जोरदार ढंग से की गई। यानी कांग्रेस ने भी इस मांग पर अपनी मुहर लगाई। 1910 . में मार्लेमिंटो सुधार के अंतर्गत प्रथम चुनाव आयोजन में स'िचदानन्द सिंह ने चार महाराजाओं को हराकर बंगाल विधान परिषद् की ओर से केंद्रीय विधान परिषद में विधि सदस्य के रूप में नियुक्त हुए । 1911 . में दिल्ली दरबार में जार्ज पंचम के आगमन में केन्द्रीय परिषद् के अधिवेशन के दौरान स'िचदानन्द सिंह, अली इमाम एवं मोहम्मद अली ने पृथक बिहार की मांग की। फलत: इन बिहारी महान सपूतों द्वारा 12 दिसम्बर, 1911 को दिल्ली के शाही दरबार में बिहार और उड़ीसा को मिलाकर एक नया प्रांत बनाने की घोषणा हुई। इस घोषणा के अनुसार एक अप्रैल, 1912 को बिहार की नए प्रान्त के रूप में विधिवत स्थापना की गई। बिहार के स्वतन्त्र अस्तित्व का मुहर लगने के तत्काल बाद पटना में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का 27वां वार्षिक सम्मेलन हुआ।
मुगलकालीन समय में बिहार एक अलग सूबा था। मुगल सत्ता समाप्ति के समय बंगाल के नवाबों के अधीन बिहार चला गया। फलत: बिहार की अलग राज्य की मांग सर्वप्रथम मुस्लिम और कायस्थों ने की थी। जब लार्ड कर्जन ने बंगाल को 1905 . में पूर्वी भाग एवं पश्चिमी भाग में बांध दिया था तब बिहार के लोगों ने इस प्रस्ताव का विरोध किया एवं स'िचदानन्द सिंह एवं महेश नारायण ने अखबारों में वैकल्पिक विभाजन की रूपरेखा देते हुए लेख लिखे थे जो पार्टीशन ऑफ बंगाल और लेपरेशन ऑफ बिहार 1906 . में प्रकाशित हुए थे।
इस समय कलकत्ता में राजेन्द्र प्रसाद अध्ययनरत थे वे वहां वे बिहारी क्लब के मंत्री थे। डा. 'िचदानन्द सिंह, अनुग्रह नारायण सिंह, महेश नारायण तथा अन्य छात्र नेताओं से विचार-विमर्श के बाद पटना में एक विशाल बिहार छात्र सम्मेलन करवाया। यह सम्मेलन दशहरा की छुट्टी में पहला बिहारी छात्र सम्मेलन पटना कॉलेज के प्रांगण में पटना के प्रमुख शर्फुद्दीन के सभापतित्व में संपन्न हुआ था। इससे बिहार पृथक्करण आंदोलन को विशेष बल मिला। बिहार के साथ उड़ीसा भी था। 19&5 में बिहार से उड़ीसा अलग हुआ और इसके 65 साल बाद झारखंड। बिहार के निर्माण में बिहार टाइम्स की भी प्रमुख भूमिका रही है। 1906 . में बिहार टाइम्स का नाम बदलकर बिहारी कर दिया गया। 1907 . में महेश नारायण का निधन हो गया। स'िचदानन्द ने ब्रह्मदेव नारायण के सहयोग से पत्रिका का सम्पादन जारी रखा। पत्रिका का प्रकाशन 1894 में शुरू हुआ था। इसका उद्देश्य भी बिहार को एक अलग राज्य के रूप में स्थापित करना था।