शुक्रवार, 12 सितंबर 2014

मूक बराकर को जैसे भाषा मिल गई

सुकांत भट्टïाचार्य का पत्र

12 अनंतपुर, हिनू, रांची
अरुण। आंधी, तूफान और अविश्वास को अनदेखा करते हुए अंतत: सचमुच रांची आ गया। आने के क्रम में उल्लेखनीय कुछ नहीं देखा। सिर्फ पूर्णिमा के अस्पष्ट प्रकाश में गहरे बराकर नदी को देखा। रात गहरी थी, लग रहा था कि रात्रि जा रही है। उसी अंधेरी रात में मूक बराकर नदी में गंभीरता प्रतिबिंबित हो रही थी। लग रहा था कि सबको भाषा मिल गई है। बराकर का पानी और दूर के पहाड़ मेरे सामने एक सपना रच रहे थे। बराकर नदी के एक ओर बंगाल है और दूसरी ओर बिहार। इसी के बीच में झरझर बहती बराकर नदी। क्या अद्भुत एवं गंभीर दृश्य। दूसरी कोई नदी, शायद गंगा भी मेरी नजरों में इतनी मोहनी नहीं है।
और अच्छा लगा रहा था गोमो स्टेशन। वहां ट्रेन बदलने के लिए आखिरी रात इंतजार करना पड़ा। पूर्णिमा की पूर्णिता को उपलब्ध किया। उस स्टेशन की शांति मेरे जीवन में हमेशा चिरस्थायी रहेगी। इसके बाद अपरिचित सुबह हुई। अब छोटे-छोटे पहाड़, छोटी-छोटी सूखी नदियां, लाल पंगडंडी अगल-बगल में अनजान भागते पेड़, देखते- देखते ट्रेन का रास्ता खत्म हो गया।
रांची रोड से बस से आगे बढऩा शुरू किया। बस की क्या भयंकर आवाज थी। बहुत तेजी से पहाड़ी सड़क से गुजर रहा था। हजारों फीट की ऊंचाई में बस चल रही थी। यह देखकर हम बहुत आवेश में आ गए। जिंदगी में बहुत से प्राकृतिक दृश्य देखें लेकिन ऐसा अभिभूत करने वाला नहीं। रांची आ गया। हमलोग जहां रहते हैं, वह रांची नहीं है। वह रांची से दूर, डोरंडा में रहते हैं। हम लोगों के घर के सामने से स्वर्णरेखा नदी बहती है। उसी के बगल के एक क्रबिस्तान है। इसको देख कर हम खो जाते हैं। उस क्रबिस्तान में बहुत बड़ा वटवृक्ष है जो सिर्फ मेरा ही नहीं, सबका प्रिय है। उस वटवृक्ष के ऊपर एवं नीचे मेरी कई दोपहर बीती है। पिछला शुक्रवार से सोमवार दोपहर तक प्रति पल मेरा बहुत आनंद में बीता। रविवार को 18 मील दूर जोन्हा जल प्रपात देखने गए। ट्रेन चलने के साथ ही भयंकर बारिश शुरू हो गई। इस तरह की बारिश का आनंद पहली बार लिया। दोनों पहाड़ और वन धुंधला नजर आने लगे। यह रोमांच पैदा कर रहा था। लेकिन आनंद अभी बाकी था, जो जोन्हा पहाड़ के अंदर इंतजार कर रहा था। पानी में भींगते हुए काफी दूर पैदल चलने के बाद पहाड़ के नीचे एक बौद्ध मंदिर के सामने खड़े हुए। मंदिर के रक्षक ने आकर दरवाजा खोल दिया। शांत मंदिर में प्रवेश किए। मंदिर में लोहे के दरवाजा एवं खिड़कियां थीं, उसको हमलोंगों ने घूमघूम देखा। मंदिर का घंटा बजाया। यह ध्वनि पहाड़ तक ही सीमित रही। बाहरी दुनिया में नहीं पहुंची। संध्या हो रही थी। इस भयंकर जंगल में बाघ का डर भय पैदा कर रहा था। इसलिए हमलोग मंदिर में ही आश्रय लिए। इसके बाद हमलोग निकटवर्ती जलप्रपात देखने गए। हम लोगों ने जो देखा, उसने स्नायु तंत्र को अभिभूत किया। अब तक का अभ्यस्त परंपरागत वृष्टि का प्रलय था। यह सब देख कविता लिखे बगैर नहीं रह सका। यह कविता मेरे पास है। लौटकर दिखाएंगे। जोन्हा में आकर हम जो कुछ देखे वह छोटानागरपुर आकर सार्थक हो गया। यद्यपि हुंडरू बहुत ही विख्यात जलप्रपात है, लेकिन उसके उपभोग का सौभाग्य नहीं मिल सका। यह हम जोर से बोल सकते हैं। जो आदमी जोन्हा देखा है, वह मेरी बात का विश्वास नहीं करेगा। जोन्हा जितना सुंदर उपभोग्य नहीं है। ऐसी बात नहीं है। अगर एक दिन पहले भी पहुंचते तो भी इस तरह के रोमांचित दृश्य से वंचित रहते। प्रपात देखने के बाद संध्या हमलोगों ने बुद्ध देव की वंदना की। गपशप किया। रात्रि भोजन किया। इसके बाद स्तब्ध गहन अरण्य में पानी के धुन को सुनते-सुनते सो गए। जोन्हा पूरी रात तीव्र वेग से गहरी जलधारा पहाड़ पर पटकता रहा। अपनी सांस को सुन रहे थे।
प्रहरी जैसा जगा रहा ध्यानमग्न पहाड़। दूसरे दिन हमलोगों ने रहस्यमय जोन्हा को देखा। उसके उच्छल रूप के प्रति हमलोग गहरा प्यार जताए। उसके बाद अनिच्छा के साथ वापस लौटे। आने के समय जो वेदना हुई, वह और भी बढ़ गई जब हम लोगों ने आधे लोगों को विदाई दी।
जोन्हा से लौटते हुए मन में प्रार्थना कर रहे थे कि यह यात्रा अनंत हो, लेकिन रास्ता खत्म हुआ, हमलोग जोन्हा और आश्रयदाता बुद्ध मंदिर को छोड़कर वापस आ गए।
जिंदगी में बहुत कम चीज आती है, लेकिन लगभग सबकुछ चला जाता है। जोन्हा ही इसका बड़ा प्रमाण है।
रांची आने बाद आधा लोग विदा हुए तो आनंद जाता रहा। लेकिन इसी के बीच दो दिन रांची पहाड़ी गए और उल्लसित हुए। इस पहाड़ी के ऊपर से रांची शहर बहुत सुंदर नजर आता है, लगता है कि लिलिपुट साम्राज्य का गठन कर रहा है। शहर के बीचोबीच एक लेक है, सृजन के साथ उसका दृश्य भी लगातार बदलते रहता है। यही लेकर शहर के सौंदर्य को बढ़ाता है। रांची पहाड़ के ऊपर एक छोटा सा शिव मंदिर है। उस मंदिर में खड़ा होकर लगता है कि रांची चारों ओर पहाड़ से घिरा है। पहाड़ पर एक गुफा है, जिसका आनंद लिया जा सकता है। रांची की अखंड सत्ता सिर्फ रांची पहाड़ से ही नजर आती है।
डोरंडा में डोरंडा बांध एक चीज है, जिसमें एक दिन हम नहाएं। एक शाम उसका हृदय से अनुभव किया। इसको एक तालाब कह सकते हैं। इसको सब लेक बोलता है फिर भी जलाशय के रूप में मुझे बहुत अच्छा लगा। इसके सिवा डोरंडा का रास्ता, मैदान और जंगल बहुत अच्छे लगे। एक तरह से यहां का सबकुछ अच्छा है। सिर्फ एक चीज खराब है। यहां का पड़ोसी, बाजार की दूरी और सैनिकों का आधिपत्य। अभी भी बारिश हो रही है। लेकिन यही हल्का पानी असाध्य को साधा है। दुबली पतली स्वर्ण रेखा नदी को युवती बना दिया। इसके जलस्रोत और लहर से रोमांचित हो रहे थे। क्योंकि कल तक स्वर्णरेखा के बीचोबीच खड़ा होने से भी पैर नहीं भींगता थे।
फिर भी रांची का बहुत कुछ नहीं देखे हैं। पर जो कुछ देखा है, उससे परितृप्त हो गए-यानी कि रांची मुझे अच्छा लगा। फिर भी रांची का वैचित्र्य कम होता जा रहा है। आजकल सभी का चेहरा एक ही नजर आ रहा है। अत: विदाय
सुकांत भट्टाचार्य
पुनश्च
मुझे लौटने में देर होगी। उतने दिन कृपा करके भाई की देखभाल करना। क्योंकि यहां का प्राकृतिक आकर्षण से अधिक पारिवारिक आकर्षण है। कब लौटेंगे, यह निश्चय नहीं है। बन्ना का काम कितना दूर। पत्र का उत्तर देना। 
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