बुधवार, 3 सितंबर 2014

हम तो कवि हैं, इतिहास बदलने वाले हैं

हिंदी में गोपाल सिंह नेपाली अकेले ऐसे कवि हैं, जिन्हें कई विशेषणों से नवाजा गया है। प्रकृति से लेकर राष्ट्रीय चेतना को झकझोरने वाली उनकी कविताओं का रेंज इतना व्यापक है कि उन्हें किसी एक खांचे में डालना थोड़ा मुश्किल लगता है। लोगों ने अपने-अपने सौंदर्यबोध, राष्ट्रबोध, प्रकृति प्रेम के कारण कई संबोधनों से संबोधित किया। उन्हें 'प्रकृति का कविÓ कहा गया, 'राग और आग का कविÓ कहा गया, 'गीतों का राजकुमारÓ कहा गया तो 'राष्ट्रवादी कविÓ से भी संबोधित किया गया। पर, उनकी कविताओं की विविधवर्णी छवियों को देखकर ये सारे संबोधन, उपाधियां, विशेषण उनकी विद्युत प्रतिभा की चमक के आगे बौने ही सिद्ध होते हैं। बेशक, देश की सरहद के आर-पार देखने वाले नेपाली का मूल्यांकन अभी बाकी है। इसका एक कारण यह भी है किआलोचक अभी अपने कुनबे से बाहर देख पाने पर असमर्थ हैं। वे ठोंक-बजाकर अपने चहेते कवि को महान और कालजयी कवि सिद्ध करने के 'सारस्वतÓ कर्म में संलग्न हैं। फिर, नेपाली का अपना कोई कुनबा भी नहीं था। वैचारिक खूंटा भी नहीं कि आलोचक उन्हें याद करें?

पिछले पचास साल की उपेक्षा के बाद भी नेपाली यदि लोगों के जनमानस में अपनी जगह बनाए हुए हैं तो आलोचकों की बदौलत नहीं, अपनी कविता, भाव बोध और राष्ट्रीय चेतना की बदौलत। हालावाद के सर्जक हरिवंश राय बच्चन ने उनकी मृत्यु पर लिखा था, 'हिंदी कविता को जनमानस तक पहुंचाने में उनका योगदान अद्वितीय है।Ó अभी हाल में दिवंगत हुए जानकी वल्लभ शास्त्री ने लिखा है- 'मिल्टन, कीट्स और शेली जैसे त्रय कवियों की प्रतिभा नेपाली में त्रिवेणी संगम की तरह उपस्थित है।Ó प्रकृति के सुकुमार कवि पंत ने नेपाली की कविताओं का पर कहा था- 'आपकी सरस्वती, स्नेह, सहृदयता और सौंदर्य की सजीव प्रतिमा है।Ó निराला ने तो उन्हें 'काव्याकाश का दैदीप्यमानÓ सितारा ही कह डाला। ये बातें आज की लिखी हुई नहीं हैं। बहुत पहले की हैं। फिर भी हमने नेपाली को उपेक्षित छोड़ दिया।

गोपाल सिंह नेपाली का जन्म एक गोरखा परिवार में जन्माष्टमी (11 अगस्त, 1911 )के दिन हुआ था। उनका मूल नाम गोपाल बहादुर सिंह था। पिता सेना में थे। सो, कभी यहां कभी वहां। परिवार का कोई स्थायी ठिकाना नहीं बन पाया। नेपाली लिखते हैं, 'मां और कहीं, पिता जी जर्मनी की लड़ाई में, और मेरा छोटा भाई पेशावर में। छुटपन के इसी विरह ने कविता की तुकबंदी सिखाई होगी।Ó इस अस्थिरता और भागमभाग ने उनकी पढ़ाई भी बाधित की। पर, उनकी प्रतिभा बाधित नहीं हो पाई। सोलह की उम्र से ही तुकबंदी ने कविता का शक्ल लेना शुरू कर दिया और 22 की उम्र में उनका पहला संग्रह 'उमंगÓ आ गया था। संग्रह आने से पहले ही वे मंच के मजे हुए कवि सिद्ध हो चुके थे। बनारस, इलाहाबाद, कलकत्ता के तीन बड़े कवि सम्मेलनों ने न केवल उनके आत्मविश्वास को बढ़ाया, बल्कि वे देश के चुनिंदा कवियों में शुमार भी होने लगे। मंच ने ही उन्हें मायानगरी पहुंचाया। 1943-44 में बंबई में हुए महाकवि कालिदास शताब्दी समारोह से वे फिल्मी दुनिया में प्रवेश किए। उनकी पहली फिल्म थी मजदूर थी। इसके निर्माता थे एस मुखर्जी, निर्देशक थे पीएल संतोषी, कथा लेखक थे प्रेमचंद और संवाद लिखे थे उपेंद्र नाथ अश्क ने। इसके बाद तो सफर, लीला, गजरें, शिवरात्रि, शिवभक्त, तुलसीदास, नाग पंचमी, नरसी भगत आदि 40-45 फिल्मों में करीब तीन सौ गीत लिखे। उसी दौरान इन्होंने 'हिमालय फिल्म्सÓ और 'नेपाली पिक्चर्सÓ की स्थापना की। निर्माता-निर्देशक के तौर पर तीन फीचर फिल्में-नजराना, सनसनी और खुशबू भी बनाई। इतना कुछ होने के बाद भी यह दुनिया उन्हें रास नहीं आई। एक पत्र में उन्होंने लिखा है, 'यह सिनेमा वल्र्ड साहित्य, कला या दर्शन की जगह नहीं, बिजनेस का अखाड़ा है। यहां रुपया और रमणियां हैं।Ó करीब एक दशक तक सक्रिय रहने के बाद 1955-56 में फिल्मी दुनिया को अलविदा कह दिया और मंच पर एक बार फिर अपनी सत्ता कायम कर ली। इसके बाद तो उनके 'पंछीÓ 'रागिनीÓ 'पंचमीÓ 'नवीनÓ और 'हिमालय ने पुकाराÓ इनके काव्य और गीत संग्रह आए। 'पंछीÓ संग्रह पर निराला ने अपनी टिप्पणी लिखी है, 'मुझे उनके काव्य में शक्ति, प्रवाह, सौंदर्य-बोध तथा चारू चित्रण एक विशेषता लिए हुए दिख पड़े।Ó

उमंग संकलन में ही मोहन शीर्षक कविता संकलित है। यह 1931 में तब लिखी गई थी, जब गांधी दिसंबर महीने में गोलमेज सम्मेलन में भाग ले रहे थे। बीस की उम्र में नेपाली ने लिखा, पर इससे क्या होता जाता/है हम दुखियों का मोहन/ यहां हमारे घर में जारी/ वैसा ही निष्ठुर दोहन/...आओ मोहन शंख बजाओ/ पहनो केशरिया बाना।

 नेपाली का अहिंसा में कतई विश्वास नहीं था। इसलिए गांधी को भी केशरिया बाना पहनने का आह्वान किया। यह विश्वास आजादी के बाद भी खंडित नहीं हुआ। 1956 में ही शासन चलता तलवार से कविता लिखकर एक बार फिर देश की चेतना को झकझोर दिया। पाकिस्तान के दुस्साहस और नेहरू द्वारा महज कागजी कार्रवाई के बाद कवि आहत मन से लिखा,
 ओ राही दिल्ली जाना तो कहना अपनी सरकार से
 चरखा चलता है हाथों से शासन चलता तलवार से।  
सन् 1962 के चीनी आक्रमण के समय उन्होने कई देशभक्तिपूर्ण गीत एवं कविताएं लिखीं जिनमें सावन, कल्पना, नीलिमा, नवीन कल्पना करो आदि बहुत प्रसिद्ध हैं। चीनी आक्रमण पर नागार्जुन ने भी कविताएं लिखीं और चीन, नेहरू और वामपंथ की खबर ली।
नेपाली का आह््वान था-
भारत के जवानो, भारत के जवानो
भारत से तुम्हें प्यार तो बंदूक उठा लो
इन चीनी लुटेरों को हिमालय से निकालो। 

......
नेपाली अपने कलम को तलवार की तरह इस्तेमाल करते थे। कविता पर गौर करें-
'बहन तू बन जा क्रांतिकराली, मैं भाई विकराल बनूं
तू बन जा हहराती गंगा, मैं झेलम बेहाल बनूं।

ये पंक्तियां अब मुहावरा बन चुकी हैं। उन्होंने अपनी कलम की सदैव रक्षा की। उनके लिए कलम की स्वाधीनता ही असली धन था। मेरा धन स्वाधीन कलम। अपनी इस विशिष्टता के कारण ही वे भीड़ों में खोए नहीं। वे सदैव नवीन कल्पना करते रहे। आम आदमी के दुख-दर्द को शब्द देते रहे-दिन गए बरस गए, यातना गई नहीं, रोटियां गरीब की, प्रार्थना बनी रहीं। जाति के झंझावतों में फंसी हिंदू समाज की चेतना को भी झकझोरा-बिछड़े परिजन मिले बढ़ाते हाथ प्रेम का मिलने को/पर, जाता सम्मान हमारा उन हरिजन को छूने में। नागार्जुन की हरिजन कविता को याद करें। तब साहित्य में दलितवाद उपस्थित नहीं हुआ था। लेकिन नेपाली और नागार्जुन हिंदू समाज की जड़ता पर प्रहार कर रहे थे।

इन विशिष्टताओं के साथ-साथ उनके प्रकृति के प्रति एक अनुराग था। शायद चंपारण और देहरादून में बीते बचपन के कारण प्रकृति से उनका एक गहरा लगाव पैदा हो गया था। यही वजह है कि उनकी रचनाओं में मौलसिरी, पंछी, हरीघास, पीपल, किरण, सरिता, बेर आदि का अत्यंत सजीव चित्रण मिलता है।
नेपाली ने पत्रकारिता भी की। निराला के साथ 'सुधाÓ मासिक पत्र में काम भी किया। इसके बाद 'रतलाम टाइम्सÓ, 'पुण्य भूमिÓ तथा 'योगीÓ के संपादकीय विभाग में काम किया। उत्तर छायावाद के महत्वपूर्ण कवियों में शुमार नेपाली ने लोकतत्वों से संस्कार लेकर हिंदी गीतों को समृद्ध किया। एक नई भाषा दी। उसका विस्तार किया। एक नई पहचान बनाई। 'हम धरती क्या आकाश बदलने वाले हैं, हम तो कवि हैं, इतिहास बदलने वाले हैं।