गुरुवार, 27 मार्च 2014

साझी विरासत का पर्व है होली

होली साझी विरासत का पर्व है। जब दो संस्कृतियों का मिलन हुआ तो संस्कृति के साथ-साथ पर्व-त्योहार भी एक दूसरे के हो लिए। होली की बात करें तो यह भले हिंदुओं का पर्व है, लेकिन इसने अपनी सीमाएं तोड़ी हैं। यह मुसीबतों में भी मस्ती का एहसास कराता है। इस पर्व पर शायरों ने भी अपनी खूब कलम तोड़ी है। यह हमारी अनमोल साझी विरासत और इंसानी रिश्तों को एक सूत्र में बांधता है। फ़ाइ$ज देहलवी ने फरमाया है, आज है रोज़े-वसंत अय दोस्तां, सर्व $कद हैं, बोस्तां के दरमियां...अज अबीर-ओ-रंगे-केशर और गुलाल, अब्र छाया है सफेद-ओ-जर्द-ओ-लाल।
मीर तकी मीर की तो पूछिए ही मत। फरमाते हैं-होली खेला आसिफुद्दौला वजीर, रंगे-सुहबत से अजब है खुर्द और पीर। एक और नज्म देखिए-जश्ने नौरोजे हिंद होली है, राग-ओ-रंग और बोली-ठोली है। जश्ने नौरोजे यानी नए साल का समारोह। होली के साथ ही नया साल भी प्रारंभ हो जाता है।
नज़ीर अकबराबादी के फन से तो वाकिफ ही होंगे-जब फागुन रंग झमकते हों, तब देख बहारें होली की। और दफ के शोर खड़कते हों, तब देख बहारें होली की। परियों के रंग दमकते हों तब देख बहारें होली की...लड़-भिड़ के नजीर फिर निकला, कीचड़ में लत्थड़-पत्थड़ हो, जब ऐसे ऐश झमकते हों, तब देख बहारें होली की।
शाह 'हातिमÓ लिखते हैं, मुहैया सब है अब अस्बाबे होली, उठो यारों भरो रंगों से झोली...कोई है सांवरी कोई है गोरी, कोई चंपा बरन उम्रों में थोड़ी। सआदत यार खां 'रंगींÓ पिचकारी में रंग भरने की बात कहते हैं, भर के पिचकारियों में रंगीं रंग, नाजनीं को खिलाई होली सं...और...यह हंसी तेरी भाड़ में जाए, तुझको होली न दूसरी आये। इस तरह बहुत से उर्दू शायरों ने होली पर नज्म कही है।