रविवार, 11 जनवरी 2015

गाजीपुर में विवेकानंद


 संजय कृष्ण -   योद्धा संन्यासी स्वामी विवेकानंद पूर्वी उत्तरप्रदेश के गाजीपुर में चार महीने तक प्रवास किया। गाजीपुर में उनके बचपन के एक मित्रा रहते थे सतीश चंद्र मुखर्जी। वे गाजीपुर के गोराबाजार में रहते थे। विवेकानंद यहीं ठहरे थे। एक दूसरे मित्रा, रायबहादुर गगनचंद्र, जो अफीम कंपनी में अधिकारी थे, के द्वारा ही उन्हें यहां के संत पवहारी बाबा के बारे में जानकारी मिली थी। उनसे मिलने ही वे आए थे। उन दिनों विवेकानंद इधर ही भ्रमण कर रहे थे। प्रयाग, बनारस होते हुए गाजीपुर पहुंचे थे। बनारस में मलेरिया ने पकड़ा। कमर दर्द से वे पहले से ही परेशान थे। गाजीपुर आए तो लंबी प्रतीक्षा के बाद उन्हें पवहारी बाबा के दर्शन हुए, बीच-बीच में उनसे वार्तालाप भी हुई और शंका का समाधान भी। आए तो थे दो चार दिन के लिए ही लेकिन यहां की स्वास्थ्यप्रद जलवायु और पवहारी बाबा के आग्रह ने उन्हें रोक लिया। पवहारी बाबा से मिलने के लंबे समय बाद उन्होंने एक छोटी सी पुस्तिक ‘पवहारी बाबा’ लिखी। तब तक पवहारी बाबा दुनिया से विदा ले चुके थे क्योंकि पुस्तक में उनके समाधिस्थ होने का भी समाचार है। विवेकानंद 27 की उम्र में उनसे मिले और वे 13 साल और जीवित रहे। 40 की अवस्था में 1903 में विवेकानंद भी देश-दुनिया में अपने गुरु का विचार पहंुचा और मठों की स्थापना कर इस लोक से विदा हुए। विवेकानंद ने यह पुस्तिक 1903 से पहले ही लिखी होगी। तब तक पवहारी बाबा भी संसार छोड़ चुके थे। स्पष्ट है कि वे पवहारी बाबा की खोज खबर लेते रहे।
    विवेकानंद ने पुस्तिका अंग्रेजी में लिखी थी। हिंदी में यह पहली बार 1950 में आई। पुस्तक के कारण देश-दुनिया में लोग पवहारी बाबा को जानने लगे। वैसे, पवहारी बाबा का न नया धर्म चलाने में विश्वास था न मठ बनाने में और न शिष्य बना
    विवेकानंद जनवरी 1890 से लेकर अप्रैल तक गाजीपुर में रहे। उनके पहले रवींद्रनाथ टैगोर गाजीपुर में प्रवास कर चुके थे। गुरुदेव भी यहां करीब छह मास रहे। सन् 1888 के मार्च से लेकर जुलाई तक। विवेकानंद यहां उनके जाने के 2 साल बाद आए। वैसे दोनों के जन्म में दो साल का ही अंतर भी है। रवींद्रनाथ टैगोर का जन्म 7 मई, 1861 को हुआ था और विवेकानंद का 12 जनवरी 1863 को। दोनों समकालीन थे। दोनों कलकत्ते के ही दो नजदीकी मुहल्लों शिमला और जोड़ासांकों में पले-बढ़े थे। पर दोनों में कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं था न कोई वार्तालाप। रवींद्रनाथ टेगोर ने गाजीपुर में जब प्रवास किया तो उस समय उनकी उम्र 27 साल थी और कैसा संयोग कि जब विवेकानंद गाजीपुर में आए तो उस समय उनकी भी उम्र 27 साल ही थी। पर, विवेकानंद ने इसका कोई जिक्र नहीं किया। जाहिर है, गाजीपुर के भद्र बंगालियों से रवींद्रनाथ के प्रवास की चर्चा तो विवेकानंद ने सुनी ही होगी। पर, किसी पत्रा में इसका जिक्र नहीं है।
    विवेकानंद अपने गाजीपुर प्रवास के दौरान मित्रों, गुरु भाइयों एवं अग्रजों को करीब 15 पत्रा लिखे और संत और गाजीपुर की आबोहवा के बारे में जानकारी दी। पत्रों में कहीं विवेकानंद लिखा तो कहीं नरेंद्र तो कहीं नरेंद्रनाथ। पहला पत्रा उन्होंने शुक्रवार, 24 जनवरी, 1890 को प्रमदादास को लिखा। पता था, बाबू सतीशचंद्र मुखर्जी, गोरा बाजार, गाजीपुर। वे यहां तीन दिन पहले पहुंचे थे यानी 21 जनवरी को। पत्रा देखिए, ‘मैं तीन दिन हुए सकुशल गाजीपुर पहुंच गया। यहां मैं अपने एक बालसखा बाबू सतीशचंद्र मुखर्जी के यहां ठहरा हूं। गंगाजी पास में ही बहती हैं, परंतु उसमें स्नान करना कष्टसाध्य है, क्योंकि कोई सीधा रास्ता वहां तक नहीं जाता है रेत में चलना बहुत कठिन है।’....आगे लिखा है, ‘मेरी बड़ी इच्छा थी कि मैं वाराणसी आता, परंतु अभी तक बाबाजी पवहारी बाबा के दर्शन नहीं हुए। यही मेरे आने का अभिप्राय है। इसलिए कुछ दिनों का विलंब होना अनिवार्य है।’ 
    दूसरा पत्रा 30 जनवरी, 1890 को बलराम बोस को लिखा और गाजीपुर के स्वास्थ्यप्रद जलवायु का उल्लेख किया। लिखा कि, ‘...वैद्यनाथ का जल अत्यंत खराब है, हजम नहीं होता। इलाहाबाद अत्यंत घनी बस्ती है-वाराणसी में जब तक रहा, हर समय ज्वर बना रहा, वहां इतना ‘मलेरिया’ है। गाजीपुर में, खासकर जहां मैं रहता हूं, वहां की जलवायु स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभदायक है।’ आगे सूचना दी कि ‘ पवहारी बाबा का निवासस्थान देख आया हूं। चारों तरफ ंची दीवारें हैं, देखने मंे साहबों का बंगला जैसा है, अंदर बगीचा है।’ पुनश्च के अंतर्गत विवेकानंद वहां की आर्थिक स्थिति का जिक्र करते हैं। बताते हैं कि यहां मकान का किराया 15 से 20 रुपये है, चावल महंगा है, दूध रुपये में 16 से 20 सेर है, अन्यान्य वस्तुएं सस्ती हैं। और हां, यह भी कि ‘वाराणसी अत्यंत मलेरियाप्रधान शहर है।’ दरअसल, यह पत्रा बलराम बोस को लिखा गया और उन्हें गाजीपुर में रहने के लिए सारी बातें बताई गईं कि गाजीपुर कैसा है, कितना महंगा है या सस्ता है। दरअसल, बलराम बोस भी गाजीपुर आना चाहते थे, इसलिए विवेकानंद ने पत्रा के माध्यम से ये सब जानकारी मुहैया कराई। विवेकानंद ने भी लिखा कि आप यदि कुछ दिन गाजीपुर में रहें तो अच्छा है। आपने रहने के निए बंगले की व्यवस्था सतीश कर सकेगा और गगनचंद्र राय नामक एक और व्यक्ति, जो आबकारी कार्यालय में बड़े बाबू हैं, अत्यंत ही सज्जन, परोपकारी तथा मिलनसार हैं। ये लोग सबकुछ व्यवस्था कर देंगे। दरअसल, बलराम भी किसी बीमारी से ग्रस्त थे। स्वास्थ्य लाभ के लिए ही उन्हें गाजीपुर आमंत्रित कर रहे थे, पर ऐसा हो न सका। जुलाई के एक पत्रा में विवेकांनद बलराम के असामयिक निधन पर गहरा शोक जताते हैं। जब बलराम के निधन की खबर मिली तो विवेकानंद भागे-भागे कलकत्ता गए।
   अगले दिन, 31 जनवरी को वे प्रमदादास मित्रा को फिर पत्रा लिखते हैं,  ‘बाबाजी से भेंट होना अत्यंत कठिन है, वे मकान से बाहर नहीं निकलते, अपनी इच्छानुसार दरवाजेे पर आकर भीतर से ही बातें करते हैं। ...लोगों का कहना है कि भीतर गुुफा यानी तहखाना जैसी एक कोठरी है, जिसमें वे रहते हैं, वे क्या करते हैं, यह वे ही जानते हैं क्योंकि कभी किसी ने देखा नहीं है। एक दिन मैं वहां जाकर बैठाबैठा कड़ी सर्दी की मार खाकर लौटा था।...रविवार को वाराणसी धाम के लिए प्रस्थान करूंगा- यहां के लोग मुझे नहीं छोड़ रहे हैं, नहीं तो बाबाजी के दर्शन की अभिलाषा मेरी समाप्त हो चुकी है।....फिर लिखते हैं, यह स्थान अत्यंत स्वास्थ्यप्रद है, बस इतनी ही इसकी विशेषता है।-नरेंद्र।
    स्वामी विवेकानंद बाबा का दर्शन न होने से उकता गए थे। गाजीपुर से कुर्था का आश्रम थोड़ी दूर है। आने-जाने में परेशानी संभव है। कुछ दिन बाद ही बाबा का दर्शन होता है। उनसे खासे प्रभावित भी होते हैं। 7 फरवरी के पत्रा में लिखते हैं, बाबाजी देखने में वैष्णव प्रतीत होते हैं। उन्हेें, योग, भक्ति, विनय की प्रतिमा कहनी चाहिए।...किसी को मालूम नहीं कि वे क्या खाते-पीते हैं। इसीलिए लोग उन्हें पवहारी बाबा कहते हैं। एक बार जब वे पांच साल तक गुफा से बाहर नहीं निकले तो लोगांे ने समझ लिया कि उन्होंने शरीर त्याग दिया है। किंतु वे फिर उठ आए। पर इस बार वे लोगों के सामने निकलते नहीं और बातचीत भी द्वार के भीतर से ही करते हैं। इतनी मीठी वाणी मैंने कहीं नहीं सुनी, वे प्रश्नों का सीधा उत्तर नहीं देते, बल्कि कहते हैं, ‘दास क्या जाने।’ अगले दिन, 8 फरवरी के पत्रा में बाबा जी से मिलने का जिक्र काफी उल्लास के साथ विवेकानंद करते हैं। ‘...बड़े भाग्य से बाबाजी से साक्षात्कार हुआ। वास्तव में वे एक महापुरुष हैं। बड़े आश्चर्य की बात है कि इस नास्तिकता के युग में भक्ति एवं योग की अद्भुत क्षमता के वे अलौकिक प्रतीक हैं। मैं उनकी शरण में गया और उन्हांेने मुझे आश्वासन दिया है, जो हरएक के भाग्य में नहीं। बाबाजी की इच्छा है कि मैं कुछ दिन यहां ठहरूं, वे मेरा कल्याण करेंगे।’
   पवहारी बाबा विवेकानंद से 23 साल बड़े थे। यानी जब वे मिले तो उनकी उम्र 40 की रही होगी। इस उम्र तक बाबा काफी लोकप्रिय हो गए थे। एक बार स्वामी विवेकानंद ने पवहारी बाबा से पूछा कि संसार की सहायता करने के लिए अपनी गुफा से बाहर क्यों नहीं आते। बाबा ने एक नकटे साधु की एक कहानी सुनाई और कहा कि तुम्हारी क्या ऐसी इच्छा है कि मैं भी इसी प्रकार के एक और संप्रदाय की स्थापना करूं? विवेकानंद तार्किक थे और पवहारी बाबा ज्ञानी। एक बार फिर इसी प्रश्न को घुमाकर जब विवेकानंद ने पूछा तो कहा कि तुम्हारी क्या ऐसी धारणा है कि केवल स्थूल शरीर द्वारा ही दूसरों की सहायता की जा सकती है? क्या शरीर के क्रियाशील हुए बिना केवल मन ही दूसरों के मन की सहायता नहीं कर सकता?
    एक दूसरे अवसर पर जब विवेकानंद ने पूछा कि ऐसे श्रेष्ठ योगी होते हुए भी होमाद्रि क्रिया तथा रघुनाथजी की पूजा आदि कर्म जो साधना की केवल प्रारंभिक अवस्था के लिए समझे जाते हैं-क्यों करते हैं? बाबा ने बहुत ही सहज ढंग से विवेकानंद की इस शंका का समाधान किया, तुम यही क्यों समझ लेते हो कि प्रत्येक व्यक्ति अपने निज के कल्याण के लिए ही कर्म करता है? क्या एक मनुष्य दूसरों के लिए कर्म नहीं कर सकता? विवेकानंद ने बाबा के कई चमत्कारों का भी जिक्र किया है।
   विवेकानंद यहां कुछ दिनों के लिए आए थे और दर्शन की अभिलाषा के कारण वे यहां चार महीने तक टिके रहे। मार्च 1890 को उन्होंने स्वामी अखंडानंद को पत्रा लिखा। पत्रा से जाहिर होता है वे गाजीपुर शहर छोड़ बाबा के यहां ही ठहरे थे। लिखा है, मैं इस समय यहां के अद्भुत योगी और भक्त पवहारीजी के पास ठहरा हूं। वे अपने कमरे से कभी बाहर नहीं आते। दरवाजे के भीतर से ही बातचीत करते हैं। कमरे के अंदर एक गुफा में वे रहते हैं। कहा जाता है कि वे महीनों समाधिस्थ रहते हैं।...अपना बंग देश भक्ति और ज्ञान प्रधान है, वहां योग की चर्चा तक नहीं होती। जो कुछ है वह केवल विचित्रा श्वास साधन इत्यादि का हठयोग, वह तो केवल एक प्रकार का व्यायाम है। इसीलिए मैं इस अद्भुत राजयोगी के पास ठहरा हूं।’ दूसरे पैराग्राफ में अपने कुछ गुरु भाइयों की शंका का समाधान किया है। उन्हें लगा कि ये अब रामकृष्ण परमहंस को छोड़ कोई और गुरु कर रहे हैं। स्वामीजी ने शंका निवारण करते हुए लिखा है, ‘मेरा मूलमंत्रा है कि जहां जो कुछ अच्छा मिले, सीखना चाहिए। इसके कारण मेरे बहुत से गुरुभाई सोचते हैं कि मेरी गुरुभक्ति कम हो जाएगी। इन्हें मैं पागलों तथा कट्टरपंथियों के विचार समझता हंू, क्योंकि जितने गुरु हैं वे सब एक उसी जगद्गुरु के अंश तथा आभासस्वरूप हैं। यदि तुम गाजीपुर आओ तो गोराबाजार में सतीश बाबू या गगनबाबू से मेरा ठिकाना पूछ लो। अथवा पवहारी बाबा को तो यहां का बच्चा-बच्चा जानता है। उनके आश्रम में जाकर पूछ लेना कि परमहंस कहां रहते हैं। लोग तुम्हें मेरा स्थान बता देंगे। मुगलसराय के पास दिलदारनगर नामक एक स्टेशन है जहां से तुम्हें ब्रांच रेलवे द्वारा तारीघाट तक जाना होगा। तारीघाट से गंगा पार करके तुम गाजीपुर पहंुचोगे। अभी तो मैं कुछ दिन गाजीपुर ठहरूंगा।’
    विवेकानंद बाबा से दीक्षा भी लेना चाहते थे लेकिन स्थितियां ऐसी आ जातीं कि संकल्प को स्थगित करना पड़ता। वे बाबा से हठयोग सीखना चाहते थे ताकि उनकी कमर का दर्द दूर हो सके। यह अभिलाषा भी उनकी पूरी नहीं हुई। दूसरी इच्छा थी कि बाबा से कुछ आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करें। यह भी पूरी नहीं हुई। इससे विवेकानंद काफी निराश हो गए। निराशा इस स्तर तक पहुंच गई कि उन्होंने संकल्प ही ले लिया कि अब किसी बाबा से नहीं मिलना है। विवेकानंद का मोटो दूसरा था और पवहारी बाबा का दूसरा। विवेकानंद ने खुद अपनी ही पुस्तिका में उनके बारे में लिखा है, ‘भारत के अन्य अनेक संतों के सदृश पवहारी बाबा के जीवन में भी कोई विशेष बाह्य क्रियाशीलता नहीं दीख पड़ती थी। ‘शब्द द्वारा नहीं बल्कि जीवन द्वारा ही शिक्षा देनी चाहिए, और जो व्यक्ति सत्य धारण करने के योग्य हैं, उन्हीं के जीवन में वह प्रतिफलित होता है।’-उनकी जीवन इसी भारतीय आदर्श का एक और उदाहरण है। इस श्रेणी के संत, जो कुछ वे जानते हैं, उसका प्रचार करने में पूर्णतया उदासीन रहते हैं, क्योंकि उनकी यह दृढ़ धारणा होती है कि शब्द द्वारा नहीं, वरन केवल भीतर की साधना द्वारा ही सत्य की प्राप्ति हो सकती है। उनके निकट धर्म सामाजिक कर्तव्यों की प्रेरकशक्ति नहीं है, वरन इसी जीवन में सत्य का प्रखर अनुसंधान एवं सत्य की उपलब्धि है। वे काल के किसी एक क्षण मंे अन्यान्य क्षणों की अपेक्षा अधिक क्षमता स्वीकार नहीं करते। अतएव अनंत काल के प्रत्येक क्षण के एक समान होने के कारण वे इस बात पर जोर देते हैं कि मृत्यु की बाट न जोहकर इसी लोक में तथा प्रस्तुत क्षण में ही आध्यात्मिक सत्यों का साक्षात्कार कर लेना चाहिए।’....‘उनकी एक विशेषता यह थी कि वे जिस समय जो काम हाथ में लेते थे, वह चाहे कितना ही तुच्छ क्यों न हो, उसमें पूर्णतया तल्लीन हो जाते थे। वे जिस प्रकार पूर्ण अंतःकरण से श्रीरघुनाथजी की पूजा करते थे, उसी एकाग्रता तथा लगन के साथ एक तांबे का लोटा भी मांजते थे। उन्हांेने हमें कर्म रहस्य के संबंध में यह दीक्षा दी थी कि जौन साधन तौन सिद्धि, अर्थात् ध्येयप्राप्ति के साधनों से वैसा ही प्रेम रखना चाहिए, मानो वे स्वयं में ध्येय हों, और वे स्वयं इस महान सत्य के उत्कृष्ट उदाहरण थे।’ ...‘ वे प्रत्यक्ष रूप से कभी उपदेश नहीं देते थे, क्योंकि ऐसा करना तो मानो आचार्यपद ग्रहण करने तथा स्वयं को मानो दूसरों की अपेक्षा उच्चतर आसन पर आरूढ़ कर लेने के सदृश हो जाता।  परंतु एक बार जब उनके हृदय का स्रोत खुल जाता था तब उसमें से अनंत ज्ञान की धारा निकल पड़ती थी। पर फिर भी उनके उत्तर सीधे न होकर संकेतात्मक ही हुआ करते थे।...उनके एक ही आंख थीं और अपनी वास्तविक उम्र से वे बहुत कम प्रतीत होते थे। उनकी आवाज इतनी मधुर थी कि हमने वैसी आवाज अभी तक नहीं सुनी।’
   विवेकानंद ने उनकी एक और विशेषता का उल्लेख नहीं किया है। पवहारी बाबा की लिखावट बहुत सुंदर थी। उनके हस्तलिखित ग्रंथ उनके आश्रम में पड़े हैं। इस तुच्छ लेखक को वह ग्रंथ देखने का मौका मिला। ग्रंथ में खूबसूरत डिजाइनदार किनारे और प्रसंगानुसार चित्रा सजे हुए हैं। चित्रा भी बाबा ने खुद ही बनाए थे। उन्हें देखकर उनके कलाबोध को समझ सकते हैं और एक संत के भीतर कितना उम्दा कलाकार भी था, चित्रा इसकी चुगली करते हैं।

ने में। इसलिए वे कुर्था से बाहर कहीं गए नहीं। जो लोग इस संत के बारे में सुनते वे यहां आते। बाबा गुफा से बाहर होते तो दर्शन हो जाता, नहीं तो गुफा द्वार को ही प्रणाम कर चले जाते। बाबा योगी भी थे और भक्त भी। उनके बारे में कई तरह की किंवदंतियां उनके जीते जी प्रचलित हो गई थीं। आश्रम में ही उन्होंने एक गुफा बनवा रखी थी और उसी में वे साधनारत रहते थे। उनके बाहर निकलने की तिथि कोई निश्चित नहीं रहती, लेकिन पूर्णिमा से लेकर संक्रांति तक हवन होता था। इस बीच वे गुुफा में नहीं जाते थे। कुछ दिनों तक विवेकानंद आश्रम में ही रहे। आश्रम के भीतर एक बगीचा था, तरह-तरह के पेड़-पौधे लगे थे। नींबू के पेड़ों की भी बहुतायत उस समय थी, जिसका सेवन विवेकानंद खूब करते थे। विवेकानंद यदि पवहारी बाबा से न मिले होते और उनपर पुस्तिका न लिखी होती तो वे एक स्थानीय संत ही बनकर रह जाते। हालांकि पवहारी बाबा चाहते भी नहीं थे  कि वे जगप्रसिद्ध हों। ऐसी लोकेषणा उनमें नहीं थीं।  

शुक्रवार, 2 जनवरी 2015

पीएन विद्यार्थी की याद में

डा. प्रभु नारायण विद्यार्थी से पहली बार परिचय डा. गिरिधारी राम गौंझू ने कराया। इसके बाद तो यह परिचय धीरे-धीरे प्रगाढ़ होता गया। इसी क्रम में पहली बार गौंझूजी के साथ उनके हरमू स्थिति घर गया। घर के ग्राउंड फ्लोर पर ही उनका कार्यालय और पुस्तकालय है। इसी में दसों आलमीरा पुस्तकें भरी पड़ी हैं। घर में कुछ कुर्सियों को छोड़कर किताबों का अखंड साम्राज्य स्थापित है। उनका यह समृद्ध पुस्तकालय और राहुल की समग्र पुस्तकों को देखकर चकित ही हुआ जा सकता है। राहुल के प्रति उनमें विशेष अनुराग था। यही कारण था कि वे राहुल की किताबों तक ही सीमित नहीं रहे, बल्कि उनकी पत्नी और पुत्रों के साथ भी उनका आत्मीय रिश्ता कायम हो गया था। संभव है, उनको घूमने की प्रेरणा राहुल सांकृत्यायन से ही मिली हो! 'अथातो घुम्मकड़ जिज्ञासाÓ को चरितार्थ करता उनका चरित्र और बौद्ध धर्म के प्रति विशेष लगाव के कारण ही तो नहीं श्रीलंका में उनका निधन हुआ। श्रीलंका में सम्राट अशोक के पुत्र ने बौद्ध धर्म का बिरवा रोपा था, जो आज वट वृक्ष बनकर लहलहा रहा है। श्रीलंका में उनके निधन के कुछ तो निहितार्थ होंगे ही।
प्रशासनिक सेवा से मुक्त होने के बाद तो उनका एकमात्र काम घूमना रह गया था। कभी बोधगया, कभी श्रीलंका, कभी कनाडा, कभी अमेरिका। हमेशा यात्रा पर ही रहे। फोन मिलाइए तो उधर जवाब आता, अभी तो शिमला में हैं। पेंशन का पैसा घूमने और किताबों में ही खर्च होता। जहां जाते, किताबों का ग_ïर ले आते। अंगरेजी, बांग्ला, अरबी, मगही जैसी आधा दर्जन भाषाओं के जानकार विद्यार्थीजी ने कोई पचास किताबें लिखी हैं। इनमें क्षेत्रीय इतिहास से लेेकर कविता, कहानी, संस्मरण, लेख आदि शामिल हैं। अभी-अभी दिल्ली से छपकर उनकी नई किताब आई है 'सत्ता की साजिश और पाखंड का मकडज़ाल।Ó तीन सौ पृष्ठï की इस पुस्तक में बौद्ध धर्म से लेकर दलित विमर्श और जातियों के जंगल से गुजरते हुए अगड़ी-पिछड़ी राजनीति तक को समेटा है। यह पुस्तक उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता और पक्षधरता को रेखांकित करती है।
विद्यार्थीजी की सरलता व्यक्तिगत रूप से मुझे आकर्षित करती रही है। संयुक्त सचिव से अवकाश प्राप्त करने वाले इस अधिकारी में अकड़ या दंभ नाम की कोई चीज नहीं थी। इतनी सरलता और सहजता विरले लोगों में होती है। हो सकता है, यह बुद्ध के दर्शन का प्रभाव हो!  यह भी हो सकता है कि झारखंड के आदिवासियों के बीच रहने के कारण यह गुण उनमें सहज आ गया हो। जब अधिकारी थे, जंगलों की खाक छानते और उनके दुख-दर्द को देखते और जितना संभव होता, उनकी मदद करते। आज के अधिकारियों की ओर नजर दौड़ाइए तो पता चलेगा कि भारत को भुखमरी को ओर ले जाने वाले ये ही नौकरशाह हैं। नितांत असंवेदनशील और बेईमान। झारखंड में जो भी योजनाएं गरीबों-आदिवासियों के लिए चलाई जा रही हैं, उन पर ये अधिकारी कुंडली मारकर बैठे हैं।
ऐसे समय में इनकी याद स्वाभाविक है। अवकाश प्राप्ति के बाद तो उनके पास दो ही शगल थे, लिखना और घूमना। इसके अलावा उन्हें एक और शौक था। इसे प्राय: कम लोग ही जानते हैं। पुराने-नए सिक्कों, नोटों और डाक टिकटों का संग्रह। उनके पास दुनिया भर के सिक्के, नोट और डाक टिकटों के कई एलबम भरे हुए हैं। जहां जाते, जिस देश जाते वहां के नोट, सिक्के और डाक टिकट ले आते और अपने एलबम को समृद्ध करते।
उनने एक महत्वपूर्ण काम यह किया है कि जहां-जहां वे अधिकारी रहे, उस क्षेत्र के अज्ञात इतिहास से पर्दा उठाया। रोमिला थापर ने अपने एक लेख में क्षेत्रीय इतिहास पर बल दिया था। क्षेत्रीय इतिहास की कडिय़ों को जोड़कर ही भारत का समग्र इतिहास लिखा जा सकता है। यह काम बड़ी ईमानदारी से विद्यार्थीजी ने किया। जब वे देवघर में पदस्थापित थे, वहां के एक मराठी ब्राह्मïण के बारे में लिखा। इस ब्राह्मïण सखाराम देउस्कर ने 'देेशेरकथाÓ लिखी थी। इस पुस्तक का उन्होंने पुनरुद्धार ही नहीं किया, बल्कि स्थानीय लोगों के सहयोग से उनकी मूर्ति भी स्थापित की। यह पुस्तक आजादी के आंदोलन की चश्मदीद कहानी है। लेखक ने महाराष्ट्र से अपने परिवार के आने की कहानी के साथ आजादी को लेकर चले संघर्ष की कहानी को भी लिखा है। अभी हाल में हिंदी के ख्यात आलोचक डा. मैनेजर पांडेय ने इस पुस्तक का संपादन किया है और यह नेशनल बुक ट्रस्ट से प्रकाशित हुई है। इस पुस्तक की भूमिका डा. पांडेय ने विद्यार्थी की महत्ता को रेखांकित किया है।
विद्यार्थीजी के काम का मूल्यांकन होना बाकी है। लोगों ने उनके कामों को रेखांकित करने से परहेज किया है। कारण, वे किसी गुट के आदमी नहीं थे। इधर, रांची में जो ट्रेंड चला है, तू मुझे सराहो, मैं तुझे सराहूं, इससे वे मुक्त ही रहे। इसलिए, लोग उन पर कम ही ध्यान देते हैैं। वैसे, राधाकृष्ण जैसे सिद्धहस्त कथाकार को जब रांची के कथाकार याद नहीं करते, तो विद्यार्थीजी को कैसे याद कर सकते हैं। अपने-अपने वैचारिक खूंटे में बंधे लोगों से बहुत अपेक्षा भी नहीं की जा सकती। जब वह नहीं हैं, उनकी यादें, मुस्कुराता हुआ चेहरा बार-बार याद आता है।