शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2015

ग्लोबल गांव की अंतर्कथाएं


 -संजय कृण :
 
  सन् 1840 में, संताल हूल और 1857 की कथित आजादी की पहली लड़ाई से डेढ़ दशक पहले एक ब्रिटिश अधिकारी ने नगाओं पर टिप्पणी करते हुए लिखा था, ‘ये आदिवासी पूरी ताकत से महज अपनी हिफाजत ही नहीं करते बल्कि ये अपने दुश्मनों पर बहुत हिम्मत से वार भी करते हैं...किसी तरह का खतरा और भय उन्हें नहीं सताता।’

   इस टिप्पणी से जाहिर है, उस ब्रिटिश अधिकारी ने आदिवासियों के रहन-सहन और उनके संघर्ा को काफी नजदीक से देखा
  गायब होता देश इसी साल आया और आते ही देश की साहित्यिक पत्रिकाओं में इस पर समीक्षाआंे की बाढ़ सी आ गई। अंतरजाल पर भी यह खूब प्रचारित हुआ। ‘बाबा रामदयाल मुंडा की स्मृति एवं दीदी दयामनी बारला और इरोम शर्मिला चानू के संघर्ा के जज्बे को समर्पित’ इस उपन्यास में डाॅ. रामदयाल मुंडा भी हैं और दयामनी बरला भी। इसके साथ ही इसकी कुछ और बातें हैं, वह है हिंदी के महान लेखकांे की टिप्पणियां। पुस्तक की पीठ पर मैत्रौयी पुपा और प्रसन्न कुमार चैधरी की टिप्पणी है और अंदर संजीव की। इन्हें देखना भी दिलचस्प होगा, इससे उपन्यास को समझने में आसानी होगी। मैत्रोयीजी ने लिखा है, आधुनिक विकास की तमीज के हिसाब से रातों रात गुम हो जाती बस्तियों के बाशिंदों की दर्दनाक दास्तान...जिनपर कागजी खजाना तो बरसाया गया लेकिन पांव तले की धरती छीन ली...यह उपन्यास साहित्य में अपनी मुकम्मल जगह बनाएगा, ऐसी मुझे उम्मीद है।’ उम्मीद उनकी बेमानी नहीं है। अब प्रसन्न की टिप्पणी देखें, यह एक प्रेम कथा भी है और थ्रिलर भी...लगभग कोई पात्रा एक आयामी नहीं है, सभी पात्रों के अपने-अपने ग्रे शेड्स हैं।’ संजीव ने तो कलम ही तोड़ दी है, जादुई यथार्थवाद को खोजने के लिए लैटिन अमेरिका और स्पेनिश भाााओं में भटकने की जरूरत नहीं। अपना देश और अपने लोग ही पर्याप्त हैं। इस लिहाज से भी यह उपन्यास हिंदी को समृद्ध करता है।’ हालांकि रमेश उपाध्याय का माथा ठनग गया संजीव के विशेाण से.. संजीव के शब्दों में यह पढ़कर कि यह जादुई यथार्थवाद का उपन्यास है, माथा ठनक गयाः यह क्या? अपने पहले उपन्यास‘ ग्लोबल गांव का देवता’ में रणेंद्र ने भूमंडलीय यथार्थवाद को जो नया रास्ता पकड़ा था, उसे छोड़कर वे जादुई यथार्थवाद के उस पुराने रास्ते पर क्यांे चले गए, जिस पर मार्केज के असंख्य नकलनवीस पहले ही चल चुके हैं?’ खैर, रमेशजी ने इसे भूमंडलीय यथार्थवाद का उत्कृट उदाहरण माना है। अब साहित्य के इतने धुरंधर, मूर्धन्य और लब्ध प्रतिठ लेखकांे की टिप्पणी के बाद भी भला कुछ रह जाता है! 
  लेकिन बात सिर्फ इतनी भर होती तो हम भी राम-राम कहकर आगे बढ़ जाते। पर, ऐसा है नहीं। लेखक ने अपने पूर्व कथन में इस उपन्यास की कैफियत दी है। सोना लेकन दिसुम यानी सोने जैसा देश। यह देश था मुंडाओं का, जो अब गायब हो रहा है। थोड़ा इतिहास भी है कि मुंडा झारखंड में कब आए? लेकिन सवाल है, क्या यह वास्तव में मुंडाओं पर लिखा गया उपन्यास है? जिसके लिए यह खूब प्रचारित किया गया है और किया जा रहा है? 318 पेज के इस उपन्यास को पढ़ने पर ऐसा लगता है कि यह मुंडा के गायब होते देश की नहीं, उस मैथिल पत्राकार किशन विद्रोही के जीवन की कहानी है, जो यहां पत्राकारिता करने आया था, कुछ क्रांतिकारी टाइप लोगांे की सोहबत में क्रांतिकारी हो गया और अंततः कारपोरेट होती पत्राकारिता में उलझकर दम तोड़ दिया। उसकी हत्या हुई या उसने आत्महत्या की, इसकी खोज है या उपन्यास। एक युवा पत्राकार ही इस गुत्थी या रहस्य को सुलझाने के लिए निकलता है और फिर कहानी आगे बढ़ती है। कई पात्रा आते हैं, पत्राकारिता की सड़ांध भी आती है। डाॅ रामदयाल मुंडा डाॅ सोमेश्वर सिंह मंुडा के रूप में मौजूद हैं और सोनामनी के रूप में दयामनी बारला और उनका आंदोलन। आंदोलन के बिकने की कहानी भी यहां हैं। अनुजा के रूप में एक आदिवासी महिला पत्राकार है और उस पर एकतरफा मोहित किशन विद्रोही। है तो यह विद्रोही पर रसिक भी कम नहीं। अनुजा पाहन के बैंजनी रंग पर वह इस कदर मोहित होता है तो उसके सौंदर्य का बखान करने में वह कालिदास, विद्यापति और बिहारी को भी पीछे छोड़ देता है। सारी उपमाएं जूठी लगती हैं उर्दू शायरों की भी। पांच पेजों तक उसके सौंदर्य का बखान करता उपन्यास का चैतीसवां अध्याय का शीर्ाक है नैनां अंतरि आव तू। एकाध टुकड़ा देखें तो हमें लेखक के सौंदर्य बोध का पता चल जाता है-‘...दूधिया-बैंजनी दूध में नहा कर जब तुम निकलने लगी तो मेरी आंखें...मेरा वजूद...आंखों की पुतलियां बनकर रह गया।...तुम्हारी सफेद चुनर ढलक कर वक्षस्थल पर आ टिकी। जहां दो चांद हाफ रहे थे या उड़ने को बेताब पंख फड़फड़ाते दो कबूतर।...मैंने सोचा, मैं कालिदास बन जां...या विद्यापति...या बिहारी।...क्या मैं पुरुरवा नहीं बन सकता...या कनु...अंधकार में...। यहां तक आते-आते धर्मवीर भारती भी याद आने लगते हैं। लेखक उसके सौंदर्य का चित्राण करते समय हकलाने लगता है। सो, डाॅट डाॅट डाॅट से काम चलाता है। संस्कृत के पद से भी उसका पेट नहीं भरता तो उर्दू का आंचल थाम लेता है। परीचश्म-परीजमाल, नूरे मुजस्सम, नूरानी वजूद जैसे भारी भरकम शब्द पाठकांे की परीक्षा लेने लगते हैं। हालांकि उपन्यास में ऐसे ढेरों शब्द बिखरे पड़े हैं, जिसे डिक्शनरी में ही उसके अर्थ की तलाश की जा सकती है। हालांकि लेखक ने एकदम टटका बिंब या उपमा दी है...हाफते चांद या फड़फड़ाते दो कबूतर। एक अलग सौंदर्यशास्त्रा, जिसके लिए हिंदी समाज को लेखक का ऋणी होना पड़ेगा।
   उपन्यास के पन्ने दर पन्ने पढ़ते हुए जब आगे बढ़ते हैं तो यह भी एहसास होता है कि लेखक ने काफी अध्ययन किया है। हर पन्ना और अध्यायों के शीर्ाक इसकी चुगली करते हैं। लेखक की यह विशेाता है कि वह अब तक जो पढ़ा है, इतिहास, पुराण, शेरों-शायरी, मानव विज्ञान...। वह सब कुछ अपने इस महान उपन्यास में विन्यस्त कर देना चाहता है। मेगालिथ की पूरी कहानी यहां हैं। लेमुरिया तो है ही। यह सब ज्ञान उसे सोमेश्वर सर से प्राप्त होता है। लेखक बताता है कि ‘लेमुरिया भी आठ लाख वर्ा ईसा पूर्व से 9654 वर्ा ईसा पूर्व की अवधि में धीरे-धीरे डूब गया। मेडागास्कर, मारीशस, मालदीव, लक्षद्वीप उसी लेमुरिया महाद्वीप के अवशेा हैं।’ यह भूमि 12 नस्लों की मूल भूमि थी। यह सवाल तो आप नहीं उठा सकते हैं कि क्या उस समय तक जातियांे का निर्धारण हो चुका था या इतने लाख साल पहले वे आदिम रूप में ही मौजूद थीं? लाखों साल से यह जाति इस घटना को कैसे अपने लोक गीतों के माध्यम से याद करती आ रही है? सचमुच, इस परिघटना के जरिए लेखक मुंडा जनजाति का अतीत बताता है। फिर वर्तमान में उसकी त्रासदी। सोमेश्वर मुंडा के जरिए मुंडा के जरिए ही वह अतीत की यात्रा पर निकलता है और वहां से जब फारिग होता है कि सोनामनी के जरिए अपने वर्तमान को पकड़ने की कोशिश करता है, जहां देश या दिसुम गायब हो रहा है।
  जहां तक जमीन का सवाल है, वह झारखंड में हर आदिवासी के हाथ से छीनी जा रही है। कहीं विकास के नाम पर, कहीं खनिज के नाम पर। यह सिर्फ मुंडा जनजाति के साथ ही नहीं हो रहा है। आजादी से पहले अंग्रेजों से आदिवासियों ने जमीन के लिए ही सालों साल संघर्ा किया और आज अपनी चुनी हुई सरकार से। कारपोरेट की दुनिया कैसे तंत्रा पर हावी है और विकास के नाम पर कैसे यहां के लोगों को विस्थापित करती है, यह कोई नहीं बात नहीं। बड़ी-बड़ी कंपनियां यही कर रही हैं। कुछ आंदोलनों ने कंपनियों के काम को भी रोक रखा है। यहां कुछ आंदोलन ऐसे है, जिन्हें कारपोरेट ही मदद करता है। प्रतिद्वंद्विता उसके साथ भी है। वह नहीं चाहता कि दूसरी कोई कंपनी यहां आए। ऐसे में यहां चल रहे आंदोलन उसके काम के होते हैं। आंदोलनों के अपने फायदे तो हैं हीं। देश-दुनिया में पहचान और पुरस्कार तो मिलेगा ही, जो इस उपन्यास में सिरे से नदारद है। जहां तक पूंजीवादी व्यवस्था की बात है, उससे तो हर समाज त्रास्त है। केवल मुंडा ही नहीं। यहां रहने वाली सभी आदिवासी-मूलवासी इसके शिकार हो रहे हैं। नौकरशाही की मिलीभगत से रांची में अचानक अपार्टमेंटों की बाढ़ से लेखक तो परिचित होगा ही। शहर से लेकर गांव तक आदिवासी अपनी जमीन से बेदखल हो रहा है। राज्य बनने के बाद भी। सौ साल पहले बना कानून भी कोई मदद नहीं कर पा रहा। लेखक इन अंतरविरोधों को भी सामने लाता है। इतना सब कुछ होने के बाद भी, यह उपन्यास हमारे भीतर कोई संवेदना नहीं जगाता। हम किसी पात्रा को याद नहीं कर पाते। डायरी की शक्ल में लिखे इस पूरे उपन्यास में कोई मुंडा पात्रा उभरकर नहीं आता। न उनकी लोककथाएं, न उनका जीवंत जीवन। कुछ जमीनी सच्चाइयां जरूर हैं। नक्सली संगठनों का अपराधी गिरोहों में बदलना। विवरण बहुत है। विवरण उपन्यास नहीं होता। कहीं-कहीं अरण्यरोदन भी है। एक पत्राकार की डायरी में जितना समाया, वह आया। बाकी तो दूर से बैठकर देखने का सुख और खुशफहमी है। हां, एक सवाल यह जरूर उठाता है, यदि लुटियन की दिल्ली के नीेचे खनिज संपदा निकल जाए तो क्या सरकार उन अमीरों को वहां से बेदखल करेगी? 
  लेकिन ऐसा महुआ माजी के साथ नहीं होता। महुआ का उपन्यास ‘हो’ आदिवासी जीवन पर है: ‘मरंग गोड़ा नीलकंठ हुआ’। यह उपन्यास भी छपने से पहले ही पुरस्कृत हो गया था। बहुत हद तक लेखिका अपने कहन में सफल होती है। यह कहानी भी कोल्हान के उस क्षेत्रा की है, जहां के आदिवासी पिछले कई दशकों से यूरेनियम के कचरे का शिकार होकर जवानी में ही दम तोड़ रहे हैं। यह एक भयावह समस्या है। कई तरह की बीमारियां, गर्भपात की समस्या और चर्म रोग से यहां के बाशिंदे परेशानहाल हैं। लेकिन यहां भी वही समस्या और देखने का वही नजरिया। 402 पेज के इस भारी भरकम उपन्यास में लेखिका 167 पेज तक तो अपनी आंखों से मरंग गोड़ा को देखने की कोशिश करती है, लेकिन आगे वह कैमरे से देखती हैं। कैमरामैन हैं आदित्यश्री। इन्हें आप श्रीप्रकाश भी पढ़ सकते हैं और मरंगगोड़ा को जादूगोड़ा। इत्तेफाक से ये भी किशन विद्रोही ही तरह पत्राकार हैं पर अलग ढंग के। यहां सगेन जैसा जीवंत पात्रा है। शुरुआत के 167 पेज तक एक दम काव्यात्मक भााा से साक्षात्कार होता है। इसके बाद हो आदिवासी जीवन पसरने लगता है। महाश्वेता देवी तरह ही लेखिका जैसे अपने पात्रों में उतर गई हो। हो जीवन की छोटी-छोटी कहानियां, उनका अतीत और त्रासद वर्तमान सब कुछ को नोट करती है। उनके पर्व, त्योहार, परंपरा, अखड़ा, लोकगीत सब मुखर होता है। इसके बाद कहानी अपने मूल पर आती हैः ‘विकिरण, प्रदूाण व विस्थापन से जूझते आदिवासियों की गाथा।’ सगेन उपन्यास का नायक है। सगेन के ततंग यानी उसके दादा पत्थरों का डाक्टर बनाना चाहते थे, लेकिन जैसे-जैसे वह बड़ा होता है, उसे जादूगोड़ा का सच दिखाई देने लगता है। फिर लोगांे को जागरूक करने और एकजुट करने के लिए कमर कस लेता है। सगेन की भेंट आदित्यश्री से होती है और आदित्यश्री अपने वृत्तचित्रा के माध्यम से यूरेनियम से हो रही जानलेवा परेशानियों से दुनिया को रूबरू कराता है। आदित्यश्री एनजीओ के माध्यम से यह काम करता है। जापान में भी वह जाते हैं और यहां के हालात को दिखाता है। फिर वहां से एक टीम यहां आती है। यहां अध्ययन करती है और अपनी रिपोर्ट देती है। इतना कुछ होने के बाद यूरेनियम कंपनी वाले थोड़ा नरम रुख अपनाते हैं। यह सब कुछ बहुत प्रामाणिक ढंग से कही गई है। इसे पर इंटरनेट पर भी खोज-देख-पढ़ सकते हैं।
  मरंगगोड़ा के साथ ही सारंडा की कहानी भी कही गई है। साल बनाम सागवान की लड़ाई को भी उठाया गया है, लेकिन उस समय के एक बहुत बड़े आंदोलन कोल्हान विद्रोह को छोड़ दिया गया है। 1977 में केसी हेम्ब्रम और उस समय के मानकी मंुडा के प्रमुख नारायण जोंको ने कोल्हान रक्षा संघ का गठन किया था। आंदोलन की लपटें बहुत दिनों तक उठती रहीं। 1981 में अलग कोल्हान की मांग उठी थी। यहां तक कि काॅमनवेल्थ सचिव के सामने इसकी मांग रख दी गई। यही नहीं, यूएनओ में भी इस मामले को उठा दिया गया। इसके बाद तो केसी पर राटद्रोह का मुकदमा चला। आरंभ में इस संगठन के लोगों ने ही जादूगोड़ा में विकिरण के प्रभावों को सामने लाया था। आंदोलन को वैचारिक धार देने के लिए ही संघ का गठन किया गया था। लेकिन इसका कहीं जिक्र नहीं है। लेखिका ने आदित्यश्री के माध्यम से ही जितना जाना, समझा, उसे हिंदी पाठकांे के बीच परोस दिया। हिंदी पाठकों के लिए यह नया विाय हो सकता है। यह उपन्यास भी आधा मरंगगोड़ा की कथा कहता है और आधा आदित्य श्री की। लगता है, हम उसकी जीवनी पढ़ रहे हों। किसी ने कहा है कि जिस परिवेश में आपने जन्म नहीं लिया हो, उसकी कथा नहीं कहनी चाहिए। इसके लिए प्रतिभा की भी दरकार होती है। राधाकृण की इंसान का जन्म पढ़ने के बाद लगता है कि वह बंगलादेश की हर गली से वाकिफ है। बंगलादेश में युद्ध की पृठभूमि पर लिखी इस कहानी को पढ़कर आप कथाकार के साथ बहते जाते हैं। पर, यहां ऐसा कुछ नहीं होता। कम से कम ये दोनों उपन्यास न्याय तो नहीं करते। आदिवासी जीवन की विसंगतियां को राधाकृण ने अपनी कई कहानियों में उठाया है। कानूनी-गैरकानूनी से लेकर मूल्य तक। राधाकृण को गुजरे चालीस साल हो गए लेकिन यहां के कथाकार, अभी तीसरे-चैथे दशक में ही ठिठके हैं रचना के स्तर पर। फिर भी, मरंगगोड़ा हमें यूरेनियम के खतरे से आगाह करता है।
   एक तीसरा उपन्यास है, राकेश कुमार सिंह का ‘हुल पहाडि़या’। राकेश पलामू के हैं और आरा, बिहार में रह रहे हैं। शरीर वहां और मन यहां के जंगलों में भटकता रहता है। इसलिए, उन्होंने झारखंड पर कई उपन्यास रचे हैं। जहां खिले हैं रक्तपलाश, पठार पर कोहरा, जो इतिहास में नहीं है, यह सब झारखंड केंद्रित उपन्यास हैं। जो इतिहास में नहीं है, संताल हूल पर केंद्रित है। हुल पहाडि़या 2012 में आया। यह उपन्यास आदि विद्रोही तिलका मांझी की समरगाथा है। हमें जानना चाहिए कि अंग्रेजों के खिलाफ सबसे पहले तीर-धनुा उठाने वाले पहाडि़या थे और उसका नायक तिलका मांझी। यह उपन्यास आदिवासियों के आंदोलनों को नजरअंदाज करने वाले मुख्यधारा के इतिहास की कई भूलों को ठीक करता है सप्रमाण।
  हम अभी तक यह तय नहीं कर पाए हैं कि देश का पहला आजादी का आंदोलन 1857 को माने, या झारखंड में हुए 1855 में हूल को या फिर 1785 को, जब राजमहल की पहाडि़यों से निकलकर तिलका मांझी ने भागलपुर के पहले कलक्टर क्लीवलैंड को मौत के घाट उतार दिया था। यद्यपि 1857 को हमने प्रचारित-प्रसारित किया है। हमें यही पढ़ाया जाता रहा है, जा रहा है। लेकिन इस पाठ में आदिवासियों के आंदोलनों को हाशिए पर ही रखा गया है। यह उपन्यास दरअसल, इतिहास को ठीक करने की कोशिश भी है। राकेश कुमार सिंह ने काफी खोजबीन और शोध के बाद इसकी रचना की है, लेकिन खेमेबाज आलोचकांे ने इस पर बहुत कुछ नहीं बोला। जनसंपर्क भी एक कारण हो सकता है। हर लेखक अपनी मार्केटिंग करना नहीं जानता। बाजार के इस युग में यह एक महान कला के रूप में स्थापित हो रही है। आखिर, मनमोहन पाठक के उपन्यास ‘गगन घटा घहरानी’ पर किसी को बोलते-लिखते सुना है। यह उपन्यास भी 1991 में आया था और पलामू पर केंद्रित है। इसमें उरांव आदिवासियों को केंद्र मंे रखा गया है। लेखक अपने गांव-जवार, आदिवासियों और पलामू से किस तरह तल्लीन है, उपन्यास का एक-एक शब्द बताता है। पर इसकी चर्चा नहीं होती।
  बहरहाल। राकेश कुमार सिंह का यह उपन्यास एक बहुत बड़े अभाव की पूर्ति करता है। हमारे इतिहास को दुरुस्त करता है। हम सब जानते हैं कि अंग्रेजांे ने पहाडि़या जनजाति के इस महान विद्रोह को कुचलने का हर संभव प्रयास किया। इसके साथ ही अभिलेखों में भी एक सोची-समझी साजिश के तहत दर्ज भी होने नहीं दिया। पर स्थलीय साक्ष्यों ने कुछ इतिहासकारों को तिलका मांझी के जीवन और आंदोलन में झांकने को जरूर विवश किया। दूसरे, यह भी सवाल परेशान करता रहा कि तिलका संताली है या पहाडि़या। महाश्वेता देवी ने अपने उपन्यास ‘शाल गिरह की पुकार’ में तथ्यों के साथ खिलवाड़ करने की काफी छूट लेकर कई भ्रांतियों को जन्म दे दिया। बंगाली बौद्धिकों के साथ यह परेशानी है कि वह हर आदिवासी को संताली ही कहते हैं। रवींद्रनाथ टैगोर भी संताली कहते हैं और कविता रचते हैं। सत्यजीत राॅय भी पलामू के आदिवासियों को संताली ही समझते हैं। राकेश इसे भी दुरुस्त करते हैं। वह प्रमाण सहित बताते हैं कि तिलका संताली नहीं, पहाडि़या था और उसका एक नाम जवरा पहाडि़या भी था। इसे अंग्रेजों ने अपने अभिलेख में डाकू के तौर पर दर्ज किया है और हिल रेंजर्स का कमांडर के तौर पर भी। इन दोनांे नामों में एक की तलाश में काफी मेहनत करनी पड़ी। साक्ष्य तो चाहिए ही। राकेश सिंह इससे गुरेज भी नहीं करते। सबसे पहले तो हमें यह भी जानना चाहिए कि जब पहाडि़या विद्रोह राजमहल की जंगलतराई में फैला था, तब वहां संतालों का कोई अस्तित्व नहीं था। संतालों को अंग्रेजों ने पहाडि़यों पर अंकुश लगाने के लिए 1790 से 1810 के बीच बसाया। दामिन-इ-कोह में तब 429 गांव इनके बस चुके थे। 1851 आते-आते गांवों की संख्या 1473 तक पहुंच गई। जबकि पहाडि़यां यहां महाभारत काल से बसे हुए हैं। उन्हांेने न राजा कर्ण की अधीनता स्वीकार की न आने वाले बाद के राजाओं की। पहाडि़या खुद भी राजा थे। पर कालक्रम में इनका राजपाट खत्म हो गया और ये रंक बन गए। जंगलों पर निर्भरता इनकी बढ़ गई। अंग्रेजों ने जब इस क्षेत्रा में अपना कदम रखा तो उनके खिलाफ तीर-धनुा लेकर खड़े हो गए। 1772 में पहाडि़यों ने सशस्त्रा विद्रोह किया। इसके बाद 1778 में और 1783 में एक बड़ी चीख के रूप में उभरा। 320 पेज का यह उपन्यास इतिहास के गर्द-गुबार के भी झाड़ता है। उपन्यास बताता है कि तिलका पहाडि़या थे। पहाडि़या युवाओं ने 1942 के आंदोलन में भी बढ़-चढ़कर भाग लिया था। तिलका मांझी ने भागलपुर में जाकर क्लीवलैंड की हत्या कर दी थी। अंग्रेजों ने उसे वहीं से पकड़ लिया और 11 फरवरी, 1785 को उसे फांसी दे दी। राकेश सिंह ने जबरा से तिलका के रूपांतरण की कथा कह अटकलों पर विराम लगा दिया। इतिहास भी बताता है और यह उपन्यास भी कि पहाडि़या विद्रोह को शांत रखने के लिए क्लीवलैंड ने हिल रेंजर्स का गठन किया था। यह पहाडि़या युवकों की तीर-धनुा वाली बटालियन थी। इसका सही नाम हिल आर्चरर्स कोर था। इसमें 1300 पहाडि़या शामिल थे, जिसका कमांडर जवरा या जौराहा पहाडि़या था। जब वह रामगढ़ में हुए विद्रोह को कुचलने के लिए आया हुआ था, तभी उसे खबर मिली कि अंग्रेजोंने रानी सर्वेश्वरी को उनके किले में ही नजरबंद कर दिया है। जौराहा या जवरा को नागवार लगा। क्लीवलैंड ने उसके साथ धोखा किया। जवरा ने अपला चोला उतार फेंका और बन गया तिलका मांझी। रानी की नजरबंदी के बाद तिलका ने पूरे जंगलतराई में अंग्रेजों, साहूकारों, दलालों के साथ मारकाट शुरू कर दिया। नजरबंदी के छह महीने के बाद वह भागलपुर गया और 29 साल के भागलपुर के पहले कलेक्टर क्लीवलैंड को जहर बूझे तीर से मौत के घाट उतार दिया। गजेटियर इस पर मौन है। वह यह नहीं बताता कि 29 साल का कलेक्टर अपनी मौत कैसे मर गया? यह भी अचरज है कि जवरा उर्फ तिलका के मारे जाने के सौ साल बाद 1894 में ब्रिटिश सरकार ने उसके नाम पर काॅपर का सिक्का निकाला, क्यों?
  पहाडि़या विद्रोह के बहाने इस उपन्यास में पहाडि़या को भी जान पाते हैं। उनकी प्रथाएं, संघर्ा, गगन दमामा बाजे की स्वर भी। उपन्यास में और भी बहुत कुछ है, एक अरब साठ करोड़ वर्ा पुरानी राजमहल की पहाडि़यां और इस पर वास करते पहाडि़या। इसके साथ ही संतालों और पहाडि़या के बीच युद्ध और आपसी समझौते की कहानियां भी हैं। अंग्रेजों की कुटिलता और आदिवासियों की सादगी भी है। उस दौर का पूरा आंदोलन यहां फैला हुआ है। हमारे सामने वह पूरा काल-खंड घूमने लगता है। तिलका मांझी से तिलका बाबा और राजमहल की पहाडि़यों में बजता हूल का दमामा। राकेश का यह उपन्यास बोझिल नहीं हैं। उबाने वाली भााा नहीं है न परेशान करने वाले संवाद। रचना की पहली शर्त पठनीयता होती है। यह उपन्यास इस कसौटी पर भी खरा उतरता है। एक सवाल यह जरूर है कि कुछ संवाद भोजपुरी में हैं। शायद, वृहत्तर हिंदी समाज को देखते हुए ऐसा किया हो। पर, यहां आदिवासी भाााएं और गीत भी हैं। हूल के गीत, जो उत्प्रेरित करते हैं। एक शोधार्थी और एक प्रोफेसर भी है, जो इतिहास को सही करने और देखने के लिए वार्तालाप करते हैं। उनका वार्तालाप हमें इतिहास की ओर ले जाता है। इन तीनों उपन्यासों में एक कोई जरूर है, जो हमें अतीत की ओर ले जाता है। यह जरूरी इसलिए है कि हम बहुत कुछ आदिवासियों के बारे में नहीं जानते। खैर, ये तीनांे उपन्यास झारखंड के तीन जातियों का दिग्दर्शन कराते हैं।