मंगलवार, 28 अप्रैल 2015

रंगों की बारिश में उड़ती कटी पतंगें

कला और कलाकार एक दूसरे के पूरक हैं। कलाकार है तो कला है। कला है तो कलाकार हैं। रांची में कला का एक माहौल विकसित हो रहा है। तमाम युवा कलाकार सक्रिय हैं। राज्य की सरकार भी 14 सालों के बाद सक्रिय हुई है। हालांकि अभी तक यहां कोई आर्ट कालेज नहीं खुल सका है, जिसकी मांग यहां के कलाकार सालों से करते आ रहे हैं। फिर भी अपने स्तर से कलाकार एक माहौल तो बना ही रहे हैं। समय-समय पर मेकॉन जैसी संस्थाएं भी आगे बढ़कर कलाकारों की मदद करती हैं। इन्हीं कलाकारों में एक नाम कृष्णा प्रसाद का है।  
1975 में जन्मे कृष्णा प्रसाद कला के क्षेत्र में अपनी एक अलग पहचान बनाई है। वैसे, वे डीएवी गांधी नगर, सीसीएल में वरिष्ठ कला शिक्षक हैं। पर यह किसी कलाकार की कोई बड़ी खासियत नहीं होती है। खासियत उनकी अपनी कला है। रंग वही, ब्रश वही, लेकिन काम करने का तरीका उनका अपना अलग है। वे अपने कैनवस पर रंगों की बारिश करते हैं। बारिश के बाद जैसे रंग ऊपर से नीचे एक लय में गिरते हैं और फिर जैसे बूंद सागर मे मिल जाती है, अंत भी कुछ ऐसा ही होता है। लाल, हरा, गुलाबी, पीला...ये चटख रंग हैं, लेकिन जल मिलाकर उसे हल्का कर लेते हैं। पूरा कैनवस एक अलग रंग में रंग जाता है। वह अपनी पृष्ठभूमि ऐसे ही बनाते हैं। इसके बाद आकृतियां आकार लेने लगती हैं। चेहरे से बाहर होती खुली एकटक निहारती आंखें। गोल, अंडाकार चेहरे। चटख रंग के कपड़े। कुछ तस्वीरों में वह आदिवासी संस्कृति को जीवंत करते हैं। मकानों पर पारंपरिक चित्रकारी, गांव का वातावरण, आस-पास झूलते पेड़। पहनावे में आदिवासी संस्कृति के साथ बांग्ला संस्कृति की छाप। इस तरह वह अपने समकालीन यथार्थ से मुठभेड़ करते हैं। रंग भी अपना प्रतिरोध दर्ज करते हैं। कृष्णा के काम का देखकर यह कह सकते हैं। 
    कृष्णा की दूसरी पहचान भी है। वे थोड़ा समय चुराकर झारखंड के ग्रामीण अंचलों में घूमकर कला के प्रति बच्चों में जाग्रति भी पैदा कर रहे हैं। खुद के साथ बच्चों को भी कला के बारे में प्रशिक्षण देकर उन्हें आगे बढ़ाते हुए कला की समझ बढ़ा रहे हैं। वे फिलहाल, समकालीन कला पर काम कर रहे हैं। अपने गुरु जयपाल प्रसाद से प्रेरणा लेकर। पटना विश्वविद्यालय से कला में स्नातक कृष्णा ने खादी मेले में राज्य सरकार द्वारा आयोजित कला प्रदर्शनी में अहम भूमिका निभाई। इस तरह वे अपने सामाजिक सरोकारों को भी निभाते हैं।

'घेरे के बाहरÓ ही रहे द्वारका प्रसाद

     आज की पीढ़ी द्वारका   प्रसाद नाम के किसी रचनाकार से परिचित नहीं होगी, जबकि उन्हें दिवंगत हुए महज एक दशक ही बीते हैं। झारखंड का एक छोटा सा जिला है लोहरदगा। कभी रांची लोहरदगा में थी। अब रांची भी अलग जिला बन गई। इसी लोहरदगा में नौ अप्रैल, 1917 को द्वारिका प्रसाद का जन्म हुआ था और रांची में 21 जुलाई, 2005 को अंतिम सांस ली। उनकी पढ़ाई लोहरदगा, पटना और कोलकाता में हुई। घर से काफी संपन्न रहे। कोलकाता विश्वविद्यालय से उस समय उन्होंने मनोविज्ञान में एमए में टॉप किया और खूब चर्चा बटोरी थी। लिखने की लत बचपन से ही लग गई थी। महज 12 साल की उम्र में, जब बच्चे खेलते हुए बड़े होते हैं। उस समय की उनकी बालोपयोगी रचनाएं स्व. रामनरेश त्रिपाठी की पत्रिका 'बानरÓ में छपा करती थीं। बालकों के लिए लिखी गई उनकी कहानियां आगे चलकर 'परियों की कहानीÓ नाम से प्रकाशित हुईं। आगे चलकर 'जागरणÓ में भी छपे।
 प्रतिभा का अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि 30 साल की उम्र में महज एक महीने में भारी-भरकम उपन्यास 'घेरे के बाहर लिखाÓ। छपते ही तहलका मच गया और रातोंरात चर्चा में आ गए। यह उपन्यास 1948 में छपा। मेरे पास जो संस्करण है, वह 1976 का है। यह पांचवां संस्करण है। लेखक ने इसका रचनाकाल भी बताया है। कब शुरू हुआ और कब खत्म। सूचना दी है, प्रारंभ 23-9-1947 और समाप्ति 20-10-1947। यानी, 617 पेज के उपन्यास को लिखने में महज एक महीने लगे। हालांकि हिंदी जगत में रातोंरात अपनी जगह बनाने वाली इस रचना को साहित्य के शुचितावादी पंडित पचा नहीं सके। शायद हिंदी में यह समय से बहुत पहले लिख दी गई थी। एक अजीब प्रेम कहानी। मन की परतों और सामाजिक वर्जनाओं को तोड़ती हुई। आज की भाषा में इसे बोल्ड और बिंदास कह सकते हैं। ऐसा उपन्यास, जिसे आचार्य नलिन विलोचन शर्मा ने इसे हिंदी के दस सर्वश्रेष्ठ उपन्यासों में रखा तो शिवचंद्र शर्मा के दृष्किोण द्वारा आयोजित गैलपपोल में में इसे तत्कालीन उपन्यासों में चौथा स्थान हासिल हुआ। मजा यह कि दूसरी तरफ ऐसे आलोचकों का भी एक वर्ग था, जो घोर दुराग्रही, हठी और अपने ही संस्कारों का गुलाम था और इसे बहुत ही तंग नजरिये से देखता था। उसे यह उपन्यास भी यौनकुंठा ही लगा। इनका पलड़ा भारी रहा। इनकी वाचलता का असर यह हुआ कि तब के केंद्रीय शिक्षा मंत्राी अबुल कलाम आजाद ने उसे शिक्षण संस्थाओं और सार्वजनिक पुस्तकालयों के लिए प्रतिबंधित कर दिया और उस समय के बिहार के तत्कालीन शिक्षा सचिव जगदीश चंद्र माथुर ने 'आपत्तिजनक प्रेस सामग्री अधिनियमÓ के तहत जब्ती का आदेश दे दिया। तत्कालीन बिहार, तब झारखंड भी उसमें था, किताब दुकानों से उपन्यास को जब्त कर लिया गया या फिर जब्ती की भनक लगते ही दुकानदारों ने खुद ही अपनी दुकानों से इसे हटा दिया। आलोचकों की बात छोड़ दें तो हिंदी के किसी साहित्य के इतिहासकारों ने उनकी रचनाओं की चर्चा करना भी मुनासिब नहीं समझा। वैसे हिंदी का जो घेरा था, वह आज भी बहुत संकीर्ण ही है, जहां झारखंड जैसे इलाके के मौलिक रचनाकार उनके घेरे से बाहर ही हैं। राधाकृष्ण को कहां वह स्थान मिला, जिसके वे हकदार रहे।
बहरहाल, 'घेरे के बाहरÓ उनकी आपबीती थी या जगबीती, कहना मुश्किल है, लेकिन यह यथार्थ से परे नहीं थी। रांची के मशहूर पुस्तक विक्रेता इंदुजी ने पुराने बंडलों में से इसे खोज निकाला। प्रतिबंध के बाद सालों से बंडल में ही पड़ी रही, जिसमें से अधिकांश को दीमक ने अपना ग्रास बना लिया था, किसी तरह एकाध प्रति ऐसी मिली, जिसे दीमक निवाला बनाने जा रहे थे। 'घेरे के बाहरÓ पाठकों द्वारा खूब पढ़ी गई और एक बार राजेंद्र यादव ने अपने हंस के संपादकीय में इसका जिक्र किया कि कैसे इस उपन्यास को तकिए के नीचे छिपाकर लोग पढ़ा करते थे।
 जाने-माने लेखक डॉ. श्रवणकुमार गोस्वामी से एक बार उनके आवास पर जब  द्वारका  प्रसाद के बारे में चर्चा छेड़ी तो उनकी दूसरी महत्वपूर्ण कृति 'पहिएÓ अपने बुकशेल्फ से ले आए। 'घेरे के बाहरÓ ने ऐसी मानसिकता पैदा की कि उनकी सबसे महत्वपूर्ण कृति 'पहिएÓ भी चर्चा से वंचित ही रही। जबकि पहली बार रांची से यह 1963 में प्रकाशित हुई और बाद में 1967 में दिल्ली से। द्वारिका प्रसाद अपने मुंबई प्रवास के दौरान एक बड़े अखबार समूह टाइम्स आफ इंडिया में काम किया था। वहां जो देखा, महसूस किया, उसे ही अपने इस उपन्यास में उतार दिया। किसी प्रकाशन समूह के अंदर लोगों के पिसने की कहानी पहली बार हिंदी में आई थी, लेकिन हिंदीवालों ने इसे कोई तवज्जो दिया ही नहीं जबकि 1967 में द्वारिका प्रसाद को लिखे पत्र में यशपाल ने इसकी खूब तारीफ की थी। यही नहीं, कुल डेढ़ दर्जन से अधिक उनके उपन्यास हें। दर्जनों कहानियां हैं। नाटक, ललित निबंध हैं। फिर भी हिंदी साहित्य समाज के घेरे से बाहर ही रहे। जब उनकी रचनाएं समाज, परिवार के भीतर दोहरे मापदंड के नकाब को उतारती हैं। कई कहानियां तो रांची से प्रकाशित होने वाली पत्रिका 'आदिवासीÓ में भी दिखीं।
अपने एक लेख, 'मैं उपन्यास कैसे लिखता हूं, में  द्वारका  प्रसाद अपने मन की गांठ खोलते हैं, 'प्रारंभिक परियों की कहानियों और शिकार कथाओं के लेखन की अवस्था से गुजरने के बाद मैंने हर प्रकार के अन्याय, अत्याचार, पांखड, चाहे वे सामाजिक थे, आर्थिक थे अथवा धार्मिक आदि के विरोध के उद्देश्य से लिखा। मैंने हमेशा व्यक्ति की महत्ता को सामने रखा। मैंने देखा था कि समाज के नाम पर समूह व्यक्ति को लगातार पीस रहा है। जो संपन्न थे, वे गरीबों को कुचल रहे हैं। सबसे अधिक पुरुष स्त्रियों का शोषण कर रहे हैं। पुरुष और स्त्री के आचरणों के दो अलग-अलग एक दूसरे के विपरीत मापदंड हैं। यह डबल स्टैंडर्ड मुझे हमेशा से कचोटता रहता हैै।Ó दरअसल, द्वारिका प्रसाद की रचनाओं का यही मूल स्वर है, जिसे वह अपने उपन्यासों में विन्यस्त करते रहे। पर यह घेरेबंदी वाले आलोचकों को नागवार लगता, जिसका खामियाजा इस लेखक को भुगतना पड़ा। हालांकि एक कमी भी उनमें थी। वह अपनी रचनाओं को दुबारा नहीं पढ़ते थे। एक बार लिख दिया सो लिख दिया। 
 द्वारका  प्रसाद का एक दूसरा पक्ष भी था। वह साइको थेरेपिस्ट थे। दिल्ली, मुंबई, मसूरी आदि स्थानों में रहे और चिकित्सालय चलाई। मनोविज्ञान पर पर कई पुस्तकें लिखीं और उनकी कई पुस्तकें देश के कई विश्वविद्यालयों के पढ़ाई जाती थीं। अपने समय की सर्वाधिक चर्चित पत्रिका 'नर नारीÓ का लंबे समय तक संपादन किया। बाद में 'हमारा मनÓ और 'हमदोनोंÓ का भी संपादन किया। इसी दरम्यान 1943 से 1947 के बीच लखनऊ से पचास खंडों प्रकाशित प्रथम विश्वकोश विश्वभारती के मनोविज्ञान खंड का संपादन भी किया और लिखा भी। वे मन के चिकित्सक थे। कई तरह के 'मनÓ के मरीज उनसे मिलते और उन्हें अपनी रचनाओं के लिए आधार सामग्री मिल जाती। इसलिए, उनकी रचनाओं का बड़ा हिस्सा स्त्री-पुरुष के दैहिक संबंधों और वर्जनाओं के निषेध से जुड़ा हुआ है। ...सुनील एक असफल आदमी, गुनाह बेलज्जत, मौत और जिन्दगी, हत्या, मम्मी बिगड़ेंगी, हथौड़े और चोट, देवियां, प्यार, संबंध, जरूरत, किसकी प्रिया, मुक्ति, अनामी, कांता जैसी रचनाएं हमें आईना दिखाती हैं। पर, डर के मारे में हम आईना देखना नहीं चाहते क्योंकि आईना झूठ नहीं बोलता।  
  एक तीसरा पक्ष यह था कि वे अपने जीवन के उत्तराद्र्ध में फादर कामिल बुल्के से प्रेरणा लेकर शब्दकोश तैयार करने लगे। एस चंद कंपनी व राजकमल ने उनके कई कोशों को छापा। 2000 में उनका पहला कोश हिंदी-हिंदी शब्दकोश एंच चंद  एंड कंपनी से आया। दूसरा कोश हिंदी-इंगलिश-हिंदी कोश आया। यह बहुरंगी कोश है। राजकमल ने भी हिंदी-अंग्रेजी कोश व अंग्रेजी-हिंदी कोश को छापा। इतना काम करने के बावजूद भी वे हिंदी में अछूत करार दिए गए। इनके सारे कामों को दरकिनार भी कर दें तो श्रवणकुमार गोस्वामी के शब्दों में, घेरे से बाहर और पहिए जैसी रचना हिंदी में कतई नहीं हैं और उनकी उपेक्षा नहीं की जा सकती। हालांकि छिटपुट काली किंकर एवं विद्याभूषण ने अपने लेखों में उनको स्मरण किया है।    
 द्वारका जी का पारिवारिक पक्ष भी जान लेना जरूरी है। उन्होंने दो शादियां की थीं। पहली शादी 1940 में सत्यम्वदा के साथ और दूसरी शादी जब वे दिल्ली में रहते थे, संतोष के साथ 1955 में। दोनों पत्नी जीवित हैं। संतोष जी दिल्ली में रहती हैं। इनसे कोई संतान नहीं। सत्यम्वदा रांची में रहती हैं। इनके दो पुत्र हैं, बड़ा बेटा किरण कुमार अपने पुश्तैनी घर लोहरदगा में रहते हैं। अवकाशप्राप्त हैं। दूसरा मनोज कुमार रांची में व्यवसाय करते हैं। घेरे के बाहर को अपनी पहली पत्नी सत्यम्वदा को ही समर्पित की है। हमें घेरे से बाहर निकलकर एक बार फिर इसका पुनर्पाठ करना चाहिए।

कैनवस पर झांकते बुद़ध

पायल सोनी संकोची हैं। अपने बारे में कुछ नहीं बतातीं। पर उनका काम बोलता है। कोमल उंगलियां जब ब्रश पकड़ती हैं तब कोई जीवंत आकृति कैनवस पर उभर जाती है। पेंटिंग बचपन की आदत है। घर का माहौल भी कुछ कला-कला जैसा था। सो, स्कूल में मौका मिला। जब अवार्ड मिला तो हौसला भी बढ़ा। तब, प्रशिक्षण की चिंता हुई। रांची के ही मनोज सिन्हा से कला का प्रशिक्षण लिया। रंग और रेखाओं के महत्व को समझा। हर रंग अपना दर्शन है, उसकी पहचान है, इसे बखूबी जाना। इसी के साथ बीए भी पूरा किया। पिता के आकस्मिक निधन से मन को और मजबूत किया। परिस्थितियों से लडऩा सीखा। हिम्मत नहीं हारी। पिता ऊंचाइयों पर देखना चाहते थे। लेकिन मां ने साथ दिया। आर्थिक तंगी तो थी ही फिर भी पुणे से एनिमेशन का कोर्स किया। कोर्स करने के बाद वहीं जॉब भी मिल गया। बतौर कैरेक्टर डिजाइन काम करना शुरू कर दिया। काम आगे बढ़ा तो खुद प्रोडक्शन हाउस खोल दिया। कई उतार-चढ़ाव भी आए। संघर्ष जारी रहा। बहन ने भी साथ दिया। इसके बाद कई प्रोजेक्ट मिले। काम किया। महाभारत, रामायण, हनुमान आदि के एनिमेशन बने। पर परिस्थितियां एक जैसी नहीं रहती। समय भी परीक्षा लेता है। सो, एक बार फिर रांची आना पड़ा। पेंटिंग का सफर फिर शुरू हुआ। कई प्रदर्शनियों और कार्यशालाओं में भाग लिया। रांची, जमशेदपुर, एसपीटीएन, कला-संस्कृति विभाग, पलाश आदि की कार्यशालाओं में भाग लिया। बुद्ध की एक चर्चित पेंटिंग बनाई, जिसे मुख्यमंत्री रघुवर दास ने भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को भेंट किया। रांची के ही मशहूर कलाकार प्रवीण कर्मकार से भी सीखा। सीखने का क्रम जारी है। 
पर, पायल की पेंटिंग देखने से लगता है हम किसी परिपक्व कलाकार के काम को देख रहे हैं। आयल, वाटर और एक्रेलिक। तीनों में काम करती हैं। हालांकि अभी एक्रेलिक पर काम कर रही हैं। पायल अमूर्त में विश्वास नहीं करती। इसलिए, वह मूर्त काम करती हैं। बुद्ध प्रिय हैं। इसलिए, बुद्ध कहीं न कहीं उनके कैनवस से झांकते हैं। उनकी ध्यानस्थ मुद्राएं ध्यान खिंचती हैं। इसी तरह, इसे संयोग ही माने, बुद्ध के बाद देश में मूर्ति निर्माण शुरू हुआ, सो, पायल मूर्तियों को भी कैनवस पर साकार करती हैं। हजार-डेढ़ हजार साल पुरानी प्रतिमाएं कैनवस पर आकार ग्रहण करने के बाद सजीव लगने लगती हैं। काम में भी सजीवता दिखाई पड़ती है। एक-एक बारीकी देख सकते हैं। यदि प्रतिमाओं में कोई खरोंच है, दरार पड़ गई है, तो भी बहुत खूबी के साथ दर्शाती हैं। इधर, मध्यप्रदेश में होने वाली कला प्रदर्शनी की तैयारी कर रही हैं। वहां राष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शनी होनी है। निमंत्रण आ चुका है। सो, पेंटिंग बनाने में लगी हैं। पायल को प्राचीन प्रतिमाओं के साथ आदिवासी जीवन भी प्रिय है। सो, आदिवासी जीवन भी कागजों पर उतरता है।