मंगलवार, 8 दिसंबर 2015

फिल्मों में होगी गांव की वापसी : कमलेश पांडेय

फिल्मों में गायब होते गांव को लेकर फिल्म लेखक कमलेश पांडेय भी चिंतित हैं। वे इस बार जयपुर इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल (जिफ) के अध्यक्ष हैं। एक कार्यक्रम में भाग लेने रांची आए कमलेश पांडेय ने कहा कि सचमुच यह चिंता का विषय है। इस वजह को ढूंढना होगा? गांव तो मेरे अंदर आज भी जिंदा है। सोचना चाहिए कि आज भी गांव में 80 प्रतिशत आबादी निवास करती है। गांव में समस्याएं आज भी हैं। कहानियां भी हैं। 'लगानÓ के बाद तो गांव एकदम से गायब हो गए। खेती किसान छोड़ रहे हैं। चार करोड़ किसान आत्महत्या कर चुके हैं। पहले ऐसी स्थिति नहीं थी। किसान संघर्ष करता रहा है, लेकिन आत्महत्या नहीं करता था। सरकार ने भी किसानों को अपने हाल पर छोड़ दिया है। उसकी चिंता में मल्टीनेशनल कंपनियां हैं। हम अपने देश में ही किसानों का अपमान कर रहे हैं। जबकि आज भी जो इकोनॉमी है, कृषि आधारित ही है। किसानों के प्रति यही रवैया रहा हो अगले पचास साल में हम अनाज के लिए तरसेंगे और आधी आबादी भूख से मरेगी। जयपुर फिल्म फेस्टिवल में एक सत्र गांव पर केंद्रित रखा गया है। 

ग्लैमर देखकर आ रहे फिल्म बनाने
पांडेय ने कहा कि 90 प्रतिशत फिल्म बनाने वाले ग्लैमर देखकर आते हैं। उन्हें फिल्म की क्वालिटी से मतलब नहीं है। इनमें ऐसे धंधेबाज लोग ज्यादा है, जिनके पास अफरात पैसा है। ऐसे लोग एक करोड़ देकर शाहरूख खान के साथ डीनर करते हैं। ऐसे लोगों से क्या उम्मीद कर सकते हैं? इनका फिल्म के व्याकरण से कुछ लेना-देना नहीं है। दस प्रतिशत लोग ही ऐसे हैं, जिनके लिए फिल्म बनाना एक पैशन है। जुनून है। वे कुछ समाज को देना चाहते हैं। यह नगरी ऐसी है कि एक दूसरे से लोग झूठ बोलते हैं। सच कहने का साहस नहीं रखते।
आमिर को मुल्क की समझ नहीं
आमिर के साथ काम कर चुके कमलेश ने कहा कि आमिर को इस तरह का बचकाना बयान नहीं देना चाहिए। वे राजनीतिज्ञ नहीं हैं। इस मुल्क की विविधता को समझना चाहिए। अलग-अलग संवेदनाएं है। यह मुल्क क्या है, इसके रुट्स क्या हैं, इसे समझने की जरूरत है। आखिर वे मुल्क छोड़कर जाएंगे कहां? अमेरिका, जहां उन्हें कोई जानता नहीं। यूरोप...कौन जानता है? आमिर ने डिस्प्यूडैंसी शब्द का प्रयोग किया। यह बड़ा भारी शब्द है। नेताओं को तो कुर्सी की फिक्र है। वे इस तरह का बयान देते रहते हैं। उनके अंदर खालीपन है। पर आप तो समझदार हैं। 
पहली बार दिखेगा असल युद्ध
राकेश मेहरा के साथ 1962 के भारत-चीन युद्ध पर फिल्म बना रहे हैं। यह वस्तुत: शहीद जसवंत सिंह की बायोपिक है, लेकिन इसमें असल युद्ध दिखाई देगा। 1962 के युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए जसवंत सिंह की शहादत से जुड़ी सच्चाइयां बहुत कम लोगों को पता है। उन्होंने अकेले 72 घंटे चीनी सैनिकों का मुकाबला किया और विभिन्न चौकियों से दुश्मनों पर लगातार हमले करते रहे और तीन सौ चीनियों को मारा। जसवंत सिंह की शहादत से जुड़ी कुछ किंवदंतियां भी हैं। इसी में एक है कि जब रात को उनके कपड़ों और जूतों को रखा जाता था और लोग जब सुबह उसे देखते थे तो ऐसा प्रतीत होता था कि किसी व्यक्ति ने उन पोशाकों और जूतों का इस्तेमाल किया है। इसलिए उनकी पूजा आज भी होती है। उन्हें सेना ने पिछले साल ही रिटायर किया।
सेना का मिल रहा सहयोग
पांडेय ने बताया कि सेना ने काफी मदद की है। शोध के दौरान एक-एक जानकारी सेना ने मुहैया कराई है। जसवंत एक लीजेंड का नाम है। एक गरीब परिवार का लड़का। इस फिल्म में उस संवेदना को भी पकडऩे की कोशिश की गई कि आखिर जब सामने मौत खड़ी हो तो एक सैनिक क्या सोचता है? इस फिल्म में पहली बार युद्ध के कारणों की पहचान की गई है।