मंगलवार, 19 अप्रैल 2016

राम नवमी : बड़ागाई से 1952 में निकला था पहला महावीरी जुलूस

डा. बिरेंद्र साहु, अध्यक्ष, श्री महावीर मंडल, बडग़ाई।
श्री महावीर मंडल, रांची के तत्वावधान में 1929 से निकलने वाली शोभायात्रा की एक कड़ी में 1952 से ग्राम बड़ागांई का मुख्य अखाड़ा वेलटंगरा से भी शोभायात्रा प्रारंभ हुई थी। यों तो 1951 में ही श्रीराम नवमी महोत्सव शोभायात्रा निकालने के लिए द्वारिका महतो, सूरज मिस्त्री, दर्शन महतो, गणपत साहू, भवानी साहू, मलाल मिस्त्री, लोकनाथ महतो, बंधन उरांव, बहादुर पहान, जीवाधन महतो, दशरथ पहान आदि ने बेलटंगरा में बैठक की थी। लेकिन उस साल मुस्लिम समुदाय के विरोध एवं शांति समिति का गठन न होने के कारण प्रशासन ने शोभायात्रा निकालने की अनुमति नहीं दी। तब बेलटंगरा मुख्य अखाड़ा में ही एक चबूतरा बनाकर व आम की डाल का खूंटा गाड़कर एक महावीरी पताका लगाकर शुभारंभ किया गया।
1952 मेें पिछले साल के विरोध को देखते हुए गांव के प्रमुख लोगों ने श्री महावीर मंडल, रांची से संपर्क किया। उस समय के मंडल पदाधिकारियों किशोरी यादव, झन्नालाल यादव आदि ने सहयोग किया। प्रशासन से मिल-जुलकर लाइसेंस निर्गत करने एवं जुलूस का मार्ग निर्धारित कराने में उन लोगों ने मदद की। इस तरह इस शोभायात्रा की विधिवत शुरुआत 1952 में हुई। तय मार्ग से आज भी शोभायात्रा निकाली जाती है। 19 अप्रैल, 1956 प्रशासन ने सौ आदमी, पांच बजे, पांच तलवार, 25 लाठी, दो झंडा की अनुमति प्रदान की। जुलूस का लाइसेंस द्वारिका महतो के नाम निर्गत हुआ। 1953 में द्वारिका महतो के नेतृत्व में बेलटंगरा में श्री श्री हनुमान मंदिर का निर्माण कराया गया, जो आज भी है।
बड़ागाईवासी पहली बार 1952 में लगभग सात सौ से एक हजार की संख्या में स्त्री, पुरुष व बच्चे मिलकर रांची के महावीर चौक स्थित हनुमान मंदिर पहुंचकर मुख्य शोभायात्रा में शामिल होकर निवारणपुर स्थित राममंदिर में महावीरी पताका सहित पूजा-अर्चना की। ग्राम बड़ागाई में महाअष्टमी की रात अस्त्र-शस्त्र व गाजे-बाजे के साथ झांकी निकालने की परंपरा थी। अस्त्र-शस्त्र का प्रदर्शन करते हुए पूरे गांव में लोग घूमते थे। सभी महावीरी चबूतरे पर महावीरी पताका खड़ा करते थे। स्त्रियां लोकगीत गाती हुई जुलूस में शामिल होती थीं-
तुलसी कर बुदा तरे महावीर सपरालंय
आइज तो अंजनी कर कोरा में होवंय महावीर...जये-जयकी रामे-राम।

आज परंपरागत महावीरी पताका खड़े किए जाते हैं, लेकिन अस्त्र-शस्त्र की खनक एवं लोकगीतों की ठनक अब देखने-सुनने को नहीं मिलती। महानवमी को मुख्य अखाड़ा बेलटंगरा से श्री रामनवमी महोत्सव की शोभायात्रा निकाली जाती थी, जो पूरे गांव में महाअष्टमी की रात को खड़ा किए गए सभी महावीरी पताकों के साथ लेकर ग्राम भ्रमण कर मेडिकल चौक, करमटोली चौक, महावीर चौक होते हुए निवारणपुर जाती थी। हर घर से लोग इसमें शामिल होते थे। दिन में ग्राम भ्रमण एवं रात में निवारणपुर से वापसी के समय महावीरी पताकाओं का चरण धोकर धूप-अगरबत्ती दिखाती हुई महिलाएं आशीर्वाद प्राप्त करती थीं। हालांकि यह परंपरा आज भी कायम है।  
बड़ागाई की विशेषता यह रही कि होली के तुरंत बाद मंदिरों एवं अखाड़ों में ढोल-ढाक की गूंज व अस्त्र-शस्त्र संचालन का अभ्यास शुरू हो जाता था। रांची के मल्लाह टोली, लेक रोड, चर्च रोड, चुटिया आदि अनेक स्थानों पर होने वाली अस्त्र-शस्त्र प्रतियोगिता में लोग भाग लेते थे। प्रतियोगिताएं तो आज भी होती हैं, लेकिन यहां के लोग अब भाग नहीं लेते। पर, महावीरी जुलूस में यहां के लोग बढ़-चढ़कर भाग लेते हैं। बडग़ाई से लेकर तपोवन मंदिर तक जयश्री राम की गूंज तो सुनाई देती है।
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