मंगलवार, 19 अप्रैल 2016

एशो हे बोइशाख एशो-एशो...

पंकज मित्र,  वरिष्ठ कथाकार
शायद ही बांग्लाभाषी समुदाय का कोई सदस्य होगा, जिसकी स्मृति में कविगुरु रवीन्द्रनाथ ठाकुर का यह नववर्ष का आह्वान गीत गूंजता न हो। यह गीत सिर्फ बांग्ला नववर्ष का स्वागत गान मात्र नहीं, प्रतीक भी है कविगुरु की विश्वदृष्टि का, सत्यं शिवं सुंदरम की उनकी अवधारणा का, मानवता के प्रति उनकी शुभेषणाओं का। बचपन से ही गांव-मोहल्ले में 'पोइला बोइशाखÓ यानी बांग्ला कैलेंडर के प्रथम माह बैशाख के प्रथम दिवस के अवसर पर आयोजित होनेवाले छोटे-बड़े समारोहों में राष्ट्रगान की तरह ही अनिवार्यत: गाया जानेवाला यह गीत नववर्ष का आगमनी गीत तो है ही बांग्ला की जातीय स्मृति का अभिन्न अंग भी रहा है। शारदीय नवरात्र के आरम्भ होने से पूर्व जिस तरह 'महिषासुरमर्दिनीÓ या 'महालयाÓ का पाठ एवं गायन बंगभाषी समुदाय की नस-नाड़ी में स्फुरण भर देता है, वैसे ही एशो हे बोइशाख के गायन से नववर्ष के आगमन का संकेत रुधिर वाहिकाओं में नगाड़े की तरह बजने लगता है। कविगुरु के इस अमर गीत के बहाने आज हम इस पावन अवसर को उल्लसित हृदय से उर्जस्वित करेंगे। पता नहीं इतिहासविदों की इस स्थापना में कितना सत्य है कि बैशाख माह से आरंभ होनेवाल बांग्ला कैलेंडर की आवश्यकता मुगल सम्राट अकबर के समय में तब पड़ी, जब लगान-मालगुजारी-वसूली का कार्य हिजरी संवत के अनुसार संभव नहीं हो पाता था। बंगदेश का फसलचक्र ऋतुओं पर आधारित था और कारिंदे मालगुजारी वसूल करने आ जाते थे जब फसलें खेतों में ही खड़ी रहती थी। तब बादशाह अकबर ने अरबी विद्वान शिराजी को जिम्मेवारी दी कि ऋतुओं और फसल चक्र के अनुरूप दिन-तारीख को समायोजित किया जाए। कुछ विद्वान मानते हैं कि पिछले वर्ष की मालगुजारी चुका देने के बाद का उत्सव था 'पोइला बैशाखÓ। संभवत: मालगुजारी के उत्पीडऩ से मुक्ति के उत्सव के रूप में बादशाह ने ही उत्सव मनाने की रीत आरंभ करवाई हो। हर काल के और हर प्रकार के बादशाहों की यही तो खासियत है कि वे चालाक होते हैं। बंगभाषी समुदाय खासतौर पर बांग्लादेश के लोगों के लिए सांस्कृतिक प्रतिरोध की अर्थछवियां भी शामिल हैं इस उत्सव की निर्मिति में। तब के पूर्वी पाकिस्तान का बंगभाषी समुदाय पाकिस्तान सरकार के संस्कृति थोपने के अभियान के कारण बहुत उत्पीडि़त तथा सांस्कृतिक रूप से ठगा गया महसूस करता था। 60 के दशक में ही प्रतिरोध जोर पकड़ चुका था। कविगुरु की रचनाओं के पाठ-प्रदर्शन पर पाकिस्तान सरकार रोक लगा चुकी थी। अब जिस समुदाय का रग-रेशा ही कविगुरु और नजरूल जैसे कवियों की रचनाओं से निर्मित हुई हो, वह समुदाय भला यह अन्याय कैसे सहन करता। उसे तो प्रतिकार करना ही था। उत्पीड़क सत्ता की 'बांटो और राज करोÓ की नीति बंगभाषी समुदाय की जाति-धर्म से इतर सांस्कृतिक एकजुटता के आगे हार गई। 'छायानटÓ नाम के सांस्कृतिक संस्थान ने 'पोइला बैशाखÓ के दिन को प्रतिरोध दिवस के रूप में मनाने की ठानी और ढाका के रमण पार्क के बरगद तले आयोजित हुआ सांस्कृतिक समारोह, जिसमें कविगुरु का यह गीत उद्बोधन गीत बन गया। बाद में ढाका विश्वविद्यालय के सांस्कृतिक संस्थान 'चारूकलाÓ ने सांस्कृतिक झाकियां की शोभायात्रा निकालनी आरंभ की और 'पोइला बैशाखÓ बन गया एक राष्ट्रीय उत्सव।
बंगभाषी समुदाय इस उत्सव को धार्मिक-सांस्कृतिक एवं 'हालखाताÓ के रूप में व्यावसायिक आयाम भी देता है जब अल्पना, पूजा-पाठ, आनंद मेले एवं हिसाब-किताब के लिए नया खाता आरंभ करना और किसिम-किसिम के व्यंजन-मिठाइयां तो शामिल है ही। साथ-साथ सांस्कृतिक-आयोजनों का अविभाज्य अंग है कविगुरु का यह गीत- 'एशो हे बैशाख एशो-एशो। गीत की पंक्तियों से गुजरते हुए कविगुरु की वैश्विक दृष्टि बरबस ध्यान आकर्षित कर लेती है। बैशाख का आह्वान करते हुए कहते हैं कि तापस निश्वास के द्वारा मुमूर्ष को उड़ा दो। वर्षभर जो आवर्जना (कूड़ा-कर्कट, गंदगी, अपशिष्ट, असांस्कृतिक चीजें) जमा हो गई हैं वो सब दूर हो जाएं। कैसी उज्ज्वल दृष्टि, कैसी शुभेषणा, जिसकी आवश्यकता हम सभी को हमेशा रहती है-मूछे जाक ग्लानि/घूचे जाक जरा/अग्नि स्नाने शुचि होक घरा-संपूर्ण विश्व के कल्याण की कैसी अद्भुत कामना से ओत-प्रोत पंक्तियां - ग्लानि मिटे/हटे जरा (रोग-वार्धक्य)/अग्नि स्नान से शुचि हो धरा/लाओ तुम्हारा प्रलय शंख बजाओ/माया का कुंज्झटिजाल हटाओ/-कविगुरु भविष्य दृष्टा थे जैसे हर बड़ा कवि होता है। सिर्फ भारत ही क्यों सम्पूर्ण विश्व को आज कितनी आवश्यकता है इन शुभेषणाओं की जब जरा (रोग-वार्धक्य), माया (पूंजी) के कुंज्झटिजाल ने विश्व को घेर रखा है तो 'पोइला बैशाखÓ का प्रलय शंख निश्चित रूप से एक पल-पल नूतन होती धरा का संदेश लेकर आता ही है। इस संदेश को हम सुने-गुने और एक बेहतर दुनिया बनाने के स्वप्न को जीवित रखें। नववर्ष पर एक शुभकामना संदेश आप सबके लिए -
    'बोछोर शेषेर झरा पाता, बोललो उड़े एशे
    एकटि बोछोर पेरिये गेलो हावार साथे भेसे
    नोतून बोछोर आसछे ताके जोत्नो कोरे रेखो
    स्वप्नो गुलो शोत्ति होबे आशा निए थेकोÓ

(वर्षांत का झरता पात उड़ गया है कहकर
बीत गया एक और साल हवा के साथ बहकर
आ रहा है साल नया इसे बड़े जतन से रखना
सपने सच होंगे तुम्हारे बस तुम उम्मीद रखना।)
---