बुधवार, 27 जुलाई 2016

हैलो, हैलो माइक टेस्टिंग, एआइआर रांची

 हैलो, हैलो माइक टेस्टिंग। एआइआर रांची...। 1957 में आकाशवाणी से इसी तरह कार्यक्रम प्रसारित होते थे। लोग इस आवाज को भी सुनते। इसके



बाद तो समाचार की शुरुआत ही इस लहजे से होती थी...यह आकाशवाणी है, अब आप...से समाचार सुनिए। एक दौर में सूचना का एक मात्र स्रोत रेडियो हुआ करते थे। समाचार पत्र तो सुबह-सुबह आ जाते, लेकिन कोई दोपहर की घटना हो, संध्या की घटना हो तो उसके लिए आकाशवाणी ही एकमात्र माध्यम हुआ करता था। समाचार का समय निर्धारित था। सो, लोग ध्यान से समाचार सुनते। सिर्फ समाचार ही नहीं, मनोरंजन का भी स्रोत यही था। नाटक, रेडियो वार्ता, कहानियों का पाठ, कृषि से लेकर अन्य क्षेत्रीय कार्यक्रम भी प्रसारित होते। क्षेत्रीय भाषा में गीत-संगीत का प्रसारण भी होता।
रांची में 27 जुलाई, 1957 को आकाशवाणी केंद्र की स्थापना की गई। इसी साल इसका नाम आकाशवाणी रखा गया। इसके पहले इसका नाम भारती प्रसारण सेवा हुआ करता था। 1936 में इसका नाम ऑल इंडिया रेडियो था 1957 में आकाशवाणी।
रांची में केंद्र खुलने से छोटानागपुर को विशेष लाभ हुआ। यहां की स्थानीय भाषाओं में कार्यक्रम प्रसारित होने लगे। नागपुरी, मुंडारी, उरांव, हो, संताली भाषाओं की रचनाएं, गीत आदि का प्रसारण होता। डा. श्रवणकुमार गोस्वामी कहते हैं पहले केवल पटना में था। यहां के कलाकारों को मौका ही नहीं मिलता। जब खुलने की बात आई तो लोगों में काफी उत्साह देखा गया। जब उद्घाटन की तिथि आई तो कलाकारों के उत्साह का पूछना ही नहीं था। तब वेलफेयर सेंटर में इसका उद्घाटन हुआ। उद्घाटन आकाशवाणी के महानिदेशक जगदीश चंद्र माथुर एवं बिहार के राज्यपाल डा. जाकिर हुसैन ने किया था। शुरुआत में यहीं से इसका प्रसारण होता था। 
गोस्वामीजी कहते हैं आकाशवाणी केंद्र की स्थापना से यहां की बोलियों को एक नई शक्ति प्राप्त हुई। छोटानागपुर लोक साहित्य की दृष्टि से संपन्न क्षेत्र है। पर, लोगों ने छोटानागपुर की इस विशिष्टता की ओर ध्यान नहीं दिया। आकाशवाणी ने सभी बोलियों की सेवा की। बोलियों और लोक साहित्य का भी उद्धार होने लगा।
साहित्यकार डा. अशोक प्रियदर्शी कहते हैं कि उस समय हिंदी के प्रमुख साहित्यकार राधाकृष्ण यहां विशिष्ट अधिकारी थे। उस समय लाइव रिकार्डिंग होती थी। जब रिकार्डिंग के लिए लोग पहुंचते तो कह दिया जाता, खांसना है, खांस लीजिए, स्टूडियो में कोई आवाज नहीं होगी। आकाशवाणी से प्रसारण का मतलब था कि आप अमर हो गए। एक बार दो कहानियां भेजी। पर कोई जवाब नहीं आया। एक दिन सुना कि श्रवणकुमार गोस्वामी की कहानी प्रसारित हो गई। लगा, वे तो अमर हो गए। इसके बाद में एक पत्र लिखा लाल बाबू को। राधाकृष्ण लाल बाबू के नाम से ही चर्चित थे। उन्होंने पोस्टकार्ड लिखा और बुलाया। बाद में मेरी कहानी रिकार्ड की गई। उस समय मुझे 15 रुपये पारिश्रमिक मिला था। तब से आज तक आकावाणी से जुड़ा हूं।
आकाशवाणी ने रोजलिन लकड़ा को एक नई पहचान दी। उन्हें लोग सुगिया बहन के नाम से जानने लगे। 1964 से वह आकाशवाणी से जुड़ीं। वह यादों को साझा करती हुई कहती हैं कि उन दिनों हम लोगों की बातचीत, हम लोगों का हंसना, बोलना, हमारे श्रोताओं को बहुत अच्छा लगता था। उनके बहुत सारे प्रशंसा भरे पत्र आते थे। श्रोता हमारे कार्यक्रमों को सुनते थे और तारीफ करते थे। बातचीत की भाषा नागपुरी होती थी। वह बताती हैं कि कार्यक्रम को रोचक बनाने के लिए मगन भाई बहिरा का रोल करते थे। जब बाजार भाव में बताते थे कि आटे का यह भाव है तो मगन भाई जान बूझकर बहिरा बनकर वो आटे को भाटा समझ जाते और कहते, हां-हां सुगिया बहिन, हमके भाटा कर भाव बढिय़ा से बताय देउ, कालेकि हमके भाटा कर भरता बहुते सवाद लागेला।