सोमवार, 15 अगस्त 2016

जहां होती थी हर दिन एक शिवलिंग की पूजा


झारखंड में एक ऐसा जिला भी है, जहां हर दिन एक शिव लिंग पूजने की परंपरा है और उतने ही तालाब भी। हालांकि अब न उतने शिवलिंग हैं, न तालाब बचे हैं। उनके अवशेष देख सकते हैं। यही नहीं, कहा जाता है कि गांव के आस-पास महुआ के अनेक पेड़ भी थे। 
यह गांव है गुमला का आंजन, जहां पवन पुत्र हनुमान का जन्म हुआ। अब धीरे-धीरे यह धाम हो रहा है। श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ रही है। अभी संसद में राज्यसभा सांसद महेश पोद्दार ने भी इस मामले को उठाया कि क्यों न उसे एक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जाए। 
झारखंड एक तरह से शैव भूमि माना जाता है। इसलिए यहां प्राय: हरेक गांव में शिवलिंग मिल जाते हैं। टांगी नाथ भी शिव भूमि है और देवघर का तो क्या कहना?
शिव को रूद्र भी कहा जाता है और रूद्र के अवतार हनुमान कहे जाते हैं। आंजन इसी से जुड़ा है। यहां हर साल बड़ी संख्या में श्रद्धालु माता अंजना और महावीर के दर्शन को आते हैं। राजधानी रांची से 80 किलोमीटर दूर गुमला जिला के टोटो प्रखंड में  आंजन गांव स्थित है और यहीं वह आंजन धाम भी है।
पौराणिक आख्यानों में बहुत सी कहानियां है, पर यहां की लोक स्मृतियों में इंद्र, अहल्या से लेकर आंजन तक कथा जुड़ती है। आदिवासी बहुल इलाके में इनकी लोककथाओं में पूरा इतिहास दर्ज है। इसी विषय पर संतोष किड़ो का उपन्यास आया है, 'द इटरनल मिस्ट्रीÓ। इसमें आंजन ग्राम और हनुमानजी से संबंधित भ्रांतियों को अकाट्य उदाहरणों से पेश किया है। संतोष ने बताया कि शोध करके लिखा गया है। वह बताते हैं कि हनुमान का जन्म जहां हुआ था, वह पहाड़ी गुफा भी है। यहां घने जंगल के बीच पहाड़ पर मंदिर में स्थापित हनुमान जी को गोद लिए माता अंजना की प्रतिमा दुनिया में अकेली ऐसी प्रतिमा है। इसे बजरंगबली का ननिहाल भी माना जाता है। हालांकि दुर्गम पहाड़ी रास्ते की वजह से श्रद्धालुओं ने माता अंजना और बालक हनुमान की प्रतिमा को मूल स्थान से सात किलोमीटर पहले ही स्थापित कर दिया है।
365 शिवलिंग, 365 तलाब और 365 महुआ के पेड़
संतोष बताते हैं कि यहां के स्थानीय लोग इस बारे में जो जानकारी देते हैं, वह यह कि गर्भावस्था के दौरान माता अंजना ने 365 तलाबों में स्नान किया। हर दिन वह एक तालाब में स्नान कर  शिवलिंग पर जल चढ़ाती थीं। 365 जो महुआ के पेड़ थे, उस पेड़ से दातून तोड़ती थीं। हर दिन का यही उनका काम था। इसलिए यहां शिवलिंग, तालाब व महुआ पेड़ बिखरे पड़े हैं। अब बहुत से तालाब पाट दिए गए हैं। महुआ के पेड़ भी कुछ ही बचे हैं और शिवलिंग का भी यही हाल है। राज्य सरकार का अभी ध्यान नहीं गया है। कुछ मारवाड़ी युवा रांची से आंजन धाम की यात्रा करते हैं। कला-संस्कृति और पर्यटन विभाग यहां श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए सुविधा उपलब्ध कराए तो यह एक बड़ा पर्यटन केंद्र बन सकता है।  

सुभाष चंद्र बोस ने लिखा था मां को रांची से पत्र

                                                                                                                                    रांची
                                                                                                                                   रविवार

आदरणीय मां
मुझे काफी समय से कलकत्ता के समाचार नहीं मिले हैं। आशा करता हूं कि आप सब स्वस्थ होंगे। मैं समझता हूं कि आपने शायद समयाभाव के कारण पत्र नहीं लिखा है।
मेज दादा की परीक्षा कैसी रही? क्या आपने मेरा पूरा पत्र पढ़ लिया था? अगर आपने नहीं पढ़ा तो मुझे दुख होगा।
मां, मैं सोचता हूं कि क्या इस समय भारत माता का एक भी सपूत ऐसा नहीं है, स्वार्थरहित हो? क्या हमारी मातृभूमि इतनी अभागी है? कैसा था हमारा स्वर्णिम अतीत और कैसा है यह वर्तमान! वे आर्यवीर आज कहां हैं, जो भारत माता की सेवा के लिए अपना बहुमूल्य जीवन प्रसन्नता से न्यौछावर कर देते थे? आप मां हैं, लेकिन क्या आप केवल हमारी ही माता हैं? नहीं, आप सभी भारतीयों की मां हैं, और यदि सभी भारतीय आपके पुत्र हैं तो क्या आपके पुत्रों का दुख आपको व्यथा से विचलित नहीं कर देता? क्या कोई भी माता हृदयहीन हो सकती है? फिर क्या कारण है कि उसके बच्चों की ऐसी दुर्दशा होते हुए भी मां अप्रभावित बनी हुई है? मेरी मां, आपने सभी देशों की यात्रा की है, क्या भारतीयों की वर्तमान दशा को देखकर आपका हृदय रक्त के आंसू नहीं बहाता? हम अज्ञानी हैं और इसलिए हम स्वार्थी बन सकते हैं, लेकिन कोई मां कभी भी स्वार्थी नहीं बन सकती क्योंकि मां अपने बच्चों के लिए जीवित रहती है। अगर यह सच है तो क्या कारण है कि उसके बच्चे कष्ट से बिलबिला रहे हैं और वह फिर भी अप्रभावित है। तो, क्या मां भी स्वार्थी हो सकती है? नहीं, नहीं ऐसा कभी नहीं हो सकता, मां कभी स्वार्थी नहीं बन सकती। मां, केवल देश की ही दुर्दशा नहीं हो रही है। आप देखिए कि हमारे धर्म की हालत क्या है? हमारा ङ्क्षहदू धर्म कितना और कैसा पवित्र था और आज वह किस प्रकार पतन के गर्त में जा रहा है। आप उन आर्यों की बात सोचें जिन्होंने इस धरती की शोभ बढ़ाई थी और अब उनके पतित वंशजों को देखें। तो क्या हमारा सनातन धर्म विलुप्त होने जा रहा है? आप देखें कि किस प्रकार नास्तिकता, श्रद्धाहीनता और अंधविश्वास का बोलबाला है। इसी का परिणाम है कि इतना अधिक पाप और जन-जन के लिए दुख और कष्ट। देखिए कि जो आर्य जाति इतनी धर्मप्राण थी, उसी के वंशज आज कितने अधार्मिक और नास्तिक हो गए हैं। उस अतीत में मनुष्य का एकमात्र कर्तव्य ध्यान, प्रार्थना और उपासना था, जबकि आज कितने लोग हैं, जो जीवन में एक बार भी प्रभु को पुकारते हैं? बोलो मां, क्या यह सब देखकर और इन सब बातों को सुनकर तुम्हारा दिल नहीं दहल जाता, तुम्हारी आंखें नहीं डबडबा आतीं, तुम्हारा मन व्याकुल नहीं हो जाता? मैं नहीं मान सकता कि ऐसा नहीं होता। मां कभी हृदयहीन नहीं हो सकती।
मां, तुम अपने बच्चों की दुखद अवस्था को अच्छी तरह देखो। पाप, दुख-कष्ट, भूख, प्यार की प्यास, ईष्र्या, स्वार्थपरता और इस सबसे अधिक धर्म का अभाव, इन सबने मिलकर उनका अस्तित्व नारकीय बना दिया है। और अपने पवित्र सनातन धर्म की दुर्दशा पर भी दृष्टि डालो। देखो कि किस प्रकार वह लुप्ता होता जा रहा है। श्रद्धाहीनता, नास्तिकता और अंधविश्वास उसे पतन की ओर ले जा रहा है और कुरूप बना रहे हैं। इतना ही नहीं, आजकल धर्म के नाम पर इतने पापकर्म हो रहे हैं, पवित्र स्थानों में इतना अधर्म फैला है कि शब्द उसका वर्णन नहीं कर सकते। आप पुरी के पंडों की दुर्दशा देखिए, यह कैसी लज्जाजनक स्थिति है! कहां तो हमारे प्राचीन काल के पवित्र ब्राह्मण थे और कहां आज के पाखंडी ब्राह्मण! आज जहां कहीं भी थोड़ा बहुत धर्माचरण होता है, वहां कट्टरता और पाप हावी हो जाते हैं।
बड़े दुख की बात है कि हम क्या थे और क्या हो गए हैं। हमारा धर्म कहां से कहां पहुंच गया। मां, इन सब बातों को सोचकर तुम्हें बेचैनी नहीं होती, क्या तुम्हारे हृदय में पीड़ा से हाहाकार नहीं मच जाता।....
मेरी प्रभु से प्रार्थना है कि  मैं संपूर्ण जीवन दूसरों की सहायता में बिता सकूं। मुझे आशा है कि वहां सब कुशल हैं। यहां हम सानंद हैं। कृपया मेरे प्रणाम स्वीकार करें। और इस पत्र का उत्तर अवश्य दें।
सदैव आपका प्रिय पुत्र
सुभाष

35 की उम्र में शहीद हो गए तिलका

अंग्रेजों से लोहा लेने में तिलका मांझी और उसके संगठन की प्रमुख भूमिका रही। पूरा जंगलतरी का इलाका गोलियों और तीर-धनुष के बौछार से सहम उठा। अंग्रेजों की विशाल सेना के आगे तिलका माझी ने हार नहीं मानी। तिलका माझी पहला वह शहीद है, जिसने आजादी की अपनी कीमत चुकाई। तिलका ने अंग्रेजी शासन की बर्बरता के जघन्य कामों के विरुद्ध जोरदार तरीके से आवाज उठाई थी। इस वीर स्वतंत्रता सेनानी को 1785 में गिरफ्तार कर लिया गया और फांसी दे दी गई।
तिलका को जबरा पहाडिय़ा के नाम से भी
जंगल, तराई तथा गंगा आदि नदियों की घाटियों में तिलका मांझी अपनी सेना लेकर अंग्रेज़ी सरकार के सैनिक अफसरों के साथ लगातार संघर्ष करते-करते मुंगेर, भागलपुर, संथाल परगना के पर्वतीय इलाकों में छिप-छिप कर लड़ाई लड़ते रहे। क्लीव लैंड एवं सर आयर कूट की सेना के साथ वीर तिलका की कई स्थानों पर जमकर लड़ाई हुई। वे अंग्रेज़ सैनिकों से मुकाबला करते-करते भागलपुर की ओर बढ़ गए। वहीं से उनके सैनिक छिप-छिपकर अंग्रेज़ी सेना पर अस्त्र प्रहार करने लगे। समय पाकर तिलका मांझी एक ताड़ के पेड़ पर चढ़ गए। ठीक उसी समय घोड़े पर सवार क्लीव लैंड उस ओर आया। इसी समय राजमहल के सुपरिटेंडेंट क्लीव लैंड को तिलका ने 13 जनवरी, 1784 को अपने तीरों से मार गिराया। क्लीव लैंड की मृत्यु का समाचार पाकर अंग्रेज़ी सरकार डांवाडोल हो उठी। सत्ताधारियों, सैनिकों और अफसरों में भय का वातावरण छा गया।
एक रात तिलका मांझी और उनके साथी, जब एक उत्सव में नाच गाने की उमंग में खोए थे, तभी अचानक एक गद्दार सरदार जाउदाह ने संथाली वीरों पर आक्रमण कर दिया। इस अचानक हुए आक्रमण से तिलका मांझी तो बच गये, किन्तु अनेक वीर शहीद हो गए। तिलका मांझी ने वहां से भागकर सुल्तानगंज के पर्वतीय अंचल में शरण ली। भागलपुर से लेकर सुल्तानगंज व उसके आसपास के पर्वतीय इलाकों में अंग्रेज़ी सेना ने उन्हें पकडऩे के लिए जाल बिछा दिया।
तिलका एवं उनकी सेना को अब पर्वतीय इलाकों में छिप-छिपकर संघर्ष करना कठिन जान पड़ा। अन्न के अभाव में उनकी सेना भूखों मरने लगी। अब तो वीर मांझी और उनके सैनिकों के आगे एक ही युक्ति थी कि छापामार लड़ाई लड़ी जाए। तिलका मांझी के नेतृत्व में संथाल आदिवासियों ने अंग्रेज़ी सेना पर प्रत्यक्ष रूप से धावा बोल दिया। युद्ध के दरम्यान तिलका मांझी को अंग्रेज़ी सेना ने घेर लिया। अंग्रेज़ी सत्ता ने इस महान विद्रोही देशभक्त को बन्दी बना लिया। इसके बाद सन 1785 में एक वट वृक्ष में रस्से से बांधकर तिलका को फांसी दे दी गई। तब तिलका की उम्र महज 35 साल थी। आज तिलका को फिर से याद करने की जरूरत है। तिलका ने पहले पहल झारखंड में आजादी की अलख जगाई थी। वह पहला सिपाही था, जिसने अंग्रेजी सत्ता को चुनौती दी। 
जाना जाता था। बचपन से ही तिलका मांझी जंगली सभ्यता की छाया में धनुष-बाण चलाते और जंगली जानवरों का शिकार करते। कसरत-कुश्ती करना बड़े-बड़े वृक्षों पर चढऩा-उतरना, बीहड़ जंगलों, नदियों, भयानक जानवरों से छेडख़ानी, घाटियों में घूमना आदि रोजमर्रा का काम था। जंगली जीवन ने उन्हें निडर व वीर बना दिया था। किशोर जीवन से ही अपने परिवार तथा जाति पर तिलका ने अंग्रेजों का अत्याचार देखा था। गरीब आदिवासियों की भूमि, खेती, जंगली वृक्षों पर अंग्रेज़ी शासक अपना अधिकार किए हुए थे। आदिवासियों के पर्वतीय अंचल में पहाड़ी जनजाति का शासन था। वहां पर बसे हुए पर्वतीय सरदार भी अपनी भूमि, खेती की रक्षा के लिए अंग्रेज़ी सरकार से लड़ते थे। पहाड़ों के इर्द-गिर्द बसे हुए जमींदार अंग्रेज़ी सरकार को धन के लालच में खुश किये हुए थे। लेकिन वह दिन भी आया, जब तिलका ने बनैचारी जोर नामक स्थान से अंग्रेज़ों के विरुद्ध विद्रोह शुरू कर दिया।  तिलका के नेतृत्व में आदिवासी वीरों के विद्रोही कदम भागलपुर, सुल्तानगंज तथा दूर-दूर तक जंगली क्षेत्रों की तरफ बढ़ रहे थे। राजमहल की भूमि पर पर्वतीय सरदार अंग्रेज़ी सैनिकों से टक्कर ले रहे थे। स्थिति का जायजा लेकर अंग्रेज़ों ने क्लीव लैंड को मैजिस्ट्रेट नियुक्त कर राजमहल भेजा। क्लीव लैंड अपनी सेना और पुलिस के साथ चारों ओर देख-रेख में जुट गया। ङ्क्षहदू-मुस्लिम में फूट डालकर शासन करने वाली ब्रिटिश सत्ता को तिलका मांझी ने ललकारा और विद्रोह शुरू कर दिया।

पिठौरिया के दो गुमनाम क्रांतिकारी सिंदराय और बिंदराय

झारखंड की राजधानी रांची से करीब 18 किलोमीटर दूर पिठौरिया गांव में दो शताब्दी पुराना यह किला राजा जगतपाल सिंह का है, जो आज खंडहर में तब्दील हो चुका है। इस किले पर दशकों से हर साल आसमानी बिजली गिरती है, जिससे हर साल इसका कुछ हिस्सा टूटकर गिर जाता है।
पिठौरिया गांववासियों का मानना है कि इस किले पर हर साल बरसात के मौसम में बिजली गिरती है और किले का कोई भाग ध्वस्त हो जाता है। स्थानीय लोगों का मानना है कि ऐसा एक क्रांतिकारी द्वारा राजा जगतपाल सिंह को दिए गए श्राप के कारण होता है।
रांची के पिठौरिया स्थित वह ऐतिहासिक किला, जिसकी दीवारें अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लड़ाई में कुर्बानी देने वाले शहीदों और गद्दारों की कहानी आज भी सुनाती है। यह किला परगनैत(राजा) जगतपाल सिंह का है। इसी किले के निकट बना एक फांसी घर है, जिसमें आजादी की लड़ाई लडऩे वाले दर्जनों शहीदों को अंग्रेजों के इशारे पर फांसी पर लटकाया गया था।
दरअसल, सन 1831 ई. हुए कोल विद्रोह के नायक थे सिंदराय और बिंदराय, जिन्होंने आदिवासी आंदोलन का नेतृत्व किया था। इस विद्रोह के पीछे भी वही कारण थे। अंग्रेजों ने झारखंड के प्रवेश करने के साथ ही यहां अधिकार जमाना शुरू कर दिया। स्थानीय राजाओं को लोभ-लालच देकर अपने साथ मिलाया और नए लगान वसूली के लिए नए जमींदारों का एक वर्ग खड़ा किया। आदिवासी व्यवस्था से अनभिज्ञ अंग्रेज शासकों ने तरह-तरह के कर लगाने शुरू कर दिए। कर नहीं देने पर जुल्म की इंतहा बढ़ती गई। अंग्रेजों की क्रूरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जिस जंगल पर उनकी निर्भरता थी, जंगल आजीविका के साधन थे, उसी जंगल में उनके प्रवेश पर रोक लगा दी गई। वे न लकड़ी काट सकते थे न जंगल के अंदर अपने पशुओं को ले जा सकते थे। वनोपज का इस्तेमाल भी नहीं कर सकते थे। दूसरे, अंग्रेजों ने जमीनों की मनमानी बंदोबस्ती करने लगे। जिस जमीन को कोल-मुंडा या दूसरे आदिवासियों ने जंगल काटकर खेती लायक जमीन बनाई थी, वह नए कानून के तहत उनके हाथ से निकलने लगी थी। यह नया कानून आदिवासियों की समझ में नहीं आ रहा था। जबरदस्ती किसानों से कर वसूला जाने लगा। उनके परंपरागत पेय पदार्थ पर टैक्स वसूला जाने लगा। इनकी अपनी व्यवस्था पड़हा पंचायत को छिन्न-भिन्न किया जाने लगा। इस तरह धीरे-धीरे आदिवासियों के बीच अंग्रेजों के खिलाफ आग सुलगने लगी थी।
इस आग को और सुलगा दिया एक घटना ने। छोटानागपुर के राजा के भाई हरनाथ शाही ने अपनी जमींदारी के कुछ गांवों की खेती की जमीन पुश्त दर पुश्त खेती करने वाले आदिवासियों से छीनकर अपने प्रिय पात्रा कुछ मुसलमानों और सिखों को दे दी। सिंहभूम की सीमा के पास 12 गांव सिंदराय नाम मानकी के थे। बिंदराय मानकी और सिंदराय मानकी दोनों भाई थे। इनकी जमीन छीनकर सिखों को दे दिया गया। यही नहीं, मानकी के सिर्फ गांव ही नहीं छीने गए, उनकी दो बहने भी छीन ली गईं। सिखों ने उनके साथ बलात्कार किया। यही शिकायत मुसलमान फारमरों के खिलाफ भी थी। जफर नामक एक फारमर ने सिंहभूम के बंदगांव के मुंडा सुर्गा पर बड़ा अत्याचार किया था और उसकी पत्नी को भी उठा ले गया था। दिकुओं के इन कुकृत्यों ने आदिवासियों को जवाब देने को मजबूर कर दिया।
अत्याचार, उत्पीडऩ और अपमान के कारण आक्रोश बढ़ता गया। इसके बाद सिंगराय, बिंदराय और सुर्गा ने बंदगांव तथा रांची अंचल के सभी मुंडा लोगों की सभा बुलाई। सभा में दिकुओं और उनके संरक्षकों को तबाह करने का निर्णय लिया गया। इसके बाद इनके नेृतत्व में 11 दिसंबर, 1831 को यह विद्रोह फूट पड़ा। इनके नेतृत्व में सात सौ लोगों ने उन गांवों पर हमला बोल दिया, जो सिंदराय से छीन लिए गए थे। इन्होंने गांव को लूट लिए और गांव में आग लगा दी। दूसरे महीने जफर अली के गांव को पर हमला किया गया। जफर ही सुर्गा की पत्नी को उठा ले गया था। सारा गांव जला दिया गया। जफर अली, उसके दस आदमी और औरतों को भी मार दिया गया। इस विद्रोह 19 मार्च 1832 को कैप्टन विल्किंसन के नेतृत्व में सेना की टुकडिय़ों ने इस विद्रोह को दबा दिया। संयुक्त कमिश्नर विल्किंसन और डेंट ने, जिनकी नियुक्ति उस विद्रोह को दबाने के लिए हुई थी, विद्रोह की वजहों को रेखांकित करते हुए अपनी रिपोर्ट में लिखा- 'पिछले कुछ वर्षों के भीतर पूरे नागपुर भर के कोलों पर वहां के इलाकादारों, जमींदारों और ठेकेदारों ने 35 प्रतिशत लगान बढ़ा दिये हैं। परगने भर की सड़कें उन्हें (कोलों को) बिना किसी मजदूरी के बेगारी द्वारा बनानी पड़ी थीं। महाजन लोग, जो उन्हें रुपये या अनाज उधार दिया करते थे, 12 महीने के भीतर ही उनसे 70 प्रतिशत और कभी-कभी उससे भी ज्यादा वसूल कर लेते थे। उन्हें शराब पर लगाये गये कर, जिसकी दर तो चार आना प्रति घर के हिसाब से निश्चित थी, लेकिन जिसकी वसूली आम तौर पर इससे कहीं अधिक की जाती थी और उसके अलावे सलामी के रूप में प्रति गांव एक रुपया और एक बकरी भी ली जाती थी, से सख्त नफरत थी।....कोलों को अफीम की खेती नापसंद थी। ...हाल में वहां एक ऐसी डाक प्रणाली चलायी गयी थी, जिसका पूरा खर्च गांव के कोलों को वहन करना पड़ता था।....कोलों के बीच यह भी शिकायत का विषय था कि जो लोग बाहर से आकर नागपुर में बसे हैं, उनमें से बहुतों ने, जिनका कोलों पर बेतरह कर्ज लद गया है, अपने कर्ज की वसूली के लिए बहुत सख्ती की है। बहुत से कोलों को उनके नाम 'सेवक-पट्टाÓ लिख देना पड़ा है। यानी उनके हाथ अपनी सेवा तब तक के लिए बेच देनी पड़ी है, जब तक कर्ज अदा नहीं हो जाय। इसका मतलब है अपने आप को ऐसे बंधन में डाल देना कि उनकी पूरी कमाई का पूरा हकदार महाजन बन जाय और वे जीवन भर के लिए महाजन के दास बन जाएं।Ó
1831 में कोल विद्रोह के फूटने की शुरुआती वजहों के बारे लिखते हुए विल्किंसन ने 12 फरवरी, 1832 की अपनी रिपोर्ट में कहा-रांची जिला में ईचागुटू परगने के सिंहराय मानकी के 12 गांवों को कुछ बाहरी लोगों के हाथ ठीका दे दिया गया था। उन लोगों ने मानकी को न केवल बेदखल किया, वरन उसकी दो जवान बहनों को बहकाकर उनके साथ बलात्कार भी किया था। इसी तरह एक बाहरी ठेकेदार ने सिंहभूमि जिले के बंद गांव में एक मुंडा के साथ अत्याचार किया और उसकी पत्नी को भगा कर उसकी इज्जत बिगाड़ दी थी। अत्याचार से पीडि़त लोगों को जब इन्साफ करने वालों के यहां से इन्साफ नहीं मिला, तो उन्होंने सोनपुर, तमाड़ और बंदगांव परगनों के सभी कोलों को तमाड़ में लंका नामक स्थान पर एकत्रित होने का आह्नान किया। वहां उन्होंने फैसला किया कि वे अब उन पर हो रहे अत्याचारों को बर्दाश्त नहीं करेंगे। वे विरोध में आग लगाने, लूटने और खून करने की कार्रवाई शुरू करेंगे।Ó
रांची और सिंहभूम के कोल सब एक साथ लड़ाई के मैदान में कूद पड़े। सिंहभूम के हो भी इनके साथ आ मिले और लड़ाई और तेज हो गई और यह विद्रोह रांची ही नहीं, हजारीबाग, पलामू के टोरी परगने, मानभूम के पश्चिम हिस्से तक फैल गया। विद्रोही गांव-गांव जाते और जो भी गैर आदिवासी मिलते, उन्हें मौत के घाट उतार देते। उनके घरों को लूट कर जला देते। अनुमान लगाया जाता है कि इस तरह 800 से 1000 आदमी या तो मारे गए या वे अपने घर में जलकर मर गए। इसके साथ ही इन्होंने अत्याचारी जमींदारों को भी नहीं छोड़ा। तेजी से बढ़ते कोल विद्रोह को दबाने के लिए अंग्रेजों को बड़े पैमाने पर सैनिक कार्रवाई करनी पड़ी। कलकत्ता, बनारस, संभलपुर और नागपुर सभी दिशाओं से अंग्रेजी पलटनें मंगानी पड़ीं। कप्तान विल्किंसन छोटानागपुर पठार के उत्तरी छोर, पिठौरिया नामक स्थान पर 1832 में जनवरी के मध्य में पहुंचा। लेकिन उसका हमला फरवरी के मध्य में शुरू हुआ। पूरी सेना को तीन दलों में बांट कर पूरे प्रांत पर उत्तर से दक्षिण की ओर बढ़ते हुए हमला करने को कहा गया। भीषण संघर्ष हुआ। अंग्रेज सेना को बहुत नुकसान उठाना पड़ा। पिठाौरिया और रांची के बीच नगड़ी के विद्रोहियों ने तो आखिरी दम तक लडऩे की कसम खायी थी। वहां अंग्रेजों ने खास सेना भेजी। उसे स्पष्ट आदेश था कि वह हमला, कत्ल और बर्बादी करे। अंग्रेजों की उस सेना का तीन-तीन हजार विद्रोही कोल सैनिकों ने मुकाबला किया लेकिन अंग्रेज सेना की बर्बरता के सामने वे टिक नहीं सके। नगड़ी के बहादुर कोल विद्रोही एक-एक कर मारे गये। विद्रोहियों के नेता सुर्गा, सिंदराय और बिंदराय अंत तक लड़ते रहे। उन्होंने 19 मार्च, 1832 को आत्मसमर्पण कर दिया। हालांकि कोल विद्रोह के शांत होते ही मानभूम जिले में भूमिज जनजातियों का विद्रोह शुरू हो गया।

गुरुवार, 11 अगस्त 2016

रांची में थी मीना कुमारी की जमीन, अब दूसरे लोग काबिज

 अपने जमाने की मशहूर अदाकारा मीना कुमारी का वास्ता रांची से भी रहा है। वह कभी रांची आई या नहीं, लेकिन उनके नाम मोरहाबादी में 3.60 एकड़ जमीन थी। अब इस जमीन पर अवैध रूप से 32 लोग काबिज हो गए हैं। या फिर किसी ने फर्जी तरीके से मीना की जमीन की बिक्री कर दी। 
हालांकि मीना की जमीन की बिक्री नहीं की जा सकती थी, क्योंकि उन्होंने अपनी वसीयत में रांची की जमीन दान करने की बात कही गई थी।
उन्होंने अपनी वसीयत में लिखा है, ''मैं महजबीन उर्फ मीना कुमारी, बंबई भारतीय निवासी इस समय फ्लैट नं 111 लेंड मार्क, कार्टर रोड, बांद्रा-50 में निवासित, यह अपना अंतिम मृत्युलेख व वसीयतनाम अपनी स्वेच्छा व खुशी से बनाती व सूचित करती हूं।
मैं बंबई के श्री चांद बहादुर सक्सेना व लायंस क्लब इंटरनेशनल, बंबई के सभापति को अपने इस मृत्युलेख के उत्तरसाधक (एक्जीक्यूटर) नियुक्त करती हूं। मैं अन्य संपत्ति के अतिरिक्त निम्नलिखित संपत्तियों की अधिकारिणी हूं और मैं प्रत्येक के सामने लिखे अनुसार इस संपत्ति को मृत्यु के बाद देना चाहती हूं-
1-(क) फ्लैट नं 111, लैंड मार्क, ग्यारहवां माला, कार्टर रोड, बांद्रा, बंबई-50
(ख) 251, पाली हिल रोड, बांद्रा, बंबई-50, स्थित जमीन, जो कि कोजीहोमस को-आपरेटिव सोसायटी लि. को लीज पर दी हुई है, मेरे हिस्से के मेरे अधिकार, स्वत्व अधिकार व विशेषाधिकार
(ग) किशोर शर्मा व अन्य व्यक्तियों के पास मेरे विवादित पैसे में मेरे दावे व अधिकार
ऊपर लिखी चारों चीजें और रांची स्थित जमीन में मेरा अधिकार व दावा लायंस क्लब इंटरनेशनल को दिए जाएंगे और इन सबका मेरे नाम से एक ट्रस्ट बनाया जाएगा और इसकी आमदनी उक्त ट्रस्ट के माध्यम से व उक्त क्लब के आदेशानुसार नेत्रहीन व्यक्तियों के लाभ के काम में लाई जाएगी।ÓÓ

मीना कुमारी ने अन्य संपत्तियों का भी जिक्र किया है, उसे किसे देना है। कार से लेकर पुस्तक, गहने, निजी चीजें आदि का। छह मार्च, 1972 को यह वसीयनामा बना और इस पर गवाही के तौर दो अन्य लोगों वकील एसए शेट्टी व सीबी सक्सेना के हस्ताक्षर थे। सक्सेना मीना कुमारी के सचिव थे। 
सबको पता है कि मीना कुमारी का असली नाम माहजबीं बानो था। बंबई में 1 अगस्त 1932 को वह पैदा हुई थीं। उनके पिता अली बक्श भी फिल्मों में और पारसी रंगमंच के एक मंजे हुए कलाकार थे और उन्होंने कुछ फिल्मों में संगीतकार का भी काम किया था और वे एक अच्छे तबलावादक भी थे। मास्टर अली बक्श ही कभी रांची आए होंगे और उन्हें किसी ने जमीन दी होगी या खरीदी होगी। छह मार्च को उन्होंने अपनी वसीयत लिखी और फिर 31 मार्च को इस दुनिया से रुखसत हो गईं।  
लगभग तीन दशक तक अपने संजीदा अभिनय से दर्शकों के दिलों पर राज करने वाली ङ्क्षहदी सिने जगत की इस महान अभिनेत्री की जमीन करीब 32 लोग काबिज हैं। मीना के पिता के नाम यह जमीन थी। इसका खतियान भी है। इसके हिसाब से यह जमीन मोरहाबादी में है। 192 खाता नं 132 प्लाट नं 62 आरएस। खतियान में मास्टर अली बक्श वल्द शावल, साकिन गांगा थाना मीरा जिला सरगोदा (पंजाब) का जिक्र है। इस पर जो अभी काबिज हैं, उपसमाहर्ता ने इसकी सूची भी दी है-खाता नं, प्लाट नं, रकबा और रैयत का नाम भी है।  
मीना की कहानी सुनाने-बताने की जरूरत है। उनकी अदाकारी से कौन परिचित नहीं होगा। ऐसी शख्सियत का संबंध रांची से हो तो इस हमें गर्व करना चाहिए।  सामाजिक कार्यकर्ता हुसैन कच्छी कहते हैं कि मीना कुमारी का नाम रांची से जुडऩा ही बड़ी बात है। हमें उनकी स्मृति में कुछ न कुछ अवश्य करना चाहिए। वह लीजेंड थीं। वैसी अदाकारा आज तक नहीं हुई हैं। उनकी जमीन की खरीद-बिक्री नहीं हो सकती थी। यह जांच का विषय है कि आखिर, उस जमीन की बिक्री किसने की। भूराजस्व मंत्री को भी इस दिशा में पहल करनी चाहिए।