मंगलवार, 19 अप्रैल 2016

अकबर के काल में शुरू हुआ था पोइला बोइशाख

डा. रामरंजन सेन, ङ्क्षहदी-बांग्ला साहित्यकार।
आज पोइला बोइशाख 1423 बंगाब्द है। बंग समुदाय का नव वर्ष। आज ही के दिन समाज के सभी लोग उल्लास के साथ वर्ष वरण अर्थात नए साल का हार्दिक स्वागत करते हैं। विगत वर्ष में हमारा जो संकल्प साकार नहीं हुआ, उसे हम नए उमंग के साथ इस नए साल में पूरा करने एवं अपनी संस्कृति की रक्षा करने का संकल्प लेते हैं-नव वत्सरे करिलाम पण, लव स्वदेशेर दीक्षा। नव वर्ष का स्वागत करने के लिए कवि गुरु की भाषा में हम कहते हैं-पुरातन वस्तरेर जीर्ण क्लांत रात्रि, घुचे जाक ओरे यात्री।
एक समय था जब यह उत्सव व्यवसायी तथा परिवार तक ही सीमित था, लेकिन आज वर्षवरण उत्सव सामाजिक तथा सांस्कृतिक उत्सव बन गया है। यह बंगाब्द तथा नव वर्ष की सूचना कब और कैसे हुई-इसकी चर्चा होनी चाहिए। इस संदर्भ में विद्वानों में मतभेद तो है ही, लेकिन अधिकतर विद्वानों का कहना है कि 593 ईस्वी में 12 अप्रैल यानी पोएला बैशाख, बैसाख का पहला दिन, सोमवार, शैव धर्मावलंबी राजा शशांक ने गौड़ (वर्तमान में बंगाल)देश के सिंहासन पर आरोहण किया। उसी दिन से उन्होंने बंगला नव वर्ष अर्थात बंगाब्द प्रारंभ किया। उस समय से गणना की जाए तो 2016-593 यानी 1423। तो आज 1423 बंगाब्द है। इसके बाद बंगला नव वर्ष बादशाह अकबर के समय से प्रारंभ हुआ। अबुल फजल की आइने अकबरी से ज्ञात होता है कि अकबर के निर्देश से राजस्वमंत्री टोडरमल ने चैती फसल के बाद बंगाल में नई कर व्यवस्था बैशाख की पहली तारीख से शुरू की। उसी समय से नया हिसाब-किताब बैशाख से शुरू करने का नियम चल पड़ा। तब से व्यापारी लोगों ने इसी दिन से हाल खाता प्रारंभ किया। तब नए कपड़े पहनना, मंदिर या दुकान में हाल खाता की पूजा करना तथा घरों में स्वादिष्ट भोजन में ही नव वर्ष सीमित था, लेकिन 19वीं सदी के द्वितीयार्ध से यह सामाजिक एवं सांस्कृतिक रूप धारण कर लिया। हाल खाता का सिलसिला भले बंद हो गया हो, लेकिन नव वर्ष से जुड़ा उल्लास आज भी बरकरार है। अंधानुकरण के इस दौर में भी हमारी नई पीढ़ी भटक न जाए, इसलिए उन्हें भी इस उत्सव के साथ जुडऩे तथा अच्छा संस्कार देने के लिए हमें सचेष्ट होना चाहिए।
कवि गुरु रवींद्रनाथ ठाकुर ने ठीक कहा कि जिस तरह काल बैशाखी की आंधी पुराने सूखे पत्ते को उड़ा कर ले जाती है, उसी तरह हमारे जीवन में से पुराने वर्ष की सभी ग्लानि दूर हो जाती है। अत: मुद्दे जाक ग्लानि, घुचे जाक जरा, अग्नि स्नाने शुचि होक धरा।

पहला जुलूस महावीर चौक से सदर अस्पताल तक गया था

अशोक पागल, रंगकर्मी-लेखक।

चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि। उत्तम पुरुष श्री राम का जन्म। यानी रामनवमी। एक व्रत, एक त्योहार, एक उत्सव का दिन।
रामनवमी का पर्व पूरे छोटानागपुर में अपना एक विशेष महत्व रखता है। होली के बीतते ही रामनवमी की धूम शुरू हो जाती है। होली के बाद पडऩे वाले पहले मंगलवार को ही विभिन्न अखाड़ों में महावीरी पताका फहरने लगते हैं। जगह-जगह अस्त्र-शस्त्र संचालन का कौशल प्रदर्शन शुरू हो जाता है। मंगलवारी जुलूस अपर बाजार, महावीर चौक स्थित हनुमान मंदिर तक आता है। यहां हनुमानजी को भोग लगाया जाता है। उत्साही भक्त माथा टेकते हैं।
रामनवमी के एक दिन पहले अष्टमी को पौराणिक कथा पर आधारित आकर्षक झांकियों की प्रतियोगिता होती है। झांकी प्रतियोगिता का आयोजन श्री रामनवमी शृंगार समिति करती है। अनुष्ठान देर रात तक चलता है। इस दिन अखाड़ों, झंडाधारियों के अतिरिक्त दर्शकों की भीड़ उमड़ती है। आयोजन स्थल महावीर चौक होता है। अब डोरंडा, चर्च रोड आदि क्षेत्रों में भी झांकी प्रतियोगिता होने लगी हैं।
रामनवमी की मुख्य शोभायात्रा की विशालता का कहना ही क्या? लाखों लोग इस दिन सड़क पर उतरते हैं। चारों तरफ जयश्री राम का उद्घोष। हाथ में महावीरी पताका। घरों पर महावीरी पताका। इसके आरंभ की भी अनोखी कहानी है।
सन् 1928 में जमादार मौलवी के घर मुस्लिम लीग का गठन हुआ। इसी की प्रतिक्रिया में अपर बाजार, महावीर चौक के नेमन साहु के घर पर ङ्क्षहदू महासभा का गठन किया गया। महंत ज्ञान प्रकाश नागा बाबा इसके प्रथम अध्यक्ष हुए। मुहर्रम के समानांतर रामनवमी के अवसर पर शोभायात्रा निकालने की योजना सबसे पहले यहीं बनी। इस योजना में नेमन साहु, जगन्नाथ साहु, रामचंद्र साहु, कृष्ण लाल साहु, गंगाधर वर्मा, राम बड़ाइक आदि प्रमुख थे। 1929 में पहली बार राम नवमी की शोभायात्रा निकली थी। इस अवसर पर एकमात्र महावीरी झंडा निकला था और वह एकमात्र झंडा जगन्नाथ साहु का था। झंडा ढोने वाले थे अनिरुद्ध राम। साथ में नौवा टोली के 15-20 उत्साही नौजवान लाठी-भाला लेकर जै-जै करते चल रहे थे।
राम नवमी का यह पहला जुलूस अपर बाजार, महावीर चौक से निकल कर सदर अस्पताल गेट तक गया था। तब सदर अस्पताल का गेट मेन रोड पर, अल्बर्ट एक्का चौक से थोड़ा आगे था। जुलूस में दो हाथ रिक्शे भी शामिल थे, जिनमें से एक पर नंदकेश्वर पाठक व बुधना बतौर गायक बैठे थे। दूसरे रिक्शे पर खोखा और सूरज गोप ढोलक पर ठेका देते चल रहे थे।
सन् 1929 के बाद 1930 में भी रामनवमी शोभायात्रा का यही मोटा-मोटी स्वरूप था। इस बार भी इसका गंतव्य सदर अस्पताल गेट ही था। सन 1931 में जुलूस में दो झंडे शामिल हुए। इनमें से एक झंडा नेमन साहू का था व दूसरा कांग्रेसी झंडे की तरह तिरंगा था, जिसकी एक ओर चरखा व दूसरी ओर हनुमानजी की आकृति बनी हुई थी। यह झंडा किसका था, ज्ञात नहीं। इस वर्ष रामनवमी जुलूस चर्चा रोड स्थित महावीर मंदिर तक गया। सदर अस्पताल के गेट से आगे बढ़ाकर जुलूस चर्च रोड स्थित महावीर मंदिर तक गया था। सदर अस्पताल के गेट से आगे बढ़ाकर जुलूस को चर्च रोड, महावीर मंदिर तक ले ताने का श्रेय गुलाब नारायण तिवारी को जाता है। इस समय तक रामनवमी महोत्सव शोभायात्रा में गंगाधर वर्मा, जैन मुंशी, नान्हू गोप, शिवदीप सहाय, हंसेश्वर दयाल, गंगा प्रसाद बुधिया, राधाकृष्ण बुधिया आदि लोगों की भूमिकाएं उल्लेखनीय हो गईं।
सन 1935 में रामनवमी व मुहर्रम एक दिन पड़ा था। प्रशासन द्वारा दोनों ही जुलूसों पर रोक लगा दी गई। तब ङ्क्षहदुओं की ओर से राधाकृष्ण बुधिया व मुसलमानों की ओर से खान बहादुर हबीबुर्रहमान द्वारा बांड भरे जाने के बाद दोनों जुलूस निकले थे। इसी वर्ष रामनवमी जुलूस पहली बार डोरंडा के तपोवन स्थित राम मंदिर तक गया था। तब से अब तक रामनवमी जुलूस तपोवन मंदिर तक ही जाता है। इसी वर्ष महावीर मंडल के गठन की बात चली और सन 1936 में इसका गठन हुआ। तब से इस संगठन के माध्यम से ही इसका आयोजन होता आ रहा है।

एशो हे बोइशाख एशो-एशो...

पंकज मित्र,  वरिष्ठ कथाकार
शायद ही बांग्लाभाषी समुदाय का कोई सदस्य होगा, जिसकी स्मृति में कविगुरु रवीन्द्रनाथ ठाकुर का यह नववर्ष का आह्वान गीत गूंजता न हो। यह गीत सिर्फ बांग्ला नववर्ष का स्वागत गान मात्र नहीं, प्रतीक भी है कविगुरु की विश्वदृष्टि का, सत्यं शिवं सुंदरम की उनकी अवधारणा का, मानवता के प्रति उनकी शुभेषणाओं का। बचपन से ही गांव-मोहल्ले में 'पोइला बोइशाखÓ यानी बांग्ला कैलेंडर के प्रथम माह बैशाख के प्रथम दिवस के अवसर पर आयोजित होनेवाले छोटे-बड़े समारोहों में राष्ट्रगान की तरह ही अनिवार्यत: गाया जानेवाला यह गीत नववर्ष का आगमनी गीत तो है ही बांग्ला की जातीय स्मृति का अभिन्न अंग भी रहा है। शारदीय नवरात्र के आरम्भ होने से पूर्व जिस तरह 'महिषासुरमर्दिनीÓ या 'महालयाÓ का पाठ एवं गायन बंगभाषी समुदाय की नस-नाड़ी में स्फुरण भर देता है, वैसे ही एशो हे बोइशाख के गायन से नववर्ष के आगमन का संकेत रुधिर वाहिकाओं में नगाड़े की तरह बजने लगता है। कविगुरु के इस अमर गीत के बहाने आज हम इस पावन अवसर को उल्लसित हृदय से उर्जस्वित करेंगे। पता नहीं इतिहासविदों की इस स्थापना में कितना सत्य है कि बैशाख माह से आरंभ होनेवाल बांग्ला कैलेंडर की आवश्यकता मुगल सम्राट अकबर के समय में तब पड़ी, जब लगान-मालगुजारी-वसूली का कार्य हिजरी संवत के अनुसार संभव नहीं हो पाता था। बंगदेश का फसलचक्र ऋतुओं पर आधारित था और कारिंदे मालगुजारी वसूल करने आ जाते थे जब फसलें खेतों में ही खड़ी रहती थी। तब बादशाह अकबर ने अरबी विद्वान शिराजी को जिम्मेवारी दी कि ऋतुओं और फसल चक्र के अनुरूप दिन-तारीख को समायोजित किया जाए। कुछ विद्वान मानते हैं कि पिछले वर्ष की मालगुजारी चुका देने के बाद का उत्सव था 'पोइला बैशाखÓ। संभवत: मालगुजारी के उत्पीडऩ से मुक्ति के उत्सव के रूप में बादशाह ने ही उत्सव मनाने की रीत आरंभ करवाई हो। हर काल के और हर प्रकार के बादशाहों की यही तो खासियत है कि वे चालाक होते हैं। बंगभाषी समुदाय खासतौर पर बांग्लादेश के लोगों के लिए सांस्कृतिक प्रतिरोध की अर्थछवियां भी शामिल हैं इस उत्सव की निर्मिति में। तब के पूर्वी पाकिस्तान का बंगभाषी समुदाय पाकिस्तान सरकार के संस्कृति थोपने के अभियान के कारण बहुत उत्पीडि़त तथा सांस्कृतिक रूप से ठगा गया महसूस करता था। 60 के दशक में ही प्रतिरोध जोर पकड़ चुका था। कविगुरु की रचनाओं के पाठ-प्रदर्शन पर पाकिस्तान सरकार रोक लगा चुकी थी। अब जिस समुदाय का रग-रेशा ही कविगुरु और नजरूल जैसे कवियों की रचनाओं से निर्मित हुई हो, वह समुदाय भला यह अन्याय कैसे सहन करता। उसे तो प्रतिकार करना ही था। उत्पीड़क सत्ता की 'बांटो और राज करोÓ की नीति बंगभाषी समुदाय की जाति-धर्म से इतर सांस्कृतिक एकजुटता के आगे हार गई। 'छायानटÓ नाम के सांस्कृतिक संस्थान ने 'पोइला बैशाखÓ के दिन को प्रतिरोध दिवस के रूप में मनाने की ठानी और ढाका के रमण पार्क के बरगद तले आयोजित हुआ सांस्कृतिक समारोह, जिसमें कविगुरु का यह गीत उद्बोधन गीत बन गया। बाद में ढाका विश्वविद्यालय के सांस्कृतिक संस्थान 'चारूकलाÓ ने सांस्कृतिक झाकियां की शोभायात्रा निकालनी आरंभ की और 'पोइला बैशाखÓ बन गया एक राष्ट्रीय उत्सव।
बंगभाषी समुदाय इस उत्सव को धार्मिक-सांस्कृतिक एवं 'हालखाताÓ के रूप में व्यावसायिक आयाम भी देता है जब अल्पना, पूजा-पाठ, आनंद मेले एवं हिसाब-किताब के लिए नया खाता आरंभ करना और किसिम-किसिम के व्यंजन-मिठाइयां तो शामिल है ही। साथ-साथ सांस्कृतिक-आयोजनों का अविभाज्य अंग है कविगुरु का यह गीत- 'एशो हे बैशाख एशो-एशो। गीत की पंक्तियों से गुजरते हुए कविगुरु की वैश्विक दृष्टि बरबस ध्यान आकर्षित कर लेती है। बैशाख का आह्वान करते हुए कहते हैं कि तापस निश्वास के द्वारा मुमूर्ष को उड़ा दो। वर्षभर जो आवर्जना (कूड़ा-कर्कट, गंदगी, अपशिष्ट, असांस्कृतिक चीजें) जमा हो गई हैं वो सब दूर हो जाएं। कैसी उज्ज्वल दृष्टि, कैसी शुभेषणा, जिसकी आवश्यकता हम सभी को हमेशा रहती है-मूछे जाक ग्लानि/घूचे जाक जरा/अग्नि स्नाने शुचि होक घरा-संपूर्ण विश्व के कल्याण की कैसी अद्भुत कामना से ओत-प्रोत पंक्तियां - ग्लानि मिटे/हटे जरा (रोग-वार्धक्य)/अग्नि स्नान से शुचि हो धरा/लाओ तुम्हारा प्रलय शंख बजाओ/माया का कुंज्झटिजाल हटाओ/-कविगुरु भविष्य दृष्टा थे जैसे हर बड़ा कवि होता है। सिर्फ भारत ही क्यों सम्पूर्ण विश्व को आज कितनी आवश्यकता है इन शुभेषणाओं की जब जरा (रोग-वार्धक्य), माया (पूंजी) के कुंज्झटिजाल ने विश्व को घेर रखा है तो 'पोइला बैशाखÓ का प्रलय शंख निश्चित रूप से एक पल-पल नूतन होती धरा का संदेश लेकर आता ही है। इस संदेश को हम सुने-गुने और एक बेहतर दुनिया बनाने के स्वप्न को जीवित रखें। नववर्ष पर एक शुभकामना संदेश आप सबके लिए -
    'बोछोर शेषेर झरा पाता, बोललो उड़े एशे
    एकटि बोछोर पेरिये गेलो हावार साथे भेसे
    नोतून बोछोर आसछे ताके जोत्नो कोरे रेखो
    स्वप्नो गुलो शोत्ति होबे आशा निए थेकोÓ

(वर्षांत का झरता पात उड़ गया है कहकर
बीत गया एक और साल हवा के साथ बहकर
आ रहा है साल नया इसे बड़े जतन से रखना
सपने सच होंगे तुम्हारे बस तुम उम्मीद रखना।)
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राम नवमी : बड़ागाई से 1952 में निकला था पहला महावीरी जुलूस

डा. बिरेंद्र साहु, अध्यक्ष, श्री महावीर मंडल, बडग़ाई।
श्री महावीर मंडल, रांची के तत्वावधान में 1929 से निकलने वाली शोभायात्रा की एक कड़ी में 1952 से ग्राम बड़ागांई का मुख्य अखाड़ा वेलटंगरा से भी शोभायात्रा प्रारंभ हुई थी। यों तो 1951 में ही श्रीराम नवमी महोत्सव शोभायात्रा निकालने के लिए द्वारिका महतो, सूरज मिस्त्री, दर्शन महतो, गणपत साहू, भवानी साहू, मलाल मिस्त्री, लोकनाथ महतो, बंधन उरांव, बहादुर पहान, जीवाधन महतो, दशरथ पहान आदि ने बेलटंगरा में बैठक की थी। लेकिन उस साल मुस्लिम समुदाय के विरोध एवं शांति समिति का गठन न होने के कारण प्रशासन ने शोभायात्रा निकालने की अनुमति नहीं दी। तब बेलटंगरा मुख्य अखाड़ा में ही एक चबूतरा बनाकर व आम की डाल का खूंटा गाड़कर एक महावीरी पताका लगाकर शुभारंभ किया गया।
1952 मेें पिछले साल के विरोध को देखते हुए गांव के प्रमुख लोगों ने श्री महावीर मंडल, रांची से संपर्क किया। उस समय के मंडल पदाधिकारियों किशोरी यादव, झन्नालाल यादव आदि ने सहयोग किया। प्रशासन से मिल-जुलकर लाइसेंस निर्गत करने एवं जुलूस का मार्ग निर्धारित कराने में उन लोगों ने मदद की। इस तरह इस शोभायात्रा की विधिवत शुरुआत 1952 में हुई। तय मार्ग से आज भी शोभायात्रा निकाली जाती है। 19 अप्रैल, 1956 प्रशासन ने सौ आदमी, पांच बजे, पांच तलवार, 25 लाठी, दो झंडा की अनुमति प्रदान की। जुलूस का लाइसेंस द्वारिका महतो के नाम निर्गत हुआ। 1953 में द्वारिका महतो के नेतृत्व में बेलटंगरा में श्री श्री हनुमान मंदिर का निर्माण कराया गया, जो आज भी है।
बड़ागाईवासी पहली बार 1952 में लगभग सात सौ से एक हजार की संख्या में स्त्री, पुरुष व बच्चे मिलकर रांची के महावीर चौक स्थित हनुमान मंदिर पहुंचकर मुख्य शोभायात्रा में शामिल होकर निवारणपुर स्थित राममंदिर में महावीरी पताका सहित पूजा-अर्चना की। ग्राम बड़ागाई में महाअष्टमी की रात अस्त्र-शस्त्र व गाजे-बाजे के साथ झांकी निकालने की परंपरा थी। अस्त्र-शस्त्र का प्रदर्शन करते हुए पूरे गांव में लोग घूमते थे। सभी महावीरी चबूतरे पर महावीरी पताका खड़ा करते थे। स्त्रियां लोकगीत गाती हुई जुलूस में शामिल होती थीं-
तुलसी कर बुदा तरे महावीर सपरालंय
आइज तो अंजनी कर कोरा में होवंय महावीर...जये-जयकी रामे-राम।

आज परंपरागत महावीरी पताका खड़े किए जाते हैं, लेकिन अस्त्र-शस्त्र की खनक एवं लोकगीतों की ठनक अब देखने-सुनने को नहीं मिलती। महानवमी को मुख्य अखाड़ा बेलटंगरा से श्री रामनवमी महोत्सव की शोभायात्रा निकाली जाती थी, जो पूरे गांव में महाअष्टमी की रात को खड़ा किए गए सभी महावीरी पताकों के साथ लेकर ग्राम भ्रमण कर मेडिकल चौक, करमटोली चौक, महावीर चौक होते हुए निवारणपुर जाती थी। हर घर से लोग इसमें शामिल होते थे। दिन में ग्राम भ्रमण एवं रात में निवारणपुर से वापसी के समय महावीरी पताकाओं का चरण धोकर धूप-अगरबत्ती दिखाती हुई महिलाएं आशीर्वाद प्राप्त करती थीं। हालांकि यह परंपरा आज भी कायम है।  
बड़ागाई की विशेषता यह रही कि होली के तुरंत बाद मंदिरों एवं अखाड़ों में ढोल-ढाक की गूंज व अस्त्र-शस्त्र संचालन का अभ्यास शुरू हो जाता था। रांची के मल्लाह टोली, लेक रोड, चर्च रोड, चुटिया आदि अनेक स्थानों पर होने वाली अस्त्र-शस्त्र प्रतियोगिता में लोग भाग लेते थे। प्रतियोगिताएं तो आज भी होती हैं, लेकिन यहां के लोग अब भाग नहीं लेते। पर, महावीरी जुलूस में यहां के लोग बढ़-चढ़कर भाग लेते हैं। बडग़ाई से लेकर तपोवन मंदिर तक जयश्री राम की गूंज तो सुनाई देती है।
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पहली शोभायात्रा 17 अप्रैल 1929 को निकली थी

सुधीर लाल, लेखक
रांची में पहली रामनवमी की शोभायात्रा 17 अप्रैल, 1929 को निकली थी। यहां रामनवमी की शुरुआत हजारीबाग के रामनवमी जुलूस को देखकर किया गया था। हजारीबाग में रामनवमी जुलूस गुरु सहाय ठाकुर ने 1925 में वहां के कुम्हार टोली से प्रारंभ की थी। रांची के श्रीकृष्ण लाल साहू की शादी हजारीबाग में हुई थी। 1927 में रामनवमी के समय वे अपने ससुराल में थे और वहां की रामनवमी जुलूस को देखा। रांची आकर अपने मित्र जगन्नाथ साहू सहित अन्य मित्रों को वहां की रामनवमी के बारे में बताया। इसके बाद मित्रों में उत्सुकता जगी और 1928 में वहां की रामनवमी को देखने लोग हजारीबाग गए और इसके बाद 1929 में रांची में इसकी शुरुआत कर दी।
पहली शोभायात्रा 17 अप्रैल, 1929, दिन बुधवार को निकली। इसके लिए खादी का झंडा बनवाया गया। इसका रंग कत्थई था, जो आज भी सुरक्षित है। इस काम में श्रीकृष्ण लाल साहू के दोनों बड़े भाई लोकनाथ साहू व रामकृष्ण साहू का भी सहयोग रहा। श्रीकृष्ण साहू के पिता ठेसा साहू और जगन्नाथ साहू के पिता नेमन साहू ने दोनों को प्रोत्साहित किया और अलग से पैसे भी दिए। भुतहा तालाब निवासी अनिरुद्ध राम उन दिनों जगन्नाथ साहू के यहां कार्यरत थे। उन्होंने झंडे के लिए बांस काटा। रामनवमी के दिन ननकू की मां ने नेमन साहू की दुकान के समाने गोबर लीपकर पूजन स्थल और प्रसाद के लिए सेट तैयार किया। जगन्नाथ साहू की पत्नी कुम्हारिन देवी ने पूजा की तैयारी की। 17 अप्रैल की सुबह पंडित गुमान मिश्र ने पूजा करवाई। इसके बाद बजरंगबली की जय का घोष करते हुए श्रीकृष्ण लाल साहू, टेसा साव, कोल्हा साव, लोकनाथ साहू, रामकृष्ण लाल, गुमान मिश्र, जगदीश साव, भगवत दयाल साहू आदि थोड़े से मुहल्लेवासी झंडे को लेकर अमला टोली, वर्तमान श्रद्धानंद रोड होते हुए मेन रोड तक आए। आज जहां अल्बर्ट एक्का की प्रतिमा है, वहां एक बंगाली की दुकान हुआ करती थी। वहां का चक्कर लगाकर शोभायात्रा अमला टोली होते हुए वापस महावीर चौक लौट गई। शोभायात्रा के आगे अनिरुद्ध राम झंडे को और जागो मोची डंका बजाते हुए चल रहे थे। शोभायात्रा में शामिल सभी उपवास पर थे। इस पहली शोभायात्रा की चर्चा महीनों होती रही। उन दिनों रांची एक कस्बाई नगर था। उस समय अपर बाजार में ङ्क्षहदू-मुस्लिम की मिली-जुली आबादी थी। लगभग सभी के मकान कच्चे और खपरैल के थे। महावीर चौक के आस-पास ही आबादी थी। उसके आगे खेत और पेड़ों से भरा था। आज जहां दुर्गा मंदिर है, वहां पेड़ों का एक बगीचा था। इस तरह रामनवमी की शोभायात्रा यहां प्रारंभ हुई। आगे चलकर कुछ तनाव हुआ तो 1936 में श्री महावीर मंडल का गठन किया गया, जिसके पहले अध्यक्ष नागा बाबा ज्ञान प्रकाश बनाए गए। इसके बाद महावीर मंडल के नेतृत्व में ही शोभायात्रा निकलने लगी। मंडल का गठन होते ही रांची में उत्साह का वातावरण बन गया। इसके बाद यह शोभायात्रा तपोवन मंदिर तक जाने लगे। मुहल्लों में अखाड़ों का गठन किया जाने लगा। महावीर चौक पर गणेश मंदिर का भी निर्माण किया गया। आज शोभायात्रा और भव्य रूप में निकल रही है। हर दिन भीड़ बढ़ती जा रही है।