रविवार, 16 अक्तूबर 2016

हजारीबाग जेल में 21 दिन में लिखी थी 'वोल्गा से गंगाÓ

देश के महान घुमक्कड़ राहुल सांकृत्यायन ने वोल्गा से गंगा की रचना हजारीबाग जेल में की थी। इस महान कृति का यह 75 वां साल शुरू हो रहा है। 1942 में इसकी रचना हुई थी। 23 जून, 1942 को इसे किताब घर ने प्रकाशित किया था। खास बात यह है कि इसे महज 21 दिनों में लिखा गया था। इसका जिक्र उनकी धर्मपच्ी कमला सांकृत्यायन ने राहुल की कृति 'प्रभाÓ के नाट्य रूपांतरण की भूमिका में किया है। राहुल ने इस कृति के दूसरे संस्करण में यह जानकारी दी है कि प्रकाशित होने के सात-आठ महीने में ही इसका प्रथम संस्करण समाप्त हो गया था। इस कृति की मांग आज भी है और हर साल इसके संस्करण छपते हैं।
उत्तरप्रदेश के आजमगढ़ के एक गांव में अप्रैल 189
3 में पैदा हुए राहुल सांकृत्यायन ने विधिवत शिक्षा हासिल नहीं की थी और घुमक्कड़ी जीवन ही उनके लिए महाविद्यालय और विश्वविद्यालय थे। अपनी विभिन्न यात्राओं के क्रम में वह तिब्बत भी गए थे। वहां दुर्लभ बौद्ध साहित्य को एकत्र करने की दिशा में काफी काम किया। वहां से तिब्बत से बौद्ध धर्म की हस्तलिखित पोथियां खच्चरों पर लाद कर लाए और बाद में उनका यहां प्रकाशन भी करवाया। देखा जाए तो राहुल सांकृत्यायन की रचनाओं का दायरा विशाल है। उन्होंने अपनी आत्मकथा के अलावा कई उपन्यास, कहानी संग्रह, जीवनी, यात्रा वृत्तांत लिखे हैं। इसके साथ ही उन्होंने धर्म एवं दर्शन पर कई किताबें लिखीं। 'वोल्गा से गंगाÓ उनकी महान रचना है और सर्वाधिक बिक्री वाली भी। जिस शैली में यह पुस्तक लिखी गई है हिंदी में कम ही पुस्तकें इस शैली में हैं। प्रागैतिहासिक काल यानी पांच हजार से भी अधिक पुरानी सभ्यता से आधुनिक काल तक मानव की प्रगति का जिक्र करते हुए इस कृति की जो शैली है वह काफी रोचक एवं सरस है।
राहुल की इस विशेषता को देखते हुए आलेसांद्रा कोंसोलारो ने लिखा है राहुल (1893-1963) की पहचान एक बहुसर्जक महापंडित और बहुभाषी लेखक के रूप में है। विभिन्न विषयों पर लिखी गई उनकी कृतियां कम से कम पांच भाषाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। उन्होंने जीवन में जो कुछ भी हासिल किया अपने बल पर किया था। न उन्होंने कोई औपचारिक शिक्षा पाई थी, न उनका कोई स्थायी घर था और न ही कोई नौकरी। वह भगवान बुद्ध के इस दर्शन से प्रेरित थे कि ज्ञान एक नाव है जिस पर सवारी तो की जा सकती है, पर इसे सिर पर एक बोझ के रूप में नहीं रखा जा सकता है। दुनियाभर में अपने भ्रमण के लिए लोकप्रिय इस घुमक्कड़ ने कई यात्रा वृतांत्त लिखे, जिनका अध्ययन इतिहास, मानव भूगोल और दर्शनशास्त्र व संबंधित अन्य विषयों में किया जाता है। घुमंतुओं के लिए विशेष रूप से लिखी गई उनकी एक रचना घुमक्कड़ शास्त्र में दावा किया गया है, 'यायावरी ही मानव जीवन का पहला और अंतिम लक्ष्य है।Ó जब सभ्यताओं के बीच संघर्ष हो रहा है तो वोल्गा से गंगा का पुनर्पाठ एक बार फिर जरूरी हो जाता है।