शुक्रवार, 30 दिसंबर 2016

के.बी.सहाय- एक विस्मृत महानायक


राजेश सहाय


पिछले दिनों मेल में एक अलग ही निवेदन भरा मेल मिला- यदि 'छोटानागपुर दर्पण' से सम्बंधित कोई जानकारी हो तो साझा करें। अच्छा लगा और साथ ही सुखद आश्चर्य भी। दरअसल इस दौर में कोई साठ के दशक में हजारीबाग से प्रकाशित होने वाली पत्रिका के बारे में जानकारी चाहे तो कौतुक होता है- कौतुक इसलिए भी क्योंकि इस 'छोटानागपुर दर्पण' को प्रकाशित करने वाले शख्शियत को सरकार तो क्या वरन देश की जनता भी बिसरा चुकी है। अत: कोई आज भी इन बिसरी बातों और विरासतों को सहेजने में लगा है यह कौतिक और हर्ष का विषय था। ख़ास कर मेरे लिए क्यों कि जिस 'छोटानागपुर दर्पण' पत्रिका की यहाँ चर्चा हो रही है उसके प्रकाशक संपादक मेरे पितामह और संयुक्त बिहार के झारखण्ड क्षेत्र से आने वाले एकमात्र मुख्यमंत्री श्री कृष्ण बल्लभ सहाय थे। अपने पितामह के सम्बन्ध में जानकारी जुटाने में इधर कुछ वर्षों से लगा हूँ। क्यों? इसे जान कर शायद आप भी आश्चर्य में पड़ जाएँ। एक ज़माने में बिहार के सबसे प्रभावशाली नेता जिसे "द इंडियन नेशन' अखबार ने "बिहार के लौह पुरुष" की उपाधि से नवाज़ा था, पर 'स्वतंत्रता सेनानी' शृंखला में जब मैंने भारत सरकार के डाक विभाग से डाक टिकट जारी करने की गुज़ारिश 2014 में की, तो मुझे भी मालूम नहीं था कि इस छोटे से निवेदन को मूर्त रूप देने में मुझे नाकों चने चबाना पड़ेगा। मुझे इस बात का भान तक नहीं था कि यह देश अपने ही सपूतों को इतनी जल्दी भूल जायेगा। बहरहाल मुझे डाक विभाग से यह निर्देश मिला कि मेरे प्रस्ताव को "फिलाटेली सलाहकार समिति" के समक्ष रखने के लिए मुझे निर्धारित आवेदन पत्र भर कर औपचारिक रूप से आवेदन करना पड़ेगा और साथ ही साथ श्री कृष्ण बल्लभ सहाय के बारे में भारत सरकार अथवा राज्य सरकार के विश्वस्त सूत्रों के माध्यम से पुख्ता जानकारी उपलब्ध कराना होगा।
मुझे आश्चर्य हुआ कि क्या भारत सरकार को यह नहीं मालूम श्री कृष्ण बल्लभ सहाय बिहार के प्रमुख स्वतंत्रता सेनानियों में से एक थे? या फिर उन्हें यह नहीं मालूम कि श्री सहाय बिहार से संविधान सभा के कुछ सदस्यों में से एक थे जिन्होनें भारत के संविधान की रचना में अपना बहुमूल्य योगदान दिया था? क्या यह भी नहीं मालूम कि श्री सहाय स्वतंत्रता पश्चात् बिहार में गठित श्री कृष्ण सिन्हा की पहली सरकार में राजस्व मंत्री थे जिन्होनें ज़मींदारी उन्मूलन कानून पारित कर बिहार को ज़मींदारी उन्मूलन करने वाला प्रथम राज्य का दजऱ्ा दिलवाने में सफल रहे थे? जिनके ज़मींदारी उन्मूलन कानून को पटना उच्च न्यायलय ने निरस्त कर दिया था और जिसे पुन: उच्चतम न्यायलय में बहाल करवाने से पहले नेहरू को संविधान का पहला संशोधन विधेयक लाना पड़ा था। या यह भी नहीं कि उनके मुख्य मन्त्रित्व काल (1963-1967) में ही बिहार में सर्वाधिक औद्योगिक प्रगति हुई थी।
खैर इन बातों को भुला मैंने बिहार सरकार के विभिन्न विभागों से श्री कृष्ण बल्लभ सहाय के बारे में जानकारी उपलब्ध करवाने की अपील की।  साथ ही साथ हजारीबाग जेल (अब लोकनायक जय प्रकाश केंद्रीय कारागार) से जेल में काटे गए विभिन्न सजाओं के बारे में भी जानकारी उपलब्ध करवाने की अपील की। बिहार सरकार के लोक सूचना अधिकारी को भी मैंने जानकारी उपलब्ध करवाने के लिए लिखा।
हजारीबाग जेल अधीक्षक से मुझे यह सूचना मिली कि श्री कृष्ण बल्लभ सहाय द्वारा जेल में काटे गए सजाओं के बारे में जेल के रिकॉर्ड में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है। बिहार विधान सभा के प्रशाखा अधिकारी से सूचना मिली कि ज़मींदारी उन्मूलन विधेयक पेश करने से सम्बंधित कोई रिकॉर्ड बिहार विधान सभा सचिवालय में उपलब्ध नहीं है। बिहार सरकार के विधायी शाखा के अवर सचिव के माध्यम से मुझे सूचना मिली कि "बिहार भूमि सुधार अधिनियम 1951(ज़मींदारी उन्मूलन कानून)  एवं "बिहार टेनेंसी (संशोधन) एक्ट 1950' से सम्बंधित कोई दस्तावेज़ उनके पास उपलब्ध नहीं है। बिहार सरकार के राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग के लोक सूचना अधिकारी के माध्यम से यह जानकारी मिली की बिहार भूमि सुधर अधिनियम 1950 के सम्बन्ध में कोई दस्तावेज़ विभाग में उपलब्ध नहीं है। यानी जिस आधार पर बिहार सरकार देश में ज़मींदारी उन्मूलन करने वाला प्रथम राज्य बना उस सम्बन्ध में बिहार सरकार के पास आज की तारीख में कोई दस्तावेज़ है। न ही स्वतंत्रता सेनानियों के सम्बन्ध में सरकार के किसी भी जेल में कोई जानकारी उपलब्ध है।
तथापि विभिन्न समाचार पत्रों में श्री कृष्ण बल्लभ सहाय के बारे में स्वयं एकत्रित किये गए उपलब्ध सूचनाओं के साथ मैंने विधिवत रूप से डाक विभाग में 18 मई 2015 को आवेदन दाखिल किया और माननीय प्रधानमंत्री और तात्कालिक डाक मंत्री श्री रवि शंकर प्रसाद जी को इसकी एक प्रति देते हुए उनके हस्तक्षेप की अपील की। यह आवेदन भारत सरकार के डाक विभाग के पास पिछले 20 महीने से लंबित है। न कोई जवाब न ही डाक विभाग से मेरे आवेदन की स्वीकृति अथवा अस्वीकृति स्पष्ट सूचना देते हुए कोई पत्र।
झारखण्ड सरकार द्वारा झारखण्ड विभूतियों को सम्मानित करने के लिए विभिन्न आयोजन किये जाते हैं। मैंने झारखण्ड सरकार (वर्त्तमान सरकार से पहले की सरकारों से) से भी श्री कृष्ण बल्लभ सहाय को झारखण्ड विभूति से सम्मानित करने की अपील की जिस पर कोई कार्रवाई अब तक नहीं हुई। इन परिस्थितियों में जब बिहार के लौह पुरुष महानायक कृष्ण बल्लभ सहाय को अपने ही देश और राज्य की जनता ने बिसरा दिया वहां उनके द्वारा प्रकाशित सम्पादित "छोटानागपुर दर्पण" के बारे में किसी ने जब कोई जानकारी चाहे तो आश्चर्य होना सहज स्वाभाविक था। तथापि आज श्री कृष्ण बल्लभ सहाय की जन्म जयंती पर उन्हें याद करते हुए यह लेख उनकी स्मृतियों को समर्पित है।