शुक्रवार, 15 सितंबर 2017

सर अली इमाम ने बनवाया था अपनी बेगम के लिए अनीस महल


हजारीबाग रोड पर कोकर चौक से आधा किमी दूरी पर दाहिने एक मजार है। आने-जाने वाले इस मजार को जरूर देखते हैं, लेकिन यह मजार किसकी है, पता नहीं। यहां हर दिन अकीदतमंदों की भीड़ भी लगी रहती है। गुरुवार को यह भीड़ और बढ़ जाती है। पर, यह किसी सूफी की मजार नहीं। बल्कि यह मजार एक जज और नेता की है, वह नेता, जिसने पहली बार बंगाल से बिहार को अलग करने की मांग की थी और बाद में भारत की राजधानी कलकत्ता से दिल्ली ले जाने का प्रस्ताव दिया था। 



यह मजार, अली इमाम की है। 11 फरवरी 1869 को पटना जिले के नियोरा गांव में नवाब सैयद इमदाद इमाम के घर उनका जन्म हुआ था और 31 अक्टूबर, 1932 की रात रांची में उनका देहांत। मौत से चंद घंटे पहले अपने बेटे नकी इमाम को अपने बाग के एक गोशे में ले गए और छड़ी से जमीन के एक हिस्से पर निशान बनाया और कहा, इसी जगह मेरी कब्र बनेगी। उसी रात जब उन्हें दिल का दौरा पड़ा तो तमाम मलाजिमों को अपने पास बुलाया और सभी से माफी मांगी। उस सुबह


वे ठेकेदार पर बहुत गुस्सा हो गए थे, उसको भी बुलाकर माफी मांगी और बेटे नकी इमाम को का कि मेरे तमाम अजीजों, दोस्तों, रिश्तेदारों को मेरा सलाम कहना और कहना कि मेरी जात से अगर कोई तकलीफ पहुंची है तो मुझे माफ करें। इसी दौरान उन्होंने आखिरी सांस ली। सर अली इमाम के परदादा, खान बहादुर सैयद इमदाद अली पटना के सब ऑडिनेट जज के पद से रिटायर हुए। उनके बेटे, खान बहादुर शम्स-उल-उलेमा सैयद वाहिद-उद दीन पहले हिंदुस्तानी थे, जिन्हें जिला मजिस्ट्रेट बनाया गया था। अली इमाम के पिता सैयद इमदाद इमाम असर पटना कॉलेज में इतिहास के प्रोफेसर के साथ एक शायर भी थे। इनके बड़े भाई सैयद हसन इमाम भी जज रहे और उनका निधन 19 अप्रैल, 1933 को 61 साल की उम्र में जपला, पलामू में हुआ।

प्रेम की गवाह इमाम कोठी 
मजार के पीछे ही उनकी एक कोठी है। लाल ईंटों और सूर्खी से बनी। इसे लोग इमाम कोठी आज भी कहते हैं, लेकिन अब यह बिक गई है। इसे मालिक अब दूसरे हैं। पर सौ साल से ज्यादा पुरानी यह कोठी उसी तरह बुलंद है, जो स्कॉटिश कैसल स्टाइल में बनी है। लोग कहते हैं, यह कोठी प्रेम का प्रतीक है। अंग्रेजी हुकूमत के पहले बिहारी बैरिस्टर अली इमाम हैदराबाद डेक्कन के प्रधानमंत्री भी थे। अपनी बेगम अनीस फातिमा के लिए इसे बनवाया था। अनीस बेगम सर सैयद अली इमाम की तीसरी बेगम थी और उन्हीं के लिए उन्होंने रांची में यह इमारत बनवाई थी। उनकी चाहत तो यह थी कि मरने के बाद उनकी और उनकी बेगम की कब्र साथ रहे, जिससे वे मरकर भी जुदा न हों। लेकिन उनकी यह चाहत पूरी न हो सकी। उनकी मजार तो यहां बन गई। उन्हें यहां दफन भी कर दिया गया, लेकिन जब बेगम का निधन हुआ तो उस समय वे पटना में थीं और उन्हें पटना में ही दफन कर दिया गया, लेकिन आज भी एक मजार खाली है।

कोठी को बनने में लगे बीस साल 
इमाम कोठी को बनने में 20 साल लगे थे। इसका निर्माण सन् 1913 में शुरू हुआ था और 1932 में यह पूर्ण हुआ। उस समय इसे बनाने में 20-30 लाख रुपए लगे थे। यह कोठी, जिसे अनीस कैसल भी कहा जाता है, 21 एकड़ में था और यहां 500 लीची और आम के पेड़ थे, लेकिन आज यह जगह सिमट गई है। तीन तल्ले वाली इस कोठी में 120 कमरे हैं। इसमें प्रवेश करने के लिए छह दिशाओं से दरवाजे बने हुए हैं। उनके समय में इस कोठी में अंग्रेज ऑफिसर्स भी आया-जाया करते थे। जिस साल उनके सपनों का यह महल बनकर तैयार हुआ, दुर्भाग्य से उसी साल 1932 में उनका निधन हो गया। इसके बाद तो कोठी बेरौनक होने लगी।

पहली पत्नी के निधन के बाद ईसाई महिला से की शादी
अपनी पहली पत्नी नईमा खातून के निधन के बाद 1916 में उन्होंने एक ईसाई महिला रोज मैरी से शादी की। शादी के बाद रोज मैरी, मरियम बनी। अली इमाम ने मरियम के लिए अनीसाबाद में मरियम मंजिल बनवाया। यह जब तक बन कर तैयार हुआ, मरियम का निधन हो गया। अली इमाम को इस बात का दु:ख हमेशा रहा कि इस इमारत के बनने के बाद मरियम ज्यादा दिनों तक उनके साथ नही रह सकीं। इसके बाद अली इमाम ने तीसरी शादी अनीस फातिमा से की। जो लेडी अनीस के नाम से मशहूर हुईं। उनके लिए रांची में एक बेहद खूबसूरत ईमारत बनवाया जो अनीस कैसल के नाम से जाना गया और बाद में इमाम कोठी।

बेगम ने बनवाई मजार
रांची में इस मजार को उनकी विधवा बेगम ने बनवाया। मजार के अंदर एक पत्थर पर इसका जिक्र भी है। 1932 में सर अली इमाम का देहांत हुआ और तीन साल में यानी 1935 बनकर तैयार हो गया। फर्श संगमरमर का है और दीवारें लाल पत्थर की हैं।

एक हिदू कर रहे हैं मजार की देखभाल
सत्रह सालों से एक ङ्क्षहदू मजार की देखभाल कर रहे हैं। पहले काफी उपेक्षित था। घास-फूस जमा हो गए थे, लेकिन फिर इसकी देखभाल शुरू हुई। आफ यह मजार साफ-सुथरा है और हर सुबह लोग यहां आते हैं। गुरुवार को भीड़ ज्यादा रहती है। यहां लोग आते हैं, मत्था टेकते हैं, दुआ मांगते हैं।


1917 में पटना हाई कोर्ट के बने जज
अली इमाम बैरिस्ट्री की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड गए। वहां से वे जून, 1890 में पटना वापस आए और नवंबर 1890 से कलकत्ता हाई कोर्ट में प्रैक्टिस शुरू कर दी। बाद में वे पटना हाई कोर्ट में 1917 में जज बने। वकालत के साथ-साथ राजनीति में भी सक्रिय रहे। 1906 में जब मुस्लिम लीग की स्थापना हुई तो अली इमाम की प्रमुख भूमिका रही। अप्रैल 1908 में पहला बिहार राज्य सम्मेलन हुआ तो इसकी अध्यक्षता अली इमाम ने की। जिसकी पूरी जिम्मेदारी सच्चिदानंद सिन्हा और मजहरुल हक के कंधों पर थी। 30 दिसंबर 1908 को अली इमाम की अध्यक्षता में मुस्लिम लीग का दूसरा सत्र अमृतसर में हुआ। इसी साल उन्हें सर की उपाधि प्रदान की गई। 1911 में वे भारत के गवर्नर जनरल के एग्जीक्यूटिव कौंसिल के सदस्य बने और फिर इसके उपाध्यक्ष। 25 अगस्त 1911 को सर अली ईमाम ने ङ्क्षहदुस्तान की राजधानी कलकत्ता को बदल कर नई दिल्ली करने का पूरा खाका उस समय भारत के वायसराय लार्ड हार्डिंग के सामने पेश किया, जिसे स्वीकारते हुए अंग्रेजों ने भारत की राजधानी कलकत्ता को बदल कर नई दिल्ली करने का एलान कर दिया।
बांकीपुर पटना की एक सभा में देश के पहले राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रासाद ने सर अली इमाम को आधुनिक बिहार के निर्माता की संज्ञा दी। 1910 से 1913 के बीच वक्फ बिल उनकी निगरानी में तैयार हुआ। 1914 मे उन्हे नाईट कमांडर (के.सी.एस.आई) के खिताब से नवाज गया। 1915 मे लॉ मेंबर के पद से रिटायर हुए। 3 फरवरी 1916 को पटना हाई कोर्ट की स्थापना जब हुई तो उसके बाद सितंबर 1917 मे सर अली ईमाम को पटना हाई कोर्ट का जज बना दिया गया। वे दो साल तक रहे। अगस्त 1919 में निजाम हैदरबाद के प्रधानमंत्री बने। वे 1922 तक रहे। 1923 में फिर से पटना हाई कोर्ट वकालत शुरू की और साथ ही देश की आजादी के लिए खुल कर हिस्सा लेने लगे। कांग्रेस की कई नीतियों का खुल कर समर्थन किया। स्वराज और स्वादेशी की पैरवी की। 1927 में सर अली ईमाम ने साइमन कमीशन का जमकर विरोध किया। 1931 में सर अली ईमाम ने गोलमेज सम्मेलन में भाग लिया और अगले साल ही इनका निधन हो गया।  

मेरी पहली रचना

प्रेमचंद उस समय मेरी उम्र कोई 13 साल की रही होगी। हिन्दी बिलकुल न जानता था। उर्दू के उपन्यास पढऩे का उन्माद था। मौलाना शरार , पं रतन...