मंगलवार, 14 नवंबर 2017

बिरसा का गांव

सरवदा चर्च पर पहला तीर चलाया गया
खूंटी गांव कांप उठा।
डिप्टी कमिश्नर आए।
वह बिरसा का पीछा कर रहे थे।
बुद्धिमान लोग (बिरसा के अनुयायी) डोम्बारी पहाड़ पर चले गए।
उन लोगों ने  (ब्रिटिश सैनिकों का) मुंह बनाया
और चुनौती दी।
फौजों (ब्रिटिश) ने उन पर गोलियां चलाईं।
एक मुंडा बच्चा जमीन पर गिरी अपनी मृत मां का दूध पीने की 
कोशिश कर रहा था।
 (अंग्रेज) महिला (डिप्टी कमिश्नर की पत्नी) बहुत द्रवित हुई।
बच्चे का क्या हुआ?
यह कोई खुशी की बात न थी।
रांची से जब मुरहू प्रखंड होते हुए सुदूर उस सरवदा गांव में पहुंचे, जहां 1881 से विशाल चर्च खड़ा हुआ था, तो अचानक 117 साल पहले रचित यह गीत कानों में गूंजने लगा। बिरसा की बहादुरी में रचित यह गीत अपने समय का इतिहास भी दर्ज करता है। जब यह चर्च बना, तब खूंटी जिला नहीं बना था। वह रांची का अनुमंडल भर था। आज जरूर ताज्ज्बुब करेंगे, जब यह चर्च बना। उस समय इतनी आबादी भी नहीं रही होगी और जाने का रास्ता तो अब बना है। उस समय, मिशनरियों के विश्वास और धैर्य को याद कीजिए। यहीं पर जर्मन के विद्वान फादर हाफमैन रहते थे, जहां दो बार बिरसा के अनुयायियों ने हमला किया था। चर्च के पीछे ही वह ऐतिहासिक पहाड़ी सिंबुआ है, जहां बिरसा की बैठकें भी होती थीं। यहां रह रहे फादर जेवियर केरकेट्टा कहते हैं कि इसे बनाने के लिए कलकत्ते से बैलगाड़ी से लादकर सामान यहां आया था। करीब सौ फीट से ऊंची इसकी मीनार होगी, जो दूर से ही दिखाई देती है। सरवदा का चर्च आज भी खड़ा है और उसके परिसर में कई पत्थगड़ी में वहां का इतिहास भी दर्ज है। यहीं पर उसी समय का एक स्कूल भी है, जहां के बच्चे नंगे पैर हॉकी स्टीक लेकर दो मैदानों में एक छोर से दूसरे छोर तक दौड़ते हुए एक दूसरे को हराने के लिए पसीना बहाते हैं। फादर बाद में जर्मनी चले गए, लेकिन जाने से पहले उनका तीन महत्वपूर्ण योगदान को याद करना चाहिए। पहला, बिरसा की शहादत के बाद अंग्रेजों ने जो कानून बनाया, छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम-1908। इसमें फादर का ही मुख्य काम है। दूसरा, उन्होंने छोटानागपुर काथलिक मिशन कॉपरेटिव क्रेडिट सोसाइटी की स्थापना 1909 में की और 1928 में मुंडारी विश्वकोश तैयार किया। सरवदा चर्च के एक कमरे में उनकी किताबें धूल फांकती मिल जाएंगी और उनकी तस्वीर भी, जिसे दीमक अपना निवाला बनाने का आतुर दिखे।
खैर, यहां बच्चों का उत्साह चरम पर था। उनका खेल देखने लायक था, लेकिन हमारे राज्य के खेल विभाग को इन गांवों में देखने को फुर्सत नहीं है। खेल विभाग का पैसा कहां खर्च होता है, वह विभाग ही जानता है। यह वह इलाका है, जहां अपराधियों का बोलबाला है। नक्सली हैं, माओवादी हैं। युवाओं के पास कोई काम नहीं है।
यह नजारा सरवदा से लेकर उलिहातू और डोंबारी गांव तक दिखा। सरवदा से जब बिरसा मुंडा की जन्मस्थली उलिहातू पहुंचे तो यहां भी युवा ताश के पत्ते फेंट रहे थे। जन्म स्थली पर ताला लटका हुआ था और बाहर बिना ड्राइवर एक एंबुलेंस खड़ी थी। सरकार का पूरा विकास यहीं दिखता है। बिरसा के वंशजों का घर पक्का का बन गया है और खूंटी से उलिहातू तक की सड़क तेजी से फोरलेन बन रही है। बाकी गांव, अपनी किस्मत पर जी रहा है। बकरियां सुस्त पड़ी थीं। एक महिला धान ओसा रही थी। एक बच्ची एक बच्चे को चुप करा रही थी। गांव में बना बिरसा मुंडा परिसर चमक रहा था। यहां बिरसा की प्रतिमा को सोने की चमक दे दी गई थी। सूरज की किरण पड़ते ही प्रतिमा की आभा देखते बनती थी। सरकार ने यहीं विकास किया है।
लेकिन उलिहातू से जब डोंबारी बुरू जाएं तो फिर विकास दूर-दूर तक नजर नहीं आता। यहां डॉ रामदयाल मुंडा व जगदीश त्रिगुणायत के प्रयास से डोंबारी बुरू पर 100 फीट का एक स्मारक बनाया गया है। यहां पहाड़ तक एक पतली सड़क जाती है। यह उसी समय की बनी है। इसके बाद सरकार ने ध्यान नहीं दिया। यहीं पर सौ बेड का अस्पताल भी बनना था, लेकिन आज तक नहीं बना। मुख्य सड़क से डोंबारी बुरू की दूरी करीब दस किमी है, लेकिन इस दस किमी में विकास कैसा हुआ, कहां हुआ, यह दिख जाता है। जैसे, यह इलाका अभी भी सौ साल पहले की अवस्था में जी रहा है। गांव से लौटते हुए फिर एक गीत याद आने लगा-

डोंबारी पहाड़ी पर बिरसा के अनुयायी इक_े हुए
नीचे घाटी में गोरे सिपाही बड़ी तादाद में जमा थे।
बिरसा के अनुयायी उनकी खिल्ली उड़ा रहे थे, उन्हें चुनौती दे रहे थे, 
गोरे सिपाहियों ने हड़बड़ी में गोली चलाई...। 

खैर, लोग उनके शहादत दिवस नौ जून और 15 नवंबर, उनके जन्म दिवस पर यहां मेला लगाते हैं। नौ जनवरी को भी यहां भारी संख्या में लोग जुटते हैं, क्योंकि अंग्रेजों ने नौ जनवरी 1900 को हजारों मुंडाओं का बेरहमी से नरसंहार कर दिया था। इसमें महिलाएं और बच्चे काफी संख्या में कत्ल किए गए थे। इस पहाड़ी पर बिरसा मुंडा अपने प्रमुख 12 शिष्यों सहित हजारों मुंडाओं को जल-जंगल-जमीन बचाने को लेकर संबोधित कर रहे थे। आस-पास के दर्जनों गांवों से लोग एकत्रित होकर भगवान बिरसा को सुनने गए थे। बात अभी शुरू ही हुई थी कि अंगरेजों ने डोम्बारी बुरु को घेर लिया। हथियार डालने के लिए अंगरेज मुंडाओं को ललकारने लगे। लेकिन मुंडाओं ने हथियार डालने की बजाय शहीद होने का रास्ता चुना। यहां डोंबारी बुरु की तलहटी में एक मंच बना है। इसके साथ पत्थलगड़ी भी की गई है। पत्थलगड़ी नौ जनवरी 2014 को किया गया है। इस पर नौ जनवरी 1900 को शहीद हुए लोगों के नाम की सूची है-
हाथीराम मुंडा, गांव गुटुहातु, मुरहू
हाड़ी मुंडी,  गांव गुटुहातु, मुरहू
सिंगराय मुंडा, बरटोली, मुरहू
बंकन मुंडा की पत्नी जिउरी, मुरहू
मझिया मुंडा की पत्नी, मुरहू
डुन्डुन्ग मुंडा की पत्नी, मुरहू।
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रांची की नजर में गांधी

मैं रांची हूं। झारखंड की राजधानी। जब बिहार था, तब भी मुझे ग्रीष्मकालीन राजधानी का ओहदा मिला था। यहां की आबोहवा को देखकर ही अंग्रेजों ...