सोमवार, 8 जनवरी 2018

डोंबारी बुरू : जहां हुआ थाा अंतिम उलगुलान, पर आज है उपेक्षित

बिरसा मुंडा की अंतिम लड़ाई का गवाह उपेक्षा का शिकार
-बिरसा स्मारक बहुउद्देशीय विकास समिति ने कराया था निर्माण
-समिति के सचिव थे डॉ रामदयाल मुंडा
-तत्कालीन मंडलायुक्त सीके बसु ने किया था स्मारक का उद्घाटन
-9 जून, 1991, बिरसा मुंडा के शहादत दिवस पर हुआ था लोकार्पण
100 फीट ऊंचा है डोंबारी बुरू का स्मारक
30 फीट कास्य की प्रतिमा अब हो रही है जर्जर


आज से ठीक 118 साल पहले नौ जनवरी, 1900 को डोंबारी बुरू पर ब्रिटिश सेना-पुलिस और बिरसा मुंडा के आंदोलनकारियों बीच जंग छिड़ी थी








। सईल रकब से लेकर डोंबारी बुरू तक घाटियां सुलग उठी थीं। 25 दिसंबर 1899 से लेकर नौ जनवरी 1900 तक खूंटी का कई इलाका अशांत था। रांची से लेकर खूंटी-चाइबासा तक। मुंडा आंदोलनकारियों के साथ नौ जनवरी की लड़ाई अंतिम लड़ाई साबित हुई। इसके बाद बिरसा मुंडा के साथियों की धर-पकड़ तेज हो गई। बिरसा मुंडा भी तीन फरवरी, 1900 को बिरसा मुंडा गिरफ्तार कर लिए और नौ जून को उन्होंने अंतिम सांस ली।      
डोंबारी बुरू बिरसा मुंडा के जन्म स्थान उलिहातु से थोड़ी दूर है। उस ऐतिहासिक युद्ध की स्मृति में उस पहाड़ पर एक विशाल स्तंभ निर्माण मुंडारी भाषा के विद्वान जगदीश त्रिगुणायत के प्रयास से किया गया। इसके लिए बिरसा स्मारक बहुउद्देशीय विकास समिति का गठन किया गया और इस समिति के सचिव बनाए गए डॉ रामदयाल मुंडा। ऐतिहासिक लड़ाई की स्मृति को बनाए रखने के लिए स्मारक के गठन का प्रयास शुरू हुआ। इसके बाद पहाड़ पर 100 फीट ऊंचा है डोंबारी बुरू का स्मारक पत्थरों से बनाया गया। यह स्मारक दूर से दिखाई देता है। उस समय मंडलायुक्त थे सीके बसु। उन्हीं के कर-कमलों से स्मारक का उद्घाटन 9 जून, 1991 बिरसा मुंडा के शहादत दिवस पर किया गया था। पहाड़ की तलहटी में एक मंच भी बनाया गया और उसके पास ही 30 फीट की बिरसा मुंडा की कास्य प्रतिमा भी स्थापित की गई। कास्य प्रतिमा का निर्माण नेतरहाट के राजेंद्र प्रसाद गुप्ता ने किया है। इस साल भी अंकित है 1990। प्रतिमा तक पहुंचने के लिए सीढिय़ां बनाई गई हैं, लेकिन आज जर्जर हो चुकी हैं। लोहे की रेलिंग में जंग लग गया है। सीमेंट जगह-जगह से छोड़ रहा है। प्रतिमा का बेस कभी भी क्षतिग्रस्त हो सकता है। पिछले 28 सालों से इसका रंग-रोगन भी नहीं हुआ है।
यहीं पर एक छोटा सा मैदान भी है। एक विशाल मंच भी है। इसके बाद अंदर स्मारक तक जाने के लिए सीमेंटेड सड़क बनी है। यहां तक पहुंचने के लिए सीधी चढ़ान है। यहीं से सइल रकब भी दिखाई देता है। सरकार का विकास केवल बिरसा मुंडा के जन्मस्थल तक ही सिमट गया है, जबकि उनसे जुड़े ऐतिहासिक स्थल उपेक्षा के शिकार हैं। एक महत्वपूर्ण स्मारक, उपेक्षित है। जबकि उस समय यहां एक छोटा सा अस्पताल और स्कूल खोलने की बात भी थी। पर, बिहार के समय जो काम हुआ, राज्य बनने के बाद फिर एक ईंट भी नहीं रखी गई। अलबत्ता स्थानीय लोगों ने ग्राम पंचायत गुटुहातु, मुरहू के सौजन्य से यहां नौ जनवरी 2014 को एक पत्थलगड़ी जरूर कर दी है, जिस पर अंग्रेजों के गोलीकांड में शहीद छह लोगों के नाम दर्ज है।

रांची की नजर में गांधी

मैं रांची हूं। झारखंड की राजधानी। जब बिहार था, तब भी मुझे ग्रीष्मकालीन राजधानी का ओहदा मिला था। यहां की आबोहवा को देखकर ही अंग्रेजों ...