रविवार, 11 फ़रवरी 2018

चुटियानागपुर की सुंदरता

  -मिशन इंस्पेक्टर एच. काउश एवं मिशनरी एफ. हान
 
   जब कोई मिशन का मित्र हिंदुस्तान के बारे में सुनता है तो वह एक ऐसे जादुई देश की कल्पना करने लगता है जिसे प्रकृति ने शृंगार किया हो। लेकिन जैसा कि विदित है हिंदुस्तान अपने में एक दुनिया है। सभी जगहों पर उष्णकटिबंध की हरियाली भरी सुंदरता राज नहीं करती। कुछ ऐसे भी क्षेत्र हैं जो कवि की कल्पना से मेल नहीं खाते। विशेषकर उत्तरी हिंदुस्तान प्रकृति की सुंदरता में कई मायने में कम है और चुटियानागपुर का हमारा मिशन क्षेत्र भी सामान्यत: तुलना में श्रीलंका अथवा बड़े सुंडाद्वीप के आकर्षण के बराबर नहीं है। फिर भी चुटिया नागपुर में सुंदरता के कई स्मारक सृष्टिकर्ता ईश्वर की कृपा से मौजूद हैं। हमारी तस्वीर में दिखाया गया सुंदर जलप्रपात इसका प्रमाण है। भूरे ग्रेनाइट की चट्टानों से सफेद झागदार पानी दिल थाम लेने वाली चौड़ाई में 100 फीट नीचे आवाज करता हुआ टूट कर गिरता है। नीचे एक प्यारा नीले रंग का छोटा झील बन जाता है जो साफ और पारदर्शक दिखाई देता है। सभी प्रकार की मछलियां विशेष कर सर्पमीन और कतला जाति की सौर पानी में विचरण करती हैं। बहुत गहराई में उदविलाव मछली, हां, स्वयं घडिय़ाल और बहुत सारे पानी सांप पाए जाते हैं। किनारे पर जहां पानी छिछला होता है, लोग नहाते-धोते हैं।
  इस क्षेत्र के जलप्रपातों में स्वर्णरेखा नदी का हुंडरू घाघ सबसे बड़ा है, जो रांची से 25 मील उत्तर पूर्व में है और 320 फीट की ऊंचाई से गिरता है। हमारी तस्वीर में चट्टानों के ऊपर घने जंगलों का भाग दिखाई देता है, जिसमें विभिन्न चौड़े पत्तों वाले वृक्ष तथा शिरीष के पेड़ दिखाई देते हैं। कहीं पर भी ताड़ के वृक्षों का नामोनिशान नहीं, ताड़ के नाम पर सिर्फ खजूर के पेड़ मिलते हैं। इसके विपरीत जंगल का मुख्य पेड़ सखुआ है, जो हमारे जर्मनी के ओक पेड़ के समान दिखाई देता है। इसकी लकड़ी घर बनाने के काम आती है। उसकी छाल से रस्सी बनाई जाती है। उसकी राल से हिंदुस्तान में अपरिहार्य धुवन बनता है। इसके अलावा जंगल के बड़े हिस्से में बांसों के झुंड पाए जाते हैं।
आगे हम महुआ पेड़ का भी जिक्र कर रहे हैं, जिसके फूलों से मादक द्रव्य बनाया जाता है। कुसुम पेड़ की डालियों पर लाह के कीड़े पाए जाते हैं। सुंदरता में सबसे अलग है आम के पेड़ जिनके बड़े फल हमारे यहां के आलूबुखारा की तरह होते हैं और जिन्हें बड़े चाव से खाया जाता है। करीब सभी गांवों के आने आम के बगीचे हैं। सबसे विशिष्ट है बरगद का पेड़ जो समांतर डालियों से जड़ों को नीचे गिराता है और जब वे जमीन के अंदर पहुंचती है तो उनसे नया पेड़ निकलता है। बहुधा ऐसा होता है कि वर्षों के अंतराल में एक अकेला बरगद एक सरीखे का छोटा जंगल बन जाता है। पीपल के पेड़ को विशेषकर हिंदुओं की ओर से धार्मिक सम्मान मिलता है। प्रत्येक पत्ती पर लोग कहते हैं कि देवता निवास करते हैं। जब बारिश होती है तब लोग इसकी पूजा करते हैं। यह पेड़ समूचे हिंदुस्तान का परोपकारी पेड़ है, क्योंकि यह लोगों को सबसे ज्यादा छाया प्रदान करता है। इमली का पेड़ भी छाया का धनी है और लोग गांव के अखरा में इसे लगाना पसंद करते हैं, क्योंकि बारिश की बूंदों को भी इसी पेड़ की घनी पत्तियां रोक लेती हैं। जंगल जीवन से भरपूर है। चुटियानागपुर में पहले के उल्लेख के अलावा, जंगली जानवरों की भरमार है, यहां वहां हाथी भी दिखाई देते हैं। यहां के रहने वाले हिरण, हिरणी और खरगोश का शिकार करते हैं किंतु बिना आग्नेय शस्त्रों का प्रयोग किए। लोग हो हल्ला कर जानवरों को खदेड़ कर एक जगह लाते हैं और मारते हैं अथवा अधिक से अधिक तीरों से शिकार करते हैं। जंगली सुअर लगाए हुए बीजों को काफी नुकसान पहुंचाते हैं। सियारों की संख्या बहुत अधिक है। विभिन्न तरह की चिडिय़ां मधुर संगीत सुनाती हैं, गरुड़, गिद्ध, बगुला, तोता, कोयल, कौआ, गोरैया, बगेरी और अबावील। कीड़े-मकोड़ों की भरमार के बारे में शायद ही शिकायत सुनने को मिलती है। सबसे ज्यादा परेशानी जाहिर है, दीपक द्वारा होती है जो सभी चीजों को बर्बाद कर देती हैं। मच्छरों से बचाव के बहुत सारे उपाय पहले से मौजूद हैं। काफी संख्या में जुगनू अंधकार में निकलते हैं और भरे जंगल में एकमात्रा लालटेन का काम करते हैं।  
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1885 में लिखा गया लेख। जर्मन से अनुवाद दोमिनिक बाड़ा।

रांची की नजर में गांधी

मैं रांची हूं। झारखंड की राजधानी। जब बिहार था, तब भी मुझे ग्रीष्मकालीन राजधानी का ओहदा मिला था। यहां की आबोहवा को देखकर ही अंग्रेजों ...