मंगलवार, 1 मई 2018

अब याद नहीं आते भोजपुरी के तुलसीदस कहे जाने वाले कवि बावला

-एम. अफसर खां सागर

हम फकीरों से जो चाहे दुआ ले जाए,
फिर खुदा जाने किधर हमको हवा ले जाए,
हम सरे राह लिये बैठे हैं चिंगारी,
जो भी चाहे चरागों को जला ले जाए,
हम तो कुछ देने के काबिल ही कहां हैं लेकिन,
हां, कोई चाहे तो जीने की अदा ले जाए।


कुछ इसी अंदाज में जिंदगी को बिल्कुल सरल और सहज ढंग से जीने वाले, आम जन की आवज़ जनकवि रामजियावन दास बावला फक्कड़ स्वभाव के कवि थे। उनकी रचनाओं में बसा गवईं अंदाज लोगों को बरबस ही उनकी तरफ खींच लाता है। जीवन में तमाम उतार-चढ़ाव आने के बावजूद भी बावला जी अपने वसूलों से कभी समझौता नहीं किया। वो जो भी रचते उसमें आम आदमी की पीड़ा, कलरव और उल्लास होता था। उन्होने गांव, गरीब, किसान और वनबासी समाज को बड़े करीब से देखा था, यही वजह था की उनकी रचनाओं में इनका आसान चित्रण मिलता है।
उत्तर प्रदेश के चंदौली जनपद का चकिया तहसील विंध्यपर्वत श्रृंखला से आच्छादित है। पहाड़ों के बीच बहते झरनें व नदियों की कल-कल आवाजें बरबस ही लोगों को अपनी तरफ आकर्षित करती हैं। विंध्यपर्वत श्रृंखला की पहाड़ों में न जाने कितने रहस्य व तिलिस्म छुपे हैं। नौगढ़ और चुनारगढ़ की घाटियों में चंद्रकान्ता की याद आज भी ताजा है। चंद्रप्रभा वन जीव अभ्यारण्य में न जाने कितने जंगली जानवर विचरण कर रहे हैं। सामाजिक सद्भाव के प्रतीक लतीफशाह बाबा की आत्मा इसी घाटी में बसती है। राजदरी व देवदरी जैसे मनोरम जलप्रपात इसी घाटी में हैं। बात चाहे मूसाखाड बांध की हो या विंडमफाल की सब यहीं हैं। चन्दौली जनपद की चकिया तहसील कभी भारत की पौराणिक नगरी काशी का अंग हुआ करती थी, उससे पहले रामनगर के राजा आदित्य नारायण की मिल्कियत। इसी तहसील में पहाडिय़ों की गोद में बसा है भीषमपुर गांव, जहां बसती हैै ग्रामीण भारत के लोगों की आवाज भोजपुरी के तुलसीदास कहे जाने वाले रामजियावन दास बावला की आत्मा। भोजपुरी जो कि हिंदी की एक महत्वपूर्ण बोली है, जिसमें कविता की एक लंबी परंपरा मिलती है। कबीर, धरनीदास, भीमा साहब और लक्ष्मी सखी जैसे अनेक रचनाकारों ने भोजपुरी में रचनाएं की हैं।
भोजपुरी में काव्य रचना करने वाले रामजियावन दास 'बावलाÓ किसी पहचान का मोहताज नाम नहीं है। जिन्हें लोग भोजपुरी के तुलसीदास के नाम से भी जानते हैं। आज भले बावला जी हमारे बीच नहीं हैं मगर उनकी आत्मा काव्य के रूप में हमारे बीच मौजूद है।
रामजियावन दास 'बावलाÓ का जन्म एक जून सन् 1922 ई. को चन्दौली जनपद (तब वाराणसी) के चकिया तहसील के भीषमपुर गांव के एक अति सामान्य लौहकार परिवार में हुआ था। पिता रामदेव विश्वकर्मा जातीय व्यवसाय से जुड़े थे तथा माता सुदेश्वरी देवी घर का काम बखूबी संभालती थीं। रामदेव के चार पुत्रों और दो पुत्रियों में बावला जी सबसे बड़े थे, जिसकी वजह से इनका बचपन बहुत दुलार-प्यार में गुजरा। परिवार में शिक्षा की कोई परम्परा नहीं थी फिर भी बावला जी का नामांकन गांव के ही प्राथमिक पाठशाला में हुआ। आपने दर्जा तीन तो पास कर लिया मगर चार में फेल हो गए। कक्षा चार में फिर नाम लिखाया गया तथा नकल के सहारे आपने दर्जा चार भी पास कर लिया। बावला जी कहते थे ''बाबू आजौ हमरे मित्र ताना देवेलन की हम तोहके नकल देखाईले रहली त पास हो गईला, नहीं त चार ना पास भईल होता।ÓÓ
कक्षा चार के बाद आपने पढ़ाई लिखाई को सदा के लिए अलविदा इस तरह किया कि 'सन्तन को कहा सीकरी सो काम।Ó प्राथमिक शिक्षा के समय से ही इनका झुकाव कविता व संगीत की तरफ  था। इसी कारण इन्हे विद्यालय में सरस्वती वंदना का काम सौंपा गया था। कहते हैं कि सोहबत का असर व्यक्ति पर पड़ा है, ऐसा ही इनके साथ हुआ। बावला जी के बड़े पिता रामस्वरूप विश्वकर्मा संगीत व रामायण के मर्मज्ञ थें, जो कि आपको सोहबत में मिली। बावला जी अपने पुश्तैनी पेशे को भी बड़ी आसानी से अपनाया। आप स्वयं कहते थे कि ''हम बसुला लेके बाबू जी के साथ चल देहीं आउर रन्दा भी खूब मरले हई।ÓÓ
इसी बीच रामजियावन दास का विवाह मात्र 16 साल की उम्र में मनराजी देवी के साथ सम्पन्न हुआ। अभी तक तो आप अकेले थें मगर शादी के बाद आप पर पारिवारिक जिम्मदेारियां भी लद गयीं। घर की माली हालत उतना ठीक न था सो आपने भैंस पालने की जिम्मदारी आपने उपर लिया। युवक रामजियावन सुबह भैंस लेकर जंगल की जानिब मुखातिब हो जाता और घूमते-घूमते काफी दूर निकल जाता। भैंस चराते-चराते अक्सर राजदरी के समीप धुसूरिया नामक स्थान पर चले जाते जहां इनका काफी समय व्यतीत होता। धुसूरीया में ही बावला जी की मुलाकात स्थानीय कोल-भीलों और मुसहरों से हुई। स्वाभाविक रूप से वनमार्ग में भैंस के पीछे घूमते-घूमते रामायण भक्त रामजियावन को वनवासी राम का साक्षात्कार हुआ। खुद को कोल-भीलों की भूमिका में अनुभव करते हुये एक दिन अनायास ही मुख से बोल फूट पड़ें -

बबुआ बोलता ना, के हो देहलस तोहके बनबास,
इ विधना जरठ मति अट पट कइलन रे,
किया कौनो भूल तीनों मूरती से भइल रे।
किया रे अभागा कौनो लागा बाधी कइलन,
बबुआ बोलता ना।
हम बनबासी बबुआ माना हमरी बतिया,
बावला समाज में बिताइला एक रतिया।
कन्द, मूल, फल, जल सेवा में जुटैइबे,
बबुआ बोलता ना।
सेवा करिबै माना हमार बिसवास,
बबुआ बोलता ना।।

स्वत: गीत पूरा हुआ और प्राय: वनवासी राम, लक्ष्मण और सीता की करुणा से विह्वल रामजियावन एकांत में घंटों आंसू बहाते और अपने ईष्ट देव के साथ संवाद करते रहते। अपनी रचनाओं के उद्गम स्त्रोत के सम्बन्ध में वे कहते हैं कि ''भइस चरावत-चरावत तुकबन्दी करै लगली।ÓÓ
इनके बावला उपनाम के पीछे भी एक रोचक किस्सा है। शुरू में उन्होने कुछ भजनों की रचना की थी, जिसके प्रकाशन के लिए वे गांव के ही एक मित्र के साथ वाराणसी आये। छ: वर्णों का रामजियावन नाम बैठता ही नहीं था। बनारस में प्रकाशक उन्होने कोई छोटा नाम रखने की सलाह दी, जिसके उधेड़-बुन में वे रात भर मानसिक ऊहापोह में रहे। सुबह हाने पर दशाश्वमेघ घाट पर स्नान करने गए। वहीं पर एक अहिन्दी भाषी से टकरा गए। वह झल्ला कर रामजियावन को कुछ कहने लगा। उसकी बुद-बुदाहट में उन्हें बावला का उच्चारण होता हुआ जान पड़ा। उन्होंने तुरंत ही 'बावलाÓ उपनाम अपना लिया।
प्रथम बार रामजियावन बावला को सन् 1957-58 ई. में कवि के रूप में आकाशवाणी वाराणसी में काव्यपाठ का अवसर प्राप्त हुआ। वहीं पर आकाशवाणी के हरिराम द्विवेदी ने इनके नाम के साथ दास शब्द जोड़ दिया, तब से अब इन्हे रामजियावन दास 'बावलाÓ हो गए। इसी समय आपको कृषि-निष्ठा संस्था वाराणसी द्वारा भोजपुरी गौरव सम्मान से नवाजा गया।
बावला जी की रचनाओं में ग्रामीण समाज व किसान जीवन का अत्यन्त जीवंत चित्रण मिलता है। गांव, समाज की दीन-दशा तथा सुरसा की तरह मुंह बाये खड़ी समस्याओं का इन्होने बड़ी सहजता से चित्रण किया है। किसानों के उद्यम एवं संघर्ष के साथ-साथ ग्रामीण तीज-त्यौहारों का अक्स बावला जी के अनेक छन्दों में उभर कर सामने आता है। उन्होने किसानों के हालात को दर्शाते हुए लिख है कि-
नाहीं भेद-भाव, न त केहु से दुराव बा,
सबसे लगाव बा, मनवा के चंगा।
खेत में किनई, सधुअई समान बा,
सपना के सोध में उधार बा नंगा।।


समाज के अंदर उत्पन्न बुराइयों का चित्रण करते हुए वे लिखते  हैं-
हाय रे समाज, आज लाज बा न लेहाज बा,
चोर, घुसखोर कुल बन जालन बांका।
घोर अन्याय बा कोट में कचहरी में,
डहरी में लूट-पाट बम क धमाका।
गांधी जी क सपना कलपना बुझात बा,
खात बाये मेवा केहु, केहु करे फाका।।

बावला जी शिव उपासक हैं। अत: आपकी प्रारम्भिक रचनाएं भक्ति परक ही हैं। आप शिव जी की आराधना प्रतिदिन गीतों के माध्यम से करते थें-
    गांव क गवार बस माटी क अधार बा,
    सगरो अन्हार नाहीं पायी उजियारे के।
    कलही समाज दगाबाज क दखल बा,
    कल नाहीं बा बोझ भरत कपारे के।
    छोट-छोट बात उतपात क
    न कह जात न सह जात सुसुक-सुसुक बेसहारे के।
    बाबा शि शंकर भयंकर हो भूज देता
    आवे जे उघार करे 'बावलाÓ बेचारे के।।


भोजपुरी चित्रण में कवि का मन खूब रमता है। बसन्त बावला जी का प्रिय ऋतु है। बसन्त का चित्रण उन्होंने कई छन्दों में किया है। साथ ही वे वियोगिन के साथ सहानुभूति भी रखते हैं। वे लिखतेे हैं -
    बासल बयार रितुराज क सनेस देत
    पेड़ परास क फूल नंग
    अनंग भी अंग बदे सिहरैला।
    बारिन में फुलवारिन में
 भौंरा रसलोभ के मारे मरैला।
    जोरि के गांठ चलै तितली
    कुल गेह, सरेह, सनेह करैला।
    देख बसंत वियोगिन के
    छतिया पर आयेक कोदे दरैला।।


बावला जी भारतय संस्कृति व सभ्यता के मुल्यो में आई  गिरावट से काफी चिन्तित हैं। राजनीतिक मूल्यों का गिरना और जातिगत राजनीति के ये प्रबल विरोधी रहे हैं। परम्परागत सामाजिक संबधों में आई कमी और ग्रामीण समाज के कमियों को दर्शाते हुए उन्होंने लिखा है कि-
    मानवता मरि रहल जहां पर फिर भी देश महान।
    वाह रे हिन्दुस्तान।।
    घूस लेत अधिकारी देखा। हर विभाग सरकारी देखा।
    टोपी सूट सफारी देखा। जरै आग मे नारी देखा।
    साधु संत व्यापारी देखा। उल्टा बेट कुदारी देखा।
    कहां ज्ञान विज्ञान। वाह रे हिन्दुस्तान।।
    मांगत केहु रेगदारी देखा, गइया कटै कटारी देखा।
    दुर्घटना बमबारी देखा। घर-घर खेल मदारी देखा।
    कोठी महल अटारी देखा। दूध भयल तरकारी देखा।
    सहमै सूरज चान, वाह रे हिंदुस्तान।।
    परग परग दंगा देखा। डाकू चोर लफंगा देखा।
    करै घोटाला चंगा देखा। विकास वाली गंगा देखा।
    राजनीत बेढ़ंगा देखा। लोफर लुच्चा नंग देखा।
    चढि़ गइलै परवान। वाह रे हिन्दुस्तान।।
    वेद पुराण अपंगा देखा। वर्गवाद एक लंगा देखा।
नक्सलवाद उतंगा देखा। विद्यालय अड़कंगा देखा।
    चुनि चुनि जायं भुजंगा देखा। झंडा रंग बिरंगा देखा।
    करत 'बावलाÓ मान। वाह रे हिन्दुस्तान।।

बावला जी को तो वैसे अनेकों सम्मान मिले मगर ग्रमीण परिवश के लोगों द्वारा गाये जाने वाले इनके गीत सबसे बड़े सम्मान हैं। भोजपुरी भाषा-भाषी क्षेत्र में बावला जी का नाम अति आदरणीय है। बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश समेत भोजपुरी भाषियों में इनके गीत काफी लोकप्रिय हैं। गीतों के माध्यम से इनकी पहचान अत्यन्त व्यपक है। बावला जी को सराहते हुए साहित्यकारों ने लिखा है कि 'रामजियावन दास बावला वाचिक परम्परा के जीवन में कविता, कविता में जीवन समेटने वाले कवि हैं।Ó
बावला जी विश्व भोजपुरी सम्मेलन बम्बई, कलकत्ता और बनारस में प्रतिनिधित्व किया है। भोजपुरी का सबसे बड़ा सम्मान सेतु सम्मान से इन्हे सन् 2002 में पश्चिम बंगाल के राज्यपाल वीरेन्द्र शाह ने प्रदान किया। इसके अलावा आपको काशी रत्न, जनकवि गौरव समेत अनेक सम्मान मिले हैं। गीतलोक आपकी एकमात्र प्रकाशित पुस्तक है। जीवन के अन्तिम समय में भी आधुनिक चकाचौंध से बिल्कुल अछूते रहने वाले बावला जी गांव की प्राकृतिक वादियों में भोजपुरी साहित्य को समृद्ध करने का प्रयास किया। उनका मन हमेश गांव में ही रमा रहता। माटी का घर-आंगन, खेत-खलिहान, फगुआ-गुलाल, बिरहा-लोक गीत, बसन्त, परास, पहाड़, कोयल की कूक, पपीहे की पीउ-पीउ और हरियर मटर की दाल में बावला जी का मन आजीवन लीन रहा।
जिसके बारे में उन्होन स्वयं लिखा है कि -
        आवा चला हमरे देहतवा के ओर तनी।
        जहवां सदेहिए सरग मुसुकाला।।

भोजपुरी साहित्य की सेवा करते हुए बिना किसी सम्मान के लोभ-लालच में पड़े जनकवि रामजियावन दास बावला इस फानी दुनिया को एक मई 2012 को अल्विदा कह चले। भले ही उन्होने सिल्वर स्क्रीन व मीडिया में सुर्खियां न पाई हों मगर उनके गीतों ने ग्रामीण भारत को गुंजायमान किया है, जो हमेशा गांव की पगडंडियों पर चलने वाले किसानों व गवईं इंसानों के जेहन में अमर रहेगा।

रांची की नजर में गांधी

मैं रांची हूं। झारखंड की राजधानी। जब बिहार था, तब भी मुझे ग्रीष्मकालीन राजधानी का ओहदा मिला था। यहां की आबोहवा को देखकर ही अंग्रेजों ...