शुक्रवार, 3 जनवरी 2020

अपने ही गांव घर में उपेक्षित हैं जयपाल सिंह

झारखंड को एक नई दिशा देने वाले जयपाल सिंह मुंडा अपने ही गांव में उपेक्षित हैं। गांव में उनका पुश्तैनी घर ढह रहा है। उनकी कब्र भी गांव में उदास पड़ी हुई है। हम अपने नायकों का इसी तरह सम्मान करते हैं। जबकि बिरसा मुंडा के बाद जयपाल मुंडा ऐसे पहले व्यक्ति थे, जिनकी आवाज देश में नहीं नहीं, विदेशों में भी गूंजती थी। ऑक्सफोर्ड में उनकी पढ़ाई का यह नतीजा रहा कि वे आदिवासियों के हित के लिए संविधान सभा और उसके बाद संसद में अपनी आवाज पूरी तार्किकता से उठाई। संसद में तब उन्होंने कहा था-'आदिवासियों को लोकतंत्र का पाठ न पढ़ाया जाए।Ó
इस महानायक का जन्म खूंटी जिले का टकरा गांव में धरती आबा बिरसा मुंडा के शहीद होने के दो साल बाद 1903 में हुआ था। रांची से इसकी दूरी 11 मील है। उनके पिता अमरू परंपरागत रूप से मुंडा समाज के पाहन थे। पाहन यानी पुजारी। रांची से पढ़ाई की यात्रा शुरू हुई तो विदेश में जाकर रुकी। वहीं से हॉकी में अंतरराष्ट्रीय पहचान बनाई। इसके बाद भारत लौटे से पढ़ाने का काम किया और फिर अलग राज्य के लिए झारखंड आंदोलन में सक्रिय हो गए।
जयपाल सिंह पर पुस्तक लिखे संतोष किडो कहते हैं कि झारखंड के सपूत शहीद जयपाल ङ्क्षसह मुंडा भले ही हॉकी चैंपियन के रूप में विश्वभर में अपनी एक अलग पहचान बनाई, लेकिन अपने गांव-घर और सूबे में उपेक्षित हैं। मुंडा का पैतृक घर लोग विदेशों से भी देखने आते हैं जो पूरी तरह से धंस चुका है। अब यहां सिर्फ खंडहर दिखता है। यहां हर साल बड़े-बड़े नेता उनकी पुण्यतिथि व जयंती पर ही आते हैं। उनके पैतृक घर के जीर्णोद्धार की बात किसी को नहीं सुझती। इतना तो उन्होंने काम कर ही दिया कि वहां एक भव्य स्मारक बन सके और एक पुस्तकालय, जहां उनसे जुड़ी पुस्तकें, उनके सामान प्रदर्शित हो सकें और जो बाहर से यहां देखने आएं, वे खुद को धन्य कर सकें। अब केंद्रीय मुत्री व खूंटी सांसद अर्जुन मुंडा ने उनके गांव को आदर्श गांव बनाने की घोषणा कर दी है, लेकिन यहां अन्य शहीदों के आदर्श गांव को देखें तो कोफ्त ही होती है। रांची शहर में बना उनके नाम का स्टेडियम अब नाम का रह गया है। कोई सड़क, उनके नाम से कहीं जाती हो, पता नहीं।
संविधान सभा से लेकर संसद व सड़क तक आदिवासियों की आवाज रहे जयपाल सिंह मुंडा ने झारखंड अलग राज्य के लिए अपनी पार्टी का कांग्रेस में विलय कर दिया था, जिसका खामियाजा उन्हें व उनकी पार्टी को भुगतना पड़ा, क्योंकि कांग्रेस ने उन्हें धोखा दे दिया। संसद में नेहरू से इस पर सवाल भी किया। बाद में उन्हें विलय को लेकर पछतावा हुआ। 13 मार्च 1970 को रांची में आयोजित झारखंड पार्टी के सम्मेलन में पार्टी में लौटने की सार्वजनिक घोषणा की, लेकिन 20 मार्च को उनका निधन। बहुत कम लोग जानते हैं कि तत्कालीन बिहार सरकार में वे मात्र 29 दिन उपमुख्यमंत्री भी रहे।
जयपाल सिंह के भाषणों को पहली बार हिंदी में लाने वाले अश्विनी कुमार पंकज उनके राजनीतिक कॅरियर पर कहते हैं, दिसंबर 1938 की बात है जब वर्षों बाद जयपाल सिंह मुंडा बिहार-झारखंड आए। वे पहले पटना पहुंचे और फिर रांची। अपने गांव टकरा पाहनटोली भी गए। इंग्लैंड जाने के ठीक बीस साल बाद बिहार-रांची की यह उनकी पहली यात्रा थी जो उनके जीवन की वह महत्वपूर्ण घटना है, जिसने न सिर्फ उनके व्यक्तिगत जीवन को पूरी तरह से बदल डाला, बल्कि भारतीय राजनीति में एक ऐसे शख्सियत का उदय हुआ जिसने झारखंड आंदोलन को राजनीतिक मैदान में 'फुल बैकÓ तो बनाया ही, सदियों से देश के करोड़ों आदिवासियों की उपेक्षित आवाज को, उनके नैसर्गिक अधिकार के सवाल और आदिवासियत की पहचान को औपनिवेशिक एवं अंतर औपनिवेशिक भारत में अदम्य साहस के साथ स्थापित किया।
वे आगे बताते हैं, 'आदिवासी जनसभा को संबोधित करते हुए कहा, 'यह मेरे जीवन की सबसे महत्वपूर्ण अवसरों में से एक है। मैं लगभग बीस साल से आप लोगों के बीच में नहीं था। अब आप हमारी आर्थिक और राजनैतिक आजादी के लिए, आगे आने वाले संघर्ष में मुझसे नेतृत्व करने के लिए कह रहे हैं। आप मुझे अपने एक ऐसे सेवक, जो आपकी सेवा करे, मुझे आमंत्रित कर सर्वोच्च सम्मान दे रहे हैं। ...मैं पूर्ण निष्ठा के साथ स्वयं को उस कार्य के लिए जो आप मुझे सौंप रहे हैं, उसके महती उत्तरदायित्व तथा महान कठिनाइयों को पूरी तरह समझते हुए समर्पित करता हूं।Ó अपने इस वचन को जयपाल सिंह मुंडा ने आजीवन निभाया। अपने अद्भुत सांगठनिक कौशल से उन्होंने आदिवासी सभा को 'अखिल भारतीय आदिवासी महासभाÓ में बदल दिया। स्वतंत्रता की ओर बढ़ते भारत के नए लोकतांत्रिक समाज में आदिवासियों की हक और भागीदारी के लिए राजनीतिक दल 'झारखंड पार्टीÓ बनायी। संविधान सभा में देश के आदिवासियों की इच्छा को बुलंद किया। आदिवासी भाषा, संस्कृति और पुरखा स्वशासन व्यवस्था का पारंपरिक हक संविधान में शामिल हो, इसकी पुरजोर वकालत की। अलग झारखंड राज्य की मांग को राजनीतिक रूप से स्थापित किया। संविधान सभा की बैठक में उन्होंने कहा था, 'आदिवासी दुनिया के सबसे प्रजातांत्रिक समुदाय हैं। नए बनते भारत और भारतीय समाज को आदिवासियों से लोकतंत्र सीखना होगा।Ó


उनके जीवन की कुछ महत्वपूर्ण तिथियां
1950 : एक जनवरी को जमशेदपुर में आयोजित आदिवासी महासभा में राजनीतिक पार्टी 'झारखंड पार्टीÓ की घोषणा।
1951 : मार्च में हुए प्रांतीय एवं केंद्रीय चुनाव में झारखंड पार्टी के 32 विधायक व चार सांसद पार्टी के चुनाव चिह्न मुर्गा पर जीते। रांची पश्चिम यानी खूंटी से जयपाल सिंह चुनाव जीतकर संसद पहुंचे।
1957 : चुनाव में झारखंड पार्टी के 34 विधायक व पांच सांसद चुनाव जीते। जयपाल सिंह खूंटी से पुन: जीत हासिल की।
1962 : झारखंड पार्टी के 22 विधायक व पांच सांसद जीते। खूंटी से तीसरी बार जीत हासिल की।
1963 : 20 जून को झारखंड पार्टी का कांग्रेस में विलय।
3 सितंबर को राज्यपाल ने रांची में उपमुख्यमंत्री की शपथ दिलाई। पंचायत एवं सामुदायिक विकास विभाग का मिला प्रभार।
2 अक्टूबर को मंत्री पद से हटाए गए। मात्र 29 दिन मंत्री रहे।
1966 : कांग्रेस से खूंटी सीट पर लगातार चौथी बार जीत हासिल की।
1970 : 13 मार्च को रांची में आयोजित झारखंड पार्टी के सम्मेलन में पार्टी में लौटने की सार्वजनिक घोषणा की।
-20 मार्च को उनका निधन।
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