शुक्रवार, 27 नवंबर 2015

जैसे उड़ी जहाज को पंछी, पुनि जहाज पर आवेÓ

'जैसे उड़ी जहाज को पंछी, पुनि जहाज पर आवे।Ó यह कहावत हिंदी के प्रतिष्ठित किस्सागो राकेश कुमार सिंह पर चरितार्थ होती है। सोलहो आना। राकेश का जन्म पलामू में हुआ। पढ़ाई-लिखाई के बाद अब बिहार के आरा में नौकरी। लेकिन उनकी रचनाओं का केंद्र झारखंड। पलामू से लेकर संताल की यात्रा उनकी रचनाओं में सन्निहित है। देर से कहानी लेखन के क्षेत्र में उतरे। पर, यह देर, उन्हें स्थापित करने में विलंबित राग नहीं छेड़ा। देर आए पर दुरुस्त। तब से वे ङ्क्षहदी कथा साहित्य को समृद्ध कर रहे हैं। अपनी अलग पहचान, भाषा और किस्सागोई के साथ। एक पंक्ति पढ़कर आप पहचान जाएंगे कि यह किसकी पंक्ति है। यह पहचान किसी-किसी के नसीब में आती है। सो, इस नसीब वाले कथाकार ने अपना नसीब खुद बनाया। पलामू से चलकर आरा होते हुए फिर-फिर पलामू की यात्रा अपने रुट की यात्रा। अपने होने की यात्रा। खुद को जानने की यात्रा। इस यात्रा की पहली परिणति 2003 में दिखी, जब 'जहां खिले हैं रक्तपलाशÓ नामक उपन्यास पाठकों के हाथ में पहुंचा। वहां के भूमिगत आंदोलन को केंद्र में रखकर लिखी गई यह कृति एक दस्तावेज भी है। 
एक निजी कार्यक्रम में वे रांची आए थे। गुरुवार की सुबह, सच पूछिए तो दोपहर होने वाली थी, हम अल्बर्ट एक्का चौक पर मिले। इंदुजी की दुकान पर। फिर साथ चाय पी। साथ उनके बेटा भी था, जो यहीं पर हाईकोर्ट में वकालत करते हैं। लंबे अरसे बाद मुलाकात हुई थी। बातों-बातों में ही उनकी गहरी संवेदनशीलता और रचनाशीलता से रूबरू हुआ। यह भी ज्ञात हुआ कि झारखंड के प्रति उनकी प्रतिबद्धता प्रचारात्मक किस्म की नहीं है। गहरे कर्तव्यबोध से जुड़ी है। यही कारण है कि उसी साल, 'पठार पर कोहराÓ नामक उपन्यास आया और खूब चर्चित रहा। 
पलामू से संताल की यात्रा के बारे में कहते हैं कि हूल क्रांति को वह स्थान नहीं मिला, जिसकी वह हकदार है। 1857 की पहली क्रांति के दो साल पहले एक बड़ी क्रांति झारखंड के सुदूर अंचल में घटित हुई, लेकिन उसे स्थानीय कहकर उसके ऐतिहासिक महत्व को कमतर कर दिया गया। इसलिए, 'जो इतिहास में नहीं हैÓ, उपन्यास लिखा और उसके केंद्रीय महत्व को लाने का एक प्रयास किया। इसी प्रकार, 1755 में पहाडिय़ों का विद्रोह हुआ था। तिलका मांझी को बहुतेरे लोगों ने संताल बताया, जबकि वह पहाडिय़ा थे। राकेश बताते हैं, इस चरित्र को लेकर बड़ा घालमेल रहा है और अब भी है। ऐतिहासिक छानबीन के बाद 'हूल पहाडिय़ाÓ लिखा और तिलका मांझी के पूरे चरित्र, आंदोलन और उस दौर को समेटने का प्रयास किया। तिलका संताली नहीं, पहाडिय़ा थे। 
राकेश कहते हैं, पता नहीं क्यों, जब-जब यहां आता हूं, घूमता हूं, लोगों से मिलता हूं तो कुछ न कुछ शेष रह जाता है। इसी साल ज्ञानपीठ से 'महाअरण्य में गिद्ध आया।Ó पूरा झारखंड आंदोलन इसके केंद्र में है। झारखंड के पृथक आंदोलन की पृष्ठभूमि पर यह उपन्यास खड़ा है, लेकिन इसमें बहुत कुछ है। एक बड़ा हिस्सा पलामू पर है। इसमें एक चरित्र पलामू का आदमखोर भी है। 
राकेश बताते हैं कि झारखंड पर ही 'आपरेशन महिषासुरÓ प्रेस में जाने को तैयार है। झारखंड बनने के बाद उदारीकरण, भूमंडलीकरण और आदिवासी जन-जीवन पर इसके प्रभाव-दुष्प्रभाव को इसमें रखा गया है। अपनी रचनाओं में बार-बार झारखंड को केंद्र में रखने के बाबत कहते हैं कि झारखंड से बाहर निकलने की कोशिश करता हूं। 'साधो, यह मुर्दों का गांवÓ लिखा। यह छोटा उपन्यास है, जो विचाराधीन कैदियों पर है। इस देश में साठ हजार कैदी विचाराधाीन हैं। इस विषय पर इस तरह का पहला प्रयास था। लोगों ने इसे पसंद किया। 
पर, कहते हैं न जैसे जहाज का पंछी कहीं घूमे-उड़ान भरे, फिर-फिर वह अपने मस्तूल पर आ ही जाता है, वही हाल मेरा है। झारखंड में इतना चुंबक है कि यह बार-बार खींच लेता है। यहां के जंगलों में मन भटकने लगता है।