
तीस घंटे का किया जाता है उपवास
छठ पूजा की तरह सूर्याही पूजा में भी लंबी उपासना व सूर्यदेव की पूजा की जाती है। सभी घरों से एक महिला व पुरुष (पति-पत्नी) 30 घंटे का उपवास रख पूजा करते हैं। उपवास से पूर्व संयोत भी करना होता है। उपासक अरवा चावल के आटा से पुआ बनाते हैं। शुरू के तीन से पांच पुआ बनाने में झंझरा का इस्तेमाल न कर हांथ से ही बनाते हैं। उसी पुआ को प्रसाद के रूप में ग्रहण कर संयोत कर उपवास करते हैं।
उगते र्सूय की होती है पूजा
पूजा के एक दिन पूर्व रात में उपासक पुजारी गांव के पूजा स्थल पर पहुंचते हैं। अरवा चावल (अक्षत) छींट कर सूर्यदेव को जगाते हैं। दीप जलाकर सुबह में पूजा करने व बलि चढ़ाने की आज्ञा लेते हैं। दूसरे दिन भोर में भगवान सूर्यदेव की पूजा व अराधना की जाती है।
बलि देने की परंपरा
सुबह भोर में पूजा करने के लिए पूजा स्थल पर जाने से पूर्व बलि देने वाले पशु को स्नान करा कर फूलमाला से संवारा जाता है। वहीं एक बच्चे को राजकुमार के रूप में तैयार कर उसे उसी पशु पर सवारी कर कर ढोल-ढाक बजाते हुए, सूर्यदेव का जय जयकारा करते पूजा स्थल ले जाया जाता है। कहीं-कहीं भगवान सूर्य को प्रसन्न करने के लिए सफेद बकरे की बलि दी जाती है, जबकि सूर्य को वैष्णव माना जाता है। जो परिवार बलि देता है, वह घर से दूर नदी किनारे चावल, सब्जी और खाना बनाने का सभी सामान, बर्तन भी ले जाता है। इसके बाद खाना वनाते औरा खाते हैं। बचे हुए मांस और खाना को जमीन में गड्ढा कर डाल देते हैं, ताकि कुत्ता भी न खा पाए।
सुख-समृद्धि की कामना
सिंदूर, धूप-धुअन, अगरबत्ती, आम पत्ता, वेलपत्र, दूध, चुका-ढकन, कसैली, अरवा चावल, सूप, टोकरी आदि जरूरी सामान से पूजा कर व पूजा स्थल में ही बलि दी गई पशु का प्रसाद सामूहिक रूप से सेवन करते हैं। आरा केरम के ग्राम प्रधान गोपालराम बेदिया बताते हैं कि सूर्याही पूजा में सूर्यदेव की पूजा कर अपने कुटुंब व आने वाली पीढिय़ों के स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना की जाती है। अमृत बेदिया कहते हैं कि अकाल मृत्यु व विपदा से बचने के लिए सूर्याही पूजा की जा रही है। यह एक अद्भुत परंपरा है, जिसे बेदिया आदिवासी करते हैं।
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