रविवार, 15 मार्च 2020

राधाकृष्ण और उनकी ‘मूल्य’

-संजय कृष्ण
  हिंदी कथा साहित्य को बहुविध ढंग से समृद्ध करने वाले रांची के राधाकृृष्ण साहित्य की दुनिया में अब अपरिचित नाम हो गए हैं। पुरानी पीढ़ी को यह नाम याद भी हो, नई पीढ़ी तो शायद उनके नाम से भी परिचित न हो। हम प्रायः अपने पुराने लेखकों को याद नहीं करते। या याद करते हैं तो उन्हें ही, जिन्हें याद करना फायदेमंद होता है। सुदूर झारखंड के एक पठारी पर बसी रांची के इस दिवंगत लेखक को भला क्यों याद करना! पर इस लेखक ने अपने समय में साहित्य की हर विधा को साधा और अपनी प्रतिभा का लोहा भी मनवाया। इसीलिए, कथा सम्राट प्रेमचंद ने अपने समय में कहा था कि यदि पांच कहानीकारों की सूची में बनाई जाए तो उसमें एक नाम राधाकृष्ण का भी होगा। यह थी राधाकृष्ण की खासियत।

  राधाकृष्ण जन्म: 18 सितंबर-1910-निधन-तीन फरवरी 1979 ने लेखन की शुरुआत कहानी से की और पहली कहानी सिन्हा साहब 1929 में प्रकाितश हुई। इसके बाद प्रेमचंद संपादित हंस में उनकी अनेक कहानियां छपीं। कहानी के साथ-साथ घोश्ष-बोस-बनर्जी-चटर्जी नाम से हास्य-व्यंग्य भी लिखते थे। उनके व्यंग्य का प्रभाव बाद की पीढ़ी पर भी पड़ा। पर वे मूलतः कहानीकार ही थे। अपने आत्मकथ्य में इस बात का स्पष्ट संकेत भी दिया कि उनके लेखन का उद्देश्य क्या है। वह लिखते हैं, ‘मैं स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि मैं इसलिए नहीं लिखता कि मुझे अपनी कहानी द्वारा किसी वाद-विशेष का प्रचार करना है। हां, कहानी लिख जाने के बाद वह किसी वाद-विशेष के अंतर्गत आ जाए तो बात दूसरी है।’ इस भित्ति पर खड़े होकर वे रचना करते हैं। उन्होंने आदिवासी जीवन पर अनेक कहानियां लिखीं, लेकिन उन पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। वे किसी खास विचारधारा से संबंद्ध नहीं थे। इसलिए भी आलोचकों ने उन्हें भाव नहीं दिया। अन्यथा 40 के दशक में वे जिस तरह की आदिवासी जीवन की कहानियां लेकर आ रहे थे और जितनी प्रामाणिकता के साथ, यह आज भी विरल है। अब तो बहुतेरे कहानियां आ रही हैं, लेकिन उसमें कई तरह की विसंगति को भी देखा और महसूस किया जा सकता है, पर राधाकृष्ण की कहानियां इन दुर्गुणों से वंचित हैं। 

 आदिवासी जीवन की ढेर सारी कहानियां में उनकी एक चर्चित कहानी है-मूल्य। इसे उन्हांेने 1961 में लिखा था। कहानी को लिखे पचपन साल हो गए। इन पचपन सालों में देश-दुनिया ने काफी तरक्की की है। अब दुनिया एक ग्लोब हो गई है। ग्लोब के इस छोर से उस छोर तक संपर्क करने में अब मिनट भी नहीं लगते। पर, इसी दुनिया में, इसी धरती पर एक ऐसी आबादी भी है, जो आज भी अपने आदिम संस्कारों और संस्कति को जीवित और जीवंत किए हुए है। यद्यपि तथाकथिक सभ्य दुनिया को लगता है कि ये असभ्य और जंगली हैं। पर, जब हम उनके निकट जाते हैं, तो हमें अपनी असभ्यता का भान होता है। राधाकृष्ण की यह कहानी कुछ इसी तरह के मूल्यों को उठाती है। कहानी का शीर्षक है तो महज एक शब्द का, पर इस शीर्षक एक भरी-पूरी सभ्यता की कहानी भी छिपी है। इतना ही नहीं। यह कहानी कई तरह के मूल्यों के अंतद्र्वंद्व को भी हमारे सामने रेखांकित करती है। यह कहानी आदिवासियों में प्रचलित एक परंपरा को केंद्र रखकर लिखी गई है, लेकिन लेखक का आशय सिर्फ उसकी परंपरा से हिंदी जगत को अवगत कराने तक सीमित नहीं है। वस्तुतः देखा जाए तो यह कहानी परंपरा से आगे बढ़ती हुई हमें उस आदिवासी समाज के सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक पक्षों के उद्घाटन के साथ अपनी माटी और अपने जमीन से जुड़े रहने की उत्कट अभिलाषा को भी व्यंजित करती है।

  हिंदी में ऐसी कहानी कतई नहीं है, जहां परंपरा के प्रति एक अनुराग भी हो और प्रेम का उदात्त स्वरूप भी। आदिवासी समाज में एक परंपरा है मूल्य देकर विवाह करने की। वर पक्ष वाले कन्या पक्ष को मूल्य देकर विवाह करते हैं। परंपरा के तहत विवाह का प्रस्ताव लड़का पक्ष वाला ही लड़की पक्ष वाले के सामने रखता है। यदि दोनों पक्ष राजी हो गए तो वर पक्ष कन्या पक्ष को मूल्य देकर बाकी की रस्म पूरी करता है। यदि वर पक्ष मूल्य देने में असमर्थ है तो लड़का भावी ससुर के घर रहकर एक अवधि तक अपनी सेवा देता है और इसके बदले में अपनी लड़की का विवाह लडके से कर देता है। इसे सेवा विवाह कहते हैं।
  इस परंपरा को केंद्र में रखकर ही यह कहानी रची गई है। कहानी में कुल चार पात्रा हैं। एक और पात्रा है, जिसकी सिर्फ चर्चा है। वह है दूलो का भाई जगराय, जो गाय-बकरियां चराने में कुशल है। जो चार पात्रा हैं। वे हैं, दुलो, दुलो का पिता भत्तू, उसकी मां दुर्गी और उसका प्रेमी जबरा। कहानी इन्हीं चारों के इर्द-गिर्द घुमती हुई घर की चैहद्दी को तोड़ती हुई गांव, जंगल की यात्रा करती कुछ-कुछ बीते समय की ओर भी चली जाती है।
  प्रेमचंद की तरह ही कहानीकार एक दृश्यविधान रचता है। कहता है, उरांव लोगों की उस बस्ती में दूलो बड़ी प्यारी और अभिमानिनी लडकी थी। यह कहना कठिन है कि उसमें रूप ज्यादा था या अभिमान अधिक था। शौकीन भी कम नहीं थी। कान में कांच जड़ा तरपत, वक्षस्थल पर मूंगे की माला। उसके दोनों पैरों की तर्जनियों में दो-दो ढीली अंगूठियां थीं और जब वह चलती थी तो पैरों की अंगूठियां चाटुंग-चाटुंग बजने लगती थीं। उसकी सुरीली बोली गीत की तरह लहरा जाती थी और उसकी कजरारी आंखों में अनुराग भरा भोलापन लिए हुए अभिमान की छाया थी। केश उसके घुंघराले थे, जिसका उसे गर्व था। बावजूद इसके खटकने वाली बात यह थी कि वह 16 की हो गई थी। उसका विवाह नहीं हो पा रहा था-जबकि वह परिश्रमी थी। घर और बाहर का काम करती।...जब रात होती तो वह किसी टहनी की तरह झूमती हुई भृंगी की भांति गुनगुनाती हुई अखरा पहुंच जाती। वहां जाकर वह नृत्य और गीत में इस तरह खो जाती कि अपनी तन की सुध भी नहीं रहती।
 कथाकार दूलो के रूप, गुण और उसके भोलेपन की चर्चा कर पाठकों के भीतर एक सहानुभूति पैदा करता है। एक संवेदना जगाता है। इस सौंदर्य चर्चा के साथ की वह आदिवासी संस्कृति की विशेषता को भी बता जाता है। उनकी संगीतप्रियता, नृत्य के प्रति अनुराग और उन्मुक्त संस्कृति। दूलो 16 की है। शादी को तैयार है। वह रात में अखरा जाती है। कहीं कोई रोक-टोक नहीं है। अखरा वह स्थान है, जहां आदिवासी मांदर, ढोल, नगाड़े की थाप पर नाचते-गाते दिनभर की थकान मिटाते हैं। स्त्राी हो या पुरुष, युवक हों या युवतियां...सभी एक साथ सामूहिक रूप से वृत्त या अर्धवृत्त का घेरा बनाकर नृत्य करते हैं। कथाकार अखरा का जिक्र इसीलिए करता है हम उनकी संस्कृति को समझ सकें। ये कुछ ऐसी विशेषता है जो आदिवासी और गैरआदिवासी के अंतर को भी सामने रखती है।

 लेखक दो सीमांत धु्रवों की भी रचना करता है। एक है दूलो का पिता भत्तू, जो घर में निर्विकार भाव से चुप रहने वाला प्राणी है। दूसरा, उसकी मां दुर्गी, जो हमेशा हाथ चमका-चमका कर झल्लाती रहती है। भत्तू अपनी पत्नी के बातों का बुरा नहीं मानता। और, दुगी ऐसी थी कि उसके पास न जाने कितनी बातें थीं जो खत्म ही नहीं होती। खेती की बातें, जमीन की बातें, महंगी और अनैतिकता की बातें, सांप और शेरों की बातें, भूत और पिशाचों की बातें...। बातों का अंतहीन सिलसिला...। भत्तो परम संतोषी। दुलो की शादी करनी है फिर भी चेहरे पर चिंता की लकीरें नहीं। बैल मर गए हैं, खेती कैसे होगी, इसकी भी चिंता नहीं। एक दिन दूगी आकर भत्तो से कहती है, ए जी, हम लोगों का बैल तो पिछले महीने ही मर गया। अब क्या होगा? इस प्रश्न से भत्तो चैंकता तो है, लेकिन तुरत ही आश्वस्त भी हो जाता है। जैसे इस समस्या का समाधान उसके पास पहले से मौजूद हो। भत्तो कहता है, हां, बैल तो मर गया, क्या करें, जो बोंगा करते हैं, वही होता है। इस जवाब से यह भ्रम नहीं होना चाहिए कि भत्तो कर्मशील प्राणी नहीं है। सब कुछ भगवान भरोसे। पर ऐसा भी नहीं है। भत्तू कहता है, गरीब की मदद कोई नहीं करता। अब तो हल भी नहीं चला सकूंगा। बैल फूट गया है जो। दूगो जोड़ती है, बैल के बिना किसान का घर सूना है। बैल तो तुम्हें खरीदना ही होगा। बैल दालान की शोभा होते हैं।
  किसानों का जीवन एक जैसा ही होता है। समस्याएं भी लगभग एक सी। चाहे वह विदर्भ का किसान हो, बुंदेलखंड का किसान हो या मैदानी इलाके का या फिर पठारी का। कहानी यही बताती है आदिवासी किसान की दशा दूसरे किसानों से कतई भिन्न नहीं है। कहानी आदिवासी और गैरआदिवासी के विभाजन को इस बिंदु पर स्वीकार नहीं करती है। बैल ही किसान की पंूजी है। मैदानी इलाकों से बैल गायब हो गए। बैलों की जगह ट्रैक्टर ने ले लिया। पूंजीवाद के प्रवेश से छोटे जोतदार मजदूर बन गए। अब वहां बड़े-बड़े किसान हैं। पर पहाड़ी इलाकों में खेती के यही सबसे सशक्त माध्यम हैं। पठारी क्षेत्रा होने के कारण यहां ट्रैक्टर से खेती आज भी संभव नहीं है। ले देकर बैल या भैंसा ही खेती के माध्यम हैं। भत्तो के सामने चिंता यह है कि वह बैल खरीदे भी कैसे? पूंजी तो है नहीं? निदान भत्तो के पास है। कहता है, क्या करेंगे, दूलो को बेच देंगे।

 इस जवाब से दूगी की दोनों हथेलियां चमकने लगीं। वह चंचल होकर बोली...तुम तो कब से कहते हो कि दूलो को बेचेंगे। जब छप्पर टूट गया था तब तुमने कहा था दूलो को बेच देंगे। फिर मालगुजारी के लिए नालिश हुई तब भी तुमने कहा कि दूलो को बेच देंगे। उसके बाद जब कुआं खोदने का सवाल आया था तब तुमने कहा था कि दूलो को बेच देंगे। मगर तुम्हारी दूलो बिकती कहां है? वह तो शाल के पेड़ की तरह दिन-दिन बढ़कर छतनार हुई जा रही है। समस्या का समाधान यह नहीं है कि दूलो बिक जाए? दूलो बिक भी गई तो जो मूल्य मिलेंगे क्या उससे बैल खरीदे जा सकेंगे? दूगी कहती है-कहीं बैल के जितना भी बेटी का दाम मिलता है? आदमी के दाम से बैल का दाम हमेशा ज्यादा रहता है। यह फर्क है। यहां आदमी की कीमत बैल से सस्ता।
  यह साठ का जमाना है। आजादी मिले चैदह साल तो हो ही गए थे। इस आजादी में आदमी सस्ता हो गया था और जानवर महंगे। राधाकृष्ण एक जगह लिखते हैं, यह चावल भी एक मुसीबत है। इन दिनों चावल का दाम बढ़ता ही जा रहा है....बाजार के इस भाव को जैसे पंख लग गए हैं। वह ऊंचे-से-ऊंचे उड़ता जा रहा है। गिद्ध की तरह बाजार भाव आसमान की ऊंचाई को नाप रहा है। जनता है, वह दिन-दिन पाताल की ओर गहराई को नापती जा चली जा रही है। तब और आज का समय। क्या महंगाई कम हुई। दिनों दिनों बढ़ती जा रही है। आदमी की कीमत जानवर से भी कम...। भत्तू अपने दिनों को याद करता है। ...कहता है जब मैंने तुमसे विवाह किया था तो दो बैल दिए थे और काठ धान दिया था। तब जाकर कहीं तुमसे मेरा ब्याह हुआ। अपनी बात को याद करती नहीं, इधर-उधर की बात ले बैठती हो। दूगी प्रतिवाद करती है। कहती है, उस समय चीजें सस्ती थीं। यानी 1920 के आस-पास की बात कर रही है। तब चीजें सस्ती थीं। अंगरेजों का जमाना था। अब अपना जमाना था, जहां आदमी सस्ता हो गया था। पर, इनकी बातों से बेफिक्र दूलो अपनी दुनिया में मस्त थी। एक दिन जब दूलो अखरा से नाचकर लौट रही थी तो एकांत पाकर उसका प्रेमी जबरा ने उसे छेड़ा। बोला-अरी दूलो, तुम्हारे जूड़े में जो यह सिरगुजिया का पीला फूल है, वह किसके लिए है?
वह कहती है, तुम्हारे लिए है?
...और तुम्हारे कानों मे जो लाल तरपत है...
तुम्हारे ही लिए है बंधु?
...और तुम्हारी चंचल चितवन, नदी की तरह उमड़ती हुई जवानी, तन और मन का प्यार-वह किसके लिए है?
दूलो सकुचाती हुई जवाब देती है अगर तुम चाहो तो वह भी तुम्हारे लिए है।
जवरा कहता है, मगर मैं तुम्हें महंगे दाम में खरीद नहीं सकता। जानती ही हो कि आज कल आदमी से ज्यादा बैल के दाम हैं?

दूलो कुछ सोचकर बोली-तो जाने दो, तुम्हें मेरा मूल्य चुकाना नहीं पड़ेगा। मैं तुम्हारे यहां ढूकू चली जाऊंगी।
जवरा ने कहा, यह तो और भी नहीं हो सकता। तुम्हारी मां मेरी मां से लड़-लडकर उसे परीशान कर देगी।
जवरा एक सलाह देता है। चलो भूटान भाग जाएं। पर दूलो दृढ़ स्वर में कहती है मगर मैं न अपने मां-बाप को छोड़ सकती हूं न इस पहाड़ी को। लेकिन वह जवरा को भी नहीं छोड़ती। कहती है, मैं भूटान भी नहीं जाऊंगी और तुम्हें भी नहीं छोड़ूगी? इतना आत्मविश्वास है दूलो को। दूलो अपना दो टूक फैसला सुना देती है। जवरा भी कहता है-तो मैं भी तुम्हें नहीं छोड़ सकता। आओ चलें, कहां। दोनों घने जंगल में भाग जाते हैं।
  अगले दिन दुगी व भत्तो सर झुकाए बैठे हैं। दुगी की आंख भीगी हुई हैं। इसी समय जवरा और दुलो दोनों आकर उनके सामने खड़े हो जाते हैं। भत्तू अपनी बेटी को देखकर शांत है। कहीं कोई उत्तेजना नहीं। वह बहुत ही शांत स्वर में कहता है, बेटा जवरा, अगर तुम्हें मेरी लड़की को ले जाना ही था तो मांगकर ले जाते। जवरा भी उसी शांत भाव से जवाब देता है। उसे भी कोई ग्लानि नहीं। कहता है, बा, मांगने की मुझमें हिम्मत कहां थी। गरीबी सबकुछ कराती है। कहां हम दूलो का दाम चुका पाते और कहां से हम बारात लाते...। भत्तू कोई जवाब नहीं देता है। कुछ देर बाद लंबी सांस लेकर कहता है-हमने सोचा था कि जब दूलो को बेचेंगे तो एक बैल खरीदेंगे।

जवरा उत्साह से कहता है-बा, तुम बैल नहीं खरीद सके तो इससे क्या? मैं जो हूं। मैं किसी भी बैल से ज्यादा काम कर सकता हूं। मेरी सारी सेवाएं तुम्हारे लिए है। मैं तब तक तुम्हारी सेवा करूंगा जब तक दूलो का दाम न चुक जाएगा। एक किसान के लिए बैल कितने महत्वपूर्ण होते हैं, यह कहानी उस ओर इशारा करती है।
 आदिवासी समाज में यह परंपरा है। पर, इस परंपरा पर ऐसी कहानी भी लिखी जा सकती है, इसपर किसी का ध्यान नहीं गया। महाश्वेता देवी ने भी आदिवासी जीवन पर कहानियां लिखीं है, पर वे सर्वेक्षणात्मक ज्यादा हैं। कहानी का कहन इससे बाधित होता है। योगेंद्र सिन्हा के उपन्यास भी इस समस्या से पीड़ित हैं। पर, राधाकृष्ण की कहानी इसका अपवाद है। ऐसा इसलिए कि वे आदिवासी समाज में पूरी तरह घुल-मिल गए थे। और उनके चित्त और संस्कार से गहरे परिचित थे। वह आदिवासी समाज को बाहर से नहीं देख रहे थे। वे समाज को अपने भीतर महसूस कर रहे थे। दूसरी बात यह कि राधाकृष्ण ने इस कहानी में आंचलिक शब्दों का प्रयोग नहीं किया है। इससे कहानी की प्रामाणिकता पर कोई फर्क नहीं पड़ता। संवाद में भी हिंदी ही है। पर, भाव और बोध में आदिवासीपन है। कहानी में मातृसत्तात्मक समाज का स्वरूप आया है। प्रेम का निष्कलुष रूप कहानी में मौजूद है। चंद्रधर शर्मा गुलेरी की कहानी ‘उसने कहा था’ की याद आती है।
  कहानी में आदिवासी समाज की और भी विशेषताएं हैं। जरा कल्पना कीजिए..गैर आदिवासी परिवार की लड़की यदि घर से भाग जाए तो उसका बाप क्या यूं ही शांत रहेगा? यह समाज का खुलापन है। यहां स्त्राी परतंत्रा नहीं है। इसलिए यहां नारीवादी नारे नहीं है। वह अपना निर्णय ले सकती है। दुखद यह है कि पिछले साठ-सत्तर सालों से आदिवासी साहित्य रचा जा रहा है। पर आज तक इस साहित्य को वह हैसियत नहीं मिल सका, जिसका वह हकदार है। राधाकृष्ण के बहाने हमें पठारों की भी देखना चाहिए, जहां मूल्य और सामूहिकता अब भी बचे हुए हैं और बेहतर जीवन के लिए ये जरूरी उपादान हैं।
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शनिवार, 7 मार्च 2020

होली का सपना

-गोपाल राम गहमरी

आज आंखें क्या लगीं, होनहार ही होनहार दिखाई देने लगा। ठीक जैसे पुराने जमाने का रसांजन या सिद्धांजन लगाने से धरती के गड़े खजाने लोगांे को दिखाई देते थे। वैसे ही आज नींद ने मेरी आंखें क्या बंद की, मानो होनहार देखने के लिए ज्ञान की भीतरी आंखें खोल दी। देखा तो मोटे-मोटे सोने के चिकचिकाते अक्षरों से आसमान उज्जवज हो रहा हैं इतना बड़ा विशाल आकाश उन्हीं अक्षरों के प्रकाश से अपनी नीलिमा छोड़ सुनहला हो गया है। मन में आया आंखें बंद हैं। मैं सोता हूं तो भी यह रोशनी कैसे दिखाई दे रही है? फिर आंखें गड़ा कर देखा तो कुछ लिखा है। पहले अक्षरों की चमक से चकाचौंध लगी जाती थी लेकिन मिनट दो मिनट नहीं बीते कि नयनों को ठंडक आई। चकाचौंध जाती रही ठीक जैसे सूर्य का चांद हो गया। आकाश में जो अक्षर पीले-पीले चमकते थे वे सब चांद रंग के हो गए। अब साफ पढ़ा तो देखा यही लिखा है ‘विलायती महाभारत का अंत’ वह उ$पर सबसे मोटे अक्षरों में है। उससे कम मोटे अक्षर दूसरी पांती में है, जिसमें लिखा है, ‘ब्रिटिश विजय मित्रों की गोटी लाल’।
बस इतना ही देखा था कि एक विकट रूपा राक्षसी सामने से दांत बाये हुए दौड़ती दिखाई दी। उसकी बिखरी लटों से आग निकल रही है। मुंह ज्वालामुखी का कंदरा मात करता है। नाक और कान से भी आतिशबाजी के कुजे छूट रहे हैं। सारी देह महाकाली का विकराल रूप है। लेकिन शरीर के सभी रन्ध्रों से आग फेंकती है। ज्यों-ज्यों पास आती गई त्यों-त्यों मेरे प्राण सूखते गए। बहुतेरा चाहा कि पीछे फिर कर भाग जाउ$ं। लेकिन पांव मानों धरती से ऐसे चिपके कि हिल नहीं सके। लेकिन उसके देह से निकलती हुई आग पास आने पर जलाती नहीं, देखकर तसल्ली सी हुई। अच्छी तरह देखा तो उस पूतना के कपार पर ‘होलिका’ लिखा है। मैंने होली महारानी की जय कहकर आठों अंगों से प्रमाण किया। उसने दोनों हाथ उठाकर, मुंह हिलाकर आशीर्वाद दिया, कहा ले बच्चा! पच्चास बरस तेरी आयु और बढ़ी, पूरे सौ बरस की जिंदगी अब तेरी हुई, बोल और कुछ चाहिए?
अब मैं ढीठ हो गया। ‘कहा ना माताजी आपने पच्चास बरस मुझे आयु दी है इसके लिए धन्यवाद है। यह तो आपने अपने आप ही दिया है। ठीेक जैसे पका शरीफ न्यूटन के कपार पर आप ही आप आया था। लेकिन मैं आप से कुछ और मांगना चाहता हूं। दया करके.....
बस बस बोल क्या मांगता है। नहीं तो घड़ी तो बीती जाती है। एक, दो, तीन बस तीन ही मिनट और हैं इतने में जो मांगेगा सो पावेगा। लेकिन अपने मतलब की कुछ न मांगना।
ना माताजी! मुझे अपने मतलब की कुछ नहीं चाहिए। पहली बात तो मैं यही मांगता हूं कि युरोप में जो महाभारत हो रहा है उसका अंत इसी साल जून में ठीक ब्रिटिश विजय के साथ हो आया।
दूसरी बात यह है कि हमारी ब्रिटिश सरकार को ऐसी सुमति हो कि इस साल जो नए टैक्स लगने हैं वे मेरे कहे मुताबिक लगें। उसका विवरण मैं आगे देकर अपनी याचना समाप्त करता हूं।
‘बोलता जा! बेलता जा! की आवाज सुनकर ही मैंने कहा, ‘पहला टैक्स तो उनपर लगे तो पुराने ख्याल के खूसट आज पश्चिमी रोशनी में भी व्याह शादी में नाच फांच, रंडी, भंडुए, भांड भगतियों के बिना अपनी रस्म नहीं पूरा कर सकते। उन पर टैक्स यही लगे कि जितना इन कामों में खर्च करते हैं वह बंद करके उसका आधा टैक्स देवें आधा बचत में रखें।
दूसरा टैक्स उन धनकुबेर, महंथ और पुजारियों पर लगे जो बेकामधाम के बैठे ती का माल मलीदा चाभबैठे दूसरों का मु-चाभ कर उत्तानपाद हो रहे हैं। जिनको दीन दुनिया से कुछ नेह-नाता नहीं है। संसार में आगे लगे चाहे ब्रज पड़े, मरकी माहमारी आए चाहे हैजा हो, विकराल अकाल धरती धुआंधार हो, चाहे युद्ध से संसार का संहार हो, इनकी सदा पाचों घी में हैं।
तीसरा टैक्स उनपर लगे जो अपने देश मंे बनी अच्छी चीज छोड़कर शौक से बड़े आदमी बनने के लिए विलायती चीज खरीदते हैं।
चौथा टैक्स उन ब्रज कृपण कंजूसों पर लगे जो अपना धन धरती मंे गाड़ रखते हैं। आप खाते हैं न दूसरों को खिलाते हैं। न किसी रोजगार में लगाते हैं न लोकोपकार में खर्च करते हैं। सांप की तरह फन काढ़े उस धन पर रखवार बनकर बैठे हैं। यदि कोई उनसे भलाई के काम में खर्च करने के लिए कहने आता है तो उसपर ऐसे फुफुआते हैं कि वह सिर से पांव तक झुलस का भाग जाता है।
पांचवा टैक्स नारद के उन वंशधरों पर लगे जो सदा अपना धन मुकदमें बाजी में लगाकर स्वाहा करते हैं ओर खाली हो जाने पर लोगों को आपस में लड़ाकर घर फूंक देखते हैं। उनको अदालत का दरवाजा देखे बिना रोटी हजम नहीं होती। बात-बात में मुकदमा लड़े बिना पानी नहीं पचता।
छठा टैक्स उनी धनी धनदूसरों पर लगे जो बैकुण्ठ के गुमाश्ते बनाकर काशी, मथुरा, प्रयाग, पुरी, गया, रामेश्वर, द्वारिका आदि धामों में बैठकर यात्रियों को धेनु गाय की तरह फूंका देकर दुहते हैं और लोक शिक्षा, देश शिक्षा एवं सर्वाहित के लिए कौड़ी खरच करने में जिनकी नानी मर जाती है।
सातवां टैक्स उन नादिहंद करमुंहों पर लगे जो सालभर साहूकार की तरह नियम से अषवार डकारते चले जाते हैं लेकिन दाम देने के समय लुआठ दिखाते हैं, मांगने पर किवाड़ बंद कर लेते हैं, निवेदन करने पर निबुआ नून ट हो जाते हैं और नाट नोन चाटते हें और वी पी भेजने से कभी ले या नाट क्लेम्ड का जामा पहन कर घाघरे की आर में छिप जाते हैं।
इतना कह चुकने पर ‘एवमस्तु-एवमस्तु’ की इतनी बुलंद आवाज आई कि आसमान फटने लगा मैं भी आवाज सुनकर उठ बैठा तो देखा चौकीदार जागते रहो, जागते रहो, कहकर चिल्ला रहा था। अब कहीं न होली है न होली की आग है। होश में आया तो अभी फागुन की फसल चारों ओर हरी भरी खड़ी है। लोग खेत खलिहान में एंेडे़, गौंड़े, राह, घाट सर्वत्रा होरी और कबीर बोलते है। ‘यह सपना मैं कहों विचारी, होईहें सत्य गए दिन चारी’।
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बुधवार, 4 मार्च 2020

जिन्‍हें 42 गांव के लोग देवदूत मानते थे

दिशोम गुरु शिबू सोरेन के झारखंड आंदोलन के सिपहसालारों में एक नाम कालीचरण मांझी का भी शामिल था। 20 फरवरी 2020 को झारखंड आंदोलन का यह अनमोल रत्न खो गया। बोकारो जिले के जरीडीह प्रखंड के कुकुरतोपा गांव के फागु हांसदा के पुत्र कालीचरण मांझी खुद को जंगल का बेटा कहते थे। जंगल बचाने के अभियान के साथ-साथ अंधविश्वास, डायन प्रथा, नशाखोरी सहित अन्य सामाजिक बुराइयों के खिलाफ  भी लोंगो को जागरूक करने में तीस साल से लगे थे। झारखंड आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने वाले कालीचरण मांझी का रहन-सहन पचास साल पूर्व जैसा था। इनकी सादगी का अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि इनके तन पर केवल धोती और
माथे पर पगड़ी रहती थी। ये चप्पल तक नहीं पहनते थे। चाहे वह कंपकपाती ठंड हो या चिलचिलाती धूप। एक बार जरीडीह थाना के प्रभारी त्रिपाठी जी ने इन्हें लाल रंग का एक कुर्ता भी दिया, लेकिन इन्होंने उसे कभी पहना नहीं। मांस-मदिरा से दूर रहने वाले कालीचरण प्रतिदिन सुबह अपने घर का काम काज कर, जलपान कर अपने अभियान में निकल जाते थे। सुबह से शाम तक इस गांव से उस गांव तक भ्रमण करना इनकी दिनचर्या में शामिल थी। इनकी सेवा भाव को देख कर आस पास के 42 गांवों के लोग इन्हें देवदूत मानते थे।

कहा जाता है कि काला होने की वजह से माता-पिता ने इसका नाम काली रखा, लेकिन यही काली समाज में जागरूकता की किरणें बिखेरते रहे। उम्र के इस पचहत्तरवें पड़ाव पर भी वे बिल्कुल स्वस्थ थे। जीवन में इन्होंने कभी डॉक्टर से अपने लिए दवा नहीं ली थी। एक दो बार जब भी खेती किसानी में हल कुदाल से चोट लगी, जंगलों के जड़ी-बूटी से खुद इलाज कर लिया।
शिक्षा के नाम पर तीसरी कक्षा तक ही अक्षर ज्ञान हो पाया था। लेकिन हिंदी, संताली और बंगला और उर्दू के शब्दों और संस्कृत के श्लोक भी धारा प्रवाह बोल लेते थे। अपनी  कमाई का कुछ हिस्सा बीमार लोगों को अस्पताल पहुंचाने ओर जरूरतमंद गरीबों के आवेदन सक्षम अधिकारी तक पहुंचाने में खर्च कर देते थे।  अधिकारी भी इनकी बातों को बड़ी गंभीरता से सुनते थे, क्योंकि ये खुद के लिए नहीं, बल्कि गांव और ग्रामीणों के हित में कार्य करते थे। वे पूरे क्षेत्र में ये पर्यावरण मित्र और आदिवासी संस्कृति के रक्षक के रूप में जाने जाते रहे। इनके जेहन में गांव के बारे सोच था कि गांव का विकास हो, हिंसाविहिन हो, लोग गांव में मेल मिलाप के साथ अच्छी तरह से जीवन-यापन करे। संताली समाज के पंचायती में इन्हें लोग बुलाते रहे।
एक बार 1987 में इनकी बेटी की तबीयत खराब थी, ये आटा लाने के लिए बगल के गांव गोपालपुर गए थे, तो कुछ लोगों ने इसे जान से मारने की साजिश रची, लेकिन वे असफल रहे। ये जान बचाकर भागे। ये बगल के गांव कुलांगगुटू के एक घर में जा छिपे। वहां से इन्हें रामसुंदर बेसरा और चतुर बेसरा ने इन्हें इनके गांव तक पहुंचाया। अपनी जान बचाने के लिए उस रात इन्हें साड़ी पहन कर छद्म वेश में अपना घर आना पड़ा। 2010 में मुखिया का चुनाव और 2015 में जिला परिषद का चुनाव भी लड़ा, लेकिन इन्हें सफलता नहीं मिली। 1970 से ये वन बचाओ आंदोलन से जुड़े रहे। इनका कहना था कि वन नहीं रहने से मानव का कल्याण नहीं हो सकता है। जीवन के हर मोड़ पर हमें इनकी जरूरत पड़ती है। सुबह उठकर दतवन भी हमें जंगल से ही मिलती है। शादी विवाह में मंडप के लिए डाली पत्ता जंगल से ही मिलती है। लड़की की शादी में महुआ डाली और लड़के के शादी में आम की डाली, भोज के लिए सखुआ का पत्ता भी हमें इसी जंगल से ही मिलता है।                                                                     
-मनोज कुमार कपरदार

शुक्रवार, 21 फ़रवरी 2020

झारखंड के कण-कण में शिव की व्‍याप्ति

झारखंड का कंकर कंकर शंकर है। जहां देखिए, जहां खोदिए, वहीं कोई न कोई शिव लिंग का दर्शन हो जाता है। शिव का एक नाम झारखंडे भी है। अपने पूर्वी उत्तरप्रदेश में कई लोगों के नाम झारखंडे है। राज्य का नाम भी झारखंड। राज्य के नामकरण के पीछे शिव हैं या यहां का झाड़-झंखाड़, कहना मुश्किल है। हिंदी के महान कवि जयशंकर प्रसाद का एक नाम झारखंडे था। प्रसाद के पिता जी ने देवघर के बाबा शिव से आरजू की थी। पुत्र हुआ तो नामकरण देवघर में हुआ। देवघर शिव का घर है। वैसे, इसे देवताओं का घर भी कह सकते हैं। रांची पहाड़ी की सबसे ऊंची चोटी पर भगवान शिव विराजमान हैं। श्रद्धालु इन्हें पहाड़ी बाबा भी कहते हैं। यह मंदिर कितना प्राचीन है, कहना मुश्किल है। इस पहाड़ी की दूसरी गाथा भी है। अंग्रेजों ने कई स्वतंत्रता सेनानियों को यहीं पर फांसी पर लटकाया गया। रांची के बेड़ो महादानी शिव हैं। देवड़ी के पास हाराडीह में शिव मंदिर मिला है। आम्रेश्वर धाम विख्यात है हीं। सोनाहातू गांव में भी प्राचीन शिव मंदिर है।

360 शिवलिंग
भगवान शिव के ही एक अंश माने जानेवाले अनन्य राम भक्त हनुमान का ननिहाल झारखंड में ही है। उसे आंजन ग्राम के रूप में जानते हैं। गुमला जिले के अवस्थित आंजन ग्राम ही माता अंजनी और हनुमान का जन्मस्थल माना जाता है। गांव की सीमा पर स्थित एक पहाड़ी को आंजन पहाड़ भी कहा जाता है, जिसमें एक गुफा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार उसी गुफा में भगवान रुद्र स्वरूप हनुमान का अवतार हुआ था। एक मान्यता के अनुसार इस गांव में प्राचीन काल में 360 तालाब व उतनी ही संख्या में शिवलिंग थे। माता अंजनी में भगवान शिव की अनन्य भक्ति थी, जो प्रतिदिन एक-एक तालाब में स्नान कर एक-एक शिवलिंग की पूजा करती थीं। अब भी गांव में सौ से अधिक शिवलिंग मौजूद हैं, जो विभिन्न आकार-प्रकार के हैं। अंजनी गुफा में प्राचीन काल से स्थापित अंजनी माता की सुंदर प्रस्तर-प्रतिमा को आंजन गांव में एक मंदिर बना कर स्थापित कर दिया गया है। साथ ही मंदिर में एक सुंदर प्रतिमा भी स्थापित की गई है। इस तीर्थ की सबसे बडी विशेषता यह है कि वहां स्थापित प्रतिमा में माता अंजनी शिशु हनुमान को स्तनपान कराती दिखाई गई हैं। कहते हैं, इस मुद्रा की प्रतिमा देश के अन्य किसी भी तीर्थ में सुलभ नहीं है। आंजन ग्राम को भगवान शिव के श्रद्धालु भक्त विशेष फलदायक तीर्थ मानते हैं। ऐसा विश्वास है कि अंजनी गुफा के अंदर ही अंदर एक सुरंग है, जो पास बहने वाली खटवा नदी तक जाती है तथा जिससे होकर अंजनी माता नदी तक स्नान करने जाती थीं। अभी भी दूर दराज से लोग अंजनी माता के दर्शन करने आते हैं तथा खटवा नदी में स्नान कर भगवान शिव की पूजा-अर्चना करते हैं। इस स्थान को सिद्ध स्थल माना गया है और ऐसा विश्वास है कि यहां मनौतियां बहुत जल्दी फलवती होती हैं। विशेष कर सुयोग्य पुत्र प्राप्त होने की मनौती। गुमला में ही टांगीनाथ मंदिर है। इसे 12 वीं शताब्दी का माना जाता है। पहाड़ की चोटी पर स्थित मंदिर के पास एक विशाल त्रिशूल है। इस पहाड़ पर हजारों शिवलिंग बिखरे पड़े हैं। जहां खुदाई कीजिए, एक शिवलिंग निकल आता है।
गुमला के ही सिसई प्रखंड के नागफेनी गांव में प्रसिद्ध शिव मंदिर है। माना जाता है कि झारखंड में शैव मत वाले सर्वाधिक थे। इसीलिए यहां पर शिव लिंग काफी संख्या में मिलते हैं।

लोहरदगा के खखपरता शिव मंदिर के परिसर में सातवीं शताब्दी की 6 मूर्तियां मिली हैं। यहां मंदिर को भव्य रूप दिया गया और इस पर ओडिया शैली का प्रभाव है। यह अब पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित है।
हजारीबाग में बाराकर नदी के पास दूधपानी नाम की जगह है। वहां से 1894 में कुछ अभिलेख मिले थे। लिपि के आधर पर अभिलेख का काल 8वीं शताब्दी माना गया है। दूधपानी के पास ही दुमदुमा है। वहां पालकालीन (8वीं से 12वीं शताब्दी) मूर्तियां, पत्थर के अवशेष और शिवलिंग प्राप्त हुआ है। इसी जिले के मांडू प्रखंड के तिलैया गांव में तीन सौ साल पुराना शिव मंदिर है। विष्णुगढ़ में भी शिव का प्राचीन मंदिर है। गढ़वा के भवनाथपुर, कोडरमा, पूर्वी सिंहभूम के चित्रेश्वर मंदिर, धनबाद के झिझनी पहाड़ी पर 11 वीं शताब्दी का शिव मंदिर, राजमहल की पहाड़ी का शिव गद्दी, ढालभूम का कपिलेश्वर मंदिर अपने अतीत की याद दिलाते हैं। बेनी सागर की खुदाई में कई शिव मंदिर मिले हैं, मिल रहे हैं। बासुकी नाथ को कौन भूल सकता है।
रामगढ़ का प्राचीन कैथा मंदिर भी शिव को समर्पित है। इसी जिले में  पंद्रह सौ वर्ष पुरानी टूटी झरना मंदिर भी है। मंदिर की सबसे बड़ी खासियत यह है कि मां गंगा जल अर्पित करती हैं। शिव लिंग पर एक टूटी है, जिससे पानी निकलते रहता है। लोग मानते हैं कि इसका स्रोत गंगा हैं। कोडरमा का ध्वजाधारी धाम भी प्राचीन है। यहां जिले के अलावा गिरिडीह, हजारीबाग, धनबाद, बिहार के नवादा व गया से सैकड़ों की संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। ध्वजाधारी धाम में 777 सीढ़ी चढ़कर श्रद्धालु बाबा भोले को जलाभिषेक करते हैं।

सोमवार, 10 फ़रवरी 2020

पूर्वोत्‍तर में दो ऐतिहासिक समझौते

-ए. सूर्यप्रकाश

ऐसे समय में जब नागरिकता संशोधन विधेयक (सीएए) के बारे में भ्रामक प्रचार किया जा रहा है और कुछ लोगों की शय पर इसे वापस लेने के लिए आंदोलन चलाया जा रहा है, नरेन्‍द्र मोदी सरकार पूर्वोत्‍तर में अल्‍पसंख्‍यकों और जातीय विवादों से जुड़े लम्बित मुद्दों के समाधान के लिए शांतिपूर्वक अपना कार्य कर रही है।
हालांकि, सीएए सुर्खियों में है, केन्द्रीय गृह मंत्री श्री अमित शाह ने 50 वर्ष पुरानी बोडो समस्‍या और त्रिपुरा में ब्रू-रियांगों के पुनर्वास के 23 वर्ष पुराने मुद्दे को समाप्‍त करने के लिए दो महत्‍वपूर्ण समझौतों पर हस्‍ताक्षर करने का संचालन किया।
बोडो से जुड़ा जातीय विवाद अब तक 4000 से ज्‍यादा लोगों की जान ले चुका है, लेकिन हाल ही के समझौते के साथ, समस्‍या का एक स्‍थायी समाधान ढूंढ़ लिया गया है। भारत सरकार, असम सरकार और बोडो उग्रवादियों के बीच हुए एक ऐतिहासिक समझौते के अंतर्गत, केन्‍द्र ने बोडो इलाकों में कुछ विशेष परियोजनाओं के विकास के लिए 1500 करोड़ रुपये का विकास पैकेज देने की प्रतिबद्धता व्‍यक्‍त की है। बदले में, करीब 1500 सशस्‍त्र कैडर हिंसा त्‍याग देंगे और मुख्‍यधारा में शामिल हो जाएंगे। समझौते के बाद सरकार ने कहा कि बोडो द्वारा रखी गई मांगों के लिए एक विस्‍तृत और अंतिम समाधान ढूंढ़ लिया गया है। अब, अनेक वर्षों के विवाद के बाद, बोडो गुट हिंसा का रास्‍ता छोड़ देंगे, हथियार डाल देंगे और अपने संगठनों को बंद कर देंगे। केन्‍द्र और असम सरकार इन कैडरों में से 1500 के पुनर्वास के लिए कदम उठाएगी।
इस ऐतिहासिक बोडो समझौते से कुछ दिन पूर्व, गृह मंत्री श्री अमित शाह ने इन शरणार्थियों के 23 वर्ष पुराने संकट को समाप्‍त करने के लिए केन्‍द्र सरकार और त्रिपुरा तथा मिजोरम की सरकारों और ब्रू-रियांग के प्रतिनिधियों के बीच नई दिल्‍ली में समझौते पर हस्‍ताक्षर के दौरान उसका संचालन किया था। इस समझौते से त्रिपुरा में ब्रू-रियांग स्‍थायी रूप से बस सकेंगे और पुनर्वास पैकेज में 600 करोड़ रुपये की लागत आएगी।
ब्रू-रियांग शरणार्थियों की 23 वर्ष पुरानी समस्‍या नासुर बन गई थी। मिजोरम में 1997 में उत्‍पन्‍न जातीय तनाव के बीच उस वक्‍त इसकी उत्‍पत्ति हुई, जब करीब करीब 30,000 सदस्‍यों के साथ 5000 परिवार राज्‍य से भाग गए और उन्‍होंने त्रिपुरा में शरण ले ली। इन लोगों को उत्‍तरी त्रिपुरा में अस्‍थायी शिविरों में रखा गया। चूंकि विस्‍थापित जनजातियों की समस्‍या बनी हुई थी, 2010 के बाद ब्रू-रियांग के पुनर्वास के लिए कुछ प्रयास किए गए। 5000 परिवारों में से, करीब 1600 परिवारों को मिजोरम वापस भेज दिया गया और केन्‍द्र सरकार ने त्रिपुरा और मिजोरम सरकारों की सहायता की पहल की। मोदी सरकार की पहली प्रमुख पहल जुलाई, 2018 में देखने को मिली, जब सरकार ने एक समझौते पर हस्‍ताक्षर किए, जिसके परिणामस्‍वरूप इन परिवारों को दी जाने वाली सहायता बढ़ा दी गई। इसके बाद 1369 सदस्‍यों के साथ 328 परिवार मिजोरम लौट आए, लेकिन इसके बाद ब्रू आदिवासी एक ऐसा समाधान चाहते थे, जिससे वे त्रिपुरा में स्‍थायी रूप से बस सकें। उनका मानना था कि वे राज्‍य में अधिक सुरक्षित रहेंगे।
नवीनतम समझौते से करीब 34,000 ब्रू-रियांग लाभान्वित होंगे, जो त्रिपुरा में छह शिविरों में रह रहे हैं।
जनजातीय अनुसंधान और सांस्कृतिक संस्थान, त्रिपुरा के अनुसार त्रिपुरा में रियांग दूसरा सबसे बड़ा जनजातीय समुदाय है और उसे भारत के 75 आदिम आदिवासियों में से एक के रूप में मान्‍यता दी गई है। ऐसा कहा जाता है कि रियांग म्‍यांमार के शान राज्‍य से आए, चटगांव पहाड़ी क्षेत्रों और उसके बाद त्रिपुरा चले गए। एक अन्‍य समूह था, जो 18वीं शताब्‍दी के दौरान असम और मिजोरम के रास्‍ते त्रिपुरा आया।
संस्‍थान का कहना है कि रियांगों की आबादी 1.88 लाख है और वे दो प्रमुख कुटुम्‍बों मेस्‍का और मोल्‍सोई में बंटे हुए हैं। ये अभी भी खानाबदोश आदिवासी हैं और इनकी बड़ी संख्‍या पहाड़ की चोटियों में झूम खेती पर निर्भर करती है। इनकी भाषा कोबरू के नाम से जानी जाती है। इनकी एक बड़ी आबादी वैष्णव सम्‍प्रदाय की अनुयायी है। रियांग के लोक जीवन और संस्‍कृति में उत्‍कृष्‍ट सांस्‍कृतिक संघटक है। इनमें सबसे लोकप्रिय होजागिरी नृत्‍य है, जिसे बांसुरी की मधुर धुन के साथ किया जाता है।
गृह मंत्री श्री अमित शाह के अलावा इस ऐतिहासिक हस्‍ताक्षर समारोह में त्रिपुरा के मुख्‍यमंत्री बिप्‍लव कुमार देव, मिजोरम के मुख्‍यमंत्री जोरम थंगा, पूर्वोत्‍तर लोकतांत्रिक गठबंधन के अध्‍यक्ष हिमंत बिस्‍व सरमा, त्रिपुरा के शाही परिवार के वंशज प्रद्योत किशोर देव बर्मा और ब्रू प्रतिनिधि मौजूद थे।
समझौते के अनुसार त्रिपुरा में रह रहे ब्रू परिवार के प्रत्‍येक सदस्‍य को एक भूखंड, चार लाख रुपये का फिक्‍स्‍ड डिपोजिट, दो वर्ष के लिए प्रति माह 5000 रुपये, दो वर्ष के लिए मुफ्त राशन और अपना घर बनाने के लिए 1.5 लाख रुपये दिये जाएंगे। भूखंड त्रिपुरा सरकार द्वारा प्रदान किया जाएगा।
गृह मंत्रालय ने ब्रू आदिवासियों के सामने मौजूद समस्‍या को समाप्‍त करने के लिए गंभीर प्रयास शुरू कर दिए थे। गृह मंत्री श्री अमित शाह ने कुछ माह पूर्व दोनों राज्‍य सरकारों और ब्रू लोगों को एकसाथ लाने का फैसला किया। उन्‍होंने ब्रू लोगों के मिजोरम में पुनर्वास के प्रयासों की बजाय उन्‍हें त्रिपुरा में बसाने की पहल को समर्थन देने के लिए त्रिपुरा के नरेश और विभिन्‍न आदिवासी समूहों से भी बातचीत की। जैसा कि श्री शाह ने हाल ही में हस्‍ताक्षर किये गये समझौते के बाद कहा, यह प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी की ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्‍वास’ नीति और पूर्वोत्‍तर के लम्बित विषयों के समाधान पर उनके जोर देने का हिस्‍सा है।
दोनों समझौतों से नरेन्‍द्र मोदी सरकार की कुशाग्रता का पता लगता है, जो पूर्वोत्‍तर के लम्बित विषयों का समाधान करना चाहती थी और इन राज्‍यों को विकास के ऊंचे रास्‍ते पर ले जाना चाहती है।
फिर भी पूर्वोत्‍तर में इन सकारात्‍मक पहलों से बेखबर, कुछ असंतुष्‍ट अल्‍पसंख्‍यक गैर-मुद्दों पर आंदोलन जारी रखे हुए हैं।
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Chairman, Prasar Bharati

;ये लेखक के अपने निजी विचार हैं। इसके प्रकाशित तथ्‍यों के लिए वे खुद उत्‍तरदायी हैं। ब्‍लागर की सहमति जरूरी नहीं।

रविवार, 9 फ़रवरी 2020

तेलंगा खडिय़ा के वंशजों की कौन सुध लेगा

झारखंड में शहीदों के प्रति वह सम्मान नहीं दिखता, जो दूसरे प्रदेशों में दिखता है। देश-समाज के लिए शहीद हुए वीर पुरुष यहां आदिवासी बनाम गैरआदिवासी में बंटे हुए हैं। किस-किस शहीद को याद करना है, किनकी स्मृति में सभा-गोष्ठी करनी है, यह सब कुछ हम अपने पूर्वाग्रह के हिसाब से तय करते हैं। इसलिए, झारखंड के बहुत से नायकों के जीवन के बारे में मुकम्मल व प्रामाणिक जानकारी नहीं मिल पाती। इस राज्य को बने भी अब दो दशक हो गए, लेकिन जो सरकारें यहां आती-जाती रहीं, उनकी चिंता में भी कर्मकांड से अधिक कुछ नहीं रहा। बहुत हुआ तो बेढंग की प्रतिमा लगवा दी और शहीद के गांव को आदर्श गांव का दर्जा दे दिया, लेकिन इसके बाद गांव की सुधि कोई लेता नहीं। शहीद के वंशज हैं तो उन्हें भी घोषणाओं की लड़ी थमा देना है। बस।   
रविवार को हमने अमर शहीद तेलंगा खडिय़ा का 215 वां जन्मदिन मनाया, लेकिन गुमला जिले के सिसई प्रखंड का मुरगू गांव आज भी उपेक्षित व बदहाल है। इसी गांव में 215  साल पहले तेलंगा खडिय़ा का जन्म हुआ था। 9 फरवरी 1806 को जन्म हुआ था। पिता का नाम ठुइंया खडिय़ा व माता का नाम पेटी खडिय़ा था। पत्नी का नाम रतनी खडिय़ा, दादा का नाम  सीरु खडिय़ा व दादी का नाम  बुची खडिय़ा। सुदूर गांव के इस नायक ने अंग्रेजों से लोहा लिया था, तब जब कोई साधन नहीं रहा होगा। जब आज भी गांव उपेक्षित है तो दो सौ साल पहले साधनों का क्या हाल रहा होगा, इसकी कल्पना कर सकते हैं।
पर, दुख इस बात का है कि जिसने एक सुंदर भारत का स्वप्न देख शहीदी को गले लगाया, उसके वंशज आज दर-बदर हो रहे हैं। तेलंगा खडिय़ा के परिवार और उनके वंशजों को आज भी सरकार की ओर से कोई सुविधा या काम उपलब्ध नहीं हो सका। हमारी सरकार को भी पता होना चाहिए कि तेलंगा खडिय़ा के शहीद होने के बाद अंग्रेजी हुकूमत में स्थानीय जमींदारों की मदद से खडिय़ा परिवार को मुर्गू गांव से खदेड़ दिया गया था। उनकी जमीन भी हड़प ली गई। घर को बर्बाद कर दिया गया। अब मुर्गू गांव में शहीद तेलंगा खडिय़ा की एक प्रतिमा है, जहां जयंती व पुण्यतिथि पर दो फूल लोग चढ़ा आते हैं। उनके वंशज सिसई प्रखंड के पहाड़ और जंगल से घीरे गांव घाघरा में जाकर  रहते हैं। गांव में जाने के लिए सड़क की स्वीकृति मिले सालों हो गए, लेकिन सड़क नहीं बन पाई। तेलंगा खडिय़ा के वंशज सोमरा पहान कहते हैं कि बड़ा विचित्र हाल है। उन लोगों का हाल देखने सुनने और जानने के लिए न कोई अधिकारी आता है और न ही कोई विधायक सांसद ही। सबके सब शहीद तेलंगा खडिय़ा का गुणगान करते हैं कभी मन हुआ तो धोती चादर ओढ़ाकर सम्मान करते हैं, इससे आगे कुछ नहीं। तेलंगा खडिय़ा के वंशज जरगो पाहन, सुमेश खडिय़ाइन, चामा खडिय़ा, सुका खडिय़ा, प्रधान खडिय़ा, सोहरी खडिय़ा, गंगा खडिय़ा, बिरसा खडिय़ा, शनिचरवा खडिय़ा, वासु खडिय़ा, मोना खडिय़ा, करमचंद खडिय़ा, मांगू खडिय़ा, तेवस खडिय़ा, घासी खडिय़ा, संतोष खडिय़ा,जोगिया खडिय़ा, बिनू खडिय़ा, संजु खडिय़ा की कोई खोज-खबर भी नहीं लेता।
तेलंगा ने गुरिल्ला लड़ाई लड़ी थी। कुम्हारी से गिरफ्तार हुए थे अबौर लोहरदगा में मुकदमा चला था। 14 साल की सजा हुई। सजा काटकर आए तो उनके विद्रोही तेवर और भी तल्ख हो गए। विद्रोहियों की दहाड़ से जमींदारों के बंगले कांप उठे। जोड़ी पंचैत फिर से जिन्दा हो उठा और गुरिल्ला युद्ध प्रशिक्षणों का दौर शुरू हो गया। बसिया से कोलेबिरा तक विद्रोह की लपटें फैल गईं। बच्चे, बूढ़े, महिलाएं, हर कोई उस विद्रोह के लिए उठ खड़ा हुआ। तेलंगा जमींदारों और सरकार के लिए एक भूखा बूढ़ा शेर बन चुके थे। दुश्मन के पास एक ही रास्ता था- तेलंगा को मार गिराया जाए। 23 अप्रैल 1880 को तेलंगा समेत कई प्रमुख विद्रोहियों को अंग्रेजी सेना ने घेर लिया। तेलंगा गरजा-हिम्मत है तो सामने आकर लड़ो। कहते हैं तेलंगा की उस दहाड़ से इलाका थर्रा गया था। युद्ध कौशल से प्रशिक्षित विद्रोहियों से सीधी टक्कर लेने की हिम्मत दुश्मन में नहीं थी। सिपाही बेधन सिंह ने झाडिय़ों में छिपकर तेलंगा की पीठ पर गोली चला दी। बेहोश तेलंगा के पास आने की भी हिम्मत दुश्मनों में नहीं थी। मौके का फायदा उठाकर विद्रोही तेलंगा को ले जंगल में गायब हो गए। तेलंगा फिर कभी नजर नहीं आए। कहते हैं कि वह तारीख 23 अप्रैल 1880 थी। उन्हें गुमला के चंदाली में दफनाया गया। खडिय़ा लोकगीतों में आज भी तेलंगा जीवित हैं। 

बुधवार, 5 फ़रवरी 2020

आदिम जनजाति कोरवा की जंगल से होती है भूख शांत


कोरवा आदिम जनजाति है। माना जाता है कि यह झारखंड में मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ़ से आई है। कोरवा भी मुंडा जनजाति की उपशाखा है। इनका संबंध महान कोलेरियन प्रजाति से है। गढ़वा के 12-13 गांवों में इनकी प्रमुख आबादी है। वैसे, लातेहार, पलामू, चतरा, कोडरमा, दुमका व जामताड़ा में भी कोरवा रहते हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार इनकी आबादी महज 35606 है। आजादी के सात दशक बाद भी गढ़वा जिला मुख्यालय से 80 किमी दूर बडग़ड़ प्रखंड में कई पीढिय़ों से रह रहे आदिम जनजाति कोरवा की स्थिति में जस की तस है। दर्जनों योजनाएं यहां तक पहुंच ही नहीं पाती। सरकार भी सोचती है, इतनी दूर क्यों जाना? सो, योजनाओं का लाभ भी ठीक से नहीं मिल पाता। अधिकारियों की मजबूरी या फिर कोटा पूरा करने की गरज से कोई अधिकारी इधर पहुंच गया तो कुछ लाभ इन्हें मिल पाता है। वही काम करते हुए, जो उनके पुरखे करते आ रहे थे, उसी से दो जून की रोटी का जुगाड़ होता है और पेट की भूख शांत। 
जंगल व पहाड़ों में वे सदियों से जीते आ रहे हैं। जंगल ही इनका पेट पालता आ रहा है। रहन-सहन में भी कोई खास बदलाव नहीं आया है। तन ढंकने के लिए अभी भी वही फटे पुराने कपड़े व गंजी, लुंगी। अभी यह जनजाति 15 साल पहले बने बिरसा आवास में रहती है। इसकी हालत भी अब खस्ता हो चुकी है। आर्थिक उपार्जन का मुख्य स्रोत वनोत्पाद महुआ, डोरी, सत्तावर, लासा, तेंदु पत्ता, महुलाम पत्ता, पलाश फूल, सूखी लकडिय़ां ही हैं, जिन्हें बेचकर अपनी दैनिक व आवश्यक जरूरतों को पूरा करते हैं। आज भी कंदा गेठी उनका मुख्य आहार बना हुआ है।

पहाड़ी की तलहटी में आवास
कोरवा प्रखंड क्षेत्र में अधिकांशत: पहाड़ी की तलहटी में बसी है। बडग़ड़ प्रखंड क्षेत्र में आदिम जनजाति परिवार की कुल आबादी लगभग 350 है। वे वर्तमान में कोरहट्टी, कोचली, कोरवाडीह, बहेराखांड़, टोटकी, मदगडी़, संगाली, सरुअत, हेसातु आदि गांव में रह रहे हैं। सरकार द्वारा प्रदत्त सुविधाए इनके गांवों में नगण्य ही हैं। गांवों में पहुंच पथ का घोर अभाव है। आज भी लोग कच्चे रास्ते के सहारे आवागमन करते हैं। सरकारी योजनाओं में अभी तक इन्हें बिरसा आवास व खाद्यान्न योजना का ही लाभ मिल सका है।
 

महादेव-पार्वती की आराधना
 कोचली निवासी सुकन कोरवा, रामलाल कोरवा, सिकुन कोरवा, रुबी कोरईन, पार्वती देवी आदि कहती हैं कि जनवरी माह में सोहो का त्योहार मनाते हैं। इसमें वे सभी महादेव तथा पार्वती की आराधना करते हैं। पर्व के दिन गांव में सामूहिक भोज की व्यवस्था की जाती है, जिसमें आसपास के गांवों में बसे कोरवा समुदाय के लोग एकत्रित होते हैं। साथ ही सामूहिक रूप से ढोल, नगाड़ा व मांदर की थाप के बीच नृत्य-संगीत भी होता है। सरहुल व करमा भी धूमधाम से मनाते हैं। बोलचाल की भाषा कोरवा, नागपुरी या सादरी व हिंदी है। बीमार हो गए तो झोलाछाप चिकित्सकों की शरण लेनी पड़ती है। समुदाय अभी भी झाडफ़ूंक में भरोसा रखता है। कृषि के साथ मजदूरी भी करते हैं। कोरवा में शिक्षा का स्तर बहुत कम है। कोचली गांव में एक भी व्यक्ति स्नातक नहीं है और न ही सरकारी  नौकरी में। गांवों में शुद्ध पेयजल की भी व्यवस्था नहीं है। अभी भी लोग नदी-नालों के चुआंड़ी व कुआं का जल पीने को विवश हैं।

देवता का घर
कोरवा चाहे जंगल में रहे, पहाड़ की तलहटी में या मैदानी इलाकों में। उनका एक प्रमुख घर होता है, जिसे वे देवता का घर कहते हैं। वह इसलिए भी कहते हैं कि एक दीवार पर देवी-देवता का वास होता है। इसे भसार घर भी कहा जाता है, क्योंकि यहां भोजन बनाने के बाद रखा जाता है तथा यहीं से परोस कर खिलाया जाता है। इस घर को भंडार भी कहते हैं।

पर्व-त्योहार में बलि
कोरवा पर्व-त्योहार पर पाठा, बकरा, मुर्गा, सूअर, बत्तख की बलि दी जाती है। बरसात के दिनों में नदी, झरना, तालाब या खेत में मछली, केकड़ा, कछुआ तथा घोंघा पकड़कर उसे बनाकर खाते हैं। पर्व पर पीठा भी बनता है। कोरवा सामान रखने के लिए सूप, सुपली, दौरा, झापी, पैती, चटाई आदि रखते हैं। कोरवा के घरों में शिकार उपकरण के रूप में जाल, फंदा, चिलउन, बंसी, भाला, बरछा, तीर-धनुष व गुलेल रखते हैं। इनकी सहायता से ये शिकार करते हैं। 

घटती बढ़ती रही है आबादी
1872 में कोरवा जनजाति की आबादी 5,214 थी। 1911 में 13,920, 1931 में 13,021 1961 में 21,162, 1971 में 18,717, 1981 में 21,940 रही। इस तरह इनकी आबादी घटती-बढ़ती रही।

जेवर-गहना के प्रति लगाव
इस क्षेत्र में अन्य जातियों तथा जनजातियों के साथ रहने वाले कोरवाओं की स्त्रियों का भी जेवर-गहनों के प्रति लगाव है। निर्धनता के कारण ये चांदी के गहने पाने में असमर्थ हैं। इनके स्त्रियों के शरीर पर अधिकतर गिलट तथा तांबे के गहने होते हैं जो इन्हें आस-पास के साप्ताहिक बाजारों से उपलब्ध हो जाते हैं।
गोदना की परंपरा
अपना शारीरिक सौंदर्य बढ़ाने के ख्याल से अधिकांश कोरवा स्त्रियों गोदना गुदवाती है। गोदना सामान्यत: हाथ, सीने तथा घुटने से लेकर एड़ी तक गोदा जाता है। गोदने में अधिकतर हाथी, फूल तथा तारों के चित्र बनाये जाते हैं।
धार्मिक विश्वास
कोरवा विश्वास करते हैं कि उनके आवासों के आस-पास की पहाडिय़ों और वृक्षों पर देवता और आत्माएं निवास करती हैं। यदि समय पर उन्हें उचित तरीके से प्रसन्न नहीं किया गया तो पूरे गांव या परिवार पर प्राकृतिक आपदा और दैवी प्रकोप होगा। ये लोग विभिन्न धार्मिक क्रियाकलापों के माध्यम से अलौकिक शक्तियों के संपर्क में रहते हैं। सभी कोरवा अपने पूर्वजों की पूजा करते हैं। सिंगबोंगा (सूरज) इनका सर्वप्रथम देवता है। अन्य देवता जिनकी ये पूजा करते हैं उनमें चांद, धरती, दिहव, गोनहल, रखसाल, सावी, सतबह्नी, करमा और सरहुल आदि शामिल है।
जोहार से साभार



झारखंड का बेदिया आदिवासी हर 12 साल पर करता है सूर्याही पूजा

सूर्य पूजा की उपासना पूरी दुनिया में लोग करते हैं। दुनिया के आदिवासी भी अलग-अलग नामों से सूर्य की उपासना करते हैं। गायत्री मंत्र वस्तुत : सविता देवता की ही उपासना का मंत्र है। झारखंड के आदिवासी समुदाय भी सिंगबोंगा नाम से भगवान सूर्य की ही उपासना करते हैं। बिहार और यूपी में छठ की उपासना में सूर्य की ही पूजा की जाती है। इस पर्व की खासियत यह है कि यहां कोई पंडित नहीं होता। पहले डूबते सूर्य को अघ्र्य दिया जाता है और अगले दिन उगते सूर्य का। यह उपासना चार दिनों का होता है और पवित्रता का पूरा ख्याल रखा जाता है। लेकिन झारखंड के बेदिया आदिवासी भी सूर्य की पूजा करते हैं, लेकिन 12 साल पर। कहीं-कहीं तीन या पांच साल पर भी किया जाता है। इसे ये सूर्याही या सूरजाही पूजा कहते हैं। कहीं इसे पूर्णिमा के साथ मनाया जाता है तो कहीं कुल के पुजारी से बात करके दिन तय कर मनाया जाता है। हालांकि इसके लिए निर्धारित महीना माघ व वैशाख है। यद्यपि कभी-कभी इसका भी पालन नहीं किया जाता है। संकल्प के लिए सूर्याही स्थान पर लोग बकरा ले जाते हैं। यह स्थान गांव के बाहर होता है और यह उनकी जाति या कुल का स्थान होता है। इस स्थान पर कुल का बड़ा पुरुष, जो उपवास किए हुए होता है और पवित्रता का पालन करता है, बकरे का अभिषेक करता है। पहले पूजा के बाद बकरे को जंगलों में छोड़ दिया जाता था, लेकिन अब ऐसा देखा जाता है कि पूजा के बाद भी बकरे को बांध कर ही रख जाता है। पूजा की निर्धारित तिथि के आठ-दस दिन पहले ही जाति-बिरादरी वालों की शादी-विवाह की तरह ही न्योता देने का प्रावधान या परंपरा है। सभी लोग सूर्याही के लिए एकत्र होते हैं। बेदिया आदिवासियों द्वारा पारंपरिक रूप से सूर्याही पूजा में में बेदिया समाज के सगोत्र ही शामिल होते हैं। इसमें सगोत्र के रिश्तेदारों को भी निमंत्रण दिया जाता है। इसमें पुरोहित या पहान नहीं गोतिया के प्रमुख व परिवार की अगुवायी में ही पूजा करने की परंपरा है।
तीस घंटे का किया जाता है उपवास
छठ पूजा की तरह सूर्याही पूजा में भी लंबी उपासना व सूर्यदेव की पूजा की जाती है। सभी घरों से एक महिला व पुरुष (पति-पत्नी) 30 घंटे का उपवास रख पूजा करते हैं। उपवास से पूर्व संयोत भी करना होता है। उपासक अरवा चावल के आटा से पुआ बनाते हैं। शुरू के तीन से पांच पुआ बनाने में झंझरा का इस्तेमाल न कर हांथ से ही बनाते हैं। उसी पुआ को प्रसाद के रूप में ग्रहण कर संयोत कर उपवास करते हैं।
उगते र्सूय की होती है पूजा
पूजा के एक दिन पूर्व रात में उपासक पुजारी गांव के पूजा स्थल पर पहुंचते हैं। अरवा चावल (अक्षत) छींट कर सूर्यदेव को जगाते हैं। दीप जलाकर सुबह में पूजा करने व बलि चढ़ाने की आज्ञा लेते हैं। दूसरे दिन भोर में भगवान सूर्यदेव की पूजा व अराधना की जाती है।
बलि देने की परंपरा
सुबह भोर में पूजा करने के लिए पूजा स्थल पर जाने से पूर्व बलि देने वाले पशु को स्नान करा कर फूलमाला से संवारा जाता है। वहीं एक बच्चे को राजकुमार के रूप में तैयार कर उसे उसी पशु पर सवारी कर कर ढोल-ढाक बजाते हुए, सूर्यदेव का जय जयकारा करते पूजा स्थल ले जाया जाता है। कहीं-कहीं भगवान सूर्य को प्रसन्न करने के लिए सफेद बकरे की बलि दी जाती है, जबकि सूर्य को वैष्णव माना जाता है। जो परिवार बलि देता है, वह घर से दूर नदी किनारे चावल, सब्जी और खाना बनाने का सभी सामान, बर्तन भी ले जाता है। इसके बाद खाना वनाते औरा खाते हैं। बचे हुए मांस और खाना को जमीन में गड्ढा कर डाल देते हैं, ताकि कुत्ता भी न खा पाए।
सुख-समृद्धि की कामना
सिंदूर, धूप-धुअन, अगरबत्ती, आम पत्ता, वेलपत्र, दूध, चुका-ढकन, कसैली, अरवा चावल, सूप, टोकरी आदि जरूरी सामान से पूजा कर व पूजा स्थल में ही बलि दी गई पशु का प्रसाद सामूहिक रूप से सेवन करते हैं। आरा केरम के ग्राम प्रधान  गोपालराम बेदिया बताते हैं कि सूर्याही पूजा में सूर्यदेव की पूजा कर अपने कुटुंब व आने वाली पीढिय़ों के स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना की जाती है। अमृत बेदिया कहते हैं कि अकाल मृत्यु व विपदा से बचने के लिए सूर्याही पूजा की जा रही है। यह एक अद्भुत परंपरा है, जिसे बेदिया आदिवासी करते हैं।


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